नदी एवं साहित्य में यह बुनियादी फर्क है कि नदी एक ही दिशा में अनंतकाल तक बहती रहती है, जबकि प्रत्येक मौलिक साहित्य एक नई दिशा लेकर आता है। वह तमाम तरह की सामाजिक जड़ताओं से मुठभेड़ करता हुआ खतरे भी उत्ताता है। इसका मूल्य भी उन्हें चुकाना पड़ता है। ऐसे लेखक हो सूली पर चढ़कर ईसा और गरल पान कर सुकरात और मीरा बनते हैं। जिन लेखकों में धारा के विरुद्ध तैरने का साहस नहीं है उन्हें साहित्य लेखन में हाथ नहीं डालना चाहिए। असल में सच्चा साहित्य जन पक्षधर होता है। यह जो जन पक्षधरता है वह भला उन्हें कैसे अच्छा लगेगा जो सुविधा की चाशनी में लिथरे हुए हैं।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसी अर्थ में लिखा है “प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।” सजग समाज ऐसे साहित्य का सम्मान करता है। जहां ऐसे लेखक नहीं है वहां पतनशील समाज का सृजन होता है और पतनशील समाज का साहित्य भी धारा के विपरीत न जाकर उसके साथ बहने लगता है। ऐसे ही साहित्य को ध्यान में रखकर गेटे में लिखा है “साहित्य का पतन राष्ट्र के पतन का द्योतक है: पतन की और वे परम्पर एक-दूसरे का साथ देते हैं।” सच्चा साहित्य न सिर्फ मनुष्यता के पक्ष में होता है, बल्कि वह प्रकृति के पक्ष में भी होता है। प्रकृति और मनुष्यता दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। शायद यही कारण है कि दुनिया के साहित्य को नदियों ने जितना प्रभावित एवं सम्मोहित किया है उतना किसी और ने नहीं। हिंदी साहित्य भी इससे अछूता नहीं है।
हिंदी के लगभग सभी बड़े लेखकों-कवियों ने नदी को केंद्र में रखकर रचनाएं की हैं। यह जो नदी प्रेम है इसे समझने के लिए हमें करीब पांच हजार वर्ष पीछे जाना होगा। दुनिया की सारी सभ्यताओं का जन्म नदियों के किनारे ही हुआ है। अगर हम भारतीय संदर्भ में देखें तो सिंधु, गंगा, यमुना, नर्मदा, ब्रहापुत्र, सोन, झेलम, पुनपुन, फल्गु, सरयू, गोमती, व्यास, कृष्णा, गोदावरी आदि कुछ ऐसी नदियां हैं जिनका उल्लेख वैदिक साहित्य में बड़े सम्मान के साथ मिलता है। सभ्यताओं में सबसे प्राचीत सिंधु घाटी की सभ्यता है जो सिंधु नदी के तट पर उदित हुई थी। नदियों ने अपने तट पर सभ्यताओं का उसी तरह पोषण किया जैसे मां अपने आंचल में बच्चे का पोषण करती है। शायद इसलिए नदी को ‘मां’ की संज्ञा से भी संबोधित किया गया है। वह सिंधु घाटी की सभ्यता द्रविड़ों की सभ्यता थी। इस सभ्यता के अवशेष पंजाब के मांट गोमरी जिले के हड़प्पा और सिंधु के लरकाना जिले के मोअन जो-दड़ी में मिलते हैं।
इतिहास के विद्वान इसे लगभग पांच हजार वर्ष पुराना मानते हैं। उनका मानना है कि उस द्रविड़ सभ्यता को आर्यों ने नष्ट किया। वे लड़ाके थे, जबकि द्रविड़ शांतप्रिय जीवन जीने में विश्वास रखते थे। सिंधु नदी का पाट इतना लंबा-चौड़ा था कि आर्यों को इसे समुद्र होने का भ्रम हो गया। इसीलिए उन लोगों ने इसे ‘सिंधु’ नाम से पुकारा। समुद्र का ही एक नाम सिंधु भी है। दिनकर ने अपनी एक कविता में इस शब्द को इसी अर्थ में लिया है –
सुनू क्या सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा स्वयं युग धर्म का हुकार हूँ मैं।
