बाल साहित्य

प्रकृति का चमत्कार

 

अरे गुड़िया उठ भी जाओ, स्कूल नहीं जाना क्या? देर हो रही है।” माधव पिछले 15 मिनट से अपनी बेटी को जगाने की कोशिश कर रहा था। आज इस नई जगह पर उसके और उसके परिवार की पहली सुबह थी, आसमान साफ था सूर्य में भी एक नई सी चमक थी और मौसम हमेशा की तरह सर्द था।

“अजी, हम सब ने जितना उत्तराखंड के बारे में सुना था यह तो उससे भी ज्यादा सुंदर है, ऐसा लग रहा है मानो हम देवताओं की धरती पर आ गए हैं। माथव की पत्नी ये सब कह ही रही थी कि अचानक माधव अपनी पत्नी मंगला की बात पूर्ण होने से पूर्व ही बोल पड़ा “हां, सही कह रही हो। प्रकृति की सुंदरता का अद्भुत उदाहरण है देहरादून, बस यहां रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति यहां की प्रकृति से कभी भी खिलवाड़ ना करे, अन्यथा प्रकृति रूष्ट हो जाएगी।”

इन्हीं सब बातों के बीच गुड़िया विद्यालय जाने के लिए तैयार हो जाती है, माधव की पत्नी मंगला दोनों के लिए भोजन तैयार कर देती है और टिफिन भी बनाकर दे देती है। और फिर माधव गुड़िया को विद्यालय छोड़ते हुए अपने काम पर चला जाता है।

माधव पेशे से एक मजदूर था, जो नई-नई इमारतों को बनाने का काम करता था। पिछले वर्ष उसके गांव में सूखा पड़ा था जिसके कारण उसे अपना जन्म स्थान छोड़कर उत्तराखंड आना पड़ा ताकि उसे नया काम करने की और रहने की जगह मिल सके।

माधव अपने मन में सोच रहा था “इतनी संवेदनशील जगह में आखिर यह होटल कहां बनाने वाले हैं? क्या वहां की भूमि किसी भवन को बनाने की इजाजत देगी? कहीं उसके विपरीत प्रभाव तो नहीं होंगे?” तभी अचानक से एक भारी आवाज उसके कानों में सुनाई पड़ती है “अरे माधव जल्दी से काम पर लग जा! एक तो देरी से आया है ऊपर से अभी तक काम भी नहीं शुरू किया।” माधव पीछे मुड़कर देखता है कि ये सब उससे उसका मालिक बोल रहा था। देरी से आने के लिए माधव अपने मालिक से माफी मांगता है और फिर काम पर लग जाता है। तभी एक और मजदूर आता है और माधव को बताता है कि उन्हें भवन बनाने का कार्य जल्द से जल्द करना होगा क्योंकि अगले हफ्ते इस विशाल होटल का शिलान्यास समारोह होने वाला है। यह सब सुनकर माधव अपने काम करने की गति बढ़ा देता है, काम करते-करते अचानक माधव की नजर कटे हुए पेड़ों पर जाती है वह देखता है कि वहां लोगों ने अधिक मात्रा में पेड़ों को काटा है। भूमि की संवेदनशील जगह पर खुदाई कर के अपने घर, दुकान, होटल, मॉल आदि बनाए हैं माधव यह जानता था कि ऐसा करने से बनाई गई इमारतें ज्यादा दिनों तक टिकेंगी नहीं, प्राकृतिक आपदा आने से सब नष्ट हो जाएगा परंतु फिर वह सारी बातें छोड़कर अपना काम करने लगता है।

माधव जब शाम को घर लौट कर जाता है तो उसे कोई चिंता परेशान कर रही थी, तभी उसकी बेटी आती है और उससे कहती है “पिताजी, मुझे कल विद्यालय में पर्यावरण के महत्व के बारे में बताना है। मैं क्या बताऊं? आप मेरी मदद कीजिए। इस पर माधव कहता है “देखो बेटा, भगवान ने हमें यह पृथ्वी रहने के लिए दी है लेकिन हम अपनी जरूरतों और सहूलियत के लिए पेड़ काट रहे हैं, प्रदूषण फैला रहे हैं और प्रकृति के विपरीत काम कर रहे हैं। एक तरह से इन सब का कारण बढ़ती हुई आबादी भी है क्योंकि आबादी जिस गति से बढ़ रही है उसे हिसाब से हम अधिक वृक्षारोपण नहीं कर रहे हैं। हमें पर्यावरण का महत्व समझना चाहिए, यदि यह प्रकृति हमें रहने के लिए जमीन और उपयोग करने के लिए संसाधन दे सकती हैं तो इनका अनादर करने पर प्रकृति हमसे यह सब छीन भी सकती है। यदि सही समय पर हमने यह बात नहीं समझी तो आने वाले समय में मानव यानी हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। इसलिए हमें अपने पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए, हमें पर्यावरण का ध्यान रखना चाहिए और साथ ही हमें हर महीने पौधा लगाना चाहिए ताकि हम अपनी तरफ से प्रकृति का नुकसान होने से रोक सके।

