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सिनेमा के आईने में मुस्लिम समाज

सच एक ऐसा शब्द है, जिसे बोलने का इस देश में दावा तो हर आदमी करता है. मगर यह बोला बहुत कम ही जाता है। यह एक अदभूत संयोग है कि हमारी मूक फिल्मों की शुरुआत ‘राजा हरिश्चन्द्र’ से हुई, जिन्हें सत्य का पर्याय माना जाता है। बोलती फिल्मों की शुरुआत (बिस्मिल्लाह) उर्दू भाषा में हुई और गलत न कहा जाये तो सृष्टिकर्ता (आलम आरा) के नाम से। यानी हमारी मूक और सवाक दोनों ही फिल्मों की शुरुआत सत्य और ईश्वर के नाम से हुई, अतएव इसका दिन-ब-दिन (106 सालों में) उन्नतियों के सोपान तय करते जाना तो वैसे ही निश्चित था, जैसे समय को निरन्तरता, सूरज का उगना और मौसम का बदलना। भारतीय फिल्मोद्योग (हिंदी फिल्मों) की बात उर्दू भाषा, मुस्लिम समाज, मुस्लिम एक्टरों, लेखकों, शायरों, संगीतकारों, गायकों और फिल्मकारों के बगैर की ही नहीं जा सकती। अगर कोई इसे स्वीकार करने में हिचकता है तो हम यह कहने में जरा भी नहीं हिचकते कि समंदर में रहकर भी उसकी मानसिकता तालाबों वाली है।

वक्त के साथ-साथ समाज जिस तरह अपना केंचुल बदलता जाता है, उसी तरह सिनेमा भी परिवर्तन का पानी उदरस्थ करता रहता है। परिणामस्वरुप समाज के साथ-साथ फिल्म के किरदारों में भी परिवर्तन दिखने लगता है। बदलाव से जब प्रकृति ही अछूती नहीं तो फ़िल्में कैसे हो सकती हैं? आदमी भले प्रकृति की ईजाद हो, पर सिनेमा तो आदमी का आविष्कार है।

हमारी फिल्मों से सम्बधित एक बड़ा ही दिलचस्प सवाल यह है कि जब हमारी फिल्मों में संवाद व गीतों की भाषा उर्दू है तो फिर उन्हें हिन्दी फिल्में क्यों कहा जाता है? उर्दू भाषा में बनी फिल्म को हिंदी फिल्म कहने का पहला मतलब है कि किसी चीज को उसके असली नाम के बजाय किसी और नाम से प्रस्तुत करना। फिल्मों में उर्दू की अहमियत इतनी ज्यादा थी कि जो कलाकार उर्दू नहीं जानते थे, उन्हें उस्तादों से आवश्यक रूप में उर्दू सीखनी पड़ती थी। हर फिल्म में एक डायलॉग इन्स्ट्रक्टर होता था, जो कलाकारों को संवाद बोलने के ढंग और सही तलफ्फुज सिखाता था। बाद में यह परम्परा खत्म हो गयी। भाषा विखरती चली गयी। धीरे-धीरे उर्दू जानने वाले कम होते गये और जो भाषा फिल्मों में बोली जाती रही वो हिंदी कहलाती रही, लेकिन उर्दू का अस्तित्व बरकरार रहा। हमारी पहली सवाक फिल्म थी ‘आलमआरा’, जिसके निर्माता-निर्देशक थे आदेशिर ईरानी। यह फिल्म जोजफ डेविड के एक नाटक पर आधारित थी। स्पष्टतया इसकी भाषा उर्दू थी। अपने समय में एक बड़े ही विद्वान और नामचीन लेखक हुआ करते थे। नाम था आगा हश्र कश्मीरी। उन्होंने दूसरी सवाक फिल्म “शींरी फरहाद” लिखी थी। “उर्दू भाषा में बनी फिल्मों को हिंदी फिल्में क्यों कहा जाता है” को लेकर कई बार उर्दू भाषा के फिल्म लेखकों एवं गीतकारों ने सवाल उठाये, मगर आगे कुछ हुआ नहीं। ऐसा माना जाता है कि पैसों और सुविधाओं ने विद्रोह की खुजली को करीब-करीब जड़ से ही मिटा दिया। समझदार फ़िल्मी लोगों ने इसे न हिंदी माना, न उर्दू बल्कि उसे खालिस हिन्दुस्तानी करार दिया। बाद में तो बंबईया नाम से एक अलग ही भाषा फुदकने लगी, जिसकी झलक हमें आज की कई फिल्मों में भी दिख जाती है। तब के सेंसर बोर्ड ने भी फिल्मों को सर्टिफिकेट देने के मामले में भाषा को लेकर कोई अड़ंगा खड़ा नहीं किया। हिंदी में चाहिए, हिंदी में ले लो। उर्दू में चाहिए, उर्दू में ले लो।

आज फिल्मों से लेकर टीवी धारावाहिकों, वेब सीरीज तथा किसी भी ऑडियो-वीडियो प्रोडक्ट की स्क्रिप्ट (पटकथा व संवाद) रोमन लिपि में लिखी जाती है, क्योंकि आज के कान्वेन्ट शिक्षित एवं तथाकथित विशुद्ध इंडियन स्टार हिंदी लिपि नहीं पढ़ सकते। उर्दू ती इनके लिए और भी मुश्किल है। आज हमारी भाषा में हिंदी के साथ इंग्लिश के कई शब्द आ मिले हैं। इसका असर फिल्मों में भी देखा जा सकता है। इसके बावजूद ऐसा माना जाता है कि सिनेमा ने ही पूरे भारत के लोगों को हिंदी बोलना सिखाया है।

मुगलों के आगमन के बाद से मुस्लिम संस्कृति, आचार-विचार, उर्दू, अरबी के शब्द, संगीत, स्थापत्य कला आदि धीरे-धीरे भारतीय जीवन के साथ शरबत में शक्कर की तरह घुल गये। संस्कृति के इस संगम को गंगा-जमनी तहजीब का नाम दिया गया, जो आज भी हिंदू-मुस्लिम एकता की बात चलते समय मन में गर्व का एक इंद्रधनुष खींच देता है। भारत-पाक बँटवारे के पूर्व से ही लाहौर और मुम्बई में फिल्म निर्माण का काम सुचारु रूप से चल रहा था। उर्दू भाषा सिखों और हिंदुओं की जुबान पर चढ़ी हुई थी। बंटवारे के बाद जो लोग इस पार आये या उस पार गये, साथ में उर्दू-हिंदी भी लाते लेते गये। उर्दू की शान दोनों ही मुल्कों में बनी रही, बल्कि यह भाषा तो स्थानीय बोलियों तक में समा गयी। इसलिए सआदत हसन मंटो हो. कृश्नचंदर, राजेन्द्र सिंह बेदी, फैज अहमद फैज या उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द, सबकी रचनाओं में उर्दू की खुशबू पायी गयी। उर्दू शब्दों के इस्तेमाल से किसी को परहेज नहीं रहा, मगर फिल्म के उर्दू नाम से यह दावा भी नहीं किया जा सकता कि फिल्म मुस्लिम परिवेश पर ही आधारित होगी।

