पिछली सदी बड़ी प्रतिभाओं के जन्म और कर्म की सदी थी, यह उनकी जयंतियों, पिंडदानों एवं कर्मकांडों की सदी है। वह गदरचियों के प्रतिकार का दौर था, यह विदोरचियों के प्रचार का दौर है, वह भगत सिंह की क्रांति के जान का युग था, यह नए धगतों के ज्ञान की क्रांति एवं भकई का युग है, वह पंत की वैचारिकता और रचनाशीलता से ग्राम्या को स्वर्णधूलि निकालने के माहौल था. यह उस रचनाशीलता को कूड़ेदान में डालने का माहौल है, यह हजारी प्रसाद द्विवेदी के चदलावकारी सांस्कृतिक चिंतन का समय था, यह अकादमिक हजारियों द्वारा थोक एवं खुदरा स्तर पर उन्हें भुनाने का समय है तथा जह बच्चन के कवि सम्मेलनों को लोकप्रियता की ऋतुएं थीं और यह उनकी निःशब्दता की है। स्वाभाविक है कि जन्मशती वर्ष में दिनकर का वृत्त भी रक्त शोषिणी संस्कृति के ज्ञान, सत्ता एवं सुविधा के राहुओं केतुनों का शिकार होगा। निराला को पंक्ति सार्थक होगी बादलों में घिर अमर दिनकर रहे।
आज दिनकर पर पुनर्विचार की जरूरत क्यों है. इस प्रत्र का जवाब इस उपप्रश्र में भी है कि सौ साल बाद भी दिनकर की हिंदी एवं राष्ट्र की सामान्य जनता में लोकप्रियता और प्रासंगिकता का आधार क्या है? समकालीनता के दबाव से अतिक्रांत एवं मुक्ति मार्ग में विफलता से अशांत वर्तमान रचनाशील पीढ़ी को इस मसले पर विचार करना चाहिए। दिनकर की पंक्तियों है-वर्षा का मौसम गया, बाढ़ भी साथ गई, जो बया शेष, यह स्वच्छ नौर का सोता है। पचपन कृतियों में बिखरी रचनाशीलता के सोते का पानी आसीन जाने के कारण दर्पण सा थिर ही गया है तथा उस चिर, पारदर्शी जल में एक ओर जहां हिंदी जनता, समाज और साहित्य को अपना चेहरा देखना चाहिए नहीं जल के भीतर पड़े सांप, पोंधे, मीती का मूल्यांकन भी होना चाहिए। जल के दर्पण में दिनकर की कविता, संस्कृति चिंतन, समाज चिंतन, इतिहास चिंतन, राष्ट्र चिंतन एवं आलोचना कर्म का अक्स निहारना और परखना चाहिए।
सौ साल बाद दिनकर बीसवीं सदी के लोकप्रिय कवियों में अग्रणी दिखते हैं। दिनकर की कविता भाषा और क्षेत्र की सीमाओं को तोड़कर पढ़ी गई और गुनगुनाई जाती है। दिनकर और नागार्जुन ऐसे काँव है जिन्होंने अपनी काव्य यात्रा का अखिल भारतीय पाठक सबसे ज्यादा तैयार किया है। दिनकर की अनेक काव्य पक्तियां नारों एवं सूक्तियों में बल चुकी हैं। मसलन, सिंहासन खाली करो को जनता आती है, जब नास मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है, थक कर बैठ गए क्या भाई मंजिल दूर नहीं है। एक हाथ में कमल एक में धर्म दीप्त विज्ञान लेकर उठने वाला है धरती पर हिंदुस्तान, शांति नहीं तब तक जब तक सुख भाग न नर का सम हो, कलम आज उनकी जय बोल, लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गान प्रेम का गाता चल, सावधान मनुज, यदि विज्ञान है तलवार आदि। दिनकर राजनीतिक चेतना के ऐसे कवि हैं जो सड़क से संसद तक लोकतांत्रिक बहसों में सर्वाधिक उद्धृत होते हैं। कविता के सैकड़ों पाठक अब भी मिलेंगे जिन्हें रश्मिरथी और कुरुक्षेत्र के अनेक वर्ग का पूर्णषिराम सहित कंतरण है। को दिनकर की लोकप्रियता के कई कारण है। दिनकर भारतीय जनता
