डॉ॰ अनिल कुमार सिंह
प्राध्यापक,हिंदी विभाग आत्माराम सनातन धर्म महाविद्यालय, दिल्ली विश्विद्यालय
रोहतक से जींद वाली सड़क पर गोहाना से लगभग दो-तीन किलोमीटर आगे बाई ओर एक पतली सी सड़क निकलती है। यह सड़क ग्राम बसावनपुर की ओर जाती है। गाँव क्या साहब पूरा कस्बा है बसावनपुर। इस गाँव में स्कूल, अस्पताल, डाकघर, साइबर कैफे आदि सभी कुछ मौजूद है। गाँव में पहुँचने से आधे किलोमीटर पहले सात-आठ कमरों का एक जर्जर सा भवन दिखता है, जिसके मुख्य द्वार पर ‘संतराम महाविद्यालय बसावनपुर’ लिखा बोर्ड उसके कॉलेज होने की सूचना देता है। बाकी अगर यह बोर्ड न दिखाई पड़े तो इसे कॉलेज समझना आपके लिए कठिन ही होगा, क्योंकि विद्यार्थियों से ज्यादा इसके परिषर में गाय, बैल, बकरी, कुत्ते, सुअर आदि ही दिखते हैं। गाँव वालों का सरोकार इस कॉलेज से इतना ही है कि वे इसे चारागाह की तरह उपयोग करते हैं। भवन की दशा भी कुछ खास अच्छी नहीं है। इस महाविद्यालय के स्थापना के लगभग 60 वर्ष हो चुके हैं लेकिन इन 60 वर्षों में उपलब्धि के नाम पर दो-चार लाक्षागृहनुमा नये कमरों का निर्माण ही हो पाया है, रहा सवाल विद्यार्थियों का तो इसमें पढ़ने वाले विद्यार्थी इतने प्रतिभाशाली हैं कि वे महाविद्यालय आने की जहमत सिर्फ परीक्षाओं में ही उठाते हैं। बाकी पूरे साल ये पट्ठे अखाड़ों-पबों का ही चक्कर लगाते रहते हैं या आम चुनावों के समय इनकी व्यस्तता बढ़ी नजर आती है। कॉलेज के प्रबंधन समिति को भी इन चीजों की खास चिंता नहीं रहती है। इसके पीछे रहस्य यह था कि यह कॉलेज था तो भव्य, जिसे संतराम जी बेटे ने अपने पिता को अमर करने के लिए बनवाया था, परन्तु अपने पिता को अमर हो जाने के बाद वे इसके आड़ में अपने काले धन को सफेद करने लगे थे। इन्कम टैक्स विभाग की आँखों में धूल झोंकने में वे कामयाब हो जाते थे। कुल मिलाकर यही सब खेल कॉलेज की आड़ में चल रहा था। इस खेल से गाँव वालों का विशेष सरोकार नहीं था। गाहे-बगाहे गाँव के दो-चार शोहदेनुमा लड़के कॉलेज के मुख्य द्वार पर लगे नीम के पेड़ के नीचे जुआ खेलते या स्कूल से लौटती हुई लड़कियों पर भद्दी टिप्पणियाँ करते नजर आते थे।
लेकिन, यह क्या। एक-दो महीनों से कॉलेज में चहलकदमी बढ़ने लगी हैं। हमेशा एक-दो बाहरी गाड़ियाँ उसके मुख्य द्वार पर नजर आने लगी थी। कुछ साफ-सफाई का काम भी होने लगा था। कॉलेज के शिक्षक-कर्मचारी कुछ अतिरिक्त सक्रिय नजर आने लगे थे। यह सब अचानक होता देख गाँव वाले भी कुछ चौकन्ने हो गए थे, क्योंकि एकाध बार कुछ शिक्षक गाँव वालों को कह गए थे कि अपने-अपने बच्चों को नियमित कॉलेज भेजें क्योंकि उनकी पढ़ाई का भारी नुकसान हो रहा है। इसी तरह की कई और घटनाएँ घटीं, जिससे हर आने-जाने वालों की नजर कॉलेज पर