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तेल के खेल में झोल ही झोल

अनिल तिवारी 

 

 

पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने को लेकर देश भर में बहस विमर्श जारी है। केंद्रीय मंत्रियों का तर्क है कि इससे किसानों की आय बढ़ती है विदेशी मुद्रा बचती है और प्रदूषण में कमी आती है, वहीं विशेषज्ञों और वाहन मालिकों की शिकायत है कि इससे गाड़ियों का माइलेज घट रहा है और इंजन में खराबी आ रही है।
पेट्रोल और एथेनॉल का मिश्रित ईंधन वर्तमान में एक प्रमुख मानक ईंधन बन गया है। हालांकि पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल बहुत सस्ता होता है फिर भी मिश्रित पेट्रोल की कीमत देश में सामान्य पेट्रोल की कीमत से ही तय होती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दामों के हिसाब से पेट्रोल की कीमत घटती बढ़ती रहती है वही सरकार द्वारा इथेनॉल की लागत प्रति लीटर 71.86 रुपए तय की गई है। आज की तारीख में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 71 डॉलर प्रति बैरल है ऐसे में इथेनॉल पेट्रोल की तुलना में महंगा बैठ रहा है। खुद सरकार के विश्लेषण बताते हैं कि चावल से बनने वाले इथेनॉल की वास्तविक लागत 126 रुपए प्रति लीटर तक पहुंच जाती है वहीं मक्का आधारित इथेनॉल की लागत 95 रुपए और गाने के रस से बने आईटी लाल की लागत करीब 85.5 रुपए प्रति लीटर आंकी गई है। इथेनॉल की ऊर्जा क्षमता भी पेट्रोल से कम होती है। एक लीटर पेट्रोल लगभग 32 मेगाजूल ऊर्जा देता है जबकि 1 लीटर एथेनॉल से 21 मेगाजूल ऊर्जा प्राप्त होती है। यानि समान दूरी तय करने के लिए इथेनॉल की मात्रा अधिक चाहिए। एथेनॉल का प्रयोग बढ़कर सरकार विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों की आय बढ़ाने तथा ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने का दावा करती है, लेकिन आम जनजीवन को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाले पेट्रोल डीजल के दामों को लेकर सुसंगत रणनीति के मोर्चे पर चुप्पी साधे हुए हैं। दुनिया के बाजार में तेल के दाम बढ़ते हैं तो अपने देश में भी दाम बढ़ना स्वाभाविक है लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों में गिरावट आती है तो उसका फायदा आम आदमी को क्यों नहीं मिलना चाहिए?
पेट्रोल और डीजल केवल ईंधन नहीं बल्कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा हैं। खेत में चलने वाला ट्रैक्टर, सड़क पर दौड़ता ट्रक, बस, टैक्सी, एम्बुलेंस, हवाई जहाज, कारखानों की मशीनें और बाजार तक पहुँचने वाली हर वस्तु किसी न किसी रूप में इन्हीं पर निर्भर करती है। इसलिए पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि का अर्थ केवल वाहन चलाना महंगा होना नहीं है। इसका अर्थ है कि देश में लगभग हर वस्तु की लागत का बढ़ना।

इसी दृष्टि से यदि कच्चे तेल की कीमतों और देश के खुदरा बाजार में पेट्रोल-डीजल के दाम के बारे में 2004 से 2025 तक की अवधि का अध्ययन किया जाए तो कई रोचक और गंभीर तथ्य सामने आते हैं।

2004 से 2014 तक देश में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार थी। इस दौरान दुनिया ने कच्चे तेल का सबसे महँगा दौर देखा। 2008 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 140 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँच गई थी। इस दौरान कच्चे तेल का औसत मूल्य भी कुछ वर्ष लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहा। पूरे यूपीए कार्यकाल का औसत लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल रहा।

जबकि 2014 में एनडीए सरकार सत्ता में आई। उसके शुरुआती वर्षों में वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई। 2015-16 में कच्चे तेल का मूल्य लगभग 46 डॉलर प्रति बैरल और 2020-21 में लगभग 45 डॉलर प्रति बैरल रहा। 2014 से 2025 तक का औसत यूपीए की तुलना में उल्लेखनीय रूप से काफ़ी कम रहा।

यदि कच्चा माल सस्ता हो जाए तो उपभोक्ता को भी उसका लाभ मिलना चाहिए। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। भारत में तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।

दिल्ली में 2004 में पेट्रोल लगभग 34 रुपये और डीजल लगभग 22 रुपये प्रति लीटर था। 2014 तक आते आते पेट्रोल लगभग 72 रुपये और डीजल लगभग 56 रुपये प्रति लीटर पहुँचा। पूरे दस वर्षों में पेट्रोल का औसत मूल्य लगभग 50 से 55 रुपये तथा डीजल का लगभग 35 से 40 रुपये प्रति लीटर रहा।

2014 के बाद जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता हुआ, तब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वैसी गिरावट नहीं आई जिसकी आम लोगों को उम्मीद थी। इसके विपरीत 2021-22 में देश के अनेक शहरों में पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर से ऊपर पहुँच गया। 2014 से 2025 के बीच पेट्रोल का औसत खुदरा मूल्य लगभग 80 से 90 रुपये तथा डीजल का लगभग 70 से 80 रुपये प्रति लीटर रहा।