पचासों, आकांक्षाओं, सपनों और संपचों के जनकवि है। तावादोतर काव्यधारा की स्वच्छंदतावादी प्रवृतियों का विस्तार करते हुए दिनकर ने रूप, भाषा और अंतवस्तु का ऐसा विविधापूर्ण अविष्कार किया नवजागरण एवं स्वाधीनता संघर्ष का उदान, कांतिकारी मूल्यों से निर्मित हुई थी। दिनकर ने कला पर विचार करते हुए उसकी कसौटी कराई कि कलाकार की सफलता की कसौटी केवल यह हो सकती है कि उसकी कृति से समाज अआंदोलित हुआ या नहीं और यदि हुआ है तो उसकी रचनाओं से प्रभावित होने वालों का सांस्कृतिक घराठल क्या है? दिनकर की रचनाशीलता के केंद्र में सामाजिक आंदोलन का निर्माण और समाज के सांस्कृतिक धरावलों की खोज है। इन दोनों का लक्ष्य समाज और मनुष्य की मुक्ति है। वह इसी मुति के लोकगायक है।
दिनकर की कविता में सम्मान, राहु और मनुष्य की मुक्ति की खोज है। इस मुक्ति का आधार राजनीति और संस्कृति की संपूर्ण रूपांतरण है पह काम राजनीति और जननेतृत्व कर सकता है। दिनकर की कविता बनता का संबोधन एवं जनबुद्धिजीवी का आत्मचिंतन करने वाली कविता है। काव्यकला के भीतर इसी कापण वह वकृत्य कला और नाट्यकला का विकास करते हैं। कविता स्व एवं संसार से एक साथ संवाद करती है। दिनकर की कविता की लोकप्रियता का कारण जनभाषा, वकृत्य, नाटकीयता एवं संवादधर्मिता के भीतर भावों एवं विचारों को बेचैन लहरों का संतुलित प्रवाह है। नामवर सिंह का या आरोप कि दिनकर के गर्जन-तर्जन में केवल फेन है पूर्णतः आधारहीन है। अगर दिनकर के मर्जन-तर्जन में सिर्फ फेन है तो 1930 से 1947 के बीच चली क्रांतिकारी संघर्षशीलता, किसान आंदोलनों, मजदूर आंदोलनों, भारत छोड़ो क्रांति एवं सैनिक विद्रोह भी झाग ही हैं। वस्तुतः यह समूचे कालखंड की खौलती हुई वैचारिक अभिव्यक्ति है जिसे भावों का फेन नहीं विचारों का मक्खन कहना चाहिए। लोकप्रियता का रहस्य यह भी है कि दिनकर की कविता में राजनीतिक तत्वों को सांस्कृतिक अभिव्यक्ति, प्रगतिशील विचारधारा का भारतीय, पूरी जाति का प्रतिनिधित्व, भारतीयकरण मानस के उहापोहों, इंदों एवं प्रश्नाकुलता का कलात्मक पुनसृजन नई अदा एवं अंदाज में उतरता है। दिनकर ने आख्यान, इतिहास और जनता के जातीय एवं रोजमर्रा के अनुभवों का जबर्दस्त प्रयोग किया है। लोकप्रियता के ये तत्व ही उनकी प्रासंगिकता
के आधार को मजबूत बनाते हैं।
दिनकर की रचनाशीलता की जरूरत कुछ क्षेत्रों में आज ज्यादा है। यह रचनाशीलता अपने समय के साम्राज्यवादी जनआंदोलनों की उपज थी। यह साग्रन्यवाद का दूसरा दौर है। आज संपूर्ण राष्ट्रीय मुक्ति के लिए कोई विराट रानीतिक-सामाजिक जनआंदोलन नहीं है। अस्मितादरी जाति की बुद्धि के महानाख्यान की प्रेरणा मिल सकती है। दूसरे, विराट राजनीतिक आंदोलनों को दिनकर की रचनाशीलता से संपूर्ण राष्ट्र और राजनीतिक आंदोलनों की विपन्नलता के दौर में पते बड़े सांस्कृतिक आंदोलन में भी दिनकर की कविता संस्कृति चिंतन को बड़ी भूमिका निभा सकती है। राहु और इतिहास के अनंत जीवनदायी स्वरूपों एवं शक्तियों की खोज, संस्कृति के सामाजिक सूत्रों की पड़ताल तथा भारतीय जनता के भीतर की हताशा और निराशा को तोड़ते में दिनकर की रचनाशीलता कारगर साबित हो सकती है।