पड़ने लगी। जैसे अब तक चारागाह के रूप में इस्तेमाल होने वाला कॉलेज ग्राउण्ड में दीवार बनने लगी थी। जर्जर हो चुकी कुर्सियों-मेजों पर पॉलिस कराई जाने लगी। भवन की दीवारों को सफेदी द्वारा चमकाया जाने लगा, कॉलेज के चपरासी वर्दी पहने कॉलेज में दिखाई पड़ने लगे। इन सब गतिविधियों ने गाँव वालों की उत्सुकता भी बढ़ा दी थी, वे सब ये जानने को व्याकुल हो रहे थे कि आखिर ये सब हो क्यों रहा है? अचानक सब चीजों को व्यवस्थित करने की आवश्यकता क्यों पड़ गयी। उनकी जिज्ञासा भी एक दिन आखिर शांत हो ही गई। शनिवार की शाम को कॉलेज के प्रिंसिपल का चपरासी बाबूराम जो कि चपरासी से ज्यादा प्रिंसिपल का लाड़ला था, वह अकेला आता हुआ दिखाई पड़ा और जब उससे गाँव वालों ने पूछा कि यह अचानक क्या हुआ कि कॉलेज में इतने सारे काम करवाये जाने लगे? तब उसने बताया कि कॉलेज में नैक (NAAC) की टीम आने वाली है। नैक? ये के होवे है भाया? चौकते हुए यह प्रश्न मंगरू ने किया जिसका बड़ा लड़का भी इसी कॉलेज का होनहार विद्यार्थी था। जो कि पूरे साल कॉलेज न जाने का रिकार्ड अपने नाम करा चुका था। ऐसा सुनते ही बाबूराम भड़क गया तुम लोग रहोगे मूर्ख के मूर्ख। न खुद पढ़े ना बच्चों को पढ़ने भेजते हो। अरे नैक सी.बी.आई. है सी.बी.आई.। पता नहीं कब किसका गला पकड़ ले और उसे फांसी पर लटका दे। देखते नहीं हम लोग कितनी तैयारी कर रहे हैं। जरा-सी चूक हुई नहीं कि प्राण गए? ऐसा कहकर बाबूराम तो निकल गया पर गाँव वाले काफी देर तक सकते में रहे। दो-चार दिन में ही गाँव में यह चर्चा होने लगी कि कॉलेज में सी.बी.आई. आने वाली है ऐसा सुनते ही गाँव के लोगों ने तो लगभग कॉलेज की तरफ फटकना ही छोड़ दिया। क्या पता सी.बी. आई. किसकी गर्दन पकड़ ले।
अपने निर्माण काल से लेकर आज तक कॉलेज अपने शैक्षिक गतिविधियों के अलावा बाकी सभी कार्यों के लिए चर्चा में रहता था। कॉलेज के दो शिक्षक शिवशंकर शर्मा और कृष्ण कुमार जाखड़ शिक्षक कम स्वयंभू मसीहा ज्यादा थे।
कॉलेज की सारी गतिविधियाँ उनके इर्द-गिर्द ही घूमती थी। क्या मजाल की उनकी मर्जी के बगैर कॉलेज में पत्ता तक खड़क जाय। आलम यह था कि उनके आते ही कॉलेज खुलता और उनके जाते पर बंद हो जाता था। छात्र समूहों की सारी गतिविधियाँ उनके इशारे पर ही संचालित होती थी। नॉन टीचिंग कर्मचारियों की तो मानो शामत ही थी, वे उनके सामने कुछ बोलना तो दूर, सामने से गुजरने में भी भयभीत रहते थे। लगभग 25-30 सालों से चली आ रही व्यवस्था में बदलाव तव आया जब उनके न चाहने के बावजूद भी अलवर जिले के कठपतुली नामक गाँव से आए एक शिक्षक ज्ञानप्रकाश ने प्राचार्य का पद संभाल लिया। शुरूआत के कुछ दिनों तक तो ऐसा लगता रहा कि ये दोनों मसीहा उन्हें चुटकियों में मसल देंगे, और