गौरी तिवारी
कितनी सुखद अनुभूति होती है , जब रात्रि के दूसरे पहर अपने घर की छत पर बैठकर श्वेत चांदनी की चादर ओढ़े चंद्रमा को देखते हैं या फिर टिमटिमाते सितारों के समूह में कभी खरगोश तो कभी रथ की आकृति ढूंढने की कोशिश करते हैं। हृदय कितना प्रफुल्लित होता है जब सुबह तड़के आप उषा की लालिमा देखते हुए शीतल हवाओं को महसूस करते हैं, पक्षियों का मधुर कलरव सुनते हैं। किंतु प्रश्न यह है कि आखिर हममें से कितने लोग ऐसे हैं जो इन अनुभूतियों से परिचित हैं? आधुनिकता की इस चकाचौंध में हमने अपनी आंखें इस तरह मूंद ली हैं कि हमें अपने सिवा कुछ दिखाई ही नहीं देता। हमारा जीवन चक्र ‘मैं’, ‘मेरा’ और ‘मुझे’ के वृत्त में सिमट गया है। हमें अपने आसपास के लोग तो छोड़िए अपने परिवेश तथा पर्यावरण से भी कोई मतलब नहीं है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और इस सामाजिक प्राणी को पशु से मनुष्य बनाता है उसका विवेक किंतु शायद हम वैभव, संपन्नता तथा ऊंची इमारतों, बड़े-बड़े कल कारखानों, ऊंचे पद-प्रतिष्ठाके घेर जाल में फंसकर अपना विवेक खो चुके हैं। नामचीन कवि ‘पाश’ ने लिखा है “सबसे खतरनाक होता है व्यक्ति का मुर्दा बन जाना, घर से काम पर जाना और काम से लौट कर घर आना”। एक मशीनी दिनचर्या का पालन करते हुए स्वयं को ‘स्वः’ तक ही समेट लेंगे तो हमारे विचारों को और हमारी दिनचर्या को एक नया आयाम भला कैसे मिलेगा? वर्तमान परिपेक्ष्य में यदि देखा जाए तो किसी भी व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकताओं में रोटी, कपड़ा, मकान, पढ़ाई और दवाई जैसी वस्तुएं आती हैं किंतु हमने इन आवश्यकताओं के अर्थ को अपनी अभिलाषानुसार ढाल कर उनके अर्थ में परिवर्तन कर दिया है। उदाहरण के तौर पर जब भी हम मकान शब्द के बारे में सोचते हैं तो खुद ब खुद एक 27 मंजिला इमारत एन्टिलिया का चित्र हमारे मस्तिष्क में खिंच जाता है, कपड़े की बात हो तो, ज़ारा, पीटर इंग्लैंड, एच एन एम, जैसी कंपनियों के नाम हमें याद आते हैं। वास्तव में हम जाने अनजाने में आधुनिकता के अदृश्य जाल का, पागलपन की स्पर्धा का शिकार हो गए हैं और हमने जीवन का एक ही लक्ष्य बना लिया है कि इस अंधीदौड़ में सामने वाले व्यक्ति से आगे जाना है। जिसके चलते हम अपने जीवन को असल मायने में खुलकर नहीं जी रहे, जिंदगी के कई रंगों से अपरिचित हैं तथा अनमोल अनुभूतियों को मामूली समझ कर अनदेखा कर रहे हैं। यह भूल रहे हैं कि जो अनुभूतियां आपके लिए साधारण है वह किसी अन्य के लिए उसका स्वप्न हो सकती हैं।
वह अबोध बालक जिसके लिए संसार का अर्थ सिर्फ अंधेरा और रंग का अर्थ सिर्फ काला है, क्या वह कभी वसंत ऋतु में रंग-बिरंगे पुष्पों से लदे पेड़ के हरे पत्तों की लाल तथा हल्की पीले धारियों की खूबसूरती देख सकेगा? क्या वह संध्या की लालिमा या पूर्णिमा की चांदनी का अनुभव कर पाएगा? अक्सर मेट्रो और बस में सफर करते समय देखा जा सकता है कि किस प्रकार यात्रा कर रहे अधिकतर लोगों का ध्यान उनके मोबाइल फोन से नहीं हटता। उनकी आंखें मोबाइल फोन के स्क्रीन से इतर कुछ नहीं देखती, किसी ने कान में इयरबड्स लगाए हुए हैं तो किसी ने बड़े गर्व से ब्लूटूथ इयरफोन अपने गले में लटका रखा है जैसे की वह कोई एयर फोन ना हो अपितु बड़ी फैशनेबल वस्तु हो और कुछ महानुभाव ऐसे भी हैं जिनके पास यदि ईयर फोन ना हो तो वे अपने फोन की आवाज इतनी तेज रखते हैं कि अपने साथ-साथ दूसरों को भी सुनाते हैं कि वे क्या देख सुन रहे हैं। कई बार तो ऐसे लोग मनोरंजन का पात्र बन जाते हैं। कुछ तो इतना उन्मत होकर मोबाइल फोन का प्रयोग करते हैं कि उन्हें अपने आसपास के बारे में भी नहीं पता होता कि क्या हो रहा है।