दिनकर की प्रासंगिकता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण आधार उनका साम्राज्यवाद विरोध है। साम्राज्य विरोध की वे क्रांतिकारी राष्ट्रवादी एवं किसानी चेतना का पक्ष लेते हैं। यह हिमालय कवितां (1933) में लिखते हैं रे रोक पुचिक्षिर को न यहाँ, जाने दे उनको स्वर्गचीर पर फिरा हमें गांडीच गदा, लौटा दे अर्जुन भीम वीर। दिनकर को सशस्त्र क्रांति का समर्थक अर्जुन चाहिए। अहिंसा और सत्य का प्रयोगकर्ता युधिष्ठिर नहीं। स्वाधीनता के सामने दी चुनौतियों श्री कैसी स्वतंत? अधूरी या पूरी। किसकी स्वतंत्रता? श्रमशीलः जनता की या उसके उत्पीड़कों शोषकों को। एक विचारधारा पहली यह के पक्ष में थी और दूसरी विचारधारा समानांतर मार्ग निर्मित कर रही थी। जीत का नतीजा सामने है। दिनकर की स्वाधीनता के दौर की कविताओं की पक्षधरता क्रांतिकारी किसानी राष्ट्रवाद के पक्ष में थी। किसानों की दुर्दशा एवं मुक्ति की राह को हाहाकार कविता में देखा जा सकता है- हये व्यीम के मेघ पंच से स्वर्ग लूटने हम आते हैं, दूध, दूप.ओ कास, तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं। किसान आंदोलन की कोख से फूटी इस कंकिता में स्वर्ग ब्रिटिश साम्राज्यवाद एवं देशी सामंतवाद है, मेष 1937 की बिहार में कांग्रेस सरकार है जो स्वाधीनता एवं क्रांति के सूरज एवं दूध के स्वराज्य को डंके हुए हैं। हम केवल कवि नहीं किसानों के संगठनकर्ता भी हैं। भूलना नहीं चाहिए कि दिनकर योगी जनता और हुंकार साप्ताहिकों के साथ रचनात्मक धरातल पर गहरे जुड़े थे।
नव साम्राज्यवाद भी पुराने साम्राज्यवाद की तरह मालिक और विजेता की शक्ल में आया। दुनिया भर में हिंसा और युद्ध की जटिल संरचना नवसाधान्यवाद की उपज है। कुरुक्षेत्र एक विचार काव्य है और वह महाभारत के एक रूपक के माध्यम से हिंता अहिंसा की द्वंद्वात्मकता रचते हुए मनुष्य एवं सभ्यता की मुकि की खोज करता है। पूरे कुरुक्षेत्र के निचोड़ के तौर पर इन पतियों को देखिए-शांति नहीं तब तक जब वक, सुख भाग न नर का सम हो। दिनकर कुरुक्षेत्र में वर्ग विभाजित विषमता पर आधारित दुनिया को हिंसा का कारक मानते हैं और उसका समाधान सुख और आनंद की समानता है।
यह राष्ट्रीयताओं के अंत का दौर है। दिनकर की राष्ट्रीक्ता एवं राष्ट्र चेतना का निर्माण संघर्षशील जनता, उसके औजारों, भावों, संघर्षों, सपनों से होता है न कि धार्मिक सांस्कृतिक संकीर्णताओं की बुनियाद पर। दिनकर के राष्ट्र की परिकल्पना, परिभाषा और अवधारणा किसको नमन करूं कविता में मूर्तमान होती है भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है, एक देश का नहीं, शौल यह भूमंडल भर का है। दिनकर की राष्ट्रचेतना का महत्व इसलिए बढ़ गया है कि विश्व ग्राम की लूट और झूठ पर टिकी अवधारणा ने राष्ट्रों के अंत के सहारे मनुष्यों का उत्पीड़न तीव्र किया है।