समय-समय पर होते रहने वाले दंगे फसाद भले अपने दागदार चेहरे दिखाते फिरें, पर सत्य तो यही है कि हिंदी और उर्दू ने कभी एक दूसरे पर आँखें नहीं तरेरी। कवियों और शायरों ने उन्हें सगी बहने माना। इसे सच साबित करने के लिए क्या यह काफी नहीं होगा कि राही मासूम रजा जैसा मुस्लिम कलमकार टीवी धारावाहिक “महाभारत” के लिए विशुद्ध हिंदी में लिखकर यह संदेश देता है कि “सिनेमा को सिनेमा ही रहने दो, कोई भाषायी नाम न दो” और जब मुसलमान मो. रफी “ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले” गाता है और सिख बलराज साहनी ‘काबुलीवाला’ को अपने जीवंत अभिनय से बुलंद कर देता है तो दिमाग की सारी ऋणात्मकता खत्म हो जाती है।

इस आलेख के मुख्य उद्देश्य की ओर बढ़ते समय जो सवाल सामने आते हैं, वो ये हैं कि

1. भारतीय फिल्मों में मुस्लिम कलाकारों, कलमकारों, फिल्मकारों और तकनीशियनों की भूमिका कितनी और कैसी रही?

2. हिंदी फिल्मों में मुस्लिम समाज को किस तरह पेश किया गया?

3. समय के साथ फिल्मों के मुस्लिम चरित्रों/किरदारों में किस तरह के बदलाव आए?

4. मुस्लिम महिलाओं को भारतीय सिनेमा के आईने में कितना खुशरंग व बदरंग दिखाया गया?

5. और मुस्लिम पृष्ठभूमि पर बनी अब तक की फिल्मों का यथासंभव बेलाग विवेचन।

आगे की पक्तियों में इन्हीं सारे सवालों के जवाब सन्निहित होंगे। 106 सालों का लेखा-जोखा चंद पन्नों में नहीं समेटा जा सकता, मगर संक्षेप में उनका विवेचन करना भी कोई असंभव काम नहीं है।

मुस्लिम समाज भारतीय सिनेमा का एक अभिन्न अंग रहा है। हिंदी सिनेमा में उसका प्रतिनिधित्व असरदार व सशक्त है। वास्तविक जीवन में भी राष्ट्रीयता की भावना को बलवती बनाने में मुस्लिम समुदाय का योगदान उल्लेखनीय रहा है। मुस्लिम समाज से आए लेखकों, फिल्मकारों और शायरों ने उर्दू भाषा एवं तहजीब को फिल्मों में बड़ी खूबसूरती से ढालने का काम किया है।

शुरुआत में फिल्मों पर पारसी प्रभाव तारी रहा, मगर बाद में उर्दूद्दा मुस्लिमों और गैर-मुस्लिमों ने मुस्लिम संस्कृति और अदब से सिनेमा को बड़ी लगन से सँवारा। पहले की तरह आज भी फिल्मोद्योग में विभिन्न धर्मावलंबी लोग सक्रिय हैं। यहां तक कि विदेशों के कलाकार, तकनीशियन तक भारतीय सिनेमा से जुड़कर नाम, दाम और शोहरत कमा रहे हैं। ऐसे में हिंदू-मुसलमान की बातें करना निरा मूर्खता ही होगी।

ऐसा धर्मनिरपेक्ष उद्योग दुनिया के किसी भी कोने में नहीं मिलेगा। यहाँ जाति, धर्म को नहीं बल्कि प्रतिभा और इंसानियत को तरजीह मिलती है। 1912 से लेकर 2018 तक यानी 106 बरसों में दुनिया काफी बदल चुकी है। विचारों के साथ-साथ तकनीकों में भी आमूलचूल परिवर्तन आ चुके हैं। फ़िल्में बनाने को लेकर भी अलग-अलग विचारधारायें काम कर रही हैं। लेकिन इसका मिजाज पहले जैसा ही शाही है। मुस्लिम वर्ग में परिपक्व प्रतिभाएं तब भी थीं, आज भी रचनात्मक पौध लहलहा रही है। बस बदले हैं तो हालात।

1912 से 1947 तक हमारी सामाजिक और राष्ट्रीय परिस्थितियाँ कुछ अलग थीं। यह अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे आंदोलनों का दौर था। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, तब मिल-जुलकर अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे। 1946 और उसके बाद सांप्रदायिक दंगों के साथ-साथ मुल्क के दो टुकड़े हो गये। फिल्मों से जुड़े कई लोग पाकिस्तान चले गये. कुछ यहीं रह गये। सामाजिक हालातों ने आदमी को हजार तरीकों से झकझोरा। फिर भी फ़िल्मी दुनिया को नफ़रत और भेदभाव से अछूता पाया गया। आजादी के बाद के दौर को हम मोहभंग का दौर भी कह सकते हैं। इन तीस बरसों के दौरान लोगों में आक्रोश और असंतुष्टि ने एक बेचैनी भर दी। फलस्वरूप ‘एंग्री यंग मैन’ जैसे चरित्र सिनेमाई घोड़े पर सवार हुए। सलीम-जावेद जैसे लेखकों ने दर्शकों में व्यवस्था के प्रति विद्रोह की चिंगारियां चटकायीं। इसी दौरान देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। आपातकाल ने देश के सीने पर फफोले उगाये। अवाम को फिर से गुलाम होने का आया। इस बार तो अंडरवल्डं अपराध, बावरी (अमरीका) जैसे हमलों के जरिए पूरे विश्व में आतंकवाद ने मस्जिद गांधरा कांड सांप्रदायिक दंगे और वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर दहशत का ऐसा माहौल बनाया कि देश-विदेश के फिल्मकारों को फिल्में बनाने के अनगिनत टिप्स दे दिये। अब परदे पर मुस्लिम किरदार बदले। वो रहमदिल इनसान से हैवानों की शक्ल में डाले जाने लगे। वो अब हर जगह जलील होने लगे। कारण कुछ नहीं था। बस यही कि वो मुसलमान थे। पांचवें और छठे दशकों में हम मुगल बादशाहों और

