बड़े बेआबरू होकर बिहार से निकले नीतीश कुमार

अनिल तिवारी

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नीतीश कुमार के क्रमिक राजनीतिक उत्थान और तेज़ गिरावट को समझाना इतना आसान नहीं है। कुछ वर्ष पहले तक नीतीश को प्रधानमंत्री पद के योग्य “पीएम मैटेरियल” के रूप में देखा जा रहा था और आज वे अपने आप को उस राजनीतिक आश्रय गृह में पाते हैं जिसे राज्यसभा कहा जाता है। यह भले ही सभा (बैठक स्थल) हो, लेकिन निश्चित रूप से यह राज्य नहीं है।

स्वर्गीय सुशील मोदी ही वे व्यक्ति थे जिन्होंने पहली बार अपने मित्र/बॉस में “पीएम मैटेरियल” खोजा/गढ़ा/चित्रित किया था, और इस बात की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी क्योंकि उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल बाहर किया गया।

व्यक्तिगत रूप से भले ही नीतीश सौम्य दिखाई देते हों लेकिन अवसरवाद उनकी राजनीति की पहचान रहा है और वे अपने उपकारकर्ताओं के प्रति भी निर्मम रहे हैं—चाहे वे लालू हों, जॉर्ज हों या शरद, जरूरी नहीं कि इसी क्रम में।

जो लोग नीतीश को सिद्धांतवादी राजनेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं, वे वर्ष 2000 की उस घटना को भूल जाते हैं जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के लिए वे खतरनाक अपराधियों का आशीर्वाद लेने बेउर जेल तक चले गए थे। उस समय नीतीश झुके तो जरूर, लेकिन जीत नहीं पाए—यह अलग कहानी है।

इसके बाद भी उन्होंने अनंत सिंह, सुनील पांडे, बुटन सिंह और आनंद मोहन जैसे कई विवादास्पद लोगों को बढ़ावा और संरक्षण दिया।

मित्रवत मीडिया की मदद से नीतीश को वित्तीय ईमानदारी के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया लेकिन उनके कद के किसी राजनेता के लिए उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी उन लोगों द्वारा अर्जित अवैध संपत्ति से तीव्र विरोधाभास में दिखती है जो उनके करीब रहे—चाहे वे मंत्री हों या नौकरशाह। वे इतने भोले भी नहीं हैं कि उन घोटालों से अनभिज्ञ हों जिनमें उनके कई करीबी लोग न केवल शामिल थे बल्कि कुछ मामलों में उन संदिग्ध सौदों के सूत्रधार भी थे। किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसकी अपनी छवि से ही नहीं बल्कि उसके सहयोगियों से भी होती है, और इस मामले में उनकी तुलना बीजेपी के भ्रष्ट नेताओं से की जा सकती है।

उनके पास अपनी अवसरवादी कलाबाज़ी को सिद्धांतों की भाषा में छिपाने की कला थी। वे विकास के सिद्धांत के नाम पर सांप्रदायिक भाजपा को गले लगा लेते थे और सामाजिक न्याय के सिद्धांत के नाम पर राजद के साथ खड़े हो जाते थे।

इसका यह मतलब नहीं कि इतिहास उन्हें केवल गलत कारणों से याद करेगा। एक व्यक्ति और राजनेता दोनों के रूप में उनके गुण काफी हद तक उनकी कमियों से अधिक हैं।

राजनीतिक छंटनी के समय नीतीश ने कभी मित्र और शत्रु में फर्क नहीं किया। शायद उनके कोई मित्र थे ही नहीं। उन्होंने मित्रता को विकसित नहीं किया। किसी की चापलूसी को मित्रता समझ लेना भी उनकी प्रवृत्ति रही। वे मूलतः एक अकेले व्यक्ति हैं और यही शायद उनकी कमजोरी भी रही। हममें से अधिकांश लोगों की तरह नीतीश भी कुछ हद तक आत्ममुग्ध हैं और इसके लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

हर अच्छा खिलाड़ी जानता है कि जूते कब टांग देने चाहिए, लेकिन नीतीश ने इतने आत्मघाती गोल करने के बावजूद मैदान छोड़ने से इनकार कर दिया—और यही उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई।

निस्संदेह नीतीश एक बेहतर विदाई के हकदार थे। लेकिन अपनी स्वयं की गलतियों के लिए दूसरों पर दोषारोपण नहीं कर सकते । उनके लिए राजनीति से संन्यास लेने का सबसे उचित समय 2020 था, जब उनकी पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा था। उस समय उन्होंने कम से कम दिखावे के तौर पर पारी समाप्त करने का संकेत दिया था। लेकिन 2024 में उन्होंने खुद को और गिरा लिया जब कप्तान के वेश में वास्तव में बारहवें खिलाड़ी की भूमिका निभाने पर सहमत हो गए। बिहार की सत्ता हथियाने वालों ने कूद कूद कर नारे लगाए गए थे नीतीश मुख्यमंत्री थे, नीतीश मुख्यमंत्री हैं, नीतीश मुख्यमंत्री रहेंगे?
और देखते ही देखते इतिहास ने उन्हें एक लाचार मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज कर लिया ठीक उसी तरह जैसे मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना को पंजाब में अकाली दल बादल को।
प्रशांत किशोर पिछले 6 महीने से आरोप लगा रहे हैं की नीतीश जी वृद्ध हैं, बुजुर्ग हैं, बीमार हैं। वह कह रहे हैं कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में उन्होंने कई कुर्सियां देखी है लेकिन राज्यसभा की कुर्सी पर कभी नहीं बैठे हैं, इसलिए बिहार छोड़कर दिल्ली आना चाहते हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि बेटे को राजनीति में कोई मुकाम देने की गरज से ऐसा कर रहे हैं। खबरिया अभी तैर रही है कि बेटे को एक आपराधिक मामले से बचाने के लिए सारा अपमान घोंट रहे हैं। विश्वस्त सूत्र तो पेगासस के कारनामे और एप्स्टिन फाइल के रंगीन चित्रों की भी बात कर रहे हैं।
फिलहाल तो आश्रम वेब सीरीज के उसे पांच लाइन से ही काम चलाते हैं,”बाबा जाने मन की बात”

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