इसके लिए उन्होंने अपने सारे दाँव चले भी, शुरूआती दिनों में उन्हें आंशिक सफलता भी मिलती दिखी। परन्तु धीरे-धीरे ज्ञानप्रकाश ने अपनी सूझबूझ से सारी परिस्थितियों का सामना किया और उन दोनों को अपने मुँह की खानी पड़ी। तब से ये दोनों बेहतर समय आने की प्रतीक्षा में घात लगाए बैठे हुए हैं। धीरे-धीरे ज्ञानप्रकाश के पक्ष और विपक्ष की खेमेबंदी स्पष्ट होने लगी। नैक के टीम की आने की सूचना ने दोनों खेमे की सक्रियता बढ़ा दी थी। पक्ष वाला खेमा जहाँ सबकुछ व्यवस्थित करने में जुटा था वहीं विपक्ष वाला खेमा नैक टीम के सामने ज्ञानप्रकाश की कमियों को उजागर कर उनसे पूरी तरह से दो-दो हाथ करने के फिराक में था। इन सबके बीच ज्ञानप्रकाश जी की चिंता बढ़ती जा रही थी वे अभी सभी को मिलाकर चलने के पक्ष में नजर आ रहे थे।
कॉलेज के निर्माण के 60-65 सालों में पहली बार नैक (NAAC) ने इस कॉलेज का रूख किया था, इसलिए उसकी प्रक्रिया और शक्ति का सही-सही अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा था। हालात ये थे कि जितने मुँह उतनी बातें। बाबूराम की बातें तो शिक्षक और कर्मचारी ऐसे सुन रहे थे मानो नैक की वास्तविक सूचना उसके पास ही मौजूद हो। उसका कारण यह था कि वह ज्ञानप्रकाश जी का मुँहलगा चपरासी था और अंदर-बाहर की खबरे इधर-उधर करके अपनी धौंस जमाये रखता था और अस्थाई शिक्षकों को तो वह धमका भी देता था, इसी खौफ में नये-नये स्थायी हुई कुछ शिक्षक उसके सलाम भी ठोंक दिया करते शायद इस उम्मीद में कि प्राचार्य के पास वह उनकी अच्छी छवि पेश करेगा। खैर, हम लोग नैक की तरफ लौटते हैं। ज्ञानप्रकाश जी अपनी क्षमता और स्रोत का इस्तेमाल कर नैक की शक्ति और प्रक्रिया के आकलन में लगे हुए थे परन्तु उन्हें भी कुछ खास सफलता नहीं मिल पा रही थी। कुल मिलाकर सब कुछ घालमेल-सा ही दिख रहा था। अस्थाई अध्यापकों को ऐसा लग रहा था कि इसके बाद उनकी नौकरी पक्की, तो पक्की नौकरी वालों को अपने प्रमोशन की उम्मीद जगने लगी थी। वहीं शिवशंकर शर्मा और जाखड़ ग्रुप के शिक्षक इस कोशिश में थे कि इस आँधी में ज्ञानप्रकाश को उखाड़ फेंकना ज्यादा आसान होगा पर इस सब गतिविधियों के बीच असली चाँदी हो गई थी हिन्दी विभाग के शिक्षक आर एस. चिल्लर की। इनका पूरा नाम क्या था? ये पूरे कॉलेज में किसी को मालूम न था। दस-बारह साल इन्हें नौकरी करते हो गये थे, इस अवधि में इनका पूरा नाम कोई जान न पाया था, हो सकता है ये खुद भी भूल गये हों। और क्या पता इनका पूरा नाम कुछ हो ही ना! क्योंकि जितनी डिग्रियों के होने का ये दावा करते थे उसमें एकाध डिग्री इसी नाम से बनवा ली हो।
