पी.टी.एम (कहानी)

गौरी तिवारी

 

कोई भी व्यक्ति दोषरहित या एकदम सही नहीं होता, उसमें कोई न कोई कमी अवश्य होती है, किंतु कमियों के बावजूद वह किसी एक क्षेत्र में उत्तम होता है। मुझे भी यह स्वीकार करना होगा कि मैं अपनी कक्षा की सबसे होनहार विद्यार्थी नहीं हूं। कक्षा की सबसे मेधावी विद्यार्थी होने का अनन्य श्रेय सिर्फ काजल (अनुक्रमांक 21) को जाता है, मेरी रुचि नृत्य और हस्तकला (क्राफ्ट) बनाने में है, अंग्रेज़ी, सामाजिक विज्ञान, संस्कृत और हिंदी में अच्छी हूं। एक तरह से कहा जा सकता है कि हर विषय में मेरी पकड़ ठीक है। न मैंने कभी अपने जीवन में असफलता प्राप्त की, और ना ही कभी परीक्षा में अनुत्तीर्ण हुई। किंतु मैंने कभी परीक्षा में टॉप भी नहीं किया है। “बेहतर कर सकती थी” यह एक ऐसी टिप्पणी है जो आमतौर पर मेरे रिपोर्ट कार्ड में लिखी होती है। शायद ही कभी मेरे परीक्षा के परिणाम से घर में कोई खुश हुआ हो। बात यह है कि, मेरे माता-पिता अंकों को बहुत महत्व देते हैं, जब भी उन्हें कोई ऐसे मेधावी विद्यार्थी के बारे में बताता है, जिसने परीक्षा 99.8 प्रतिशत से पास की हो तो उनकी आंखों में गर्व, उदासी तथा उम्मीद का एक अनोखा मिश्रण होता है। यह देखकर उनके लिए मेरा मन बहुत दुखी होता है क्योंकि गर्व उस विद्यार्थी के लिए होता और उदासी तथा उम्मीद मेरे लिए।

पर कर भी क्या सकते हैं?? उनके सभी दोस्तों और संबंधियों के बच्चे अत्यंत बुद्धिमान हैं जिन्होंने कई पुरस्कार भी प्राप्त किए हैं, किंतु मेरे माता पिता के पास मैं हूं, जिसके पास कागज़ का झूला, फूलदान और सजावट की वस्तुएं बनाने के अलावा दूसरी कोई उपलब्धि नहीं है।

सच कहूं तो मुझे सबसे खराब वह दिन लगता है जब विद्यालय में पी.टी.एम होती है जिसमें रिपोर्ट कार्ड दिखाया जाता है। क्योंकि मेरा रिपोर्ट कार्ड घर में सिर्फ कयामत और निराशाजनक माहौल लाता है। मां, बिना कुछ बोले मुझे तिरस्कार भरी निगाहों से देखती हैं मानो मैंने कोई बहुत खतरनाक अपराध किया हो। और पापा ?? वह अपने क्रोध पर नियंत्रण करने का पूरा प्रयास करते हैं लेकिन शायद कर नहीं पाते, वह क्रोध में इतने शांत हो जाते हैं कि मुझे डर लगने लगता है कि ज्वालामुखी कब फट जाएगी। हालांकि पापा में आत्मसंयम निश्चित रूप से नही है, जल्द ही उनके क्रोध की सीमा का बांध टूट जाता है और वह प्रतिस्पर्धा, महत्वकांक्षा, जीवन के उद्देश्यों आदि के बारे में बातें करने लगते हैं। कई दिनों तक मेरे साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाता है इसलिए मैंने अब यह सुनिश्चित किया है कि जब भी रिपोर्ट कार्ड दिखाने के लिए पी.टी.एम होगी मैं घर पर बिना मां-पापा को बताए दादी को विद्यालय लेकर चली जाऊंगी क्योंकि आखिर एक वही तो हैं जिनसे मुझे से ज्यादा लगाव है। जितना स्नेह दादी मुझसे करती हैं उन भावों को शब्दों से ज़ाहिर करना मेरे लिए लगभग असंभव है। उनसे मैं कभी कुछ नहीं छिपाती, विद्यालय में क्या क्या हुआ से लेकर अपने दोस्तों तक के बारे में सब उन्हें बताती हूं और वो भी मेरी बातें बहुत खुश होकर सुनती हैं जैसे इससे आनंदमय कोई दूसरा काम नहीं। अभी जो परीक्षाएं समाप्त हुई हैं उनके परिणाम जब घोषित होंगे तब मैं दादी के साथ ही विद्यालय जाऊंगी क्योंकि उनके साथ पी.टी.एम. में जाना अपेक्षाकृत सुरक्षित है।

