दिल बहलाने के लिए अच्छा है क्रिकेट का ‘बीसम-बीस

अनिल तिवारी
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देश में चारों तरफ भारतीय क्रिकेट टीम की जीत की वाह-वाही है। आठवीं बार विश्व कप जीतने का आनंद है। यहां वहां जहां-तहां हर जगह जश्न का जोर है। धूम-धड़ाका है। देश के ऊंचे आसन पर बैठे किरदारों से लेकर अंतिम पायदान तक की बहुसंख्यक आबादी भावविभोर है। सबको लगने लगा है कि ‘ मैदान मार लिया’ है। लगना भी चाहिए क्योंकि जीत किसको अच्छी नहीं लगती, सबको सुहाती है। हारना कोई नहीं चाहता? बीती शाम अहमदाबाद स्टेडियम में जब भारत के खिलाड़ियों ने न्यूजीलैंड की टीम को एक बड़े अंतर से हराया, तो मौके पर मौजूद बड़े राजनेताओं व्यापारियों गणमान्य लोगों सहित दर्शकों ने खड़े होकर, नाच गा कर अपनी भावनाओं का इजहार किया। किसी ने अनुमान लगाया की लगभग 100 करोड लोग किसी न किसी रूप में इस जीत के साक्षी बने। बेहद उत्साही आबादी ढोल मंजीरा लेकर सड़कों पर उतर आई। इंडिया गेट सहित देश के विभिन्न हिस्सों मैं घनघोर आतिशबाजी हुई। स्वीकृत ध्वनि मानक को धत्ता बताते हुए पटाखे फोड़े गए।
हम सभी को गर्व है कि हमारे खिलाड़ियों ने वर्ल्ड कप 2026 जीतकर खेल की दुनिया में भारत का नाम रोशन किया है। अब हम इस टूर्नामेंट में ऑस्ट्रेलिया से सिर्फ दो जीत पीछे रह गए हैं। मौजूदा विश्व कप में कुल 55 मैच खेले गए। सभी टीमों ने कुल मिलाकर 17582 रन बनाए, जिसमें 1434 चौके और 780 छक्के शामिल हैं। इस दौरान कुल 699 विकेट गिरे। हमारे देश के गेंदबाज जसप्रीत बुमरा ने सबसे अधिक 14 विकेट प्राप्त किया। प्रधानमंत्री से लेकर पंचायत स्तर के नेताओं तक ने बढ़-चढ़कर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से अपनी खुशी जाहिर की। रविवार अवकाश का दिन होने के कारण फाइनल मैच को लेकर देश में सुबह से ही उत्साह था। खासकर बच्चे बहुत क्रेजी रहे। धाए काम धाम सब त्यागी। अभिभावकों ने भी कमोबेश स्वीकार कर लिया था। भारत के क्रिकेट खिलाड़ियों को जीत मिली। व्यापार और कारोबार की भी जीत हुई। बताते हैं कि सटोरियों की भी चांदी रही। छिटपुट झड़पों और आधा दर्जन के करीब हृदय रोगियों की मृत्यु के समाचार भी है लेकिन बड़े दायरे में शुभ लाभ ही सर्वोपरि रहा।
जब हमारे देश में पहली बार बीसम-बीस क्रिकेट का खेल शुरू हुआ था तब उम्मीद नहीं थी कि यह टेस्ट मैच या एकदिवसीय मैच की तरह खेल प्रेमियों को जोड़ पाएगा। लेकिन कहते हैं कि आम आदमी जो चीज आज देखता है कारोबारी उसे एक दिन पहले ही भांप लेते हैं। तब कारोबारियों ने समझ लिया था कि टेस्ट मैच की तरह वनडे से भी लोग उबने लगे हैं। उस समय एक विज्ञापन बहुत चला था। “मैच के पहले टॉस हुआ और टॉस जीतने वाले कप्तान को रेफरी ट्रॉफी थमा देता है। आश्चर्यचकित कप्तान पूछता है, बैटिंग नहीं? तब रेफरी कहता है, नहीं आप जीत गए और तभी टीम के दूसरे खिलाड़ी दौड़ते हुए आते हैं और ट्रॉफी उठा लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे असली मैच जीतने पर होता है। अंत में विज्ञापन कहता है ‘फलां बिस्किट खाओ, शार्ट में निपटाओ’।”
अब सवाल है कि जल्दी निपटाना ही मूल मंत्र है तो यह काम तो टाश से भी हो सकता है। लेकिन फिर व्यापार का क्या होगा। व्यापार तो खेल के होने पर ही है। और खेल वह हो जिसमें ज्यादा से ज्यादा दर्शक सीधे रूप से जुड़ सकें। जो टेस्ट मैच और एकदिवसीय से ऊब गए थे उन्हें बीसमबीस ने फिर से बाजार का पुर्जा बना दिया। थोड़े समय के इस खेल के लिए लोग मैदान पर आए। टीवी खोल कर बैठे। अखबार पढ़े। उनका कारोबार चल निकला।