पूरा कॉलेज इन्हें चिल्लर सर के नाम से ही जानता था। इन्होंने हिन्दी के अलावा भी कई विषयों में राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय डिग्रियों का जुगाड़ कर रखा था और दूसरों के लिए जुगाड़ कर देने का दावा भी करते थे, पर मुफ्त में नहीं हर चीज के पैसे इन्होंने फिक्स कर रखे थे। यह उनका साइड बिजनेस था। बच्चों को पढ़ाने से इनका कोई खास सरोकार न था, ये भोजन के समय पर ही कॉलेज पहुँचते थे और भोजन की तैयारी तथा भोजन करने में दो-ढाई घंटे निकाल देते थे। इस दौरान अगर किसी बच्चे ने उन्हें क्लास की याद दिला दी तो तुरन्त उसको अशिष्ट और संस्कारहीन घोषित कर देते थे। और अगर महीने में एकाध बार क्लास तक पहुँच जाते तो बच्चों को पाठ्यक्रम के अलावा हर प्रकार का ज्ञान परोस आते थे। क्योंकि इनका मानना है कि पाठ्यक्रम में क्या रखा है इसे तो कोई भी शिक्षक पढ़ा देगा जबकि वे तो वही पढ़ाते थे जो अंतरराष्ट्रीय स्तर का हो। पूरे वर्ष दो-चार क्लासों में ये बच्चों को यह बात समझाने में सफल हो जाते कि इस पाठ्यक्रम को पढ़कर कुछ नहीं होगा। इसलिए मैं तुम लोगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का ज्ञान देता हूँ। और बीच-बीच में बच्चों को यह बताना नहीं भूलते कि अमेरिका राष्ट्रपति हिन्दी सिखाने के लिए उन्हें तीन-चार बार फोन कर चुका है, पर वे अपने छात्रों के कैरियर को ध्यान में रखते हुए वहाँ नहीं जा पा रहे हैं। और तुम लोगों की वजह से अपना कैरियर खराब कर रहे हैं। नहीं तो इस कॉलेज से उन्हें मिलता ही क्या है? इतना तो वे कॉलेज के बाहर एक लेक्चर में कमा लेते हैं।
तो ऐसे हैं हमारे चिल्लर साहब। मैं कह रहा था कि आजकल उनकी चाँदी हो गई है। वे विभाग के कमरे में हमेशा सात-आठ लोगों से घिरे ही रहते थे, क्लास के लिए तो उनके पास पहले ही समय नहीं था पर आजकल काम का दबाव इतना बढ़ गया है कि साला खाने का टाईम भी नहीं मिलता है, काफी व्यस्त रहते हैं आजकल चिल्लर साहब। क्योंकि नैक ने इतना दहशत पैदा कर रखा है कि हर कोई न कोई लेख या पुस्तक छपवा लेना चाहता है, तो कोई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर की डिग्री, डिप्लोमा के जुगाड़ में चिल्लर साहब के चक्कर लगा रहा है। चिल्लर साहब शिक्षक चाहे जैसे भी हों, सेल्समैन निखरे हुए थे। इसी कारण इस बात की कतई गुंजाईश नहीं छोड़ते थे कि कोई पैसे में मोलभाव कर पाये इसलिए अपने हावभाव ऐसे रखते थे कि कोई हजार-दो हजार रूपये अधिक ही दे जाता। उन्होंने हर तरह के ग्राहकों के लिए अलग-अलग फार्मूले बना रखे थे। जब कोई अस्थाई शिक्षक उनके पास आता तब वो एक काल्पनिक नामों की ऐसी सूची पेश करते जिन्होंने इनसे डिग्री लेकर या लेख छपवाकर स्थायी नौकरी प्राप्त कर ली है। जैसे ही कोई स्थायी शिक्षक उनके पास आता तो वो एक दूसरी सूची पेश कर देते जिनमें उन लोगों के नाम होते