अनिल तिवारी
“खूबसूरत रिवाज होता है प्रेम में, कभी न मिलने वालों की भी राहें देखी जाती है।”
आजकल सामाजिक संचार माध्यम (सोशल मीडिया) के मंचों पर इन पंक्तियों को बार-बार दोहराया जा रहा है। बेशक बहुत खूबसूरत और लाजवाब लाइनें है। यह एक प्रेम गीत है जिसमें बेहतरीन बिम्ब और बरबस लुभाने वाली व्यंजना के साथ विशुद्ध आध्यात्मिक चिंतन सहज रूप से शामिल है। कुछ लोग इसे गुलजार की शायरी से जोड़ते हैं लेकिन अधिकांश लोगों का दावा है कि यह लोक मन की उपज है और सामाजिक संचार माध्यमों के जरिए प्रसारित हो रहा है। ज्ञात हो कि अज्ञेय की कदाचित शीर्षक वाली कविताओं में भी इस तरह के भाव- प्रवाह बहुधा दिखाई देते हैं। इस तरह के ढेरों मसले हैं।
ऐसे लफड़ों को छोड़िए। हम लोग आम खाते हैं, पेड़ गिनने से क्या फायदा? वैसे भी जब से मोबाइल का चलन बढ़ा है और लोगों के मुट्ठी में दुनिया समाई है, स्मरण शक्ति वैसे ही नदारत हो रही है जैसे चील के घोंसले से धीरे-धीरे मांस। पहले ऐसी बीमारी एक उम्र के बाद आती थी, अब तो छोटे-छोटे बच्चे भी यहां रखी हुई चीज वहां ढूंढते मिलते हैं। धीरे-धीरे लोग भूल रहे हैं। या यह कहे कि
लोग भूल गये हैं। लोगों को भूलने की बीमारी है। भूल जाना भी चाहिए। जब तक भूलेंगे नहीं, इस कपटकायी संसार में नयी चीजें, नयी बयार, नये दस्तकों की आहट और आवक को आप महसूस कैसे करेंगे? दिमाग वैसे भी कोई आलू गोदाम तो होता नहीं। भूलना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि जहां बुनियाद होती है, उस ठौर को हर हाल में बचाया जाना चाहिए-आंधी, पानी, मौसम की संगदिली और दाहक स्मृतियों से, जो कब आ धमकेंगी और हमसे हमारा आपा छीन लेंगी, कोई नहीं जानता। उसे हर हाल में बियाबान होने से बचाना भी जरूरी है, ताकि वक्त कितना भी विपरीत हो, तीखा हो, क्रूर हो,परिंदों की परवाज़ बनी रहे, चहकता रहे आंगन और तुलसी के बिरवे संवाद करते रहें तितलियों से। पूछते रहें कि तुमने नदी देखी? तुमने बचपन के यार देखें? कभी ढाई अक्षर प्रेम का बांचा? तुमने गुलाम मंडी(संसद) देखी? तुमने बिकते हुए लोग देखे? तुमने क्रौंच वध देखा? क्या क्या देखा तुमने? यह तितली-तुलसी संवाद ही (चाहे काल्पनिक और मिथकीय जितना भी लगे) हमारे जीवन में रोज आकार लेते वक्त का बैरोमीटर है जो किरचों से बना है और जो आर-पार देख सकने की कला में प्रवीण है। ऐसी ही कुछ सघन किरचों से हमारा परिचय कराती है आप द्वारा भेजी गई उक्त पंक्तियां। इन पंक्तियों में क्या कुछ नहीं है! प्रेम है, प्रेम का रिवाज है, मौन अभिव्यक्ति के साथ प्रेमी से मिलने की तड़प है, और इस रिवाज को बदस्तूर कायम रखने के लिए राहें भी है। यह सर्वत्र पिन्हा हैं। अपनी पूरी आंतरिकता, पूरे द्वंद्व, पूरे ठाठ और पूरे ठसक के साथ।
इस पर ठहर कर बात होनी चाहिए क्योंकि ये पंक्तियां हम औसत लोगों के हालाते हाजरा पर तफ्सरा भी करती है और उन दुश्वारियों से आगाह भी करती है जो किसी कलाकार को, किसी चाहने वाले को मुकाम तक पहुंचने के टेढ़े मेड़े रस्तों में झेलनी होती हैं। यह कालिदास के उज्जयिनी जाने और राजकवि होने की कथा नहीं है। यह उससे भी पहले की कथा है। यह कालिदास के कालिदास बनने की कथा है। प्रेम को पाने की जिद और जुनून की कथा है। यह उस मेटल की कथा है जो किसी को कालिदास तो किसी को तड़ीपार की राह दिखाता है। यह कथा है एक कलाकार आशिक की जो ‘हम में तुम और तुम में हम’के दार्शनिक भाव से खुद को परिपाक करता है।
यह उस मंजर की कथा है जिसने औसत भारतीय समाज को दिया बहुत कम लेकिन लिया बहुत-बहुत अधिक।
जो लोग हिंदी कविताओं और शेरो शायरी की दुनिया को समझते बूझते है, वे इनका मर्म बहुत हद तक जानते हैं, उनके जेहन में इस तरह की पंक्तियां सीधे भीतर तक उतरती हैं और जो भी कहना है वह चुपके से कान में कह कर निकल जाती है। इन पंक्तियों में प्रेम का अनूप रूप है। इसके स्वरूप में विश्व रूप का दर्शन है। जार-बेजार इंतजार ही नहीं है, रिवाज को कायम रखने के लिए नसीहत भी है। हेरने का हांका प्रमाणिकता के साथ उपस्थित है। प्रत्यक्ष रूप से नहीं होने में भी होने का अप्रत्यक्ष बोध है।
“हालात कह रहे हैं, कि वह अब ना आएंगे/ उम्मीद कह रही है, जरा इंतजार कर//”
भंते, बिलावजह बात बढ़ रही है। चूंकि आरंभ में अज्ञेय जी की बात हुई है, इसलिए अंत भी उनकी कुछ पंक्तियों के साए में,
“आंखों ने देखा, पर वाणी ने बखाना नहीं।
भावना ने छुआ, पर मन ने पहचाना नहीं।
राह मैंने बहुत दिन देखी,
तुम उस पर से
आए भी, गए भी,
कदाचित कई बार..पर हुआ घर आना नहीं।।
लेकिन सच वचन तो काका कबीर ही कहते हैं-
साधु कहावत कठिन है, लंबा पेड़ खजूर।
चढ़े तो चाखे प्रेम रस, गिरे तो चकनाचूर।।।