सिंधु घाटी की सभ्यता सबसे पुरानी मानी जाती है। उस समय की कुछ सभ्यताएं मिस्र में, सुमेर में, चीन में भी विकसित हो रही थीं। सुमेर की सभ्यता चलुचिस्तान के दूसरी ओर दजला और फरात नदियों के मुहाने पर फैली थी, संभवतः समूचे बलूचिस्तान में भी। इतिहास के कुछ विद्वान इन सभ्यताओं को भी सिंधु सभ्यता का ही विस्तार मानते हैं। अतः संभव है कि ये सभ्यताएं भी द्रविड़ों की ही होंगी।
यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि द्रविड़ों की सभ्यता जहां नगरीय थी वहीं आर्यों की सभ्यता कबीलाई। ‘ऋग्वेद’ आयों का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। भगवतशरण उपाध्याय ने ‘भारतीय संस्कृति की कहानी’ नामक पुस्तक में ‘ऋग्वेद से आर्यों के ग्रहन-सहन का पर्याप्त पता चलता है। लगता है वे धीरे-धीरे अफगानिस्तान से गंगा-यमुना और घाघरा तक फैल गए थे। काबुल में घाघरा के बीच की नदियों के नाम उसमें मिलते हैं। उनकी जाति कबीलों में बंटी हुई थी, जिन्हें ‘जन’ कहते हैं”। अगर सिंधु नदी की भौगोलिक स्थिति देखें तो पता चलता है कि वह मानसरोवर के उत्तर में तिब्बती हिमालय से निकलती है। वहीं जोरकुल झील है जहां से पूर्व में ब्रह्मपुत्र, उत्तर में यारकंद जिसे ‘सीता’ भी कहा जाता है और पश्चिम में आमू नदी निकलती है। आमू नदी को ‘वक्षु’ भी कहा जाता है। ये संसार की सबसे ऊंची चोटियों से निकलकर मध्य एशिया और कश्मीर के बीच सरहद बनाती है। वहां से निकलकर पंजाब और अफगानिस्तान की धाराओं को पीती, सिंधु के रेगिस्तान में प्रवेश कर जाती है। आगे चलकर अरब सागर में इसका मुहाना है जहां अनेक देशों का लाया हुआ सारा जल गगन चूमती लहरों में विलीन हो जाता है।
इन नदियों का उल्लेख कर मेरा उद्देश्य अतीत के अंधकार में ले जाना नहीं है, बल्कि सिर्फ इस ओर संकेत करना है कि मानवीय सभ्यताओं का पल्लवन एवं पोषण नदियों के किनारे ही हुआ। इसलिए ये नदियां दूर होकर भी उसी तरह हमारे भीतर प्रवहमान है जिस तरह धमनियों में हमारे पुरखों का रक्त प्रवहमान है। ‘ऋग्वेद’ में नदियों का कितना महत्व दर्शाया गया है. इसका अंदाजा इस पंक्ति से हो जाता है-
महोज्योतिर्वहति वक्षणासु
अर्थात् गंगा आदि नदियों में महान ज्योति ही बह रही है। ‘गीता’ में कृष्ण ने यहां तक कहा है कि ‘स्रोतसामस्मि जाह्नवी’ अर्थात् नदियों में मैं गंगा हूं। तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ के अयोध्याकांड में गंगा के बारे में लिखा है-
गंग सकल मुद मंगल मूला सब सुख करनि हरनि सब शूला
यानी गंगाजी में जाकर अपवित्र जल भी पवित्र हो जाता है। ऐसे में नदियों के प्रति हिंदी लेखकों का अनुराग भी स्वाभाविक है। यह इसलिए भी स्वाभाविक है, क्योंकि लेखक समाज का एक संवेदशील प्राणी होता है। वह प्रकृति में मनुष्य को और मनुष्य में प्रकृति को देखता है। गेटे ने ठीक ही लिखा है, “प्रकृति अपनी उन्नति और विकास में रुकना नहीं जानती और अपना अभिशाप प्रत्येक अकर्मण्य पर लगाती है।” शायद इसी अभिशाप का नतीजा है कि हम लगातार प्रकृति से मुठभेड़ करते आ रहे है। ‘कामायनी’ के चिंता सर्ग में जयशंकर प्रसाद ने लिखा है-
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छांह एक पुरुष, भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह। प्रसाद ने मनु के माध्यम से जो चिंताएं व्यक्त की थीं वे आज भी