जिन्होंने उनसे सुविधा प्राप्त कर प्रमोशन पा चुके थे या किसी न किसी संस्थान के प्राचार्य या निदेशक आदि नियुक्त हो चुके थे। ऐसी बातें सुनकर लोगों के बाँछे खिल जातीं। उन्होंने लोगों को विश्वास में लेने के लिए कुछ खास तरीके भी ईजाद कर रखे थे, जैसे अगर कोई उनके पास आता हुआ दिख जाता तब वो फोन उठाकर बात करने का अभिनय करने लगते और सामने वालों को न देखने का नाटक करते हुए बड़ी-बड़ी बातें करने लगते, जिसे सुनकर सामने वाला पहले ही सहम जाता था। और मुंहमांगा कीमत पर सौदा तय करके भी अपने को उपकृत समझता था। हद तो तब हो गयी जब कॉलेज में नैक टीम में आने वाले सदस्यों के नामों का खुलासा होते ही उनमें से दो लोगों को उन्होंने अपना शिष्यवत बताना शुरू कर दिया था।
अब भाई खबरें तो आग की तरह फैलती हैं और इस खबर ने भी जोर पकड़ी और पहुँच गई प्राचार्य ज्ञानप्रकाश तक। पर इस खबर ने उन्हें खुश करने के बजाय थोड़ी चिन्तित ही कर दिया। क्योंकि अभी एक महीने पहले ही उन्होंने चिल्लर को क्लास नहीं लेने पर अपने कमरे में बुलाकर धमकाया था और अगली बार ऐसा करने पर कानूनी कारवाई की भी चेतावनी दे दी थी। अब उनके सामने धर्मसंकट ये था कि अब वे उसी चिल्लर के सामने मदद का हाथ कैसे फैलाते ?
ऐसे नाजुक मौके पर खुफिया विभाग के लोग काम में लगाये जाते हैं सो उन्होंने भी ऐसा ही कुछ किया। उन्होंने शिक्षक के रूप में दो-तीन खुफिया लोगों को नियुक्त कर रखा था। कहा जाता है कि कुशल प्रशासक वही होता है जिसका खुफिया विभाग मजबूत हो और फिर जासूसों का चलन तो राजे-महराजे भी किया करते थे। दुनिया में सबसे शक्तिशाली वही माना गया जिसका खुफिया तंत्र मजबूत हो, तो भला ज्ञानप्रकाश जी क्योंकर चुकते? सो भाई उन्होंने शिक्षकों के वेष में दो-तीन जासूस भी पाल रखे थे, जो पूरे कॉलेज में होने वाली हर गतिविधि की सूचना उन तक पहुँचाते थे। चिल्लर साहब के क्लास न लेने की सूचना और नैक टीम के सदस्यों से उनके संबंधों की सूचना भी उनके जासूसों की ही सफलता थी। जासूसों की कुछ खासियत होती है ये मान-सम्मान की परवाह नहीं करते और घोर अपमान सहकर भी चेहरे पर मुस्कान चिपकाये रह सकते हैं। इन्हें शीघ्र ही किसी को भरोसा जीत लेने में महारत हासिल होती है। खबरे न मिलने पर ये काल्पनिक खबरे गढ़ लेने में भी कुशल होते हैं। और उनका ज्यादातर व्यापार इन गढ़े गये खबरों के सहारे ही चलता है। इन तमाम गुणों के अतिरिक्त इन्हें जिसमें विशेषज्ञता प्राप्त होती है वह इन खबरों को राजा तक पहुँचाने का तरीका, जिसका काट आज तक कोई नहीं खोज पाया। ये हर झूठी-सच्ची खबर को राजा की कान में फूंकते हैं, जिससे राजा को ये अहसास हो जाये कि कोई गंभीर बात बता रहा है साथ ही आस-पास के लोग ये भी समझ जायें कि