एक बार दिल्ली मेट्रो में सफर करते हुए मैंने पहले डिब्बे की दिव्यांगजनों के लिए आरक्षित सीटों पर बैठे एक परिवार जिसके सभी सदस्य दृष्टिहीन थे उनके माध्यम से जिंदगी जीने की कला देखी और कुछ-कुछ सीखने की भी कोशिश की। एक शत प्रतिशत दृष्टिहीन मां जिसके चारों ओर सिर्फ अंधकार है, उसके हृदय के एक कोने में भी हर पल उसके बच्चे को खोने का डर विद्यमान है, यदि थोड़ी देर के लिए भी उसके बच्चों की खिलखिलाहट, उनकी अनुगूंज उसके कानों तक न जाए तो उसका मन बेचैन हो जाता है। चाह कर भी अपने बच्चे को न देख पाने की पीड़ा मैंने एक मां के मुख पर देखी। दांपत्य जीवन में एक दूसरे के सुख-दुख में साथ देने वाले प्रेम को उन माता-पिता में देखा। मैंने महसूस किया कि प्रकृति के विभिन्न रंगों को देखने में असमर्थ उन बच्चों के माता पिता ने जीवन के कई रंग देख लिए शायद जिनसे हम में से कई लोग अपरिचित हैं। उन्होंने साबित किया कि जीवन में तमाम तरह के दुखों के बावजूद एक व्यक्ति का कोमल स्पर्श, उसका प्रेम से हाथ पकड़ना कैसे दूसरे व्यक्ति में साहस भर देता है, एक उम्मीद की लौ जगाता है कि यदि आपस में प्रेम हो तो हम साथ मिलकर सारे दुखों को पार कर सकते हैं।
रात के समय यदि घर की बिजली चली जाए या आंखमिचौली खेलते समय कोई हमारी आंखों पर काली पट्टी बांध दे और हमारे चारों ओर सिर्फ अंधकार ही अंधकार हो तो हम एक कदम भी नहीं बढ़ा पाते, हर क्षण एक अजीब सा डर रहता है और मन चाहता है कि जल्दी से कोई मोमबत्ती जला दे या फिर आंखों की पट्टी खोल दे ताकि यह अंधकार दूर हो भले ही अंधकार कुछ क्षण का ही क्यों ना हो। आप सोचिए जिनका जीवन ही अंधकार में हो उनके हृदय पर कैसा वज्रपात होता होगा? पग पग पर जो कुछ न देख सकने के कारण लड़खड़ा जाए, उन्हें कितनी पीड़ा होती होगी? उनका जीवनयापन कैसे होता होगा? जिनकी जीविका का एकमात्र स्रोत दिहाड़ी मजदूरी है, बिना आंखों की रौशनी के वो काम कैसे करते होंगे? उनके परिवार का गुजारा कैसे होता होगा? जब एक मां एक नई कलि को जन्म देकर इस संसार में लाती होगी तब सिर्फ एक बार ही सही किंतु अपने बच्चों की मधुर मुस्कान उसके मासूम चेहरे को देखने की तृष्णा क्या कभी मिट सकेगी? न देख पाने की कसक उसे जरूर सालती होगी।
लेकिन ईश्वर ने जिन्हें आंखों की रोशनी जैसी अमूल्य भेंट दी है, उन्हें इसकी परवाह कदाचित नहीं है। वे प्रकृति की इस रमणीयता को अनदेखा करते हैं, साधारण समझते हैं, वे जीवन को एक बेहतर ढंग से जीने से चूक जाते हैं और जीवन के अनेक रंगों से अपरिचित रह जाते हैं।
आमतौर पर कुछ लोगों की आदत होती है प्लेट में जरूरत से ज्यादा भोजन लेकर फेंक देने की, महंगे होटलों में खाना खाने की, छोटी दुकान वालों के खाने को ‘अनहाइजीनिक’ बोलकर वही चीज किसी ऐसे बड़े होटल में खाने की जहां उन्हें खुद नहीं पता कि भोजन की सामग्री कितने समय से फ्रीजर में रखी गई है। लेकिन फुटपाथ पर सो रहे उन बेघर लोगों के लिए ऐसे लोगों की प्लेट से फेंका गया भोजन का एक-एक दाना ही अमृत के समान होता है। एक गरीब मजदूर जब दिनभर भूखे रहकर मेहनत करता है और शाम को रोटी, नमक और प्याज के साथ खाता है तब उसके मुख पर जो संतोष होता है वह किसी भी व्यंजन और पकवान से अधिक मूल्यवान होता है।