खेलों में इधर खासा पैसा आया है। खेल संगठनों पर काबिज होने की जद्दोजहद पहले से ही थी। क्या राजनेता और क्या नौकरशाह सभी किसी न किसी खेल संगठन में पद जुगाड़ लेने की फिराक में रहते हैं। लेकिन इस समूची कवायद में खेल और खिलाड़ियों के हालात अक्सर प्रभावित होते हैं। अब समय आ गया है कि यह सूरत बदली जानी चाहिए। क्रिकेट को पहले ‘जेंटलमैन गेम’ कहा जाता था। पहले के समय में सफेद परिधानों में खेलने वाले खिलाड़ियों के व्यक्तित्व से भद्रता झलकती थी। अब तो रंग बिरंगी पोशाकों का चलन शुरू हो गया है और खेल-खेल में खेल खेलने और खेल खिलाने वाले के तेवर भी तीखे हो गए हैं। क्रिकेट के मैचो में पैसों की भरमार होने के साथ मैच फिक्सिंग और स्पाट फिक्सिंग जैसी बुराइयां जड़ जमा चुकी है। खेल, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भाईचारा और समता का भाव लेकर आता है और वही स्वस्थ मनोरंजन का आधार भी होता है। कम से कम खेल जीतने- हारने और उसे सहने का भाव प्रदान करता है लेकिन जैसे ही इन उद्दात्त मानवीय मूल्यों को महज आवरण बनाकर उसके पीछे धूर्तता, चालाकी और अवैध कमाई की पाशविक इच्छाओं को स्थान दिया जाता है वैसे ही अपने दैवत्व वाले स्थान से गिरकर दानवी गर्त में चला जाता है। यही आजकल क्रिकेट के साथ हो रहा है। खेल में राजनीति की कोई जगह नहीं है, लेकिन भारत में खेल और राजनीति का साथ ‘चोली दामन’ का है। यहां समझना मुश्किल है कि खेलों में राजनीति है या राजनीति में खेल। लगभग सभी खेलों में भारी भरकम राजनेता मठाधीसी के अंदाज में कब्जा जमाए बैठे हैं।
आखिर कोई राजनीतिक व्यक्ति किसी खेल संस्थान पर क्यों अधिकार जमाए रखना चाहता है? इसका सीधा जवाब है कि वह जहां अपने पोर्टफोलियो पर एक तमगा और चढ़ाता है वहीं खेल संस्थान का पदाधिकारी बनकर अपना और अपनों का अनेक हित लाभ भी साधता है।
भारत में खेल का इतिहास बहुत प्राचीन है। यहां कुश्ती कबड्डी को-को शतरंज आज पारंपरिक खेलों के अलावा फुटबॉल बैडमिंटन प्रचलित खेल रहे हैं। 18वीं शताब्दी के अंत में क्रिकेट भाया इंग्लैंड भारत में आया। यह राजा महाराजाओं का खेल माना जाता था। महाराजा पटियाला इसके शौकीन थे। वर्ष 1983 में जब भारत ने क्रिकेट विश्व कप पहली बार जीता तो इसकी लोकप्रियता अचानक से बढ़ गई। वर्ष 2007 में आईपीएल की शुरुआत हुई और देखते ही देखे या पूरी दुनिया में छा गई। जैसे-जैसे लोगों के बीच इस खेल की पहुंच बढ़ी कारोबारियों की गिद्ध दृष्टि भी लगी। वे लाभ के हर मौके को भुनाने में लग गए। तरह-तरह के विज्ञापन तरह-तरह के प्रलोभन देकर हर वर्ग के लोगों को जोड़ने की होड़ मच गई। मूल्य और नैतिकता जैसे आदर्श शब्दों से किनारा कर लिया गया। दर्शक संख्या के आधार पर उनका कारोबार ‘दिन दुना रात चौगुना’ फलने फूलने लगा। छोटे बच्चों पर इसका अत्यधिक मानसिक प्रभाव पड़ा। अपनी टीम के हार जाने पर कुर्सी तोड़ देने, मेज तोड़ देने, कंप्यूटर तोड़ देने, टीवी का स्क्रीन तोड़ देने, साइकिल लेकर नाले में कूद जाने, छत से छलांग लगा देने की अनेक घटनाएं समय-समय पर सामने आई हैं। व्यापार तो बढ़ा पर बच्चों में विकृति भी बढ़ी। जो बच्चे क्रिकेट को कैरियर के रूप में नहीं लेते उनमें भी दीवानगी हद दर्जे की है। हमारे यहां क्रिकेट धर्म है, और इस धर्म का जुनून है, खासकर बच्चों में। आज कुछ नौजवान क्रिकेट के जुनून में इस कदर डूब गए हैं कि अपनी कीमती ज़िंदगी, वक्त और ताक़त को उसी में झोंक रहे हैं। उन्हें यह ग़लतफहमी हो गई है कि वो “कामयाबी” की तरफ़ बढ़ रहे हैं, लेकिन सच्चाई इससे बहुत दूर है।
अगर आप क्रिकेट खेलते हैं या खेल से किसी न किसी तरह प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं तो यह अच्छी बात है। क्रिकेट खेलना एक सेहतमंद शौक़ भी हो सकता है — लेकिन आजकल कुछ लोग केवल दर्शक बनकर, इसका वीडियो बनाकर, उस पर ट्रेंडिंग गाने लगाकर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक पर अपलोड करने तक सीमित कर चुके हैं। मक़सद? सिर्फ़ व्यूज़ और थोड़े से पैसे। यक़ीनन, इससे कुछ चंद रुपए कमाए जा सकते हैं, मगर ज़रा ठहरकर सोचिए —
क्या यह कमाई आपकी ज़िंदगी की असली ज़रूरतें पूरी कर पाएगी?
क्या यह रास्ता वाक़ई आपको एक मजबूत, कामयाब और सम्मानजनक भविष्य की तरफ ले जा रहा है?
समझदारी इसी में है कि अपने समय और काबिलियत को ऐसे कामों में लगाएं जो लम्बे वक़्त तक आपको फायदा दें — दीन और दुनिया दोनों में।
एक क्रिकेट के पीछे अपनी पूरी जवानी, अपनी ज़िम्मेदारियाँ और अपना मुस्तक़बिल बर्बाद मत करें। सोचिए, समझिए — फिर फैसला लीजिए।

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