नवाबों से जुड़े अफसानों तथा अरब बगदाद, सिंदबाद से बाबस्ता किस्सों पर बनी फिल्में देखा करते थे। आज हम दुनिया में व्याप्त दिल दहला देनेवाली सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्में देख रहे हैं। ये हमें बहुत झकझोरती हैं। हमारी चिंताएं बढ़ाती हैं. मगर सच ही कहती हैं। गर्व की बात है कि हकीकतों के दस्तावेज दिखानेवाले ज्यादातर फिल्मकार और अभिनेता मुस्लिम समाज से आते हैं। उन्होंने आतंकवाद के खौफनाक चेहरे को दिखाने और उसके भयानक पंजों को शिथिल करने की चेष्टा भी की है। ‘ए बेडनेसडे’ में नसीरुद्दीन शाह आम आदमी की तकलीफों से आजिज आकर एक दुस्साहस भरा कदम उठाते हैं। वहीं शाहरुख खान को अपनी जलालत से तंग आकर कहना पड़ता है कि ‘माई नेम इज खान’। ये लोग फिल्म निर्माण का अपना फर्ज ईमानदारी से अदा कर रहे हैं। मुस्लिम लेखकों, फिल्मकारों और अदाकारों के कारण भारतीय फिल्मों में मुस्लिम तहजीब और तौर तरीकों को एक्सपोजर मिला। फिल्मों में पूरी कोशिश की गयी कि भाषा की नजाकत और तहजीब की नफासत बनी रहे। जब ऐतिहासिक और मुस्लिम समाज प्रधान फिल्में बन रही थी तो देश में आज की तुलना में काफी अमन और सुकून था। तब हम कभी शाहजहाँ और मुमताज महल की प्रेमकथा देखकर मस्त हुआ करते थे तो कभी सलीम-अनारकली की बगावती मोहब्बत देखकर झूम उठते थे।

अपनी फिल्मों में हमने लुगी तहमद लपेटे और बनियान पहने बड़े अदब के साथ पेश आनेवाले रहीम, उस्मान, सलीम अथवा अब्दुल चाचा को देखा, जिनके गले में ताबीज और सिर पर गोल टोपी पायी गयी। हमें नमाज के पाबंद और मुह से उर्दू के खूबसूरत लफ्ज टपकाने वाले विभिन्न किरदारों के दीदार हुए। तंग पाजामा, कुर्ता पहने नवाब टाईप लोगों के अलावा अजीमो शान शौकत वाले बादशाह भी दिखते रहे। बादशाह, सेनापति और दरबारी तो खैर एक स्थापित लिबास में रहे। पान, पानदान, धूकदान, हुक्का, खादिम, कनीज आदि को भी हमने उनकी सेवा करके धन्य होते हुए देखा। सलाम और कोर्निश करने का एक अलग ढंग। घुटने मोड़‌कर बैठने का एक जुदा अंदाज। जब तक ऐतिहासिक फ़िल्में बनले परिधानों के जरिए झलकती रही। फिल्मों में बादशाही के रही बादशाहों की दरबारी संस्कृति विभिन्न तौर-तरीकों और दरबारों से ज्यादा कोते दिखाये गये। लच्छेदार लफ्जों की खूबसूरत बानगियों से ज्यादा मुजरे और कव्वालियां सुनवायो गयीं। औरतों को सलवार, कमीज और पंजाबी सूट में पेश किया गया। परदा, दुप‌ट्टा और बुरका के सिवाय तो महिला मुस्लिम पात्रों की कोई पहचान ही नहीं बनती थी। अगर किसी पुरुष पात्र से गुफ्तगू करनी हो तो उसके लिए चिलमन की व्यवस्था। एक दूसरे की बात सुनें सुनायें मंगर परदे थे। रक्कासा भी पूरे कपड़ों में नाचती हुई ऐसा उन्माद पैदा करने का दम रखती थी कि आज की आजाद ख्याल अभिनेत्रियां पूरी तरह वस्त्रहीन होकर भी वो प्रभाव पैदा नहीं कर सकती।

हम जिन मीना कुमारियों और मधुवालाओं के दिलकश अंदाज परदे पर देखकर मुग्ध हुए. उन्होंने वो कातिलाना अंदाज पेश करने के लिए कितनी मशक्कत की होगी? यह भी सोचनेवाली बात है। इस्लाम में ड्रेस कोड का कहीं कोई विधान नहीं है. मगर जो फिल्मों में चला, वो दिल और दिमाग में भी चलता रहा।

जो सिनेमा ने दिखाया, हमने उसे इतिहास के पन्नों का सिनेमाई तजुर्मा समझा। जैसे-जैसे समय बदला, सिनेमा में मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व का स्वरुप भी बदला. क्योंकि समाज के अन्य तबकों के साथ-साथ मुस्लिम समाज भी बदल रहा था। फिल्मकारों ने बदलती हवाओं का रुख देखते हुए फिल्मों के विषय बदले। बाद में तो हमने ‘गरम हवा’ झेलने के साथ-साथ ‘मंडी’ और ‘बाजार’ के भी फेरे लगाये। फार्मूला फिल्मों के दौर में भी मुस्लिम चरित्र फिल्मों में आवश्यक रूप से प्रतिस्थापित किये जाते रहे। फिर अंडरवर्ल्ड को आधार बनाकर फ़िल्में बनाने का काम शुरू हुआ। वैसे तो मुस्लिम चरित्रों की तादाद बड़ी, मगर उनके दोष उजागर होते हुए भी दिखाये जाने लगे। पहले उन्हें बुराइयों के मुरीद के रूप में दिखाया गया, फिर उनकी मजबूरिया बताकर सहानुभूति के सिक्के भी इकट्ठे करने की कोशिशें हुई। फिल्मकारों ने तो प्लानिंग के मुताबिक पैसे बटोरे मगर मुस्लिम समुदाय की छवि बिगाड़ने का भी उन्होंने कोई कम काम नहीं किया. जिसका अफ़सोस उनकी तरफ से कभी जाहिर भी नहीं किया गया। यह सच है कि कई अवसरवादी फिल्मकारों ने हिंदू-मुस्लिम एकता को चादर चढ़ाने का झूठा नाटक किया और बॉक्स ऑफिस का दिव्य प्रसाद लेकर खामोश हो गये।

फिल्म मेकिंग और मुस्लिम समुदाय
जब तक मूक फ़िल्मे बनती रहीं. भाषा और संगीत को लेकर कोई उलझन नहीं थी, लेकिन जैसे ही बोलती फिल्मों का जमाना शुरू हुआ, संवादों और गीतों के लिए एक अदद भाषा की जरुरत महसूस हुई। तब उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, दिल्ली, पंजाब जैसे राज्यों में हिंदी और उर्द की मिश्रित भाषा बोली जाती थी. जिसे हिन्दुस्तानी भाषा का नाम भी दिया गया। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि फ़िल्मी दुनिया में ज्यादातर फिल्मकार, गीतकार, मौसिकीकार और संवाद लेखक आदि उत्तरी भारत से ही आये। तब अखबारों-सिनेमाओं से जुड़े कई पत्रकार भी फिल्मों में आते जाते और लिखते रहे। वो बड़े ही प्रतिभाशाली और जागरूक थे। आजादी के पूर्व उत्तरी भारत के बहुत सारे छोटे-बड़े शहरों में मुस्लिम समुदाय की तादाद ज्यादा थी। ये लोग संभ्रान्त परिवारों से सम्बन्ध रखते थे। ये आर्थिक रूप से सबल, कलात्मक रूप से संवेदनशील एवं बौद्धिक रूप से सजग व प्रखर थे। यही लोग तीसरे और चौथे दशक में बंबई की ओर रवाना हुए कुछ करने, नाम और शोहरत कमाने के लिए। इन्हीं शहरों से अन्य समुदायों (हिन्दू, सिख) के लोग भी फिल्मों में कुछ करने के इरादे से पहुंचे।

