जुर्म जिसकी माफी नहीं
अक्सर हमारे साथ ऐसी घटनाएं घटित होती हैं जिनका महत्व एक सागर में मोती के समान होता है लेकिन फिर भी दिन के 24 घंटों में घटित 5 से 10 मिनट की घटना पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता, जैसे चंद मिनटों में कही गई उस बात को हमने ऐसे भुला दिया हो मानो वह कभी बोली ही न गई हो। वही घाटना जब आए दिन दोहराने लगती है तो कहीं न कहीं हमारे आत्मसम्मान को छल्ली कर हमारा अस्तित्व धूमिल करने लगती है, फिर सिवाय पछतावे के कोई रास्ता नहीं बचता। और उस पछतावे का कारण है हमारा सभ्य समाज, जिसका उद्देश्य सिर्फ भय पैदा करना है, अब वो चाहे ईश्वर के प्रति, मनुष्य के प्रति, या फिर पशु के प्रति किया जाए लेकिन हाँ भय उत्पन्न सिर्फ एक के मन में किया जाता है, एक स्त्री के मन में। सदियों से यही तो रीति चली आ रही है, भय उत्पन्न करने वाला सदैव एक पुरुष रहा है और भयभीत होने वाली एक स्त्री। भय ऐसा उत्पन्न किया जाता है जो दिखने में कहीं से भी भय प्रतीत नहीं होता, भय की श्रेणी में नहीं आता सामान्य लगता है लेकिन उसका असर ऐसा होता है कि एक स्त्री, पितृसत्ता को, रुढ़ियों का पालन करने को और अत्याचार सहन करने को संस्कार मान लेती है और खुद ही अपना अस्तित्व भूल जाती है, वह भी इस हद तक कि उसकी सारी ज़िंदगी सिर्फ एक आज्ञाकारी बेटी, संस्कारी दुहिता और एक अच्छी माँ बनने तक सिमट कर रह जाती है। उसके द्वारा सोची गई हर बात, किए गए सारे प्रयास, उसके सपने अंत में आकर सिर्फ हमारे सभ्य समाज द्वारा बनाए गए मानकों की चार दीवार में कैद हो जाते हैं और दूसरी स्त्रियों से भी यही उम्मीद करने लगती है कि वे भी समाज द्वारा बनाई गई इन्हीं बेड़ियों में जकड़ी रहें। जिसका नतीजा यह होता है कि समाज के एक तबके द्वारा बड़ी ही सरलता से परिहास करते हुए कहा जाने लगता है ”एक स्त्री ही स्त्री की दुश्मन है” लेकिन वास्तविकता कुछ और है। असल में हमने शोषण को इतना सामान्यीकृत कर दिया है कि हम अपने आस-पास या फिर अपने साथ हो रहे शोषण को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, असली समस्या पर हमारा ध्यान ही केंद्रित नहीं हो पाता।
संसार का नियम है बदलाव, भले ही इसकी गति धीमी हो किंतु सृष्टि में हर क्षण कोई ना कोई बदलाव अवश्य होता है। इसी बदलाव के परिणाम स्वरुप तो पृथ्वी की रचना हुई, जीव उत्पन्न हुए, हमने बंदर से मनुष्य बनने का सफर तय किया, पाषाण युग से लौह युग फिर औद्योगिक क्रांति से आधुनिक युग में हमने प्रवेश किया। किंतु विकास की इस यात्रा में कहीं ना कहीं सदैव समाज के एक वर्ग का शोषण हुआ है, उसके अधिकारों का हनन हुआ है। जिस संसार में एक समय पर मात्र सट्टा का वर्चस्व था इस संसार में आज स्त्रियों को अपने अधिकारों के लिए लड़ना पड़ रहा है। जो स्त्री सदैव से चेतना का स्वरूप रही है उसे ही आज बड़ी सरलता से जड़ कह दिया गया है, ‘ *गृहस्वामिनी*’ का दर्जा देकर उसे चार दिवारी में कैद कर दिया गया है। ‘गृहस्वामिनी’ की उपाधि देकर ही उस पर इतना बड़ा उपकार कर दिया गया है कि उसका बोझ उससे उठाए नहीं उठता। पूरे घर की जिम्मेदारी उसे पर सौंप दी, इतना बड़ा भार दे दिया गया कि घर संभालते-संभालते उसके पास अपने लिए, अपने सपनों के लिए समय ही नहीं बचता और यदा-कदा यही गृहस्वामिनी यदि गलती से अपने गृह (घर) के लिए कोई निर्णय ले लेती है तो परिहास करते हुए कह दिया जाता है “तुम्हें क्या पता इन सबके बारे में”, “तुम तो पूरा दिन सिर्फ घर पर रहती हो”। आए दिन इसी गृहस्वामिनी के गृह में (उसके महल में) ही उसके आत्मसम्मान पर वार किया जाता है, कभी मानसिक प्रताड़ना के रूप में तो कभी शारीरिक प्रताड़ना के रूप में।
