गौरी तिवारी
ना अंत है इसका ना आरंभ है कोई
कथा है वह अनकही जिसे सुनना चाह हर कोई
वह चंद्र सा सुशोभित है
वह रागिनी कोई दीवानी सी
वह अनंत सा शिव है
वह सत्य सी सती है
हैं जटाओं में गंगा जिसकी
हैं केश में बंधे फुल उसके
हैं बाजुओं में रुद्राक्ष उसकी
तो करों में आभूषण उसके
है तांडव जिसके वेग में
वह शांत जैसे धरा सी
है ताप उसमें हलाहल का
है शीतल वह अमृत सी
वह भोर सा उजियारा है
वह संध्या की लालिमा सी
वह अटल है पर्वत सा
वह चंचल है लहरों सी
वह मौलिक है व्यक्तित्व से
है पारदर्शी वह दर्पण सी
भिन्न इनके रूप हैं
यह संगम ही अर्धनारीश्वर स्वरूप है
एक दूजे के बिना कुछ नहीं
एक दूजे से ही संपूर्ण हैं
वह प्रेम का आरंभ है
वह प्रतीक्षा के अंत सी
संहार का रूप हैं शिव
तो शक्ति का स्वरूप हैं सती
ना अंत है इसका ना आरंभ है कोई
कथा ये अनकही जिसे सुनना चाहे हर कोई