देश के बंटवारे के साथ फिल्मों से जुड़े कई महत्वपूर्ण लोग पाकिस्तान चले गये। मसलन, नूरजहां, स्वर्णलता, नजीर, डब्लू जेड अहमद, शौकत हुसैन रिजवी, लुकमान, ख्वाजा खुर्शीद अनवर, सआदत हसन मंटो, फिरोज निजामी आदि। आजादी के पूर्व और उपरांत भी भारत में हिन्दू सही अर्थों में बहुसंख्यक थे। आपसी नफरत के कारण यह संभव नहीं था कि बहुसंख्यक दर्शक मुसलमान कलाकारों को स्वीकार करें। अतएव कई लोगों ने अपने हिन्दू नाम रख लिए, जैसे दिलीप कुमार, जयंत, जॉनी वॉकर, मीनाकुमारी, मधुबाला आदि।

जिन मुस्लिम लेखकों, शायरों और निर्माता निर्देशकों ने भारतीय फिल्मों में अपना योगदान दिया और यादगार कृत्तियां छोड़ीं, उनमें से कई लोग बाद में पाकिस्तान चले गये। बतौर फनकार और कलमकार निम्नलिखित हस्तियों ने अपने इल्म से फिल्मोद्योग को संपन्न किया:-

मंटो, इस्मत चुगताई, महबूब खान, शहीद लतीफ, ख्वाजा अहमद अब्बास, ए आर कारदार, के. आसिफ, कमाल अमरोही, राजा मेहंदी अली खान, अली सरदार जाफरी, निदा फाजली, कैफी आजमी, रफीक गजनवी, आगा जानी कश्मीरी, साहिर लुधियानवी, जां निसार अख्तर, अख्तर उल इमान, शहरयार, जावेद अख्तर, अबरार अल्वी, वजाहत मिर्जा, एस एच बिहारी, अख्तर मिर्जा, मिर्जा मुशर्रफ, सईद मिर्जा, एस. यू. सन्नी, एम. सादिक, नौशाद, गुलाम मोहम्मद, गुलाम हैदर, ए. नक्शब, जिया सरहदी, मुजफ्फर अली, सुलतान अहमद, अब्बास मस्तान, साजिद नडियादवाला, एस. एम. युसूफ, फिरोज खान, संजय खान, सज्जाद, सरदार मालिक, खय्याम, शमशाद बेगम, अमीरबाई कर्नाटकी, तलत महमूद, मो. रफी, शब्बीर कुमार, मुन्ना अजीज, खुशीद बानो, हेमलता, सुरैय्या नूरजहां आदि।

एक्टरों में दिलीप कुमार, जयंत, रहमान, इफ्तेखार, नजीर कुमकुम, सायरा बानो, मुमताज, जगदीप, परवीन बॉबी, जीनत अमान, शबाना आजमी, जरीना बहाव, रेहाना सुलतान, आशा सचदेव आदि। फिल्मों में अपना अहम योगदान देने वाले आज हसैन नासिर और ताहिर खान, श्यामा, शकीला निम्मी अमिता, मधुबाला, मीना कुमारी, नरगिस, वहीदा हिमाते, के सक्रिय मुस्लिम प्रतिभाओं को भुलाया नहीं जा सकता :-

नसीरुद्दीन शाह, राजा मुराद, फारुख शेख, कादर खान, स्व. महमूद, स्व. जॉनी वाकर, शाहरुख, सलमान, आमिर, इरफान खान, फरहान अख्तर, सैफ अली खान, इमरान खान, अरशद वारसी, सोहैल, अरबाज, जायद खान, इमरान हाशमी, फराह खान, सरोज खान, जोया खान, इम्तियाज अली, अनीस बज्मी, कबीर खान, ए आर रहमान, दिया मिर्जा, फराह, तब्बू, कैटरीना कैफ, जरीन खान, अन्नू मलिक, सलीम सुलेमान, इस्माईल दरबार, राहत फतेह अली खान आदि आदि।

कुछ फिल्में जिन पर मुस्लिम सभ्यता, संस्कृति और मुगल-मुस्लिम पृष्ठभूमि का प्रभाव माना जा सकता है, निम्नांकित है :-

पुकार, नजमा, बरसात की रात, बेनजीर, गजल, पालकी, दिल ही तो है. बहू बेगम, याद, मेरे हुजूर, महबूब की मेहंदी, दस्तक, नसीम, बाजार, चंगेज खान, लेडीज टेलर, तवायफ, फिजाए सरदारी बेगम, मम्मा, गरम हवा, अंजुमन, गमन, जहांआरा, उमराव जान, शतरंज के खिलाड़ी, मकबूल, जुबैदा, वेल डन अब्बा, मेरे महबूब, मेरे हुजूर, ऐलान, जुनून, आमिर, ब्लैक फ्राइडे, खुदा गवाह, जोधा अकबर, अनारकली, मुगले-आजम, अजूबा, हसीना पारकर, वंस अपोन ए टाईम, मिर्जा गालिब, वजीर-ए-आजम, थीफ ऑफ इराक, थीफ ऑफ बग्दाद, तलाक, सुलतान-ए-आलम, सन ऑफ़ हातिम ताई, सन आफ अलादीन, सन आफ अलीबाबा, शाहे इरान, शाहे मिसर, रईस, कज्जाक की लड़की, रश्के लैला, रजिया सुलतान, रजिया सुलताना, रुस्तम-ए-सोहराब, रुस्तमे बगदाद, रुस्तमे-ए-जहां, शमशीरे अदब, शमशीरे जंग, शाने हातिम, शाने सुभान, सिंदबाद दी सेलर, शेरे अफगान, शेरे बगदाद, शेरे काबुल, हुमायूं, ईद का चांद, ईद मुबारक, लाल किला, शाहजहां, शहंशाह बाबर, ताजमहल, मेरे गरीब नवाज, मिर्जा साहिबान, नूरजहां, नौशेरवाने आदिल. नूरे यमन, नूरे अरब, नूरे इलाही, नूरे इस्लाम, नूरे वहादत, शहंशाह अकबर, नूरे वतन, नूरे अमन, निकाह, पाकीजाए राजी, दीदारे यार, हीना, रोजाए सरफ़रोश, मिशन कश्मीर, बिस्मिल्लाह की बरकत, बुलबुले बग्दाद, बुलबुले ईरान, बुलबुले परिस्तान. हातिमताई, हातिमताई की बेटी, हमारा हज, फखे इस्लाम, सलीम लंगड़े पर मत रो, अंजुमन, कुर्बान आदि आदि।

अब कुछ टेलीविजन धारावाहिक जो मुस्लिम पृष्ठभूमि पर आधारित हैं या मुस्लिम किरदार जिनमें महत्वपूर्ण हैं:-