ये राजा का बहुत करीबी है, जिससे बाकी लोग उसके झाँसे में आ जायें। इस कॉलेज में ऐसे तीन-चार जासूस मौजूद थे, होंगे तो शायद और भी पर ये तीन-चार के ऊपर से पर्दा हट चुका था। और जिन पर से पर्दा हट चुका था उनको देखते ही लोग अपनी बातचीत बंद कर देते या मुद्दा बदल लेते थे। परन्तु चिल्लर ने ऐसा कुछ नहीं किया उसने तो जासूसों को देखते ही नैक टीम के सदस्यों के साथ अपने संबंधों की गहराई को जोर-जोर से बताने लगता ताकि जासूस ये खबर ज्ञानप्रकाश तक पहुँचाये। और हुआ भी कुछ ऐसा ही जैसा चिल्लर साहब चाहते थे। रोज-रोज की खबरें सुनकर आखिर ज्ञानप्रकाश जी से रहा न गया और उन्होंने भारी मन से चिल्लर को अपने चैम्बर में बुलाया और काफी आवभगत की तथा पुरानी बातें भूलकर कॉलेज के विकास की दुहाई देकर उनसे साथ देने का आग्रह किया। पर चिल्लर ठहरा मोटी चमड़ी का इतनी आसानी से कहाँ मानने वाला था। इसकी आड़ में उसने अपने दो चार काम ज्ञानप्रकाश से करवा लिये तथा कुछ अन्य शर्तों के साथ उनसे बात करने का आश्वासन देकर चलता बना।
जैसे ही यह खबर शिवशंकर शर्मा और जाखड़ को पता चली कि ज्ञानप्रकाश ने नैक टीम से जुगाड़ निकालने के लिए चिल्लर को बुलाया था। इससे उन दोनों ज्ञानप्रकाश की बेचैनी को भांप लिया उन्हें ये लगने लगा कि अब समय आ गया है जब वे ज्ञानप्रकाश को कुर्सी से हटाने में सफल हो जायेंगे। कहते हैं ना कि ‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा। नैक टीम की तैयारी में कमरतोड़ मेहनत के बीच संस्कृत विभाग के एक अस्थाई शिक्षक सनत कुमार का लीवर खराब हो गया। उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। चूँकि सनत कुमार की तबीयत कॉलेज में काम करते हुए बिगड़ी थी इसलिए नैतिक रूप से इसकी जिम्मेदारी कॉलेज की थी, परन्तु कॉलेज के सामने तकनीकी परेशानी यह थी कि वह अस्थायी शिक्षक था और उसके स्वास्थ्य संबंधी सुविधा का कोई प्रावधान महाविद्यालय के पास नहीं था। सनत अपनी विधवा माँ और एकलौती कुँवारी बहन का अकेला सहारा था और माँ ने बड़ी कठिनाइयों से उसे पढ़ाया था। इस उम्मीद में कि बेटे की नौकरी होते सब ठीक हो जायेगा। और तब वह अपनी कुँवारी बहन की शादी बड़े धूमधाम से करेगा इस उम्मीद में उसने अपनी बेटी की शादी के लिए कुछ बचाकर नहीं रखा। उनके पास जो कुछ भी था वह सब अपने बेटे की पढ़ाई पर ही खर्च कर दिया। और बड़ी जतन और मिन्नत के बाद सनत का संतराम महाविद्यालय के संस्कृत विभाग में अस्थाई शिक्षक के तौर पर नियुक्ति मिली थी। वह जी-तोड़ मेहनत करता और छात्रों को बेहतर से बेहतर शिक्षण प्रदान करता। जैसे ही नैक टीम के आने की सूचना कॉलेज को मिली। सनत ने मानो अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। उसने अपनी