आपूर्ति सुनिश्चित नहीं हुई तो ठंडे पड़ जाएंगे चूल्हे
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अनिल तिवारी
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केंद्र की सरकार ने वर्ष 2016 में उज्ज्वला योजना की शुरुआत की थी तब लगभग साढे 14 करोड़ एलपीजी कनेक्शन देश में थे। सरकार ने साल भर में ही ढाई करोड़ से अधिक कनेक्शन वितरित करने का लक्ष्य हासिल कर लिया। वर्ष 2025 बीतते-बीतते यह संख्या 100% से अधिक बढ़कर 33 करोड़ तक पहुंच गई। इस बीच दो बार लोकसभा के तथा समय-समय पर राज्यों के चुनाव हुए। धूल, धूप, धुंआ, गर्मी और गरीबी से नाक भौं सिकोड़ने वाले राजनेताओं ने इसे मास्टर स्ट्रोक बताया। ग्रामीण महिलाओं को भी धुएं से मुक्ति दिलाने जैसी मानवीय पहल का खूब प्रचार प्रसार किया। यह अलग बात है कि जिन ग्रामीण महिलाओं को मुफ्त कनेक्शन प्रदान किए गए उनमें से अधिकांश ने दोबारा सिलेंडर भरवाने की जहमत नहीं उठाई। यह भी सच है कि लाभार्थियों ने बहुत हद तक सरकार के काम का समर्थन किया। लाभार्थियों का समर्थन पाकर सरकार ने अपनी पीठ तो थपथपाई, लेकिन योजना के तहत सुचारू आपूर्ति का कोई स्थाई इंतजाम नहीं किया। इस मामले में सरकार की स्थिति उस अड़़गड़े साधु की तरह हो गई है जो गांव में नेवता के भरोसे ही बड़े यज्ञ के आयोजन की घोषणा कर दिया लेकिन जब प्रसाद पाने वाले भक्तों की भीड़ बढ़ी तो मुंह छुपाने लगा। बताते हैं कि तभी से यह उक्ति प्रचलित हुई कि ‘नेवता के भरोसे कभी यज्ञ नहीं ठानना चाहिए’। सरकार घरेलू गैस के लिए अब भी खाड़ी देशों पर निर्भर है तथा कुल जरूरत का लगभग 65% आयात करती है।
ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच हो रही गोलीबारी में मिसाइलें हमारे एलपीजी सिलेंडर पर भी गिर रही हैं। वो गैस सिलेंडर, जिसका आकार उज्ज्वला योजना के कारण दो गुना से अधिक का हो गया है। बीते 10 सालों में कनेक्शन बढ़े, खपत बढ़ी। लेकिन चिंताजनक पहलू यह है कि एलपीजी आपूर्ति को लेकर सरकार चादर तानकर सोती रही। शायद कल्पना ही नहीं थी कि कभी खाड़ी में युद्ध जैसे हालात बने तो क्या होगा?
साल 2016 में जब ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ शुरू हुई थी, तो इसे एक क्रांतिकारी कदम माना गया था। ग्रामीण महिलाओं को चूल्हे के धुएं से मुक्ति दिलाना एक बड़ा मानवीय और स्वास्थ्य संबंधी लक्ष्य था। सिलेंडर घर-घर पहुंचे, चूल्हे जले और करोड़ों भारतीयों की जीवन शैली में बदलाव आया। लेकिन 8-10 साल के अंदर ही इस सफलता ने भारत को एक ऐसे मुश्किल में लाकर खड़ा कर दिया है जिसे सफलता का जंजाल कहा जा सकता है।
ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और लाल सागर में जारी हलचल ने भारत को एक कड़वी हकीकत से रूबरू करा दिया है। हकीकत यह है कि हमने चूल्हे तो घर-घर पहुंचा दिए लेकिन उन चूल्हों को जलाने के लिए जरूरी गैस के लिए हम दुनिया के सबसे अशांत कोने पर निर्भर हो गए। आज भारत में एलपीजी की मांग जिस तेजी से बढ़ी है उसने हमारी ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एलपीजी मांग में वृद्धि से यह भी हकीकत सामने आ गई है कि उज्ज्वला योजना के जरिए दिए गए सिलेंडर दोबारा ना भरवाने की बातें बहुत हद तक प्रोपेगेंडा थी।