मिर्जा गालिब, गुल गुलशन गुलफाम, मुल्ला नसीरुद्दीन, फरमान, अमानत, हिना, अम्मा एंड फेमिली, शाहीन, कश्मीर, नाम गुम जायेगा, मेहर, अकबर बीरबल, ख्वाहिश, चांद के पार चलो, सियासत, सजदा तेरे प्यार में, कुबूल है, जोधा अकबर, बेइंतहां, हमसफ़र, तुम साथ हो जब अपने, रजिया सुलतान, प्यार को हो जाने दो, मस्तानगी, नामकरण, पीओडब्ल्यू बंदी युद्ध के, दिल से दिल तक, पेशवा बाजीराव, इश्क सुभान अल्लाह, बेपनाह, मरियम खान, रिपोटिंग लाईव आदि।

(टीवी धारावाहिकों के मामले में यह देखा गया है कि फार्मूला ‘बहुसंख्यकों’ के लिए ‘अल्पसंख्यकों को ज्यादा तवज्जो नहीं मिलती। मुस्लिम समाज आधारित फिल्में या टेलीविजन धारावाहिक बहुत ज्यादा लोग नहीं देखते। एक तो दर्शकों की कमी दूसरे उन धारावाहिकों में ऐसी-ऐसी चीजें दिखायी व बतायी जाती हैं. जो आम लोगों को हजम नहीं होतीं।)

सामाजिक मुस्लिम फिल्मों में औरत

दुनिया के किसी भी कोने में जाइए, समाज में स्त्रियों के प्रति एक सी ही धारणा देखने को मिलेगी। वो यहां, वहां, सर्वत्र शोषण, उत्पीड़न व सेक्स कुंठाओं का सामान ही समझी जाती रही है। प्रचार साधनों, अखबारों, रिसालों, पत्र-पत्रिकाओं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में उसकी आकर्षक देहयष्टि को एक्सपोज करते हुए लोग पैसे कमाते और अपनी विकृत्तियों की तुष्टि करते मिलेंगे। यह मानव समाज की त्रासदी ही है कि वो चाहे. जिस धर्म का अनुयायी हो, औरत को निश्चित रूप से भोग का सामान ही माना जाता है। मुस्लिम सामाजिक फिल्मों में भी औरत को मुस्लिम समाज की तरह ही हाशिए पर रखा गया है अथवा कहें कि पुरुष प्रधान समाज ने दोनों ही जगह लक्ष्मण रेखाएं खींचकर उसकी सीमा तय कर दी है। वास्तविक जिंदगी में मुस्लिम औरत अशिक्षा, गरीबी, बहुविवाह, तलाक जैसे सामाजिक कोढ़ को अपने वजूद से अभी तक पूरी तरह अलग नहीं कर पायी है। 70 साल के शेख आज भी ।। साल की नाबालिग लड़कियों से विवाह कर रहे हैं। मोबाइल पर ही बददिमाग शौहर एक ही लफ्ज तीन बार बोलकर अपनी अय्यारी दिखाने से बाज नहीं आ रहा।
वो संस्कारों की घंट में ही चारदीवारी तक महदूद रहने की कला सीख जाती है। बाहरी दुनिया पुरुषों की तरफ से उसके लिए वर्जित है। समाज और परिवार दोनों ही उसके पांवों में पाजेब की जगह बेडियां देखना चाहते हैं। हां. बदलतो हवाओं ने उनके मंसूबों पर ठोकर मारना शुरू कर दिया है। मुस्लिम समाज ने तो उसे दुपट्टे परदे और बरके से कुछ इस तरह बाबस्ता कर रखा है कि बरसों तक इनसे अलग होकर उसकी सांसें घुटती रहेंगी। ऐसा लगता है जैसे उसकी गरिमा जन्म के पूर्व से ही समाज के मदों के पास गिरवी पड़ी हो। पुरुष उसे अपने लिए हमेशा दूसरों की नजरों से बचाकर रखना चाहता है। मुस्लिम समाज में से अगर किसी पुरुष या स्त्री ने उन जाहिलाना ज्यादतियों के खिलाफ आवाज उठाई तो शरीयत का हवाला देकर उस पर फतवा जारी कर दिया जाता है, जबकि कुदरत ने औरत को भी मर्द के समान ही हर नेमत से बख्शा है। बात-बात पर कुरान और शरीयत का सन्दर्भ तो सब देते हैं मगर उनमें उल्लिखित किसी भी निर्देश का ईमानदारी से कोई पालन नहीं करता। गलत व्याख्या, गलत उपयोग। सिर्फ बरगलाना और खुद को लाभ पहुंचाना। जो भी हो हमारा समाज आज भी परदे और बुरके से मुक्त नहीं हुआ। ये बुरके कभी-कभी गलतफहमियां भी पैदा करते हैं और मुश्किलें भी। शुरुआत से लेकर आज तक की मुस्लिम सामाजिक फिल्मों में ‘बुरके’ की नुमाइंदगी कम या ज्यादा मगर बरकरार मिलेगी। चिलमन नहीं, परदा नहीं, बुरका नहीं, मुस्लिम सामाजिक फिल्म? लोग कहते हैं कि अरब देशों बात-व्यवहार में नफासत व नजाकत नहीं तो फिर वो कैसी बुरका ईजाद हुआ था। कुछ लोग इसे बुरी नजर वालों की में आधी के कारण उड़नेवाले धूल कणों से बचने के लिए भी साबित हो जाता है। बुरकेवालियों को लोग जल्दी छेड़ते दवा कहते हैं। यह अक्सर महिलाओं के लिए सुरक्षा कवच नहीं, इसलिए कुछ अपराधी भी बच निकलने के लिए बुरके की वृद्धा तक को नहीं छोड़ते, फिर बुरके पहनकर पूरी तरह का इस्तेमाल कर लेते हैं। यहां तो काम पिशाच 80 साल है? मुस्लिम या गैर-मुस्लिम पृष्ठभूमि वाली फिल्मों में अगर सुरक्षित हो जाने का इस देश में कोई कैसे दावा कर सकता छोटे-बड़े मुस्लिम किरदार हैं भी तो मुस्लिम जीवन शैली और संस्कृति की हल्की झलक तो देखी ही जा सकती है।

के अत्याचार सहती हुई स्त्री चुपचाप कोने में दुबकी दिखती गैर-मुस्लिम पृष्ठभूमि वाली फिल्मों में पति, सास-ननद है। मुस्लिम सामाजिक फिल्मों में भी उसकी हालत अच्छी नहीं दिखती। वो हमेशा पाबंदियों में घिरी रहती है। तीन सौतनों और तीन तलाक की आशंका में वो जीवन भर डूबती उतराती रहती है। भारतीय फिल्मों में तो तवायफों के बड़े जलवे है।

