अनिल तिवारी
मेरी मातृभाषा ठेठ भोजपुरी है।
हमारा पुश्तैनी इलाका उत्तर प्रदेश का सीमावर्ती जिला है जो के एक तरफ गंगा तो दूसरी तरफ घाघरा नदी से घिरा है। प्रचुर पानी वाली नदियों के कारण प्राचीन काल से बाहर के लोगों के इस रास्ते आना जाना रहा है। इस मेलजोल का असर भाषा बोली पर भी है। एक दावे के मुताबिक लगभग 25 करोड लोगों की मातृभाषा भोजपुरी है या भोजपुरी भाषा-भाषी हैं। देश,काल, परिस्थिति के लिहाज से बोली में एकरुपता नहीं है।कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी वाली बात भी है।
हमारे द्वाबा की भोजपुरी में बनारसी खनक के साथ बिहार के भोजपुर वाला ठेठपन तो है ही छपरहिया लचक भी शामिल है। सासाराम की ओर से आया शब्द ‘नू’और छपरा गोपालगंज की ओर से पहुंचा ‘रंउआ’ आम है। यह समृद्धि आवा-जाही और मेल-जोल के कारण है। रोजी-रोटी और अन्य कारणों से यहां लोगों की स्मृति में विस्थापन भी एक स्थाई भाव से रचा बसा है। जो विस्थापित हुए उनका भाषायी बोध, प्रयोग भी बदला। जो बड़े-बड़े नगरों महानगरों में गए वे धीरे-धीरे मातृभाषा से कटते गए।
भाषा का मसला बड़ा टेढ़ा है। जो भाषा में समर्थ हैं, जो उसे बोलने की कला जानते हैं, जिनमें भाषा के संस्कार हैं, जो भाषा के गौरव उसकी अस्मिता के प्रति जागरूक हैं, वे अधिक संप्रेषणीय होते हैं।
परिवार बालक की प्रथम पाठशाला है और माँ प्रथम गुरु। अनौपचारिक शिक्षा का श्री गणेश यहीं से होता है और भाषायी संस्कारों की पृष्ठभूमि भी यहीं तैयार होती है। एक तरह से कहें तो भजन, भोजन, भाषा और भाव की नींव परिवार में ही रखी जाती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भाषा का संस्कार वह परिवार से ही पाता है कि बड़ों से कैसे विनम्रता से बोला जाता है, कैसे ध्यानपूर्वक उनकी बात सुनी जाती है, उनसे जुबान नहीं लड़ाई जाती, पलटकर जवाब नहीं दिया जाता। यदि बालक गलत बात की जिद पकड़ ले तो माता-पिता, अभिभावक केवल समझाते ही नहीं हैं, जरूरी होने पर दंडित भी करते हैं। आप उनके बेहद अपने हो, इसलिए साम, दाम, दण्ड, भेद से आपको सुधारना उनका कर्तव्य है। वे अध्यापक नहीं हैं जिन्हें कक्षा के सभी विद्यार्थियों को सुधारना ही सुधारना है, इसलिए वे अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला भी नहीं झाड़ सकते हैं। वे माता-पिता और परिजन हैं, उन्होंने ही आपको रचा बुना है। आप उनकी प्रतिकृति हैं। वे आपको अपने से आगे ले जाना चाहते हैं। जो-जो उन्हें उपलब्ध नहीं हो सका, वह सब आपकी झोली में डालना चाहते हैं। आखिर आप उनके अंश हैं, आत्मज हैं, उनका रक्त आपकी शिराओं में दौड़ता है। आपको लेकर उन्होंने कई सपने चुने हैं और वे चाहते भी हैं कि उनके आत्मज उनकी कसौटी पर खरे जरूर उतरें।
जीवन मूल्यों की बात हो या भाषायी संस्कारों की ये मूलतः हमें परिवार से ही प्राप्त होते हैं तथा संबंधों की नींव भी वहीं रखी जाती है। जो संस्कार बचपन में दे दिये जाते हैं वही भविष्य में हमारे व्यवहार का आधार बनते हैं। लोगोंसे बातचीत करते यह लगता है कि भाषायी संस्कार धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। शब्दों की गरिमा समाप्त हो गयी है। बिना सोचे समझे पता नहीं कितने कितने असभ्य और अश्लील शब्द बोल दिये जाते हैं जिन्हें लेकर तनिक भी पश्चाताप नहीं होता और किसी के टोकने और समझाने पर बेलाग कह दिया जाता है’ अरे सब चलता है’। “सब चलता है”, इसी वृत्ति ने तो भाषा में बिगाड़ पैदा किया है। सच तो यह है कि परिवार में जो समय भाषायी संस्कारों को बनाने और मूल्यों को जगाने का है, उसे हमने मोबाइल और टी.वी. के लिए आवंटित कर दिया है। परिवार धीरे-धीरे विघटित हो रहें हैं। कमाई का बहुत अधिक दबाव है, सो सब कमाई में लगे हैं। 24 घंटे की व्यस्तता में जो बहुत जरूरी है, वह सब छूटा जा रहा है। उसे विस्मृत कर दिया गया है, सो किसी का इस ओर ध्यान ही नहीं। बस पैसे से सब खरीदा जा सकता है इसलिए जितना हो, उस पर सारा ध्यान केंद्रित हो गया है। ” सर्वे गुणा: काञ्चनमाश्रयन्ति” यह वाक्य तो जैसे रट लिया गया है, उसके प्रभाव में भाषायी संस्कारों की बात करना बेमानी है। आज सब जुगाड़ खोजने में लगे पड़े हैं। संक्षिप्तीकरण इतना हावी है कि संदेश की भाषा तक बदल गयी है, बोलचाल की भाषा बदल गयी है, संवाद की भाषा बदल गयी है, संप्रेषण की भाषा बदल गयी है। संस्कारों और भाषिक संस्कारों को जिस तरह तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है, उसे लेकर भाषायी समाज में एक चिन्ता घर कर गयी है। बच्चों का क्या, वे तो वही सीखते हैं, जैसा देखते हैं।
एक बार फिर सोचना होगा कि आखिर परिवार उन भाषायी संस्कारों को क्यों विकसित नहीं कर पा रहे हैं जिनकी दरकार है। इस दायित्व को सब एक-दूसरे पर छोड़ रहे हैं, एक-दूसरे को आलोचित करने में लगे हैं।
परिवार को लगता है यह विद्यालय का कार्य है, हम पैसा खर्चा कर सकते है और विद्यालय को लगता है कि जब तक घर परिवार का सहयोग नहीं मिलता तब तक अकेला चना क्या भाड़ फोड़ लेगा? समाज ने अपने हाथ अलग खड़े कर लिये हैं और इन सबके मध्य सबसे अधिक बालक की मिट्टी पलीद हो रही है और जो सबके मूल में था, वहीं उपेक्षित हो गया है। उसने अपने रास्ते खोजने शुरू कर दिये हैं। वह परिवार से मिलने वाले पाथेय को गूगल में खोज रहा है। दिन-भर मोबाइल में आँखें गड़ाये बैठा है कि कोई रास्ता मिल जाए। अब भी समय है, परिवार अपनी भूमिका तय करे क्योंकि वही बालक की पहली पाठशाला है और माँ ही बच्चे को भाषिक संस्कार देती है।