दिनकर की कविता लोकतंत्र निर्माण एवं संसद की आलोचना की मुखर अभिव्यक्ति है। दिल्ली किताब में चार कविताएं हैं जो भिल कालखंडों की हैं। नई दिल्ली के प्रति (1933), दिल्ली और मास्को (1945), हक की पुकार (1952) और भारत का यह रेशमी नगर (1954)। इन चारों कविताओं को बीड़कर एक ऐसा रूपक बनता है जो हिंदी कविता की परंपरा में दिल्ली का अद्वितीय, जटिल एवं त्रासद मानचित्र निर्मित करता है। दो कविताएं गुलामी के दौर की हैं और दो स्वाधीन भारत की संसद में बैठकर निकट से भोगी गई दिल्ली की। जो लोग दिनकर पर दिल्ली की भूल भूलैया में खोने का आरोप लगाते हैं उनके लिए दिनकर की यह विकासशील रचनाशीलता ज्यादा पठनीय है। 1933 में कृषक मेघ की गनी दिल्ली है। 1945 में दबा हुआ शत-लक्ष नरों का अन वस्त्र, घन बल है। 1952 में दिल्ली के रेशम पर पड़ती हुई रोशनी, की लकदक सब झूठी है तथा 1954 में दिनकर को दिल्ली के प्रति घृणा देखिए-गंदगी, गरीबी, मैलेपन को दूर रखो, शुद्धिपन के पहरे नाले चिल्लाते हैं। दिनकर दिल्ली के माध्यम से भारतीय लोकतंत्र की कथनी और करनी शब्द और कर्म की फांक को साफगोई से रखने वाले जनता के प्रतिनिधि कवि है।
स्वाधीनता के बाद हिंदी में मोहभंग का साहित्यिक युग था। दिलवस्म है कि प्रगतिवादी कवि नागार्जुन की आजादी पर टिप्पणी कि कागज की आजादी मिलतों, ले लो दो आने में तथा दिनकर की आलोचना ऊपर-ऊपर सब स्वांग, कहाँ कुछ नहीं सार, केवल भाषण की लड़ी, तिरंगे का तोरण समान धरातल पर है। दिनकर और नागार्जुन ने जितने सांसद और नेताओं पर व्यंग्य और विडंबना बोध के तीर चलाए हैं हिंदी कविता में यह विरल उपलब्धि है। गणतंत्र साल में दिनकर की नेता शीर्षक कविता राजनीति को दोमुहेपन, जनविरोधी चेतना एवं भ्रष्टाचार को खोलती है जो आज ज्यादा प्रासंगिक हो गई है नेता का अब नाम नहीं ले, अंधेपन से काम नहीं ले, मंदिर का देवता, बोर बाजारी में पकड़ा जाता है।
कविता केवल दर्शन और राजनीति के कच्चे माल को लिपिबद्ध कर देने से नहीं बनती है। कविता में यथार्थ की ऐंद्रिकता, कल्पनाशीलता, कैंटेसी, भावजगत, विचार जगत की नली से होते हुए भाषा के सांचे तक पहुंचना होता है। इस प्रक्रिया में यथार्थ सर्वथा नई वस्तु की पुनर्खाज एवं नए रूप का पुनः आविष्कार कर लेता है। दिनकर की परवर्ती कविताओं में भी इस प्रक्रिया को देखा जा सकता है। ये कविता इतिहास, आख्यान, दर्शन और राजनीति के क्रूर तत्वों को नहीं, उसके सत का प्रयोग नई भाव भंगिमा, नई भाषा, नई अदा और नए काव्य प्रतिमानों पर सौ प्रतिशत जांच परख कर करती है। इसलिए उसकी तात्कालिकता भी सार्वजनीनता में बदल जाती है।
दिनकर के सांस्कृतिक चिंतन पर विस्तार से विचार इसलिए भी होना सामासिक संस्कृति की जटिलता की जनता के लिए खालयोबी की सरलता में रखते हैं। संस्कृति के चार अध्याय की आवृत्तियां एवं अध्ययन इस बात का प्रमाण है कि दिनकर की चिंता जनता के भीतर सामासिक व्यकित्य एवं चिंतन की रचना करना है। दिनकर के समय चिंतन एवं आलोचना की सैद्धांतिक, व्यावहारिक बहसों से आज की दिग्भ्रमित आलोचना चहुत कुछ प्रेरणा ग्रहण कर सकती है। स्वातंत्रयोत्तर प्रधान और कथ्य गौण है। जिसका माध्यम सर्वस्व और संदेश कोई चीज रचनाशीलता पर दिनकर की टिप्पणी है कि यह वह युग है जिसकी शैली नहीं है। आज हिंदी कविता और कहानी में भाषा और शिल्प का पैटर्नबद्ध आतंक है। दिनकर भारतीय काव्य की आत्मा ध्वनि को मानते हुए कविता की कसौटी तैयार करते हैं कि कविता वह नहीं है जो कहा जाता है बल्कि वह है जिसकी ओर संकेत किया जाता है। आलोचना के नएपन व मौलिकता का प्रतिमान गढ़ते हुए वह कहते हैं कि प्रत्येक नया कवि आलोचक से आलोचना की नई कसौटी की मांग करता है क्योंकि आलोचक नए कमि को पुरानी कसौटी पर कसकर उसके साथ न्याय नहीं कर सकता। दिनकर अपनी कविता, आलोचना में लगातार बदलते रहने एवं विकास करते रहने वाले लेखक हैं।