जैसे ही मैं घर पहुंची दादी ने पूछा “आज का इम्तिहान कैसा हुआ??” “फिर से धमाकेदार प्रदर्शन करके आई हो परीक्षा में??” इसपर मैंने कहा “देखिएगा एक दिन मैं आपको अपने अंकों से चौका दूंगी, मैं प्रथम स्थान अवश्य प्राप्त करूंगी, आप सिर्फ प्रतीक्षा कीजिए।”
“मैं अठहत्तर की हूं, अब तुम मुझे और कितना इंतजार करवाओगी??” उन्होंने जवाब दिया।
“अठहत्तर? मुझे तो आप पचपन वर्ष की उम्र से ज्यादा नहीं लगती हैं।”
मेरी बात सुनते ही दादी हंसने लगी और मेरा सिर अपनी गोद में रख कर हल्के से सहलाने लगी, उनकी यही बात मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। वह भी जानती हैं कि उनके पास आते ही मैं सारे दुख भूल जाती हूं इसलिए तो जब भी मैं उदास होती हूं वह अपनी गोद में मेरा सिर रख कर मुझे सुलाती हैं।

मेरी परीक्षाएं समाप्त हो गई थी इसलिए मुझे बेसब्री से सप्ताह के अंत होने का इंतजार था क्योंकि मैंने पहले ही तैयारी कर ली है पी.टी.एम में जाने की। मैं यह सोच कर खुश हो ही रही थी कि अगले सप्ताह तक परिणाम घोषित कर दिए जाएंगे तभी मां ने आकर कहा
“तुम्हारी क्लास टीचर का फोन आया था, सीमा मैम कह रही थी कि शुक्रवार को पी.टी.एम है। अबकी बार हम और तुम्हारे पापा दोनों चलेंगे रिपोर्ट कार्ड देखने”
और इस तरह मेरी सारी आशाएं बिखर गई!!!!

शुक्रवार को सुबह 8 बजे से 12 बजे तक पी.टी.एम है। मेरे माता-पिता के पास मुझ पर क्रोध करने के लिए शाम तथा शनिवार और रविवार का पूरा दिन रहेगा। बेशक गुस्सा फूटने के बाद भी तीन दिन तक भूकंप के झटके जारी रहेंगे, लेकिन पिछले कुछ अनुभवों से मुझे इससे निपटने का हल मिल चुका है, वह है… स्वयं को काम में व्यस्त रखना। इसलिए मैं अपनी पसंदीदा पुस्तक लेने के लिए स्थानीय लाइब्रेरी में चली गई।
अंदाजा लगाइए कि मैं वहां किस से मिली थी?? अत्यंत बुद्धिमान तथा कक्षा की मेधावी छात्रा काजल (अनुक्रमांक 21) से।
“तुम यहां क्या कर रही हो?” उसने रूखेभाव से पूछा।
उसने बिना मेरा जवाब सुने ही किसी से फोन पर कहा “मैं इस बार पी.टी.एम में नहीं आ पाऊंगी क्योंकि सोमवार तक के लिए कहीं बाहर जा रही हूं।”
“कहां?” मैंने पूछा।
“हमारे गांव”
“अच्छा, खूब मस्ती करना”
“धन्यवाद… इसके पहले कि मैं भूल जाऊं तुम्हे शुभकामनाएं”
“किसलिए?”
” तुम इस बार भी पीछे से टॉप करोगी, अंतिम स्थान प्राप्त करोगी कक्षा में। और हां… मुझे दिखाना मत भूलना। उसने हंसकर कहा।
मैं उदास होकर वह से चली गई। जब मैं घर पहुंच गई तो दादी ने मुझसे पूछा “क्या तुम मटर पनीर खाओगी?” पर मुझे तो रिपोर्ट कार्ड के बारे में सोच-सोच कर डर लग रहा था, इसलिए मैंने उन्हें मना कर दिया। उन्होंने फिर कहा “गाजर का हलवा भी है” मैंने कहा “नहीं दादी, कुछ भी खाने का मन नहीं है।” इस पर दादी ने रूखेपन से कहा “हमने कभी नहीं सोचा था कि तुम एक पी.टी.एम की वजह से, अपना मनपसंद खाना नहीं खाओगी। क्या सच में इतने कम अंक आएंगे?”
“नहीं दादी ज्यादा कम भी भी आयेंगे लेकिन अच्छे भी नहीं आयेंगे।” मैंने कहा।
दादी ने मुझे सांत्वना देते हुए कहा “सिर्फ परीक्षा में प्राप्त किए अंक ही बुद्धि का पैमाना नहीं होते।”
“फिर भी मुझे बेवकूफ क्यों समझा जाता है?” इसपर दादी ने बिना कुछ बोले हल्के से अपना हाथ मेरे सिर पर फेरा।