उतनी ही प्रासंगिक हैं। क्या यह कम चिंता की बात है कि दुनिया की प्रमुख नदियों में पानी की मात्रा लगातार घटती जा रही है। चीन की यलो रिवर, अफ्रीका की नइल नदी और उत्तरी अमरीका की कोलोराडो नदी साल के तीन महीने के दौरान सागर में मिलने से पहले ही सूख जाती हैं। भारत की प्रमुख नदियों में भी पानी का घटता बहाव साफ देखा जा सकता है। नदियों को पानी से लबालब भरने वाले ग्लेशियर बढ़ते तापमान के कारण लगातार पिघलते जा रहे हैं। भविष्य में कभी सदानीरा नदियां सूखी पगडंडी की तरह दिखाई देने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। देश की राजधानी दिल्ली में यमुना का क्या हाल है। अगर आप कभी दिल्ली के वजीराबाद पंटुन पुल से होकर गुज़रे होंगे तो उसकी बदहाली का अहसास आपने शिद्दत से किया होगा। बजबजाते नालों में तब्दील यमुना क्या वहीं रह गई है जिसके किनारे पर कभी कदंब की डाल पर कृष्ण बांसुरी बजाया करते थे। उस यमुना की रमणीयता की कल्पना कर विद्यापति से लेकर सुभद्रा कुमारी चौहान तक न जाने कितने कवियों ने कविताएं लिखी हैं।
हिंदी में नदियों को बहाली को लेकर लेखकों-कवियों ने भरपूर लिखा है और सचेत भी किया है कि अगर हम इसी तरह नदियों का दोहन करते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब नदियां सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएंगी। त्रिलोचन शास्त्री ने ‘नदी कामधेनु’ शीर्षक अपनी एक कविता में लिखा है-
नदी ने कहा था: मुझे बांधो
मनुष्य ने सुना और
तैरकर धाराओं को पार किया।
नदी ने कहा था मुझे बांधो
मनुष्य से सुना और/ सपरिवार धारा को/ नाव से पार किया/
नदी ने कहा था मुझे बांधो मनुष्य ने सुना और आखिर उसे बांध लिया बांधकर नदी को मनुष्य दुह रहा है। वह अब कामधेनु है।
इसी तरह ‘पानी की प्रार्थना’ शीर्षक अपनी एक कविता में केदारनाथ सिंह ने लिखा है-
अंत में प्रभु अंतिम लेकिन सबसे जरूरी बात वहां होंगे मेरे भाई-बंधु मंगल ग्रह या चांद पर पर यहां पृथ्वी पर मैं यानी आपका मुंहलगा यह पानी/ अब दुर्लभ होने के कगार तक पहुंच चुका है।
हिंदी साहित्य में नदियां कई-कई रूपों में सामने आई हैं। इस संदर्भमहाप्राण निराला की यह कविता देखें-
बांधो न नाव इस ठांव बंधु, पूछेगा सारा गांव बंधु यह वही घाट है जिस पर धंसकर वह नहाती थी कभी हंसकर आंखें रह जाती थीं फंस कर कांपते थे दोनों पांव बंधु।
संभवतः पत्नी के निधन के बाद निराला ने यह कविता लिखी थी। जिस घाट पर वह अक्सर नहाने जाया करती थी, उस घाट को देखकर उनकी स्मृतियां जीवित हो उठती थीं। इसी तरह अजेय की बंधु हैं नदियां, नदी के द्वीप, नदी तट: एक चित्र, अंतःसलिला आदि ऐसी कविताएं हैं जो नदी को अनेक आयाम देती हैं। अज्ञेय की कविता ‘नदी के द्वीप’ की कुछ पक्तियां देखें-
हम नदी के द्वीप हैं। हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्वनी बह जाए। वह हमें आकार देती है। हमारे कोण, गलियां, अंतरीप, उभार, सैकत कूल/ सब गोलाइयां उसकी गढ़ी हैं।
मां है वह। हैं, इसी से हम बने हैं।
