वरुण कुमार पांडे
कहते हैं इतिहास सब कुछ दर्ज करता है। निरंतर चल रही घटनाओं को साक्षी भाव से सहेज कर रखता है और समय आने पर आईने की तरह ब्लैक एंड व्हाइट में दिखा भी देता है। महीन से महीन करतूतो को भी इतिहास समय आने पर उजागर कर देता है और इतिहास के बारे में कहा यह भी जाता है कि इतिहास समय के घूमते पहिए के साथ कभी ना कभी अपने को दोहराता भी है।
आपातकाल यानी साधारण शब्दों में कहें तो आफतकाल। किसी भी सभ्य समाज के लिए आपातकाल खुशगवार, सुकूनदेह शब्द नहीं है। आपातकाल में प्रचलित नागरिक अधिकार समाप्त कर दिए जाते हैं। लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया जाता है और शासन सत्ता में बैठे लोग निरंकुशता के साथ अपनी तानाशाही अपनी मनमानी करने का आधार गढ़ लेते हैं।
भारत ने आजादी के बाद 21 महीनों तक घोषित आपातकाल का दंश झेला है। उस दौर में विपक्षी नेताओं को कैद में बंद कर दिया गया था। लोकतंत्र के चौथे खंबे प्रेस की आजादी पर प्रतिबंध लगाया गया था। लोकतंत्रात्मक गणराज्य की सरकार अध्यादेशों के सहारे चलाई जा रही थी।
सत्तर के दशक का यह वह समय ऐसा था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देश का पर्याय भी कहा जाने लगा था। किसी और ने नहीं बल्कि उनकी पार्टी के उस समय के कवि हृदय अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने कहा था, ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’। केवल श्री बरुआ ही नहीं कांग्रेस के तमाम बड़े नेता श्रीमती गांधी की खुशामद में तमाम तरह के कसीदे पढ़ रहे थे।
12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने समाजवादी नेता राजनारायण की चुनाव याचिका पर फैसला सुनाते हुए श्रीमती गांधी के रायबरेली से लोकसभा चुनाव को अवैध घोषित करने के साथ ही उनपर अगले छह वर्षों तक कोई भी चुनाव लड़ने के लिए रोक लगा दी थी। इस फैसले को लेकर कांग्रेस पार्टी में दो तरह की राय थी। एक तो यह कि श्रीमती गांधी को इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक किसी वरिष्ठ नेता को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाना चाहिए जो सुप्रीम कोर्ट का फैसला श्रीमती गांधी के पक्ष में आने पर पद त्याग कर सत्ता वापस श्रीमती गांधी को सौंप दे। दूसरी राय सुप्रीम कोर्ट में अपील के साथ ही फैसला आने तक श्रीमती गांधी के प्रधानमंत्री बने रहने के पक्ष में थी। विदेशी लेखिका कैथरीन फ्रैंक ‘‘इंदिरा : दि लाइफ ऑफ इंदिरा नेहरू गांधी’ में लिखती हैं, “इस सबंध में श्रीमती गांधी ने अपने करीबी विधि विशेषज्ञ और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे से कहा, ‘मुझे त्यागपत्र देना चाहिए।’ जवाब में श्री रे ने कहा कि ‘हड़बड़ी में उन्हें ऐसा कोई फैसला नहीं करना चाहिए।’
कुलदीप नैयर अपनी पुस्तक ‘इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी’ में लिखते हैं कि श्रीमती गांधी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद अपने मंत्रिमंडल के तीन वरिष्ठ सदस्यों-जगजीवन राम, यशवंतराव चव्हाण और स्वर्ण सिंह से पूछा था कि क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक उनका पद पर बने रहना वाजिब होगा! तीनों ने मन की बात मन में मारते हुए कहा कि अगर वह त्यागपत्र देती हैं तो देश में तबाही मच जाएगी। बकौल श्री नैयर, “जगजीवन राम ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करना चाहिए।
पुपुल जयकर ‘इंदिरा गांधी : एक जीवनी’ में लिखती हैं कि उस समय कांग्रेस के भीतर अफवाहों, नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और दोमुहीं बातों का दौर शुरू हो गया था। श्रीमती गांधी से मिलने वाले कांग्रेस के बड़े नेता, वरिष्ठ मंत्री एक तरफ तो उनके प्रति अटूट श्रद्धा और आस्था व्यक्त कर रहे थे, दूसरी तरफ पर्दे के पीछे वैकल्पिक प्रधानमंत्री के रूप में अपने लिए संभावनाएं भी तलाशने में लगे थे।
