ईरान संकट के कारण भारत को संतुलित करनी होगी अपनी विदेश नीति

अनिल तिवारी
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अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़ा घमासान जैसे-जैसे लंबा खींच रहा है एशियाई देशों में चिंता की लकीरें बढ़ती जा रही है। घरेलू और व्यावसायिक सिलेंडरों के दाम में सरकार द्वारा हाल ही में वृद्धि किए जाने के बावजूद भारत में तेल और गैस को लेकर पिछले कई दिनों से अफरा-तफरी का माहौल है। सरकार कह रही है की सब कुछ सामान्य है, लेकिन लोग सिलेंडर लेकर गोदाम के चक्कर काट रहे हैं। मैन्युफैक्चरिंग के सेक्टर में गिरावट आई है, आर्थिक मामलों के जानकार अर्थव्यवस्था की रफ्तार के ठीक-ठाक ने का अंदेशा भी व्यक्त कर रहे हैं।
करीब चार साल पहले जब रूस ने यूक्रेन पर हमला शुरू किया, तब भारत परेशानी में घिर गया था। दुनिया ने उस समय महामारी से उबरना शुरू ही किया था। भारतीय अर्थव्यवस्था को अच्छे बजट से रिकवरी की उम्मीद थी, लेकिन एक अनचाहे युद्ध ने उस पर पानी फेर दिया। देश एक बार फिर उसी स्थिति में खड़ा है। इस बार पश्चिम एशिया की वजह से मामला ज्यादा पेचीदा है।
अमेरिका- इस्राइल और ईरान के बीच चल रहा संघर्ष सीधे-सीधे दो ध्रुवों वाला मामला नहीं है। भारत के पास यह सुविधा भी नहीं है कि वह नैतिक सिद्धांतों पर बहस करे। वह खुद तूफान के पास खड़ा है। उसे तुरंत कुछ महत्वपूर्ण फैसले लेने होंगे। विदेश नीति की प्राथमिकताओं और रणनीतिक जरूरतों को नए सिरे से तय करना अब भारत के लिए जरूरी हो गया है।
भारत की सबसे बड़ी चिंता पश्चिम एशिया में संघर्ष के फैलने को लेकर है। इस रीजन में करीब एक करोड़ भारतीय रहते हैं। एक तरह से यह भारत की रणनीतिक भौगोलिक सीमा का विस्तार है। दांव पर केवल गोल्डन वीजा धारक या दुबई में दूसरा घर खरीद रहे अमीर ही नहीं हैं। खेती से लेकर ऊर्जा तक, भारत और खाड़ी देशों के बीच सप्लाई चेन बनी हुई है।
यह क्षेत्र भारत के लिए तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है। सऊदी अरब को लीजिए तो साल 2000 में भारत का निर्यात करीब एक अरब डॉलर था, जो अब बढ़कर 12 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यूएई और ओमान जैसे देश भारत के सबसे करीबी मित्रों में गिने जाते हैं। अबू धाबी के साथ शायद भारत का कोआर्डिनेशन सबसे तगड़ा है। वित्तीय लेनदेन, निवेश और भारतीय उद्योगों के लिए अरब देश बेहद महत्वपूर्ण हैं। यूएई में भारत के लोग कंस्ट्रक्शन साइट से लेकर कॉरपोरेट सेक्टर में ऊंचे पदों तक पर बैठे है। यूएई इसी वजह से भारत की ‘थिंक वेस्ट नीति का अहम हिस्सा है।
साल 2014 के बाद से भारत ने आधुनिकता की ओर बढ़ रहीं अरब राजशाहियों के साथ रिश्तों को मजबूत किया है। इसे केंद्र सरकार की अहम उपलब्धियों में से एक कहा जा सकता है। हालांकि इसकी शुरुआत पहले ही हो चुकी थी। वाजपेयी सरकार के समय विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने यूएई का दौरा किया था। मनमोहन सिंह के समय भी रिश्ते आगे बढ़े।
इस मजबूत रिश्ते के पीछे आपसी समझ और बदली वैश्विक परिस्थितियों की जरूरत थी। सब कुछ तेल पर निर्भर नहीं रहा और अमेरिका की भूमिका कम हुई। इसी वजह से भारत और यूएई ने सेमीकंडक्टर, एआई, ग्रीन एनर्जी और न्यूक्लियर टेक्नॉलजी जैसे क्षेत्रों में भी आपसी सहयोग बढ़ाया है। इसी तरह, पश्चिम एशिया के कई देशों के साथ भारत का रक्षा सहयोग भी बढ़ा है, खासकर मैरिटाइम क्षेत्र में। आज के समय में अमेरिका पहले की तरह सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पा रहा, इसलिए यह साझेदारी और भी जरूरी हो गई है।
लोग मानकर चल रहे थे कि अमेरिका में मंदी का दौर आएगा लेकिन उम्मीद थी कि धीरे-धीरे आएगी, ताकि उसे संभलने का मौका मिले। लेकिन, वॉशिंगटन के जल्दबाजी वाले रवैये ने अलग खतरा खड़ा कर दिया है। जब यह संकट खत्म होगा, तब भारत और उसके अरब साझेदारों को इस नई हकीकत को समझना होगा।

ईरान की बात करें तो भारत की नजदीकी तेहरान से उतनी नहीं है, जितनी अबू धाबी से, लेकिन दोनों के बीच हमेशा कामकाजी संबंध रहा है। भारत की क्षेत्रीय रणनीति का ईरान हिस्सा है और आगे भी रहेगा। ध्यान देने वाली बात है कि खुफिया सहयोग, सुरक्षा और अफगानिस्तान व मध्य एशिया जैसे पड़ोसी इलाकों में तालमेल के लिए दोनों देशों का साथ जरूरी है। ईरान के लोगों को लेकर आम भारतीयों के मन में सम्मान है।

हो सकता है कि भारत का रुख
अमेरिकी नीति-निर्माताओं के लिए समझना आसान न हो, लेकिन मतभेदों के बावजूद भारत अयातुल्लाह अली खामेनेई और ईरान के शीर्ष नेतृत्व की हत्या को एक गंभीर और लापरवाह कदम मानता है। हालांकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके समर्थित उग्रवादी समूहों को लेकर भारत को हमेशा से आशंका रही है। यूपीए सरकार के दौरान 2005, 2006 और 2009 में भारत ने आईएइए में ईरान के खिलाफ वोट भी किया था। यानी तब भी पश्चिम एशिया में कठिन संतुलन साधना पड़ा था।

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