आज के आधुनिक युग में जितनी रफ्तार से देश का विकास हो रहा है उतनी ही रफ्तार से हमारे देश के वृद्धाश्रमों में वृद्धों की संख्या भी बढ़ रही है। आए दिन अखबार में खबर आती है कि किस प्रकार वृद्धावस्था में पहुंचे माता-पिता पर अत्याचार होता है। प्रेमचंद की ‘बूढ़ी काकी’ या फिर भीष्म साहनी द्वारा लिखित ‘चीफ की दावत’ सिर्फ एक कल्पना नहीं है, कहानी नहीं है, अपितु समाज का यथार्थ है। जिस माता-पिता ने एक वृक्ष के समान निस्वार्थ भाव से अपने बच्चों को स्नेह की छाया में पाला पोसा, कष्टों से बचाकर रखा, उनके अच्छे भविष्य के लिए अपना वर्तमान भूल गए, वही बच्चे बड़े होकर उन्हें भूल जाते हैं। भूल जाते हैं कि जिनके कारण वह खुद अस्तित्व में आए, उनका भी कोई अस्तित्व है। कुछ ऐसे बच्चे भी हैं जो सदैव मातृत्व की छाया से, पिता के स्नेह से वंचित रहे, जो डर लगने पर मां के आंचल में छुप जाने की अनुभूति से अपरिचित हैं, पिता की उंगली पड़कर चलने से महरूम हैं। क्या वह कभी इस अनुभूति से परिचित हो पाएंगे कि किस प्रकार माता-पिता मुसीबत आने पर अपने बच्चों के लिए कवच बन जाते हैं?
इस संसार में असमानताएं बहुत हैं। किसी व्यक्ति के पास सब कुछ अत्यधिक मात्रा में है तो वहीं दूसरे के पास अत्यंत न्यूनतम मात्रा में भी नहीं। एक भरा पूरा है दूसरा बिल्कुल खाली। परंतु जीवन की गति दोनों तरफ है। और प्रकृति की गति काही परिणाम है कि कई बार जो परिपूर्ण है वह अपूर्ण लगने लगता है और जो अपूर्ण है वह परिपूर्ण का बोध करा जाता है। इसीलिए हमें सिखाया जाता है कि जीवन का सौंदर्य इसी में है कि हम अपनी प्राप्त परिस्थितियों में कृतज्ञ रहना सीखें। सुबह जब आप उठे तब मन में कृतज्ञता का भाव अवश्य लाएं कि आप सकुशल हैं। हम गर्व करें की इस संसार में एक और सूर्योदय तथा सूर्यास्त के साक्षी बनेंगे, आप कृतज्ञ रहिए कि आपके पास रोटी, कपड़ा, मकान, पढ़ाई और दवाई जैसी सुविधाएं हैं जो इस संसार में सबके पास नहीं होती। आप कृतज्ञ रहें कि आपके पास एक परिवार है जो आपसे प्रेम करता है, आप कृतज्ञ रहिए कि आप अभी भी पेड़ों की हरियाली को देख सकते हैं। साहित्य व्यक्ति को विनम्र और संवेदनशील बनाता है। संवेदनशील व्यक्ति में दूसरों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझने की भावना होती है। साहित्य हमें सिखाता है की हर वह व्यक्ति जो आज अपने जीवन में सफल है वह सिर्फ अपने बारे में न सोचकर सर्वोदय की भावना रखे और अपने साथ-साथ दूसरों की भी सहायता करे, खासकर उनको जो खुद के लिए खड़े नहीं हो सकते। अक्सर हम दूसरों की संपन्नता देखकर अपने जीवन को अधूरा, अर्थहीन मान लेते हैं और 99 के चक्कर में पड़कर अधिक धन और अधिक सुविधाओं की तलाश करने लगते हैं, किंतु वास्तविकता यह है कि सुख का संबंध मात्र भौतिक वस्तुओं से नहीं अपितु कुछ अनुभूतियों से भी होता है, संतुष्टि के भाव से भी होता है। जब एक छोटा सा पौधा भी मिट्टी से उगता है तब वह सूर्य की किरणों, जल और हवा के छोटे-छोटे उपहारों के सहारे बढ़ता है। यदि इनमें से कोई एक वस्तु भी न मिले तो उसका विकास रुक जाता है, ठीक उसी प्रकार हमारा जीवन भी है, छोटी-छोटी बातों की कद्र करना और उनके प्रति कृतज्ञ रहना ही जीवन को अधिक सुंदर बनाता है।