में दिनकर बन्य शताब्दी वर्ष का उद्घाटन व्याख्यान देते हुए मार्क्सवादी अंत में एक असुविधाजनक सवाल। 23 सितंबर 2007 को सिमरिया आलोचक मैनेजर पांडेय ने कहा कि दिनकर का मार्क्सवाद से राग का संबंध था और हिंदी के मार्क्सवादी लेखकों से विराग का। रामविलास शर्मा ऐसे अकेले माक्र्सवादी और आलोचक हैं जिनके आलोचना कर्म का हिस्सा दिनकर हो पाए। माक्र्सवादी असलीचना ने दिनकर की रचनाशीलता की लगातार उपेक्षा की और उर्वशी विवाद ने इसे चरम पर पहुंचा दिया। यदि दिनकर की कविता एवं टिप्पणियों को देखा जाए तो साफ पता बलता है कि वह जनता के समतामूलक समाज की रचना में माक्र्सवाद का महत्व स्वीकार करते थे। उनकी क्रांतिकारी कविताओं में न केवल मार्क्सवादी दर्शन का प्रयोग है बल्कि सोवियत, लेनिन और बोल्शेविक का भी समर्थन है। बिहार प्रलेस की अध्यक्षता और लेनिन पर लेख भी इसके प्रमाण हैं। 1973 में ज्ञानपीठ पुरस्कार पर भाषण देते हुए दिनकर ने कहा था कि मैं जीवन भर गांधी और माक्र्स के बीच झटके खाता रहा हूं। इसीलिए उजले को लाल से गुणा करने पर जो रंग बनता है नहीं रंग मेरी कविता का है। हिंदी की जनवादी आलोचना को दिनकर की रचनाशीलता की परख और पड़ताल पूर्वाग्रह मुक्ति के साथ शुरू करनी चाहिए। अपनी रचना और भारतीय जनता के भविष्य के बारे में उनको टिप्पणी गौरतलब है कि सभी जीवंत कलाएं भविष्य का इतिहास बतलाती है तथा सबसे कलाकार, अतीत की ओर से नहीं भविष्य की ओर से आते हैं। दिनकर सचमुच भारतीय जनता के भविष्य की मुक्ति के जन कवि हैं। (समांतर से साभार)
भारतीय जनता की रचना
मनुष्य पहले पहल कहां उत्पन हुआ, यह प्रश्नः मनोरंजक तो है, लेकिन इसका ठीक-ठीक उत्तर अब तक नहीं दिया जा सका है। बाइबिल को अपना धर्मग्रंथ मानने वाले लोगों का ख्याल है कि आदमी पहले पहल सीरिया में जन्मा था। इसी तरह, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया, वर्मा, अफ्रीका और उत्तरी ध्रुव के पास के प्रांत, इन सारे भूभागों के बारे में समय-समय पर अटकल लगाई गई है कि हो न हो आदमी इन्हों में ये किसी एक देश में सर्व प्रथम तत्पर हुआ होगा। पौकिंग में जो नरकंकाल मिला है, वह तीस हजार वर्ष पुराना है। अतएव यह अनुमान भी चलता है कि आदमी पहले-पहल चीन में जन्मा होगा। एक अंदाजा यह भी कि आदमी चूंकि प्रधानतः लोमहीन प्राणी है, इसलिए उसकी उत्पत्ति किसी गर्म देश में हुई होगी। इस विचार के लोग अफ्रीकर, भारत वर्ष अथवा उससे भी दक्षिण पूर्व के भागों को आदि मनुष्य का जन्म स्थान मानते हैं। एक अनुमान यह है कि आदमी दक्षिण भारत में जन्मा होगा। एक दूसरा अनुमान यह है कि भारत समुद्र में पहले जो बड़ा स्थल भाग था, आदमी वहां जनमा था। अफ्रीका के पक्ष में दलील यह दी जाती है कि कहां चिपांजी और गोरिला बंदर, चहुतायत से पाए जाते हैं। इसके सिया, अफ्रीका में कहुत सी हड्डियां भी पाई गई हैं, जिनके बारे में यह अनुमान है कि वे आदि मानवों की हड्डियां होंगी।