बूढ़ी माँ और बहन की चिन्ता किए बगैर दिन-रात एक करके कॉलेज को बेहतर बनाने में लगा रहा उसने अपने खाने-पीने की परवाह भी नहीं की, सोना तो वह लगभग भूल ही चुका था। कभी-कभी तो अधिक रात हो जाने और जाने की कोई सुविधा न मिलने पर उसने कॉलेज में काम करते हुए ही रातें गुजार दी थी। बस स्थाई नियुक्ति पाने की उम्मीद में उसने अपना सबकुछ कॉलेज के लिए ही समर्पित कर दिया था। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे उसका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और एक दिन शाम को वह बेहोश होकर गिर पड़ा। पहले तो उसके साथियों ने पानी के छींटे आदि मारकर उसकी चेतना वापस लाने की कोशिश की, परन्तु जब वह होश में नहीं आया तब उसे पास के स्वास्थ्य केन्द्र ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने प्राथमिक परीक्षण करने के बाद उसे बड़े अस्पताल में रेफर कर दिया।
यह घटना मानों शिवशंकर शर्मा और कृष्ण कुमार जाखड़ के लिए बड़ा अवसर लेकर आया था। अब उनकी मसीहाई पुनः जाग्रत हुई परन्तु सनत के लिए
नहीं बल्कि सनत के बहाने वे प्राचार्य ज्ञानप्रकाश को धूल चटाना चाहते थे। उन लोगों ने चिल्ला-चिल्लाकर पूरे कॉलेज को यह बता दिया कि कैसे प्राचार्य अस्थाई शिक्षकों का शोषण करते हैं। ऐसे प्राचार्य को तुरन्त इस्तीफा दे देना चाहिए। ऐसे आदमी को प्राचार्य बने रहने का कोई हक नहीं है। उसमें मानवता नाम की कोई चीज नहीं बची है। इन दोनों को कॉलेज के कुछ और शिक्षकों का भी समर्थन मिला। जिसमें पॉलिटिकल साइंस की एक महिला शिक्षक भी शामिल थी जो शिक्षक से ज्यादा ट्रेड यूनियन की नेत्री थी, उन्होंने इस घटना को मार्क्सवाद से जोड़ते हुए इसे मालिक-मजदूर शोषण से जोड़ दिया तथा कॉलेज को इंईंट से ईट बजा देने और इस मुद्दे को पार्लियामेन्ट तक में उठवाने की चुनौती दे डाली। इन सबके बीच आग में घी डालने का काम किया, एक राष्ट्रवादी शिक्षक ने, जब उन्होंने इसे हिन्दू शिक्षक पर हुए अत्याचार के रूप में देखा और हिन्दूवादी शिक्षकों को इसके खिलाफ गोलबंद होने का आह्वान भी किया। ऐसी कुछ न कुछ गतिविधियाँ रोज-रोज कॉलेज में चलने लगी। पढ़ाई न तो पहले होती थी ना अब हो रही है। सारे शिक्षक सनत कुमार पर हुए इस अत्याचार से इतने आहत महसूस कर रहे थे कि उनका पढ़ाने से मोहभंग हो गया था। इन सारी गतिविधियों के बीच किसी ने भी अस्पताल जाकर सनत की सुध लेने की कोशिश नहीं की। सरकारी अस्पताल के बीमार बिस्तर पर पड़े पड़े उसकी हालत और खराब हो गई थी। उसकी बूढ़ी माँ ने बहुत आँसू बहाये परन्तु डॉक्टरों का दिल न पसीजा। किसी कीमत पर मंहगा ईलाज मुफ्त करने को तैयार न हुए। उसकी बहन को तो मानो साँप ही सूँघ गया था। वह दिन भर गुमसुम होकर अपने भाई के सिरहाने बैठी रहती, इस उम्मीद में कि उसका भाई जल्द ही ठीक हो जाएगा।