जगजीवन राम, यशवंतराव चव्हाण, सरदार स्वर्ण सिंह के पक्ष में लॉबीइंग भी शुरू हो गई थी। वह लिखती हैं, “कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष देव कांत बरुआ ने श्रीमती गांधी के सामने सुझाव रखा कि सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने तक श्रीमती गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बन जाएं और वे (बरुआ) उस समय तक के लिए प्रधानमंत्री। फैसला श्रीमती गांधी के पक्ष में आने पर वह उनके लिए प्रधानमंत्री का पद खाली कर देंगे।” लेकिन कहते हैं कि जिस समय प्रधानमंत्री आवास पर यह चर्चाएं चल रही थीं, तभी गुड़गांव में अपनी मारुति फैक्ट्री से लंच के समय वहां आए इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी ने अपनी मां को किनारे ले जाकर समझाया कि उन्हें इस्तीफा नहीं देना चाहिए। प्रधानमंत्री के रूप में (चाहे वह कार्यवाहक या अल्पकालिक ही क्यों न हो) पार्टी के किसी भी नेता पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यही राय श्रीमती गांधी के विश्वासपात्र अतिरिक्त निजी सचिव आर के (राजेंद्र कुमार) धवन की भी थी। संजय और धवन ने उन्हें समझाया कि त्यागपत्र देने के बाद पिछले आठ वर्षों में खासी मशक्कत से उन्होंने पार्टी और सरकार में अपनी जो निष्कंटक स्थिति हासिल की है, उसे वे तुरंत खो देंगी। इंदिरा गांधी अपने बेटे संजय, विश्वस्त करीबी सिद्धार्थ शंकर रे और धवन के तर्कों से सहमत हो गईं। उन्होंने तय किया कि इस्तीफा देने के बजाय वह इलाहाबाद हाई कोर्ट से मिली बीस दिनों की मोहलत का इस्तेमाल करते हुए इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगी और पद पर बनी भी रहेंगी। बकौल पुपुल जयकर, अपने सुझाव पर इंदिरा गांधी की अनुकूल या कहें उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया नहीं मिलती देख श्री बरुआ निराश हुए, डर गए और ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ कहने लगे।
कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में संसद के दोनो सदनो के 518 सदस्य की ओर से पारित प्रस्ताव में कहा गया कि इंदिरा गांधी का नेतृत्व देश के लिए अपरिहार्य है। प्रस्ताव जगजीवन राम ने पेश किया जबकि अनुमोदन यशवंतराव चव्हाण ने किया था। उस समय प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव रहे बिशन टंडन अपनी पुस्तक ‘पी एम ओ डायरी (भाग एक) दि इमरजेंसी’ में लिखते हैं, “बैठक में श्री चव्हाण ने कहा था, ‘‘भारत (इंडिया) को जो होता है, वह इंदिरा को होता है और जो इंदिरा गांधी को होता है, वह भारत को होता है।’’ इसी बैठक की अध्यक्षता करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने थोड़ा और आगे बढ़ते हुए कहा था, ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ यानी ‘इंदिरा भारत हैं और भारत इंदिरा’।”
और फिर शुरू हुआ था देशव्यापी भक्ति प्रदर्शन। राज्यों के मुख्यमंत्री ने अपने-अपने राज्य से इंदिरा को महान बताते हुए उनके पक्ष में प्रस्ताव पारित किए गए वही देश भर से कांग्रेस नेता कार्यकर्ताओं को जूटा कर अपना अपना नंबर बढ़ने लगे।
लोग बताते हैं की पूरी दिल्ली श्रीमती गांधी के समर्थन और उनमें आस्था व्यक्त करने वाले पोस्टरों, कटआउटों से पट गयी थी।
20 जून 1975 को राजधानी दिल्ली में एक विशाल रैली आयोजित कर श्रीमती गांधी के पक्ष में शक्ति प्रदर्शन किया गया। इस रैली में श्रीमती गांधी का पूरा परिवार (दोनों बेटे-राजीव और संजय गांधी और दोनों बहुएं-सोनिया और मेनका गांधी) उनके साथ खड़ा था। इस रैली में व्यक्ति पूजा और चाटुकारिता की हदें पार करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष देव कांत बरुआ ने एक शेर पढ़ा था,
“इंदिरा तेरी सुबह की जय, इंदिरा तेरी शाम की जय,
इंदिरा तेरे नाम की जय, इंदिरा तेरे काम की जय।” लोग दावा करते हैं कि इस रैली में 10 लाख से अधिक लोग जुटे थे।
श्रीमती गांधी के खिलाफ पार्टी के भीतर और पार्टी के बाहर भी गोलबंदी हो रही थी। प्रमुख विपक्षी पार्टियां देश में व्याप्त अराजकता महंगाई भ्रष्टाचार को आगे कर कांग्रेस की सत्ता उखाड़ने फेंकने का आह्वान कर रही थी।
कुलदीप नैयर ‘इमरजेंसी की इनसाइड स्टोरी’ (पृष्ठ 44) में लिखते हैं, “श्रीमती गांधी ने रैली में कहा, कुछ विदेशी शक्तियां और निहित स्वार्थी तत्व न सिर्फ मुझे पद से हटाना चाहते हैं बल्कि जान से भी मारना चाहते हैं। विपक्ष इन शक्तियों से मिला हुआ है। इन तत्वों को मीडिया का समर्थन भी हासिल है। तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर झूठ फैलाया जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि मैं पद पर रहूं या ना रहूं, सवाल राष्ट्रीय हितों की रक्षा का है।”