भारतीय इतिहास कांग्रेस के ग्वालियर वाले अधिवेशन में (1952) सभापति के पद से भाषण देते हुए डाक्टर राधामुकुंद मुखर्जी ने यह कहा था कि आदि मनुष्य पंजाब और शिवालिक की ऊंची भूमि पर विकसित हुआ होगा, इस बात के प्रमाण मिलते हैं। मुखर्जी महोदय का मत यह दीखता है कि मनुष्य भारत में ही उत्पन हुआ था और इसी देश में उसकी सभ्यता विकसित हुई। पंजाब में हिमालय के पास मनुष्य का आदि जन्म, फिर सिंधु की तराई में कृषि सभ्यता का विकास, और सिंधु के पठार में भारती की प्राचीनतम सभ्यता का अवशेष पाया जाना, ये सारी बातें आपस में एक दूसरे को पुष्ट करने वाली है और अजब नहीं कि अध्ययन और खोज करने पर मुखर्जी महोदय का अनुमान सत्य ही प्रमाणित हो।
किंतु सबसे युक्तिसंगत अनुमान यह है कि आदमी यदि पहले-पहल भारत में उत्पत्र हुआ हो तो वह उत्तर नहीं, दक्षिण भारत में जनमा होगा। भारत की सबसे पुरानी धरती वह नहीं है जो विंध्याचल के उत्तर में पड़ती है, प्रत्युत, वह जो विंध्य में फैलती हुई दक्षिण को चली गई है। आज से लगभग तीन लाख वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में मनुष्य रहा होगा, इस अनुमान को पंडित साधार मानते हैं। सन 1935 में बड़ोदरा राज्य के चादनगर स्थान में लघु मानव का एक तोस इंच लंबा कंकाल मिला था, जिसे वैज्ञानिक आदि नीग्रो का कंकाल समझते हैं।
इंग्लैंड के एक वैज्ञानिक, मिस्टर डारविन ने जब से यह सिद्ध कर दिखाया कि आदमी बंदर से बढ़कर आदमी हुआ है, तब से विकासवाद के सिद्धांत पर यह मानने की प्रथा चल पड़ी है कि मनुष्य के पूर्वज बंदर को ही योनि से निकले थे। लेकिन सभी पंडित अभी यह भी मानने को तैयार नहीं है कि आदमी निश्चित रूप से बंदर से ही विकसित हुआ है। फिर भी, जो लोग विकासवाद के सिद्धांत को पूर्ण रूप से मान चुके हैं, उनका ख्याल है कि एप गिब्बन, ओर्यगउटान और चिंपांजी बंदरों की इन्हों चार जातियों का विकास मनुष्य के रूप में हुआ है। और जिन पंडितों का ऐसा विश्वास है, वे घूमफिर कर अफ्रीका को ही मनुष्य के जन्म का आदि स्थान मानना चाहते हैं। लेकिन कुछ दूसरे पंडितों का विचार है कि आदमी जिस जीव से बढ़कर आदमी हुआ है, वह बंदर तो नहीं था, हां, वह बंदरों के समान ही कोई अन्य स्थलचारी जीव था। एक दूसरा अनुमान यह भी है कि आदमी, शुरू से ही, आदमी था और उसकी पैदाइश एक साथ अनेक देशों में हुई।
इस अनिश्चय के बीच अधिकांश पंडित यह मानते हैं कि भारत में जो
पर भी लोग मौजूद हैं, उनके पूर्वज इस देश में अन्य देशों से आए और अन्य देशों से आकर ही उन्होंने आपस में मिश्रित होकर, इस देश में जनसमूह रचना की, जिसे हम भारतीय जनता कहते हैं। और भारतों की मिट्टी अनंत काल से, कितनी विभिन्न जातियों, कितने प्रकार के लोगों का समागम होता रहा है, यह किस्सा भी काफी मजेदार है। अगर ईसाइयों और मुसलमानों को छोड़ दें, तब भी, इस देश में एक के बाद एक, कम से कम, ग्यारह जातियों के आगमन और समागम का प्रमाण मिलता है, जिन्होंने इस देश को ही अपना देश मान लिया और जिनका एक-एक सदस्य यहां की संस्कृति और समाज में भलीभांति पच-खप कर आर्य अथवा हिंदू हो गया। नीग्रो, औष्ट्रिक, द्रविड़, आर्य, यूनानी, यूची, शक, आभीर, हुण, मंगली और मुस्लिम आक्रमण के पूर्व आने वाले तुर्क इन सभी जातियों के लोग कई झुंडों में इस देश में आए और हिंदू समाज में संस्कृति कहते हैं, का किसी एक व्यति को देन नहीं, बल्कि इन सभी दाखिल होकर सब के सब उसके अंग हो गए। असल में, हम जिसे हिंदू-जातियों की संस्कृतियों के मिश्रण का परिणाम है।