उन्हें शोपीस बनाकर रखा जाता है। इने गिने फिल्मकारों में ही वो कुव्वत है जो उनकी भावनाओं के कण-कण से कोर्ड पिरामिड बना सके। मुस्लिम नवाबों और बादशाहों के समय से ही तवायफ संस्कृति बरकरार है। मुस्लिम प्रधान फिल्मों से कहीं ज्यादा एक्सपोजर तवायफों को दिया गया है। पुराने वक्त में ही अमीर ताकतवर और रसूख वाले लोगों की दिलजोई करने, उनको शारीरिक सुख देने और उनकी रखैल कहलाने को ही अपना जहेनसीब मानकर जीनेवाली औरतें तवायफ मानी गयीं। हमारे हिंदी फिल्मोद्योग में तवायफों पर आधारित फिल्में मुस्लिम समाज में औरतों की उनकी हैसियत समझाती हैं। सामने शानो-शौकत के नज्जारे दिखेंगे, मगर इज्जत की कानी कौड़ी से भी वो महरूम होंगी।

न सिर्फ मुस्लिम प्रधान फिल्मों में बल्कि शुरुआती फिल्मों में भी औरत को इनकी जैसी ही दुःस्थिति झेलते हुए दिखाया गया है। वास्तविक जीवन में गैर-मुस्लिम गायिकाओं व नर्तकियों को मुस्लिम नाम दिये गये। कुछ नर्तकी गायिकाओं को मुख्य किरदार के रूप में लेकर भी फ़िल्में बनीं। बी आर चोपड़ा की ‘साधना’ और रामदयाल की ‘प्रभात’ संभवतः ऐसी ही फ़िल्में थीं। बाद में बी आर इशारा ने उन्हें ‘चेतना’, ‘जरुरत’ जैसी फिल्मों में आधुनिका बना दिया। तवायफ संस्कृति को सबसे ज्यादा संरक्षण नवाबों ने दिया। तवायफों की कई सनसनीखेज कहानियां तो फ़िल्मी परदे तक पहुंची ही नहीं। औरत को तवायफ बनाने के लिए उस पर बहुत जुल्म ढाये गये। उनकी खूबसूरती के कारण उनका अपहरण हुआ। खानदानी दुश्मनी के कारण भी उन्हें इस संस्कृति को अपनाने के लिए मजबूर किया गया। यह समाज में भी दिखा और फिल्मों में भी। ‘उमरावजान’ की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आधुनिक काल में नागेश कुकनूर की फिल्म ‘लक्ष्मी’ भी यही सब दिखाते हुए रोंगटे खड़े करती है। नवाबों के समय में उन्हें उर्दू शायरी, अरबी व्याकरण और अमीर उमराओं की दिलजोई के तौर तरीके सिखाये गये। नीजी और सार्वजानिक महफिलों में किस तरह अलग अलग तरीके से पेश आना है, ये सारे गुर उन्हें सिखाये जाते थे। हमारी कई फिल्मों में इनके अलग-अलग रुप दिखाये गये हैं। लोग स्वयंमेव उसके पास अपनी पत्नी, अपना घर छोड़कर आते और धन लुटाते हैं। तवायफ उनसे प्रेम करके उनका घर नहीं तोड़ना चाहती। मौका लगा तो उससे अपनी दिलजोई करनेवाले भी उसे पथभ्रष्ट और सती-सावित्रियों के घर बिगाड़ने वाली का नाम दे जाते हैं।

तवायफों पर बॉलीवुड में कई फिल्में बनी हैं, जिनमें ‘उमराव जान’ और ‘पाकीजा’ का नाम सबसे ऊपर आता है। दोनों में नायिकाओं को कोठे तक पहुंचाया गया है। जो लड़की या औरत कोठे की सीढ़ियां चढ़ी, वो शायद ही घर को देहरी तक वापस पहुंची। अभी तक तो हमारा सामान्य ज्ञान यही है। हमारी फिल्मों में पान चबाती हुई कोठे की मम्मी तवायफ की बलैय्या लेती और कद्रदानों से मिले नोट गिनती दिखती है। तवायफ नाच मुजरा पेश करती रहती है। वक्त-वक्त पर कद्रदानों को सलाम भी ठोंकती रहती है। शायद यह बताने के लिए कि वो अपनी औकात जानती है। उसके पायल की झंकार के साथ ताल में ताल मिलाते साजिदे किसी खास के आने या कोठे की मालकिन के इशारे पर अपना साज संभालते हुए लोकेशन खाली कर देते हैं। तवायफ चमकदार, भड़कदार कपड़े पहने, भारी गहने लादे व हैवी मेकअप किए तश्तरी में पान लिए पेश होती दिखती है। अब मोबाइल, लैपटॉप, इन्टरनेट के इस जमाने में तो कॉलगर्ल भी कम दिखने लगी हैं। शहरों में भी कोठे उजड़ गये। फिल्मों में भी तवायफें न के बराबर दिखने लगीं।

हमने अपनी फिल्मों में यही देखा कि तवायफ अपने हालात से पूरी तरह वाकिफ होती है। वो भ्रम में नहीं रहती। वो ज्यादा बड़े-बड़े सपने भी नहीं देखती। कोठों के तौर तरीकों की जानकारी देते समय उन्हें मदों से सिर्फ धन ऐंठने और किसी भी मोह माया में न फंसने की ताकीद की जाती है। किसी से मोहब्बत करना उनके लिए सर्प दंश झेलने के समान माना जाता है। कभी-कभी उन्हें भी किसी न किसी से मोहब्बत हो जाती है, लेकिन वो उस राह पर बहुत आगे तक नहीं बढ़ पातीं। एक-दो नहीं सैकड़ों फिल्मकारों ने इन बदनसीब तवायफों पर सैंकड़ों फ़िल्में बना दी। उन्हें कोटे पर छोड़ दिया और खुद कई-कई कोठियां बनवा ली। उनकी पहचान झूम-झूम कर कव्वाली गाने और झुक झुक कर मुजरा सुनाने तक सीमित कर दी गयी है। बड़े-बड़े लोग उनके पास आते-जाते रहे। रिश्ते तो बना लिए, मगर उन्हें समाज में सम्मान के साथ जीने देने के लिए अपना नाम देने की हिम्मत नहीं जुटा पाये। प्रेम से वंचित प्रेमियों का वो दर्द हरण करती रहीं, मगर बदले में उन्हें हर तरफ से उपेक्षाओं, बददुआओं और बदहालियों की गरम हवा में झुलसना पड़ा। कई फिल्मों में उसे किसी भलेमानस के साथ घर बसाने का मौका भी दिया गया। फिल्म अगर आशावाद का दामन छोड़ दे तो बात कहा बनती है, अतएव निर्माताओं ने तवायफों से जुड़ी कई फिल्मों में सुखद अंत भी दिए। भले परदे से परे, यह सच देखने को मिले या न मिले। कई फिल्मों में हमने तवायफों के दुखद अंत होते भी देखे। या तो वो रास्ते से खुद हट गयीं या हटा दी गयीं। कभी प्रेमी ने बरगलाया, कभी समाज ने ठुकराया, कभी तकदीर ने दुत्कारा।