रैली के बाद कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्य मंत्रियों ने राष्ट्रपति से मिलकर उन्हें दिए एक पृष्ठ के ज्ञापन में कहा कि श्रीमती गांधी के त्यागपत्र से न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि राज्यों में भी अस्थिरता फैल जाएगी। इंदिरा गांधी को आशंका थी कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए देश में बड़े उलट फेर और गड़बड़ियां फैलाने में जुटी है। इसी तरह के शक के आधार पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा को हटा दिया गया और उनकी जगह दिल्ली के चाटुकार नारायण तिवारी को प्रदेश की कमान दे दी गई। नई दिल्ली तिवारी के बारे में चर्चा थी कि वह संजय गांधी की चापलूसी में दिन-रात लगे रहते थे।
दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की ऐतिहासिक रैली के बाद आधी रात को आपातकाल की घोषणा हुई। श्रीमती गांधी को जल्दी ही यह एहसास हो गया कि भारत की लोकतांत्रिक आजादी को कानून के जरिए लंबे समय तक निलंबित नहीं किया जा सकता इसलिए उन्होंने देश की जनता को एक ही जादू कड़ी मेहनत, दूर दृष्टि, पक्का इरादा, अनुशासन का प्रण दिलाते हुए सभी वर्गों के विकास हेतु 20 सूत्री कार्यक्रमों का सूत्रपात किया तथा लोकतंत्र बहाली के लिए देश में आम चुनाव की घोषणा की।
घोषित आपातकाल के पांच दशक पूरा होने के बाद देश में अमृतकाल चल रहा है।
उन दिनों की तुलना आज के ‘अमृतकाल’ से की जाए तो तो लगता है कि हम अमृत काल में नहीं बल्कि एक अघोषित आपातकाल के दौर में जी रहे हैं। आपातकाल में बोलने की आजादी नहीं थी, आज के दौर में भी अभिव्यक्ति पर पहरा है। आपातकाल में प्रेस की आजादी जप्त कर ली गई थी, आज मुख्य धारा की मीडिया को जर-खरीद गुलाम बना लिया गया है। खान पान, रहन-सहन, वेशभूषा, सरकार के इशारे पर नियंत्रित की जा रही है। धार्मिक आजादी पर अंकुश लगाने की कोशिश जारी है। यहां तक कि प्रेम पर भी सरकार समर्थित संगठनों का पहरा है। चाटुकारिता के मामले में आज का अमृत काल तब के आपातकाल को लगातार बौना साबित कर रहा है।
प्रधानमंत्री की प्रशस्ति और चाटुकारिता के मामले में भाजपा के अध्यक्ष रहे जगत प्रकाश नड्डा सहित तमाम बड़े और जिम्मेदार नेताओं ने देवकांत बरुआ सहित कांग्रेस के अन्य नेताओं को बहुत पीछे छोड़ दिया है। उन्हें विश्व गुरु, देवताओं के भी नेता, युग पुरुष, देव तुल्य, देव दूत, साक्षात भगवान, सुपर ह्यूमन तक कहा जा रहा है। और तो और श्री मोदी ने स्वयं भी खुद को नान बॉयोलॉजिकल उत्पत्ति बताते हुए कहा है कि भगवान ने उन्हें यहां किसी खास इरादे से भेजा है। राम मंदिर, अयोध्या में श्रद्धालुओं के दान-चढ़ावे में चोरी के आरोपों से घिरे, विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष एवं श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत बंसल ने तो श्री मोदी को देश का राजा और इस बहाने विष्णु का अवतार भी कह दिया।
कुल मिलाकर घोषित आपातकाल का दौर काट चुके लोगों की एक बड़ी संख्या अभी भी देश में मौजूद है। पुराने लोगों से बात करने पर पता चलता है की सिक्के के दो पहलू होते हैं। लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रतिबंध की शिकायत तो वे करते हैं लेकिन लगे हाथों, वे उसे दौर की अच्छाइयां भी गिनाते हैं। इमरजेंसी के दौरान अमूमन लेट चलने वाली रेलें टाइम से चलने लगी थी। बाजार में घटतौली, मिलावट खोरी मूल्य वृद्धि पर पूरी तरह से अंकुश हो गया था। पुलिस थानों पर आम जन की शिकायतें तुरंत संज्ञान की जाती थी। हड़ताल धरना प्रदर्शन के कल्चर पर रोक से स्कूल कॉलेज समय से चलने लगे थे। सरकारी दफ्तरों में उपस्थित नियमित हो गई थी। एक जवाब देही का वातावरण निर्मित हुआ था।
आज के समय में हम देखें तो आए दिन भ्रष्टाचार के मामले उजागर हो रहे हैं। दिल्ली के अस्पतालों में हजारों करोड़ों का घपला उजागर हुआ है। किसी भी सरकारी ऑफिस में बिना लेनदेन के कोई काम नहीं हो रहा है। धर्म जाति संप्रदाय के नाम पर एक दूसरे को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है। पुलिस प्रताड़ना भी बढी है। एनकाउंटर और बुलडोजर कार्रवाई को मान्यता दी जा रही है। लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप लग रहे हैं। यह सब कुछ एक तरह से अघोषित आपातकाल की तर्ज पर हो रहा है।

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