आदमी की नस्ल पहचानने वाले शास्त्र
हजारों वर्षों से एक ही भू भाग में, एक ही तया की जलवायु तथा एक ही सामाजिक ढांचे और एक ही आर्थिक पद्धति के भीतर जीते रहने के कारण भारतीय समाज के सभी लोगों के रूप-रंग, वेशभूषा, रहन-सहन, भाव विचार और बीवन विषयक दृष्टिकोण में जो अद्भुत एकता आ गई करने का काम अस्वाभाविक और जरा मुस्किल भी मालूम होता है। है, उसे देखते हुए एक नस्ल के लोगों को दूसरी नस्ल के लोगों से अलग लेकिन तब भी ऐसी कुछ कसौटियां मौजूद हैं, जिनके आधार पर बिलगाव किया जा सकता है। दुनिया में जितनी भी जातियां बसती हैं, उनको मूल नस्लों की पहचान भाषा और शरीर के गठन को देखकर को जाती है और इस विषय का अध्ययन अब अलग-अलग शास्त्रों के रूप में विकसित हो गया है, जिनके प्रयोग से मानव जाति के बहुत पुराने इतिहास की रचना में बहुत सहायता मिली है। भाषा का अध्ययन करने वाले शास्त्र को भाषा विज्ञान कहते हैं। साहित्य से संबद्ध रहने के कारण इस विषय के जानकार अब काफी लोग हो गए हैं। किंतु रूप-रंग और कद ढांचे को कसौटी पर भी मनुष्य जाति का अध्ययन एक दूसरे शास्त्र के द्वारा किया जाता है, जिसे मानुषमिति या जनविज्ञान कहते हैं। भाषा-भेद को देखकर मनुष्य की नस्ल का पता लगाना अपेक्षाकृत कुछ सरल कार्य हो गया, मगर रंग-रूप और शरीर के ढांचे को देखकर आदमी के मूल खानदान का पता लगाना उतना आसान नहीं है, क्योंकि जलवायु के प्रभाव और विवाहादि के द्वारा रक्त के मिश्रण के कारण इस क्षेत्र में बड़ी बड़ी उलझनें पैदा हो जाती हैं। फिर भी, जनविज्ञान ने जो कसौटियां बनाई हैं, उन पर आदमी की नस्ल की पहचान, बहुत दूर तक, सही-सही कर ली जाती है।
जनविज्ञान की पहली कसौटी रंग की है। जनविज्ञानियों का एक साधारण विश्वास है कि गोरे रंग के लोग आर्य वंश के हैं और जिनका रंग पक्का काला है, वे आर्येतर हैं अथवा आर्यों और आर्येतर जातियों के बीच जो वैवाहिक मिश्रण हुआ है, उसका उन पर काफी प्रभाव है। खोपडी की लंबाई-चौडाई देखकर भी नस्ल की पहचान की जाती है। इसी तरह, नाक की ऊंचाई, चौडाई, उसका खड़ा या चिपटा होना भी आदमी की नस्ल क इंगित करता है। फिर, आदमी का कद या डील, उसके मुह या जबड़े का आगे बढ़ा होना भी उसकी नस्ल की पहचान है।
जनवज्ञिान ने संसार की सभी जातियों को, मुख्यतः तीन नस्लों में बांट रखा है। पहली नस्ल गोरे लोगों की है. जिन्हें हम काकेशियन कहते हैं। दूसरी नस्ल के वे लोग हैं, जिनका रंग पीला होता है और जो मंगोल जाति के हैं। तीसरी नस्ल उन लोगों की है जिनका रंग काला है और जो इथोपियन परिवार के हैं। काकेशस रूस से दक्षिण, प्रायः एशिया-यूरोप के बीच का भूभाग है और इथोपिया अफ्रीका में है। यह विभाजन मुख्यतः रंगों के आधार पर किया गया है, क्योंकि रंग की दृष्टि से संसार में तीन प्रकार के लोग हैं-गोरे, काले और पीले। बाकी रंग इन्हीं रंगों में से किसी न किसी की, कम या ज्यादा, छांह लिए हुए हैं और वे अक्सर, दो रंगों के मिश्रण से अथवा जलवायु के परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुए हैं। भारतीय जनता में इन तीनों रंगों के प्रतिनिधि मौजूद हैं और रंगों की दृष्टि से भी भारतीय मानवता विश्व मानवता का अद्भुत प्रतीक मानी जा सकती है।
