अनिल तिवारी
कानून की व्याख्या का एक स्वीकृत सिद्धांत है“उद्देश्यपरक व्याख्या”। इसका वास्तविक अर्थ यह है कि किसी अधिनियम को उस सामाजिक बुराई के आलोक में पढ़ा जाए जिसे समाप्त करने के लिए वह बनाया गया है। लेकिन हाल के कई एक निर्णयों में संबंधित अदालतों ने जरूरी नैतिकता के तकाजों को दरकिनार कर विधिक बारीकियों को तवज्जो दिया जिसे लेकर आम नागरिकों में संशय उत्पन्न हुए हैं।
किसी सभ्य समाज की न्याय-व्यवस्था बलात्कार जैसे अपराधों की व्याख्या करती है, तो वह केवल दंड संहिता की धाराओं का अर्थ नहीं तय करती
बल्कि यह भी निर्धारित करती है कि स्त्री-देह, बाल सुरक्षा और मानव गरिमा को वह किस स्तर का नैतिक संरक्षण देना चाहती है। न्यायालय की भाषा केवल विधिक नहीं होती; वह संवैधानिक दर्शन, सामाजिक चेतना और राज्य की नैतिक प्रतिबद्धता का सार्वजनिक उद्घोष होता है।
आईए इस कसौटी पर हाल के तीन उच्च न्यायालय निर्णयों को परखने की कोशिश करते हैं।
सबसे पहले, सतीश बनाम महाराष्ट्र राज्य प्रकरण में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ की न्यायमूर्ति पुष्पा वी. गनेड़ीवाला ने यह कहा कि यदि कपड़ों के ऊपर से स्पर्श हुआ है और “त्वचा से त्वचा” का संपर्क नहीं है, तो बाल लैंगिक अपराध संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) की धारा 7 के अंतर्गत वह “यौन आक्रमण” नहीं माना जाएगा। यह व्याख्या शब्दों के अत्यंत संकीर्ण पाठ पर आधारित थी—अर्थात् अधिनियम की भाषा को केवल उसके सतही व्याकरणिक ढांचे में पढ़ा गया।
यदि व्याख्या इस प्रकार सीमित कर दी जाए कि अपराध के आशय, हिंसा, से अधिक महत्व ‘तकनीकी’ संपर्क को मिल जाए, तो अधिनियम के उद्देश्य की आत्मा का गला घोंटना हो जाता है। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इसी तर्क को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि यौन आशय से किया गया स्पर्श, चाहे कपड़ों के ऊपर से हो, अधिनियम के अंतर्गत अपराध है। यह हस्तक्षेप इस तथ्य की पुष्टि था कि विधि का उद्देश्य शब्दों की संकीर्णता में नहीं, बल्कि बाल-सुरक्षा की व्यापकता में निहित है।
दूसरा प्रकरण क्रिमिनल रिवीजन नं. 1449/2024 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति राम मनोहर राम मिश्रा का है, जहाँ यह कहा गया कि नाबालिग के स्तन दबाना और पायजामे का नाड़ा तोड़ना “बलात्कार का प्रयास” नहीं, बल्कि केवल “तैयारी” है। आपराधिक विधि में “तैयारी” का वास्तविक अर्थ है—अपराध की योजना बनाना या साधन जुटाना; जबकि “प्रयास” वह निर्णायक चरण है जहाँ अपराध की पूर्ति के लिए प्रत्यक्ष और निकट कदम उठा लिया गया हो।
यहाँ प्रश्न यह उठता है कि जब अभियुक्त ने वस्त्र हटाने की दिशा में बलपूर्वक कदम बढ़ाया, तब क्या वह अपराध की पूर्ति के इतने निकट नहीं पहुँच चुका था कि उसे “प्रयास” माना जाए? आपराधिक न्यायशास्त्र में “निकटता का सिद्धांत” कहता है कि यदि कृत्य और अपराध-पूर्ति के बीच केवल बाह्य अवरोध शेष हो, तो वह प्रयास है, मात्र तैयारी नहीं।
इस आदेश पर व्यापक आपत्ति हुई और उच्चतर न्यायिक स्तर पर इसे पहले स्थगित और बाद में निरस्त किया गया।