‘उमरावजान’ और ‘पाकीजा’ जैसी फिल्मों में मुजफ्फर अली और कमाल अमरोही ने उनकी भावनाओं को सम्मान देने की कोशिश की। कई फिल्मकार अपनी फिल्मों में औरतों के जरिये मुस्लिम आदशों की स्थापना करने में लगे रहे।

चाहे ‘आलमआरा’ के बाद का दौर हो या आज आतंकवाद के ग्लोबल स्तर तक को छू लेने का. फिल्मकारों के पास मुस्लिम समाज से जुड़े विषयों की कोई कमी नहीं रही। बहुत सारे फिल्मकारों ने तवायफों पर आधारित फ़िल्में बनायीं। कुछ ने उनकी भावनाओं को जन-जन तक पहुंचाने की भी कोशिश की। इन फिल्मों ने समाज को कितना बदला, यह तो बाद का सवाल है। आज का बड़े से बड़ा सिद्धान्तवादी भी तवायफ का जिस्म तो चूमना चाहेगा, मगर अपना नाम उसके साथ जोड़ना कभी कबूल नहीं करेगा। औरत जिस क्षण तवायफ का बाना ओढ़‌ती है, सदा के लिए तलाकशुदा हो जाती है।

फिल्म फिल्म होती है, वास्तविक जिंदगी नहीं। तवायफें चाहे जिन धर्मों की हों, उनके हिस्से में जहालत, जलालत और बदहाली ही आती है।

फिल्मों में मुस्लिम चरित्र

मुस्लिम समाज की बात करने का सीधा मतलब होता है कि जो फ़िल्में मुस्लिम समाज, संस्कृति और जीवन से जुड़ी समस्याओं पर केन्द्रित हों, उन पर बात की जाए। 1947 के बाद से गैर-मुस्लिम पृष्ठभूमि वाली फिल्मों में भी किसी न किसी मुसलमान चरित्र को दिखाना एक फैशन बन गया था। इस समाज की पहचान विभिन्न युगों में विभिन्न तरीकों और सामाजिक, राजनैतिक हालातों के मद्देनजर होती रही है। विश्व भर में होने वाली इस्लामिक हलचलों और युद्धों का भी उन पर असर पड़ता है। फिल्म चाहे मुख्य धारा की हो या भारत की कोई भी प्रादेशिक फिल्म, एक मुस्लिम कैरेक्टर उसमें बैलेंस बनाने के लिए जरूर रख दिया जाता है। किरदार मुस्लिम है तो उसे ‘चाचा’, हिन्दू है तो ‘काका’ बना दिया जाता है। जैसे रहीम चाचा, रामू काका। बहनें दीदी या आपा कहलाती हैं।

शुरुआत में हमारे यहां समस्या प्रधान फ़िल्में बहुत कम तादाद में बनती थीं। फिल्मों में मुस्लिम समाज से जुड़ी जो कहानियां होती थीं, वो संभ्रान्त मुस्लिम परिवारों के इर्द-गिर्द बुनी जाती थीं। सामान्य वर्ग के मुस्लिम परिवारों का निरूपण उन फिल्मों में नहीं हो पाता था। उनमें अक्सर मोहब्बत और बगावत की कहानियां होती थीं, जो शाही, नवाबी परिवारों के शहजादों और शहजादियों को नायक-नायिका बनाती थीं। हाँ, इन फिल्मों में एक महत्वपूर्ण काम यह किया गया कि हवेलियों, कोठियों और कोठों के तहजीबों से आम दर्शकों को अवगत कराया गया। अवगत कराने के इस खेल में नामचीन मुस्लिम फिल्मकारों पर भी इस्लाम और मुस्लिम समाज को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगा। दंगों की आंध से झुलसा हुआ यह मुल्क फिर उन तेजाबी वादियों का रुख करना नहीं चाहता था। हुकूमत भी धर्मनिरपेक्षता की बात कर रही थी. अतएव फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों में मुस्लिम चरित्रों को धर्मनिरपेक्ष दिखाने की एक नयी परम्परा शुरू कर दी। कई बड़े फिल्मकारों ने राष्ट्रीय अखंडता और भाईचारे की भावना को सुदृढ़ करने का प्रयास करते हुए फ़िल्में बनायी। “धूल का फूल4, “पड़ोसी”, “भलाई”, “भाईचारा” आदि पुरानी फ़िल्में इसका सशक्त उदाहरण हो सकती हैं। यह परम्परा लंबे समय तक चली। सच कहिये तो अभी भी चल रही है मगर अब यह हास्यास्पद और नौटंकी जैसी लगने लगी है। हर आदमी इसकी असलियत को जानता व समझता है। हां, बंटवारे (पार्टीशन) पर बनी फ़िल्में इस फार्मूले से अछूती मानी जा सकती हैं।

जब मुस्लिम समाज भी इसी मुल्क में रहता था तो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि उसके सामने समस्याएं नहीं थीं, पर मुस्लिम फिल्मकारों ने अपने कैमरे उन पर केन्द्रित नहीं किए। उन्हें फिल्मों में ‘एक्स्ट्रा प्लेयर, के रूप में रखा गया। फिल्म में गति बनी रहे, लोग हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई करते रहे और वो फिल्म दिखाकर, माल समेटकर निकल जाएं। महबूब खान ने तो मुसलमान होकर भी ‘मदर इंडिया’ में एक भी मुस्लिम चरित्र नहीं डाला, मगर ‘मदर इंडिया’ तो वर्ल्ड इंडिया हो गयी। फिल्मकार अभिजात्य मुस्लिम संस्कृति के घेरे से बाहर शायद निकलना ही नहीं चाहते थे। चूंकि गरीब दर्शक भी फिल्मों में अमीरी के सपने ही देखना चाहता है, अतएव मुस्लिम फिल्मकारों ने भी सामाजिक फिल्मों के नाम पर मुस्लिमों को सामाजिक दुनिया के दीदार कराये मगर आधे-अधूरे। वो सिर्फ मुस्लिम दर्शकों के लिए फ़िल्में बनाते थे या सबके लिए, ये तो वही जानें, मगर बहुसंख्यक समाज ने भी उन फिल्मों को देखा। कौन कहेगा कि उसने पाकीजाए मुगले-आजम, अनारकली, ताजमहल, निकाह नहीं देखी?