जनविज्ञान की कसौटी और भारतीय जनता
एक दूसरी दृष्टि से विचार करने पर भारतवर्ष में चार प्रकार के लोग मिलते हैं। एक तरह के लोग वे हैं, जिनका कद छोटा, रंग काला, नाक चौड़ी और बाल घुंघराले होते हैं। इन जाति के लोग, अक्सर जंगलों में बसते हैं। ये ही लोग उन आदिवासियों की संतान हैं, जो आर्यों और द्रविड़ों के आगमन के पूर्व इस देश में आकर बसे थे और जो शायद जंगली जीवन के आदी होने के कारण अब तक भी शहरों से दूर जंगलों में ही रहने में सुख मानते हैं।
एक दूसरी तरह के लोग हैं, जिनका कद छोटा, रंग काला, मस्तक लंबा, सिर के बाल घने और नाक खड़ी और चौड़ी होती है। रंग और कद में ये प्रायः आदिवासी लोगों से थोड़ी समानता रखते हैं, किंतु ये उनसे बिल्कुल भिन्न हैं। विंध्याचल के नीचे, सारे दक्षिण भारत में इन्हीं लोगों की प्रधानता है। ये द्रविड़ जाति के लोग हैं, जिनके पूर्वज, कदाचित आर्यों से भी पूर्व इस देश में आए थे और उन्होंने पहले-पहल भारत में नगर-सभ्यता की नींव डाली थी।
तीसरी जाति के लोगों का कद लंबा, वर्ण गेहुंआ या गोरा, दाढ़ी-मूछ घनी, मस्तक लंबा तथा नाक पतली और नुकीली होती है। ये आर्य-जाति के लोग हैं। आरंभिक आर्यों के जिस रंग-रूप का वर्णन पुराने साहित्य में मिलता है, वह अब बहुत कुछ बदल गया है। कारण, शायद यह है कि भारत की जलवायु उष्ण है और कहा जाता है कि उष्णता से रंग काला पड़ जाता है। फिर द्रविड़ों और आदिवासियों के साथ उनका जो वैवाहिक मिश्रण हुआ है, उसके चलते भी आर्यों का पहले का रंग अब फीका पड़ गया है।
एक चौथे प्रकार के लोग बर्मा, असम, भूटान और नेपाल में तथा उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तरी बंगाल और कश्मीर के उतरी किनारे पर पाए जाते हैं। इनका मस्तक चौडा, रंग काला-पीला, आकृति चिपटी तथा नाक चौडी और पसरी हई होती है। इनके चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ भी कम उगती है। ये मंगोल-जाति के लोग हैं जो भारत में तिब्बत और चीन से उस समय आए जब आर्य यहां पुराने हो चुके थे और जब नीग्रो, औष्ट्रिक, द्रविड और आर्य जातियों की संस्कृतियों के मेल से भारत में आर्य या हिंदू-सभ्यता की नींव भलीभांति डाली जा चुकी थी।
इस प्रकार, अत्यंत प्राचीन काल में आर्य, द्रविड़, आदिवासी और मंगोल इन चार जातियों को लेकर भारतीय जनता की रचना हुई थी। हम जिन्हें आदिवासी कहते हैं, उनके बीच नीग्रो और औष्ट्रिक नामक उन दोनों जातियों के लोग शामिल हैं जो जातियां द्रविड़ों से पूर्व इस देश में आई थीं। नीग्रो और औष्ट्रिक जातियों के मिश्रण से बने हुए लोग मुंड या शबर भी कहे जाते हैं। इसी प्रकार मंगोल जाति वालों का भी प्राचीन नाम किरात है। (साभार-संस्कृति के चार अध्याय का एक अंश)