पी. टी.एम के बारे में सोच सोच कर मुझे डर लग रहा था। पर मैं क्या करूं? मैं अपने माता-पिता का सामना नहीं कर सकती थी। वैसे तो घर पर मैं, आमतौर पर परीक्षा के 1 दिन पहले, शाम से पढ़ना शुरू करती थी। क्षण भर के लिए तो मुझे काजल (अनुक्रमांक 21) और उसके जैसे अन्य मेधावी विद्यार्थियों से ईर्ष्या हुई पर शायद कहीं न कहीं गलती मेरी भी है, यदि परीक्षा एक दिन पहले पढ़ने की जगह मैने साल भर पढ़ाई की होती तो आज स्थिति कुछ और होती। यह सब सोचते सोचते मैंने नींद न आने के बावजूद कैसे भी करके सोने का प्रयास किया क्योंकि अगली सुबह पी.टी.एम थी जिसमें मेरे कम अंकों वाला रिपोर्ट कार्ड दिखाया जाने वाला था।

सुबह मुझे तेज बुखार होने के कारण मां पापा अकेले विद्यालय चले गए पी.टी.एम में। एक तो तबियत खराब थी ऊपर से रिपोर्ट कार्ड को लेकर अलग डर लग रहा था कि सब मेरे अंक देखकर कितना नाराज़ होंगे मुझसे। लेकिन दोपहर में कुछ ऐसा हुआ जिसकी मुझे उम्मीद ही नहीं थी, पापा बहुत खुश थे, वह मिठाई का डब्बा लेकर आए थे और मुझे लड्डू खिलाते हुए बोले “बहुत शुभकामनाएं बेटा!!” । लेकिन आज के पहले रिपोर्ट कार्ड को देखने के बाद पिताजी इतना खुश कभी नहीं हुए। मां मुझे प्यार से देखकर मुस्कुरा रही थी, और मुझे गले लगाकर कहा “बेटा, आज तुमने हमें गौरवान्वित किया है।” दादी ने भी उनसे उनकी इस खुशी का कारण पूछा। एक पल के लिए तो मुझे लगा कि यह कोई स्वप्न है। तभी उन्होंने मुझे मेरा रिपोर्ट कार्ड दिखाया। रिपोर्ट कार्ड पर नजर पड़ते ही हर विषय के अंक देखकर मुझे यही लगा कि मैं कोई स्वप्न देख रही हूं। क्या सच में यह मेरा ही रिपोर्ट कार्ड है? हर विषय में… 90,95,96,93,98 अंक, और कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
लेकिन रिपोर्ट कार्ड पर तो मेरे नाम के नीचे गलत अनुक्रमांक लिखा है। मेरा अनुक्रमांक तो 25 है, ओह !! सीमा मैम ने गलती से काजल (अनुक्रमांक 25) की जगह काजल (अनुक्रमांक 21) का रिपोर्ट कार्ड दे दिया। दोनों नामों के रिपोर्ट कार्ड आपस में मिल गए और अदला बदली हो गई। जिससे मैं उस दिन पुस्तकालय में मिली थी उस मेधावी काजल का रिपोर्ट कार्ड मैम ने मां पापा को पी.टी.एम में दिखा दिया।
लेकिन यह तो गलत है, मैने सोचा मैं सबको बता दूं कि यह मेरे अंक नहीं हैं लेकिन उस समय मां पापा और दादी के मुख पर खुशी देखकर यह बात बता न सकी।

रात को जब हम बाहर घूमने जाने वाले थे तब मैने साहस करके सबको बता दिया कि आज पी.टी.एम में सीमा मैम जो रिपोर्ट कार्ड दिया वह मेरा नहीं बल्कि कक्षा की टॉपर काजल का है जिसका अनुक्रमांक 21 है। यह अंक चाहें कितने ही अच्छे थे, लेकिन मेरे नहीं थे। इसलिए मैंने मन में एक दृढनिश्चय किया की चाहें कितना ही कठिन परिश्रम लगे, किंतु मैं एक दिन अपनी मेहनत के अंकों से अपनी दादी और मां पापा को अवश्य प्रसन्न करूंगी और गौरवान्वित करूंगी।

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2 Comments

  • बहुत बढ़िया कहानी👍

    • बहुत सुंदर

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