कई बार तो उसके लिए अपशब्दों तक का प्रयोग होता है और कुछ समय पश्चात यह कहकर भुलाने को कह दिया जाता है कि “गुस्से में बोल दिया”, उसपर हाथ उठाने के बाद उससे कह दिया जाता है “गुस्से में आपा खो दिया था गलती हो गई”, कुछ महानुभावों को तो अपनी गलती का एहसास ही नहीं होता, मानो उन्हें लगता हो कि ये तो उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। यह सिर्फ किसी एक देश या एक घर की घटना नहीं है अपितु हर देश हर धर्म में देखा जा सकता है कि शोषित वर्ग में स्त्रियां सबसे पहले आती हैं। यदि हम भारत की बात करें, तो यहां की एक बड़ी विचित्र रीति है, यहां स्त्रियों को या तो देवी की उपाधि दे दी जाती है या फिर एक झटके में कुलटा कहकर दानवी कहकर उसी स्त्री को आसमान से नीचे गिरा दिया जाता है, लेकिन स्त्री को मनुष्य नहीं समझा जाता। उससे सदैव यह अपेक्षा की जाती है कि वह त्याग करे, संस्कारों की आड़ में रूढ़ियों का पालन करे, वह सबको जोड़कर रखे तथा कई बार तो खुद का अस्तित्व भुला देने पर भी मजबूर किया जाता है। अक्सर देखा जा सकता है कि मोहल्ले में जब भी किसी घर में पति पत्नी के मध्य विवाद होता है, तब पता ही नहीं चलता वह विवाद कब लड़ाई का रूप ले लेता है और हिंसा में बदल जाता है, पुरुष अपनी पत्नी पर हाथ उठाता है, उसके लिए अपशब्दों का प्रयोग करता है और यदि उससे भी मन नहीं भरा तो उसके परिवार से लेकर पुरुखों तक को कोस देता है। पत्नी भी चुप नहीं रहती आखिर मनुष्य का स्वभाव है वह देव्य तो नहीं है, वह भी पलटकर जवाब देती है दो चार बातें बोलती है किंतु अपने पत्नी-धर्म की रेखा नहीं भूलती और अपने स्वामी की बराबरी नहीं करती। और फिर कुछ ही घंटों बाद वह स्त्री इस व्यक्ति के लिए खाना बनाती है, थक कर कहीं से आता है तो उसकी सेवा करती है, सारा दिन भूखे रहकर उसके लिए उपवास रखती है।
औसतन हर तीसरे घर में मासिक या साप्ताहिक यही होता है, हां, लेकिन लोगों की आर्थिक स्थिति से भी कई बार फर्क नहीं पड़ता क्योंकि कई बार आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्री से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वह साधारण मनुष्य नहीं अपितु महान बने और उस महानता के लिए उसे चाहे अपने स्वाभिमान को ही क्यों ना भुलाना पड़े।
लोग यह भूल जाते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी वाणी मानी गई है, शब्दों के माध्यम से ही वह अपने विचार भावनाएं और संवेदनाएं व्यक्त करता है। बचपन में पढ़ाई गई नैतिक सिख की पुस्तक में भी यही लिखा रहता था कि मनुष्य द्वारा बोला गया कोई भी शब्द, कोई भी ध्वनि सदैव इस ब्रह्मांड में विद्यमान रहती है। लेकिन फिर भी लोग जानबूझकर या अनजाने में किसी व्यक्ति को ऐसा कुछ कह देते हैं जो उसके आत्म सम्मान को कुचल देता है, बड़ी सरलता से किसी के लिए अपशब्द (गाली) का प्रयोग कर लेते हैं बिना यह सोचे कि उसका अर्थ क्या है और सामने वाले पर क्या असर पड़ेगा। यह भी बखूबी देखा जा सकता है कि लड़ाई भले ही 2 पुरुषों में हो रही हो किंतु उनके द्वारा कहे गए अपशब्दों में जिक्र हमेशा घर की स्त्री का ही होता है। लोग यह भूल जाते हैं कि जब यही शब्द क्रोध की आंच में तप कर बाहर आते हैं तो औषधि नहीं अपितु विष बन जाते हैं। यहां गलती सिर्फ उस व्यक्ति की नहीं है जिसने किसी के लिए अपशब्द कहा या किसी भी रूप में उसकी स्वाभिमान को छल्ली किया, अपितु कहीं ना कहीं गलती उनकी भी है जो यह सुनने के बाद भी खुद के लिए आवाज़ नहीं उठाते, कुछ ही समय में सब भूलकर दुबारा पहले जैसे व्यवहार करने लगते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो। क्योंकि ऐसा करना सामने वाले व्यक्ति को सा देना है और जब तक आप खुद का सम्मान नहीं करेंगे तब तक कोई दूसरा आपका सम्मान क्यों करेगा? आपका महत्व कैसे समझेगा? यह याद रखना होगा कि क्रोध में कहा गया कोई भी अपशब्द सिर्फ क्षणिक मनोभावों की अभिव्यक्ति नहीं होता, अपितु आत्मा पर वार करके उसे चोटिल करता है और एक ऐसा अपराध बन जाता है जिसे माफ करना अक्सर संभव नहीं होता और ना ही आसान होता है।