तो नदी के प्रति यह कवि का कृतज्ञ भाव है। अगर नदियां न होतीं शायद हम भी न होते। नदियों के किनारे आज भी जो नगर बसे हैं वे नदियों से हमारे रिश्तों का अहसास कराते हैं। दिल्ली, मथुरा, आगरा, कानपुर, इलाहाबाद, काशी, पटना, कोलकाता आदि महानगरों का नदियों से क्या रिश्ता रहा है यह बताने की जरूरत नहीं। हिंदू जाति की पतितपावनी गंगा को ही लें। इसकी महिमा का बखान वेद और पुराणों में भरा पड़ा है। राजा वृस्तिन ने हस्तिनापुर नगर इसी के तट पर बसाया था। बाद में वही नगर चंद्रवंशी भरतकुल की राजधनी बना। भरतों की ही संतान कौरव-पांडव थे। डेढ़ हजार मील से भी अधिक विस्तार में फैली गंगा के अनेक नाम हैं। भारतीय सभ्यता का अधिकांश निर्माण इसी गंगा के किनारे या इसकी सहायक नदियों के किनारे हुआ। वह जहां-जहां से गुज़री वह तीर्थ हो गया। विद्यापति ने अपने आखिरी दिनों में गंगा से प्रार्थना की-
कखन हरब दुख मोर हे गंगा मैया कखन हरब दुख मोर। स्वयं कबीर के यहां नदियां कई रूपों में प्रकट हुई हैं। मसलन-नदिया एक घाट बहु तेरे कहत कबीर बचन के फेरे।
या
धोबिया जल बीच मरत पियासा/ जल ही में रहत मरम नहीं जाने/करे धोबिन के आसा।
असल में नदी हमारे जीवन में इस तरह रच-बस गई है कि इसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। आधुनिक हिंदी कविता में शायद ही कोई ऐसा बड़ा कवि है जिसने नदी पर न लिखा हो। रघुवीर सहाय की कविता ‘पानी का संस्मरण’ की पक्तियां देखें-
कौंधा। दूर घोर बन में मूसलाधर वृष्टि दुपहर घनाताल ऊपर झुकी आम की डाल बयार : खिड़की पार खड़े, आ गई फुहार रात: उजली रेती के पार, सहसा देखी शांत नदी गहरी मन में पानी के अनेक संस्मरण हैं।
इसी तरह वरिष्ठ कवि रामदरश मिश्र ने अपनी एक कविता में नदी को इस रूप में याद किया है-
हमेशा आकाश से झरती है एक नदी/और हमेशा ऊपर ही ऊपर कोई पी लेता है
धरती प्यासी की प्यासी रहती है और कहने को आकाश से नदी बहती है।
नदी पर केदारनाथ अग्रवाल की भी अनेक कविताएं हैं। नदी अब भी जवान है, नदी एक नौजवान ढीठ लडकी है. नदी है कि नितंबिनी वीणा नदी शारदीय अलबेली, नदी आदि कविताएं केदारनाथ अग्रवाल के नदी-प्रेम का द्योतक है। इन कविताओं में नदियों का मानवीयकरण हमें ‘रामचरितमानस’ का वह प्रसंग याद दिलाता है जिसमें राम-सीता की खोज में पशु-पक्षियों से भी पूछते हैं-
हे खग-मृग हे मधुकर श्रेणी/ तुम देखी सीता मृगनयनी।
यह प्रेम का एक उद्दात रूप है जिसमें प्रेमी प्रकृति की हर कलाओं में अपनी प्रेमिका को ही देखता है। असल में जो प्रकृति से प्रेम नहीं कर सकता वह आदमी से भी नहीं करेगा। प्रकृति और जीवन दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। खासकर नदी और जीवन में बेहद समानता है। गति ही दोनों की पहचान है। जो रुक गया वह न तो नदी है और न ही जीवन। केदारनाथ अग्रवाल ने अपनी एक कविता में लिखा है-
श्वेत केश की तरह भूमि पर पड़ी नदी बूढ़ी नहीं जवान है। मेघ और पृथ्वी की। यह संतान है।
शरीर के बूढ़ा हो जाने से मन बूढ़ा नहीं हो जाता। शायद नदी के रूप में कवि अपने को ही देख रहा है। इसी तरह सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक प्रसिद्ध कविता है ‘कुआनो नदी’। कुएं से निकली यह नदी दिल्ली में भी कवि को दिखाई दे रही है। कुआनो नदी को स्मरण करते हुए कवि लिखता है-
