स्त्री

वह भोली थी जब तक गलतियां माफ करती गई

वह बुरी हो गई जब स्वाभिमानी बन गई

वह अच्छी थी जब तक सब सहती गई

वह बदतमीज हो गई जब अपने हक के लिए बोल गई

वह संस्कारी थी जब तक दूसरों के लिए जीती गई

वह बिगड़ गई जब खुद के लिए जीना सीख गई

वह सही थी जब तक चार दिवारी में कैद रहती गई

वह गलत हो गई जब अपने सपने पूरे करने सारे पिंजरे तोड़ गई

वह सीता थी जब तक अग्नि परीक्षा देती गई

वह कलंक हो गई जब अपने आत्म सम्मान के लिए सबके विरुद्ध चली गई

वह वरदान थी जब तक देवी स्वरूपा नवरात्र में पूजी गई

वह अभिशाप हो गई जब बेटी रूप में घर में पैदा हो गई

वह इज्जत थी जब तक पर्दे को स्वीकारती गई

वह तिरस्कार हो गई जब उसी पर्दे पर सवाल कर गई

वह राजकुमारी थी जब तक शालीनता के बंधन में जीती गई

वह रजिया देशद्रोही हो गई जब राज्य बचाने सिंहासन पर बैठ गई

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