दर्द में जीने से अच्छा है सुकून से मरने का फैसला

अनिल तिवारी
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जीवन-मरण के प्रसंग में किसी ने महात्मा विदुर से पूछा कि मनुष्य क्यों जन्म लेता है? उनका उत्तर था, मरने के लिए।
प्रश्नकर्ता ने दोहराया कि जब जीवन का लक्ष्य मरना ही है तो फिर वह जीवन भर हाथ पैर किसलिए मारता है? उन्होंने कहा, अपनी मौत को शानदार बनाने के लिए। यानी कि सिर्फ सांस लेना, रोजमर्रा का काम निपटा लेना ही जीवन का सार नहीं है, सम्मान के साथ विदाई का हक हासिल करना ही पूरी जिंदगी की भाग दौड़ का मकसद है।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने एक अत्यंत मानवीय फैसले से पिछले 12 साल से मृत्यु का अंतहीन इंतजार कर रहे हरीश राणा को गरिमा के साथ जीवन के जरा-मरण से मुक्ति की अनुमति दे दी है। 32 वर्ष के हरीश राणा पंजाब विश्वविद्यालय के बीटेक के छात्र हैं, पढ़ाई के दौरान चौथी मंजिल से गिरने पर मस्तिष्क में लगी चोट के कारण लगातार कोमा में है। वे 12 वर्षों पर जीवन रक्षक प्रणाली पर हैं जहां धड़कन तो है पर जिंदगी कहीं नहीं है।
वर्ष 2013 में गाजियाबाद से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने चंडीगढ़ गए छात्र हरीश राणा हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए। इस दौरान उनके सिर पर गंभीर चोट आईं और वह कोमा में चले गए। पिछले 13 साल से वह कोमा में हैं। लंबे समय तक परिवार ने बेटे की सलामती के लिए प्रार्थना की लेकिन डॉक्टर्स ने हाथ खड़े कर दिए तो परिवार टूट गया। इसके बाद हरीश के माता-पिता ने बेटे के लिए इच्छा मृत्यु की याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की। दर्द को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है। आइये जानते हैं कि इच्छा मृत्यु क्या है?, कौन मांग सकता है और किन परिस्थितियों में इसकी अनुमति मिलती है? एवं दुनिया के किन देशों में क्या हैं इच्छा मृत्यु के नियम?

इच्छा मृत्यु (यूथेनेशिया) वह प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति की असाध्य बीमारी, असहनीय पीड़ा या लंबे समय तक अचेत अवस्था (कोमा) में रहने की स्थिति में उसकी पीड़ा को समाप्त करने के लिए चिकित्सकीय सहायता से उसके जीवन को समाप्त करने या प्राकृतिक मृत्यु होने देने की अनुमति दी जाती है। इच्छा मृत्यु को अंग्रेजी में यूथेनेशिया कहा जाता है। यह शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों से बना है— “Eu” (अच्छा) और “Thanatos” (मृत्यु), जिसका अर्थ है “अच्छी या सहज मृत्यु”।

भारत में इच्छा मृत्यु पूरी तरह से वैध नहीं है, लेकिन पैसिव यूथेनेशिया को सीमित परिस्थितियों में अनुमति दी गई है। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कामन काज बनाम भारत सरकार’ मामले में यह फैसला दिया कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) का हिस्सा है। इसी के साथ अदालत ने कुछ शर्तों के साथ पैसिव यूथेनेशिया को मंजूरी दी। एक्टिव यूथेनेशिया भारत में अवैध है और इसे हत्या या आत्महत्या के लिए उकसाने जैसे अपराधों के तहत दंडनीय माना जा सकता है।

हमारे देश में अगर कोई मरीज असाध्य बीमारी से पीड़ित हो या स्थायी कोमा में हो, पहले से “लिविंग विल” यानी अग्रिम चिकित्सा निर्देश लिखा हो तो
अस्पताल की मेडिकल बोर्ड द्वारा स्थिति की पुष्टि की जाती है। इच्छा मृत्यु वरण के लिए
परिवार और डॉक्टरों की सहमति आवश्यक होती है।

भारत में इच्छा मृत्यु का इतिहास
भारत में इच्छा मृत्यु को लेकर कानूनी और सामाजिक बहस कई दशकों से चल रही है। भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) के तहत इसे दंडनीय माना जाता था। इसलिए डॉक्टर द्वारा किसी मरीज को जानबूझकर मृत्यु देना या इसमें मदद करना कानूनन अपराध था। इच्छा मृत्यु पर पहली बड़ी कानूनी बहस 1994 में सुप्रीम कोर्ट के एक मामले में सामने आई। उस समय अदालत ने “जीवन के अधिकार” के साथ “मरने के अधिकार” को जोड़ने पर विचार किया था। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट कर दिया कि अनुच्छेद 21 में केवल जीवन का अधिकार है, मरने का अधिकार नहीं।
भारत में इच्छा मृत्यु पर सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साल 2011 के अरुणा शानबाग मामले से आया। अरुणा का जन्म कर्नाटक में एक साधारण परिवार में हुआ था। शुरुआती पढ़ाई गांव में पूरी करने के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए मुंबई चली गईं और नर्सिंग की पढ़ाई पूरी कर मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में नौकरी करने लगीं। 27 नवंबर 1973 को उनके साथ हैवानियत हुई जिसमें अरुणा शानबाग का ब्रेन डैड हो गया। 42 साल तक अरुणा अस्पताल के एक बिस्तर पर जिंदगी और मौत के बीच झूलती रहीं। साल 2011 में अरुणा की हालत को देखते हुए एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई जिसमें मांग की गई कि अरुणा को इच्छा मृत्यु की अनुमति दी जाए।
7 मार्च 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए अरुणा को इच्छामृत्यु की अनुमति देने से इंकार कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि कुछ परिस्थितियों में ‘इच्छा मृत्यु’ की अनुमति दी जाएगी, लेकिन केवल तभी जब अस्पताल ने स्वयं अनुरोध किया हो। अदालत ने अरुणा के मामले में इच्छा मृत्यु की अनुमति नहीं दी, लेकिन इस फैसले में पहली बार भारत में पैसिव इच्छा मृत्यु को कुछ शर्तों के साथ मान्यता दी गई। 18 मई 2015 को अरुणा का निधन हो गया था। उनकी कहानी ने भारत में इच्छा मृत्यु को लेकर बड़ी कानूनी और नैतिक बहस छेड़ दी।
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कामन काज बनाम भारत सरकार के मामले में एक और ऐतिहासिक फैसला दिया। इस फैसले में अदालत ने कहा कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। साथ ही अदालत ने “लिविंग विल” को मान्यता दी। इसका अर्थ है कि कोई व्यक्ति पहले से लिखकर यह निर्देश दे सकता है कि अगर वह किसी असाध्य बीमारी या कोमा की स्थिति में पहुंच गया है तो उसे कृत्रिम जीवनरक्षक उपकरणों पर न रखा जाए।
ज्ञात हो कि नीदरलैंड, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, कनाडा, कोलंबिया, स्पेन, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया सहित दुनिया के कई देशों में इच्छा मृत्यु या चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु को कुछ शर्तों के साथ कानूनी मान्यता दी गई है।
उच्चतम न्यायालय के फैसले से हजारों लोगों को राहत की संभावना बढ़ गई है जो बरसों से अपनों के दुख दर्द के निपटारे का अंतहीन इंतजार कर रहे हैं।

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