पितृ-प्रेम (लघुकथा)

गौरी तिवारी

चंदनिया छुप जाना रे, क्षण भर को लुक जाना रे
निंदिया आँखों में आए, बिटिया मेरी सो जाए
ले के गोद में सुलाऊँ, गाऊँ रात भर सुनाऊँ
मैं लोरी-लोरी, हो, मैं लोरी-लोरी
लोरी गाते गाते घनश्याम की आंखों से आंसुओं की धारा छलक रही थी। इस धारा का एक मोती नैना पर गिरा और वह अचानक से उठ गई। उठते ही वह कहने लगी ” पापा आप रो क्यों रहे हो? आपकी तबियत खराब है क्या? अपना माथा दिखाइए तो….. सिर तो गर्म नहीं है आपका,,, फिर क्यों रो रहे हैं आप? मुझे अच्छा नहीं लगता आप जब रोते हैं तब।” इतना कहते ही वह भी रोने लगी, तभी उसे बाहर वाले कमरे से लोगों की आवाजें आती हैं।
” यह सब अचानक से कैसे हो गया?”
” शाम तक तो शर्मा जी बिल्कुल ठीक थे। मैं मिला भी था उनसे। लेकिन हां थोड़ा परेशान लग रहे थे किसी बात को लेकर।”
” खैर, जिसने इस दुनिया में जन्म लिया है उसे आखिर एक न एक दिन तो जाना ही है। लेकिन उस बेचारी बच्ची नैना का क्या होगा? मां का साथ तो उसे कभी मिला नहीं, और अब पिता का साया भी सिर से उठ गया।”
नैना अपने आंसुओं को पोछते हुए कहती है ” पापा चलिए बाहर चलते हैं, देखिए कितने सारे लोग आए हैं हमारे घर।” कोई उत्तर न पाने पर वह अकेले बाहर वाले कमरे में चली जाती है और देखती है कि कई सारे लोग उसके मृत पिता के शरीर को घेर कर बैठे हैं।

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