अपने पिता की सारी बातें सुनकर गुड़िया बहुत खुश होती है और कहती है ” ठीक है पापा, मैं अपने भाषण में आपकी बताई गई बातें ही बोलूंगी और इसी के साथ हम भी हर महीने पौधा लगायेंगे।” माधव पौधा लगाने के लिए मान जाता है और कहता है कि वहां जंगलों की बहुत कटाई होती है जिसके कारण कई जमीनें बंजर हो गई है इसलिए भी पौधा लगाने की शुरुआत उन्हीं में से किसी एक बंजर जमीन से करेंगे। यह सुनकर गुड़िया बहुत खुश हो जाती है और अगले दिन का इंतजार करने लगती है।

अगले दिन काम पर से लौट कर आने के बाद माधव बहुत चिंतित होता। तभी उसकी पत्नी मंगला उससे पूछती है मैं आपको कल से परेशान देख रही हूं आखिर ऐसी कौन सी चिंता है जो आपको इतना चिंतित कर रही है माधव मंगला को बताता है कि कैसे देहरादून में बड़े-बड़े बिल्डर्स नई परियोजनाओं ला रहे हैं जिसके अंतर्गत वह यहां की भूमि और पेड़ों को हानि पहुंचा कर अपने होटल बनाएंगे। इस पर मंगला कहती है कि यह तो बहुत भयावह है क्यूंकि आज इन समझ में नहीं आ रहा लेकिन इस काम का नतीजा हम सबको आने वाले दिनों में भुगतना पड़ेगा। तभी माधव अपनी पत्नी मंगला से कहता है मैं पर्यावरण को कभी हानि नहीं पहुँचाना चाहता क्यूंकि मेरा परिवार एक काबिले से ताल्लुक रखता था। और मैं जानता हूं कि जंगल और यह प्रकृति हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है, परंतु यह डर भी लग रहा है कि फिलहाल जिंदा रहने के लिए मुझे काम की भी उतनी ही जरूरत है वरना मैं तुम्हारा और गुड़िया का पालन पोषण कैसे करूंगा। एक बार सरकार के बांध बनाने की योजना से हमारे मां-बाप जिस जगह वर्षों से रहते आए थे पल भर में तबाह हो गई और आज प्रकृति इतनी रूष्ट है कि राजस्थान में कहीं पानी नहीं है, ना ही कोई काम। आज इतनी मन्नतों के बाद हमें यहां देहरादून में रहने की जगह और काम मिला। लेकिन मैं अपने ही हाथों से कैसे प्रकृति को नुकसान पहुंचा हूं? यह जानते हुए भी इसका नतीजा बहुत खतरनाक हो सकता है।

मंगला अपने पति से कहती है “आप एक बार उन बिल्डर से बात कीजिएगा और कहेगा कि यहां होटल नहीं बन सकता, और यदि बनाना जरूरी है तो किसी और स्थान पर प्राकृतिक तरीके से बनाने की कोशिश करेंगे।” इस पर माधव कहता है “ठीक है मैं इस बारे में बात करूंगा कल” तभी वहां गुड़िया आ जाती है और कहती है “पापा, आपको याद है ना आज हम एक पौधा लगाना है” माधव कहता है कि उसे याद है और फिर वो, मंगला और गुड़िया तीनों उनके घर के पीछे वाली पहाड़ी के पास की एक बंजर जमीन पर पौधा लगाते हैं और यह प्रण लेते हैं कि वह उस भूमि को उपजाऊ बनाएंगे।

दोपहर में जब गुड़िया अपने विद्यालय से आती है तो वह माधव और मंगला को बताती है कि उसके अध्यापिका को उसका भाषण बहुत अच्छा लगा भाषण के अंत में उसने अपनी कक्षा के सभी विद्यार्थियों से पहाड़ी के पीछे वाली बंजर जमीन पर हर महीने पौधा लगाने के लिए भी कहा।

माधव यह सुनकर बहुत खुश हो जाता है कि उसके परिवार में भी पर्यावरण के बचाव के लिए वही भावना है जो उसके माता-पिता में थी, और इसी के साथ व दृढ़ निश्चय करता है कि कल वह बिल्डर्स से बात करेगा चाहे उसका नतीजा कुछ भी हो लेकिन उन प्रकृति के विरुद्ध जाकर कोई कार्य नहीं करेगा।

अगले दिन रोज की तरह गुड़िया विद्यालय चली जाती है और माधव अपने काम पर जाने के लिए तैयार हो रहा होता है। मंगला उसके चेहरे का भाग देखकर समझ जाती है कि वह अपने घर के लिए चिंतित हैं और कहती है “हम बिना खाए रह लेंगे कैसे भी जीवन का गुजारा कर लेंगे लेकिन जिस प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया है उसे नष्ट करके हम कभी भी फल-फूल नहीं सकते।” मंगला, माधव को बिल्डर्स से बात करने के लिए हिम्मत देती है और फिर माधव अपने काम पर चला जाता है।

माधव दफ्तर पहुंचकर अपने सबसे बड़े मालिक के पास जाता है और उन्हें सारी वस्तुस्थिति समझाता है लेकिन मालिक यह समझने को तैयार नहीं होता और माधव से क्रोधित होकर कहता है “अब तुम जैसा ही गरीब मजदूर मुझे बताएगा कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं? हम यहां सालों से रहते आए हैं, यह पर्यावरण हमारा है हम इसे चाहे जैसे इस्तेमाल करें हमारी मर्जी। अब तुम हमें पर्यावरण संरक्षण का पाठ न पढ़ाओ। तुम जिस घर में रह रहे हो ना उसे भी हमने ही बनाया है और यह जो काम करके तुम रोजी-रोटी कमाते हो वह भ%

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