बहुत गरीब जिला है वह, बस्ती…. जहां इसे मैंने पहली बार देखा था। मेरे नाना इस नदी में कूद पड़े थे और निकाल लिए गए थे। जिंदगी से ऊबकर मर नहीं सके।
गनीमत है कि बस्ती जिले की कुआनो नदी में नानाजी डूबे थे। अगर दिल्ली के कुआनो नदी में डूबे होते तो बचाना तो दूर, अगर वे बचकर निकलना भी चाहते तो लोग निकलने नहीं देते। न जाने कितने लोग यहां जीवन से ऊबकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देते हैं और मीडिया को पता तक नहीं चलता।
कविता के अलावा कथा-साहित्य में भी नदियां कई रूपों में आई हैं। फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मैला आंचल’ और ‘परती परीकथा’ में और शेखर जोशी की कहानी ‘कोशी का घटवार’ में कोशी और कमला नदी को भला कोई कैसे भूल सकता है। ‘मैला आंचल’ में मेरी गंज का ज़िक्र करते हुए रेणु लिखते हैं- “बूढ़ी कोशी के किनारे-किनारे बहुत दूर तक ताड़ और खजूर के पेड़ों से भरा हुआ जंगल है… बंध्या धरती और कहा कहा। इसमें दूब भी नहीं पनपती है। बीच-बीच में बालूचर विशाल पूरब की ओर काला जंगल दिखाई पड़ता है। वही है मेरी गंज कोठी।” परती परिकथा में तो कोशी और कमला का ऐसा भयावह वर्णन है जिसे पढ़ते हुए कटिहार और पूर्णिया का पूरा अंचल जीवंत हो उठता है। यह वह अंचल है जहां नीलहे साहब अपनी नई-नवेली दुल्हन को बचाने में असफल हो जाता है। काला ज्वर से उसकी दुल्हन तड़प-तड़प कर मर जाती है, लेकिन आसपास कोई अस्पताल नहीं जहां वह उसकी जान बचा सके। पत्नी के निधन के बाद साहब पागल हो जाता है और उसी पागलपन में वह मेरीगंज में एक अस्पताल बनवाने के लिए फाइलें लिए हुए पूर्णि या के सरकारी दफ्तरों में घूमता फिरता है। इसी तरह रामदरश मिश्र के उपन्यास ‘जल टूटता हुआ’ और ‘पानी के प्रचीर’ हैं। इन उपन्यासों में भी राप्ती और गोरा नदियों का जैसा जीवंत डरावना वर्णन लेखक ने किया है उसे पढ़ते हुए लगता है कि बिना भोगे हुए अनुभव से इस तरह का उपन्यास लेखन संभव नहीं है।
इनके अलावा शिवनारायण की कविताएं ‘नदी’ और अवधेश रंजन की कविता ‘बाया से बलान तक’, राधेश्याम तिवारी की कविता ‘झरही’ और ‘कनस्तर में गंगा’ में नदी के अनेक रूपों का दिग्दर्शन होता है। बाया वह नदी है जिसके तट पर कवि विद्यापति ने देह त्याग किया था। बाया भी गंगा का ही कछार है। कहते हैं विद्यापति गंगा से मिलने जा रहे थे, लेकिन वे इतना थक गए कि गंगा तट पर पहुंचने से पहले ही बैठ गए। मान्यता है कि गंगा खुद ही उनके पास बढ़कर आई जिसे बाया नदी के नाम से जाना जाता है। इस तरह अनादिकाल से मनुष्यों ने किसी न किसी रूप में नदियों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की है। श्रद्धा का मतलब है कि हम जिसके प्रति श्रद्धावान हैं उसके महत्व को स्वीकारें। रामचंद्र शुक्ल ने ठीक ही लिखा है कि ‘श्रद्धा का मूल तत्व है दूसरे का महत्व स्वीकारना।’ लेकिन आज हमारी श्रद्धा भी बाज़ारमुखी हो गई है। हम यह भूलते जा रहे हैं कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ बहुत समय तक नहीं चल सकती। आज हमारे लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि अपनी संततियों के लिए कैसी दुनिया छोड़कर जा रहे हैं।
