ठीक नहीं है एआई के साथ मानव बुद्धि की तुलना

अनिल तिवारी

 

हमें यहां ठहर कर सोचना होगा। मानव बुद्धिमत्ता कोई व्यक्तिगत प्रतिभा नहीं, यह सामाजिक है। किसी वैज्ञानिक खोज से लेकर कला के क्षेत्र में हुई क्रांति तक, हर इंसानी उपलब्धि सामूहिक प्रयास का नतीजा है। कोई वैज्ञानिक अकेले काम नहीं करता। हर खोज के पीछे साझा तौर-तरीके, रिव्यू, संस्थान और पीढ़ियों का ज्ञान होता है। हमारी परंपराएं भी ऐसे ही चली आ रही है और भाषा जो दुनिया को जोड़े रखने का सशक्त माध्यम है, खुद में सामूहिक उपलब्धि है।
सामूहिक बुद्धिमत्ता पर हुए शोध
से पता चला कि अगर संवाद और सहयोग प्रभावी हो तो अलग-अलग समूह के लोग साथ काम करते हुए अपनी क्षमता से बढ़कर प्रदर्शन कर सकते है। हमारी बुद्धिमत्ता परिवारों, समुदायों, संस्थाओं और संस्कृतियों में है। एआई इस तरह की किसी सामूहिक दुनिया का हिस्सा नहीं। वह किसी समाज में नहीं रहता, जहां एक-दूसरे से सहयोग चलता हो। वह केवल डेटा के आधार पर उत्तर देता है। इसमें कोई समझ, इरादा या जिम्मेदारी नही होती। ऑस्ट्रेलिया की प्रमुख भाषाविद् सेलीस्टियल लारो का निष्कर्ष है कि इंसान की बुद्धि शरीर और अनुभव से जुड़ी होती है। हम बचपन से छूकर, चलकर, देखकर और दूसरों की नकल करके सीखते हैं। हमारी भावनाएं, अनुभव और समाज मिलकर हमारी सोच बनाते है। लेकिन एआई के पास न शरीर है, न असली अनुभव। वह सिर्फ बड़े डेटा से शब्दों के पैटर्न सीखता है। वह इंसानों की तरह समझता नहीं, बस गणना करता है। उसे डर, खुशी या सहानुभूति महसूस नहीं होती। वह समाज में रहकर नियम नहीं सीखता। यह कमी नैतिक मामलों में साफ दिखती है। इंसान सही-गलत का फैसला इतिहास, संस्कृति और समाज के आधार पर करता है – मशीने डेटा के आधार पर।

एक और बात है जिस पर कम ध्यान दिया जाता है कि एआई जिस डेटा से सीखता है, वह मानवता का बहुत छोटा-सा हिस्सा है। दुनिया में 7,000 से ज्यादा भाषाएं है, (सैकड़ो भाषाएं ऐसी है जिनकी लिपियां भी अब लुप्त हो गई है )लेकिन इंटरनेट का ज्यादातर कंटेंट सिर्फ कुछ बड़ी भाषाओं में है। करीब 80% कंटेंट तो महज 10 भाषाओं में है। संस्कृतियां, मौखिक परंपराएं और तमाम ज्ञान तो मशीन की पहुंच में है ही नहीं। इतने सीमित डेटा पर प्रशिक्षित एआई मॉडल इसीलिए एक छोटी आबादी से जुड़े परिणाम ही दिखाते है। इसके विपरीत मानव बुद्धि 8 अरब लोगों के जीवन अनुभव से बनती है। मशीन की इस विविधता तक सीधी पहुंच है ही नहीं। वह इंसानों के बनाए डेटा पर ही निर्भर है, लेकिन यह डेटा भी सीमित है। हाल ही में हुए एक शोध से चेतावनी मिली है कि हम लोग उपलब्ध डेटा की सीमा तक पहुंचने वाले है।

मेरे कहने का आशय यह नहीं कि एआई एक बहुत ही गैर-जरूरी है। इसके कुछ लाभ विकसित देशों ने पहले ही उठाया है। अब वह विकासशील देशों को इस दौड़ में शामिल कर अपना बाजार बढ़ाना चाहते हैं।एआई से बदली हुई उनकी दुनिया का अनुभव लोगों के पास है। उसे समझदार देश किसी भी स्तर पर सुलझा सकते हैं। असल खतरा यह नहीं है कि उनकी मशीनें अचानक से मानव को पीछे छोड़ देंगी, खतरा है कि कही इस शोर में हमारा वास्तविक मुद्दों से ध्यान न भटक जाए। ये मुद्दे है ऑटोमेटेड सिस्टम में पक्षपात, ताकत का केंद्रीकरण, मजदूरों का विस्थापन, नियम और समावेशी तकनीक की जरूरत, एक बहुत बड़ी आबादी को रोटी, कपड़ा, मकान, पढ़ाई और दवाई। क्या एआई में यह सब समझने और इसको सुलझाने की शक्ति है? अगर ‘हां’ तो वीर तुम बढ़े चलो। यदि उत्तर ‘ना’ में है या कोई अगर-मगर है तो अति उत्साह के बजाय रुकिए-ठहरिए- सोचिए क्योंकि ‘धीरे-धीरे रे मना धीरे-धीरे’ ही बनेंगे काम।

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