आंकड़े गवाह है कि उज्ज्वला योजना के बाद भारत की एलजी की खपत में जबरदस्त उछाल आया। गांव-गांव तक गैस सिलेंडर की पहुंच ने इसे एक अनिवार्य वस्तु बना दिया। लेकिन समस्या भी यही से शुरू हो गई। भारत में एलपीजी का उत्पादन उस रफ्तार से नहीं बढ़ा जिस रफ्तार से उसकी मांग लगातार बढ़ती रही। परिणाम यह हुआ कि भारत को अपनी कुल जरूरत का करीब 60 से 65% हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ रहा है। अकेले उज्ज्वला योजना ने भारत के आयात बिल को कई गुना बढ़ा दिया। आज भारत एलपीजी का दुनिया में बड़ा आयातक देश बन चुका है। हमारी एलजी की प्यास जिन देशों से बुझती है, वे देश इस समय युद्ध में है। युद्ध के कारण गैस की लाइफ लाइन कट गई है जिसने भारत की धड़कनें बढ़ा दी हैं। अगर यह रास्ता लंबे समय बंद रहता है या टैंकरों पर हमले होते रहते हैं तो भारत के करोड़ों घरों के चूल्हे ठंडे पड़ सकते हैं।
भारत आज एक लचर स्थिति में है। हमें अपनी डिप्लोमेसी का पूरा जोर इस बात पर लगाना पड़ रहा है कि युद्ध के मैदान में हमारे टैंकर सुरक्षित रहें। भारत बार-बार अपील कर रहा है कि ईरान उसके टैंकरों को निशाना ना बनाएं। हालांकि यह स्थिति सुखद नहीं है कि भारत को अपनी रसोई बचाने के लिए दूसरे देशों के सामने गिड़गिड़ाना पड़े।
किसी भी देश के लिए आपात स्थिति से निपटने हेतु आवश्यक तेल और गैस का भंडार होना जरूरी है, लेकिन भारत में एलपीजी की क्षमता कम है। स्थिति यह है कि अगर आपूर्ति श्रृंखला में दो सप्ताह की भी रूकावट हो जाए तो देश में हाहाकार मच सकता है।
हमारे देश के राजनेताओं ने वोट बैंक की राजनीति में वितरण की खिड़की को खुले तौर पर खोल दिया लेकिन बैकअप प्लान पर काम नहीं किया। अब जब पानी सर के ऊपर से गुजर रहा है तब सरकार उत्पादन बढ़ाने और भंडारण को युद्ध स्तर पर दुरुस्त करने के लिए दौड़ लगा रही है। हालांकि यह दौड़ ‘बंदर की उछल- कूद’ जैसी ही है क्योंकि इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में सालों का समय लगता है और संकट दरवाजे पर खड़ा है।
सोशल मीडिया पर एलपीजी की कमी, कीमतों में वृद्धि, सिलेंडर की कालाबाजारी को लेकर अफवाहें तैर रही हैं। आम नागरिकों में डर का माहौल है। हालांकि सरकार बार-बार भरोसा दिला रही है कि देश में गैस की कमी नहीं है। लेकिन जनता अब केवल सरकार के आश्वासनों पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है। संसद में दिए अपने बयान में केंद्रीय तेल मंत्री ने गैस को लेकर बेफिक्र रहने की बात तो कही है लेकिन लगे हाथों उन्होंने यह चेताया भी है कि यह एक चुनौती है और इसका हमें मिलकर सामना करना है।
इस बीच सरकार एक महीने के लिए केरोसिन, लकड़ी, कोयला आदि के उपयोग की सलाह देते हुए घरेलू सोलर प्लांट और सोलर कुकिंग को बढ़ावा देने की बात कह रही है। सरकार सौर ऊर्जा को भी अपनाने की अपील कर रही है। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि करोड़ों करोड़ों परिवार जो सरकार के कहने पर अभी-अभी कोयला, लकड़ी, कंडा से एलपीजी पर शिफ्ट हुए हैं क्या वह सोलर कुकर अपना पाएंगे?

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समसामयिक एवं सारगर्भित विश्लेषण। बावजूद इसके सरकारी जनता डंका बजाने का प्रयास कर रही है भय की स्थिति केवल गैर सरकारी जनता में है।