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साक्ष्य (कविता)

गौरी तिवारी 

 

आँखें होती हैं साक्ष्य
कभी इतिहास और भूगोल की
कभी राजनीति और भ्रष्टाचार की
कभी युद्ध और मानवता के पतन की
कभी भुखमरी और निर्धनता की
कभी क्रांति और संघर्ष की
तो कभी अत्याचार और अन्याय की

कुछ नहीं छिपता आंखों से
करती हैं कैद सब अपनी पुतलियों में
बड़ी निष्पक्षता से संजो कर रखती हैं सब
बसी है इनमें भारत की स्वर्ण विरासत
तो मौजूद है भारत के होते टुकड़े भी
देखा है इन्होंने यदि कुर्सी का खेल
तो देखा है वादों की आड़ में जालसाजों को
चापलूसी कर बहलाते भी
गवाह हैं ये बारूद से लथपथ
लहूलुहान लाशों की
और निर्ममता से युद्ध में मासूमों की
हत्या करते सैनिकों की
पूछती हैं ये हताश आँखें
क्या देश की सीमा में बंधी होती है मानवता?
क्या ईश्वर और मानव के साथ
प्रकृति भी बंट जाती है धर्म से?

देखा है यदि इन्होंने बच्चों की निकलती पसलियां
तो हड्डी के ढांचों को उत्साह से भागते भी
गवाह हैं ये सर्द रात में तिरपाल में सोते लोगों की पीड़ा की
और तपती दोपहर स्वेद बहाकर रोटी कमाने वालों की भूख की
प्रशंसा करती हैं ये उस साहस की
जो चेतना जागृत करती है करोड़ों लोगों में
और साथ देती है उन तेजस्वी आत्माओं का
जिनके विश्वास को नहीं तोड़ पाती पुलिस की लाठी भी
देखती हैं कभी मजबूरन असहाय होकर
निर्दोषों को बेवजह दंड मिलते
कभी असहाय का उपहास होते भी
साथ देती हैं उस आवाज़ का
जो बजाती है क्रांति का बिगुल
और धर्म जाति से परे सोचती है सर्व हित का

आँखें होती हैं साक्ष्य
संसार की हर घटना का

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