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 2015 और 2016 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगभग आधी रह गई थी। लेकिन बावज़ूद इसके भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वैसी गिरावट नहीं आई, जैसी परिस्थितियों को देखते हुए अपेक्षित थी। यानी महँगे कच्चे तेल के दौर में औसत खुदरा कीमतें कम रहीं और अपेक्षाकृत सस्ते कच्चे तेल के दौर में औसत खुदरा कीमतें अधिक रहीं।

खुदरा बाजार में मूल्य कम करने की बजाय 2014 के बाद केंद्र सरकार पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाती चली गई। पेट्रोल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क मई 2014 में लगभग 9.48 रुपये प्रति लीटर था, जो मई 2020 तक बढ़कर लगभग 32.98 रुपये प्रति लीटर हो गया यानी लगभग साढ़े तीन गुना।

डीजल पर यही शुल्क लगभग 3.56 रुपये से बढ़कर लगभग 31.83 रुपये प्रति लीटर पहुँच गया। बाद में इसमें कुछ कटौती की गई, लेकिन शुरुआती वर्षों की भारी वृद्धि ने खुदरा कीमतों को ऊँचा बनाए रखा। इसका परिणाम यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने के बावजूद उपभोक्ताओं को अपेक्षित राहत नहीं मिल सकी और महँगाई का दबाव बना रहा।

पीपीएसी के आँकड़ों के मुताबिक 2014-15 में केंद्र सरकार को पेट्रोलियम क्षेत्र से लगभग 1.72 लाख करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ। यही आँकड़ा 2020-21 में लगभग 4.55 लाख करोड़ रुपये और 2021-22 में लगभग 4.92 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया। अर्थात सात सालों में यह लगभग तीन गुना हो गया।

दूसरी ओर यूपीए सरकार ने ऊँचे अंतरराष्ट्रीय तेल मूल्य के बावजूद उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सब्सिडी और ऑयल बॉन्ड का सहारा लिया। लगभग 1.3 से 1.4 लाख करोड़ रुपये के ऑयल बॉन्ड जारी किए गए। इससे तत्कालीन उपभोक्ता को राहत मिली, हालांकि इसका बोझ भविष्य के राजकोष पर पड़ा।

पेट्रोल के एक लीटर की कीमत का बड़ा हिस्सा कर के रूप में केंद्र और राज्य सरकारों के करों में जाता है। इसलिए महंगे पेट्रोल का सबसे बड़ा लाभ सरकारी राजस्व को मिला।

2014 से 2024 के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क और अन्य करों से लगभग 30 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भारी भरकम राजस्व प्राप्त किया।

सरकार बार-बार अपने इस तर्क को दोहराती है, कि इस अतिरिक्त राजस्व का उपयोग जनता की भलाई के लिए विकास कार्यों में खर्च किया गया। यह तथ्य अपनी जगह है। किंतु लोकतंत्र में यह पूछना भी उतना ही आवश्यक है कि क्या इस विकास का पूरा भार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जानता पर डालना सही था? चूँकि पेट्रोल और डीजल के दाम आम जनता के जीवनयापन को महंगा बना देते हैं।

यूपीए के काल में दिल्ली में पेट्रोल का औसत मूल्य लगभग 50-55 रुपये प्रति लीटर रहा, जबकि एनडीए के काल में यह लगभग 80-90 रुपये प्रति लीटर रहा।
2014-15 से 2021-22 के बीच केंद्र का पेट्रोलियम कर संग्रह लगभग 1.72 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 4.92 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुँच गया।

यहाँ गौर करने लायक बात यह है, कि कोविड महामारी के दौरान जब कच्चा तेल ऐतिहासिक रूप से 40 डॉलर प्रति बैरल के भी नीचे था, उसी समय उत्पाद शुल्क में उल्लेखनीय वृद्धि की गई।

यदि कोई सरकार महँगे कच्चे तेल के दौर में जनता को राहत देने के लिए राजकोष पर बोझ उठाती है और कोई दूसरी सरकार अपेक्षाकृत सस्ते कच्चे तेल के दौर में कर बढ़ाकर राजस्व बढ़ाती है, तो दोनों नीतियों का निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए।

सरकार को कर लेने का पूरा अधिकार है लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को भी सवाल पूछने का उतना ही अधिकार है। यह सवाल आज भी उतना ही महत्तवपूर्ण है जितना दस वर्ष पहले था। भारत आज भी लगभग 71 डॉलर प्रति बैरल के आसपास की अंतरराष्ट्रीय कीमत पर कच्चा तेल खरीद रहा है, तब भारतीय उपभोक्ता को पेट्रोल और डीजल के लिए इतनी ऊँची कीमत क्यों चुकानी पड़ रही है?

इस सवाल का जवाब केवल कच्चे तेल के दाम में नहीं बल्कि लोकतान्त्रिक जवाबदेही में छिपा है। सरकारों का मूल्यांकन नारों से नहीं, आँकड़ों से किया जाता है। और तेल के आँकड़े आज कुछ ऐसे ही सवाल पूछ रहे हैं।

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