इधर प्राचार्य ने प्रबन्धन समिति के चेयरमैन जगमोहन मजीठिया के सामने सनत कुमार के ईलाज का खर्च उठाने का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने नियम-कानून का हवाला देते हुए ऐसा करने से इन्कार कर दिया। परन्तु उन्होंने अपना बड़ा दिल दिखाते हुए व्यक्तिगत स्तर पर कुछ सहयोग देने की पेशकश अवश्य की। साथ ही ज्ञानप्रकाश को यह सलाह भी दे डाली कि महाविद्यालय के शिक्षक-कर्मचारियों से सनत कुमार के ईलाज के लिए चंदे के तौर पर कुछ रूपये इकट्ठे किए जाएँ। ‘मरता क्या न करता’ के भाव से ज्ञानप्रकाश जी इसके लिए तैयार तो हो गये। लेकिन इस प्रस्ताव ने तो कॉलेज के बिगड़े हालत के बीच आग में घी डालने का काम किया। शिवशंकर शर्मा और कृष्ण कुमार जाखड़ ने चंदे के प्रस्ताव को ज्ञानप्रकाश के आर्थिक भ्रष्टाचार से जोड़ दिया जिसमें इन दोनों का साथ देने के लिए चिल्लर साहब भी काफी मुखर दिखने लगे। इन सभी ने इस मुद्दे पर इमेरजेन्सी बैठक बुलाने की माँग की। चौतरफा दबाव के बीच ज्ञानप्रकाश को इमेरजेन्सी बैठक बुलानी पड़ी। बैठक उम्मीद के अनुरूप दी काफी हंगामेदार रही और उसमें सनत कुमार की बिगड़ती तबियत के अतिरिक्त सभी विषयों पर खुलकर चर्चा हुई। सभी गला फाड़कर ज्ञानप्रकाश पर लगे आरोपों की जाँच हाईकोर्ट के जज से कराने तथा जाँच पूरी होने तक उन्हें छुट्टी पर भेजे जाने की माँग की। जिन एकाध शिक्षकों ने सनत कुमार के मुद्दे पर चर्चा करनी भी चाही तो चौतरफा आती आवाजों ने उनकी आवाज को दबा दिया। परन्तु बैठक की समाप्ति के कुछ मिनट पूर्व ज्ञानप्रकाश जी की इस अपील का कि, सनत कुमार की प्राण रक्षा के लिए हमें उसकी कुछ आर्थिक मदद करनी चाहिए, कुछ असर जरूर दिखाई दिया। कुछ शिक्षकों ने खुलेआम और कुछ अस्थाई शिक्षक बच-बचाकर सामने वाली टेबल पर रखे डिब्बे में कुछ रूपये डाले। इस डिब्बे को बाद में जब खोला गया तो इसमें 35. च450 रू० निकले थे। ये रूपये सनत के ईलाज में आने वाले 2 लाख रूपये के खर्च के मुकाबले काफी कम थे। पर इसे ज्ञानप्रकाश ने अपनी सफलता मानते हुए इन रूपयों को सनत की माँ तक पहुँचवा दिया था। पर इन रूपयों से न कुछ होना था ना ही हुआ। सनत की तबियत दिन-ब-दिन बिगड़ती चली गई। इसके बाद किसी ने सनत की सुध नहीं ली। कॉलेज की गतिविधियाँ धीरे-धीरे सामान्य होने लगी। अब इस मुद्दे को पार्लियामेंट में उठाने या हिन्दू शिक्षक का अपमान जैसी बातें कोई करता हुआ नजर नहीं आ रहा था। एक सप्ताह बाद 24 अगस्त को कॉलेज को यह सूचना मिली कि दर्द से तड़पते हुए और उचित ईलाज के अभाव में सनत ने दम तोड़ दिया। कल यानि 25 अगस्त को 12.10 मिनट पर कॉलेज के स्टाफ रूम में उसकी शोक सभा है।