यह विवाद इस बात का संकेत है कि व्याख्या में संतुलन का अभाव समाज के विश्वास को डगमगा सकता है।
ताज़ा निर्णय वासुदेव गोंड बनाम छत्तीसगढ़ राज्य में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अंतर्गत “अंत:प्रवेशन” अपराध का अनिवार्य तत्व है; यदि यह सिद्ध नहीं हुआ, तो अपराध बलात्कार नहीं बल्कि “बलात्कार का प्रयास” माना जाएगा। यह तर्क दंड संहिता की पारंपरिक संरचना पर आधारित है, जहाँ “प्रवेशन की किसी भी मात्रा” को पर्याप्त माना गया है।
परंतु यहाँ विमर्श का गहन प्रश्न यह है कि क्या बलात्कार की अवधारणा केवल शारीरिक प्रवेश की तकनीकी सिद्धि तक सीमित है या वह उस संपूर्ण हिंसक अतिक्रमण का द्योतक है जिसमें पीड़िता की इच्छा, गरिमा और स्वायत्तता का पूर्ण उल्लंघन होता है? यदि न्यायालय यह कहे कि प्रवेश सिद्ध न होने पर अपराध का शीर्षक बदल जाएगा, तो यह विधिक दृष्टि से तर्कसंगत हो सकता है; किंतु सामाजिक दृष्टि से यह पीड़िता की अनुभूति और अपमान की गंभीरता को कम करके आँकने जैसा प्रतीत हो सकता है।
यहाँ “ स्पष्ट व्याख्या” का सिद्धांत भी विचारणीय है। इसका वास्तविक उद्देश्य यह है कि किसी अभियुक्त को दंडित करते समय कानून को मनमाने विस्तार से न पढ़ा जाए। किंतु यह सिद्धांत तब लागू होता है जब अस्पष्टता अभियुक्त के विरुद्ध अनुचित विस्तार कर सकती हो। जब कानून का उद्देश्य स्पष्ट रूप से लैंगिक गरिमा की रक्षा है तब व्याख्या को संविधान की मूल भावना—समानता, गरिमा और जीवन के अधिकार के अनुरूप संतुलित करना न्यायालय का दायित्व है।
इन तीनों प्रकरणों को एक साथ देखने पर एक प्रवृत्ति स्पष्ट होती है, तकनीकी तत्वों पर अत्यधिक बल और सामाजिक-संवैधानिक उद्देश्य पर अपेक्षाकृत कम विमर्श। यह बात किसी एक न्यायाधीश की नहीं, बल्कि उस व्यापक न्यायिक पद्धति की है जहाँ कभी-कभी शब्द की संकीर्णता न्याय की व्यापकता पर भारी पड़ जाती है।
बलात्कार और लैंगिक अपराधों से संबंधित कानून केवल अपराधी को दंडित करने के लिए नहीं, बल्कि समाज को यह संदेश देने के लिए भी बने हैं कि स्त्री-देह और बाल-सुरक्षा पर किसी प्रकार का अतिक्रमण असहनीय है।
यदि व्याख्या बार-बार इस प्रकार की तकनीकी सीमाओं में उलझेगी तो यह संदेश जाएगा कि न्यायालय अपराध की संरचनात्मक हिंसा से अधिक उसकी प्रक्रियात्मक सूक्ष्मताओं पर केंद्रित हैं। न्याय की प्रतिष्ठा केवल विधिक शुद्धता से नहीं, बल्कि नैतिक संवेदनशीलता से भी बनती है। आवश्यकता इस बात की है कि न्यायिक व्याख्या “शब्द” और “उद्देश्य” के बीच जीवंत संतुलन स्थापित करे—ऐसा संतुलन जो अभियुक्त के अधिकारों की रक्षा करते हुए पीड़िता की गरिमा को केंद्र में रखे।
जब तक यह संतुलन पूर्ण परिपक्वता के साथ विकसित नहीं होगा तब तक ऐसे निर्णय समय-समय पर समाज में असंतोष और प्रश्न उत्पन्न करते रहेंगे। और यह प्रश्न किसी एक न्यायाधीश पर नहीं, सम्पूर्ण न्यायिक दर्शन पर उठेगा—क्या हम कानून की आत्मा को उसके अक्षर में समाहित कर पा रहे हैं या अक्षर की संकीर्णता में आत्मा को सीमित कर दे रहे हैं? यही वह बिंदु है जहाँ से गंभीर आत्ममंथन आरंभ होना चाहिए।