मुस्लिम सामाजिक फिल्मों में मुस्लिम समाज की समस्याओं निकाह, याद, तवायफ, नौकर, चौदहवी का चांद जैसी पर फोकस किया गया था। अधिकांश फिल्मों में गरीब तबके के मुस्लिम पात्रों को ईमानदार और वफादार ही दिखाया गया है। भले उन पर हालातों के मद्देनजर इलजाम चस्पां हुए हों. पर वो मियार पर हमेशा खरे उतरते रहे। 1970 के बाद से तो सामान्य मुस्लिमों की जिन्दगी भी परदे पर उतर आयी। जब नयी धारा अथवा समानान्तर फिल्मों की शुरुआत हुई इस नयी धारा में मुस्लिम समाज की वास्तविक तस्वीरें तथा रोज-रोज की किल्लतें और मुश्किलें सामने आयीं। समाज में हाशिये पर पहुंचे आर्थिक रूप से पूरी तरह विच्छिन्न और सांप्रदायिक हिंसा के शिकार मुस्लिम लोगों की समस्याओं को परदे पर दिखाया जाने लगा। नए किस्म के कई चरित्र परदे पर अवतरित होने लगे।
समय के साथ कई चीजें आऊटडेटेड हो जाती हैं और जिन्हें जबरन थोपा नहीं जा सकता, इसलिए मुस्लिम फिल्मकारों ने भी खुद को बदला। उनका बदलाव उनकी फिल्मों में झलका भी। मनमोहन देसाई की फिल्म “कली” और प्रकाश मेहरा की ‘मुकद्दर का सिकंदर’ ने आठवें दशक में असुरक्षित और कमजोर महसूस कर रहे निचले मुस्लिम वर्ग को बहुत संबल प्रदान किया। तब हर तबके के युवा वर्ग के आक्रोश को अभिव्यक्त करने का बीड़ा अमिताभबच्चन ने उठाया था। ‘बिल्ला नं. 786’ को तो उन्होंने कुछ ऐसा मशहूर किया कि बाद के फिल्मकारों ने उसे बेशर्मी की हद तक दोहराते हुए बोर किया और 786 का भी महत्व गिरा दिया।

1970 के बाद नयी धारा अथवा समानांतर सिनेमा की जो हवा चली तो कई प्रबुद्ध फिल्मकारों ने लीक से हटकर काम करना शुरू किया। जिस विषय पर पर्दा डाला जा रहा था. या लोग जिन मुद्दों पर खुलकर सामने आना नहीं चाहते थे. फिल्मकारों ने उन्हीं पर काम करना शुरू किया। प्रयोग करने के लिए उन्हें सुविधाएं भी मिलीं। कम बजट की फिल्मों के लिए भी स्कोप खुला। सईद मिर्जा की दो फिल्मों “सलीम लगंड़े पर मत रो” एवं “नसीम” का फायनेन्स राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम ने किया था। ठीक उसी समय एम. एस. सथ्यू ने ‘गरम हवा’ बनाकर पुरानी परम्परा को तोड़ने की सफल कोशिश की। फिर तो मुस्लिम समाज की बुराईयों पर प्रहार करती हुई कई फिल्में सामने आयीं, जो आज भी प्रासंगिक हैं। सागर सरहदी की फिल्म ‘बाजार’ एक ऐसी ही फिल्म थी। बी आर चोपड़ा ने फिल्म “निकाह” बनायी, जो मुस्लिम समाज को आईना दिखाती है। नयी धारा की फिल्मों को एक से एक बेजोड़ कलाकार भी नसीब हुए. जिन्होंने उन फिल्मों को अमरता दे दी।

1990 के बाद पूरे विश्व में घटी कुछ अप्रिय घटनाओं ने बहुत कुछ बदलकर रख दिया। चंद लोगों के कुकर्मों के कारण मुस्लिम समाज को रुसवा होना पड़ा। उन्हें बुरा, देशद्रोही और गद्दार बताया व दिखाया गया। युद्ध फिल्मों में पाकिस्तान स्थायी दुश्मन के रूप में तो हमेशा ही प्रोजेक्ट होता रहा है और वो दुश्मन है भी। हिंदुस्तान का ही नहीं. स्वयं पाकिस्तान के बाशिंदों का भी। आतंकवाद के चरम पर पहुंचने के बाद मुसलमानों का नाम उसके साथ जुड़ता गया। वो खुद को राष्ट्रवादी, निदर्दोष और देशभक्त साबित करने की जद्दोजहद में उलझ गये। इस बार पूरे विश्व ने उनको कवर करना शुरू किया। अचानक ही पहले वाले वफादार मुस्लिम किरदार गैंगस्टर और आतंकवादियों के रूप में सामने आने लगे। कतिपय कारणों से उसके पीछे के कई मनोरंजक अफसानों को इस लेख से बाहर रखा जा रहा है। मुस्लिम समाज की मुख्य समस्याओं बहु विवाह, तलाक जैसी स्थाई समस्याओं को छोडकर फिल्मकारों का ध्यान ‘आतंकवाद और उसकी चपेट में आये मुस्लिम समाज” पर केन्द्रित हो गया। सन 2000 में बनी फिल्म ‘फिजा’ मुस्लिम समाज पर बनने वाली अंतिम क्लासिक फिल्म थी। अब आदर्शवादी मुस्लिम समाज को दर्शाती फ़िल्में तो कोई शायद ही बनाने की सोचे।

लव 1990 के बाद नये अर्थ समझाती कई फिल्में हिंदुस्तान में बनीं जिनमें से बाम्बे, माई नेम इज खान, अनवर, कम्पनी, अंडरवर्ल्ड, एनकाउंटर, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों, वीर जारा, मुहाफिज, धोखा, एक था टाईगर, दी हीरो स्टोरी ऑफ दी स्पाई आदि फिल्मों के नाम लिए जा सकते हैं। भारत भूमि से दूर विदेशी फिल्मकारों ने भी माई तेहरान फॉर सेल, बोल, लेमन ट्री, कांधार, खुदा के लिए, दी साल्ट आफ दी सी, ओसामा, ऐट फाईव इन दी आफ्टरनून, पर्से पोलिस जैसी फ़िल्में बनायीं। इन फिल्मों में कल्पनाशीलता और तंगनजरी कम, वास्तविकता ज्यादा दिखेगी।

भारतीय संदर्भ में तो हम इतना कह सकते हैं कि एक समय मुस्लिम समाज की बुराईयों पर फोकस न करके उन्हें एक ‘फिलर’ की तरह इस्तेमाल किया जाता था यानी कम तवज्जो दिया जाता था। अब मुस्लिम केन्द्रीय भूमिका में दिख रहे हैं, मगर वो जिस रूप में दिख रहे हैं, उससे पूरी दुनिया में खतरनाक संदेश जा रहे हैं। चंद सरफिरों की वजह से पूरी कौम लांछन झेले, यह सही नहीं है। इस मामले में इंसाफगोई जरूरी है।

जहां तक भारतीय फिल्मोद्योग की बात है, इसे तो अपनी धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता और खुले विचारों पर नाज होना चाहिए। यहां रचनात्मकता की बात होती है. रचनात्मकता के लिए रचनात्मक ढंग से काम किया जाता है। यहां के लोग उकसाने पर भी नहीं उकसते।

मौसम चाहे शीत, ग्रीष्म या वसंत राग छेड़े, जलाशय का काम है जल देते रहना। सिनेमा को भी इसी तरह जाति, धर्म, लिंग और द्वेषभाव से परे मनोरंजन का निर्मल जल मुहैया कराते जाना है।

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