विरहिणी (कविता)

गौरी तिवारी

जो विरह की वेदना से निकले

वह अश्रु हूं मैं

जो विरह के ताप से तपे

वह क्रोध हूं मैं

जो विरह के वेग से शांत हो जाए

वह जल हूं मैं

जो विरह में किसी के साथ को तरसे

वह तड़प हूं मैं

जो विरह से सबका नाश करे

वह क्रोध हूं में

जो विरह के यज्ञ में अर्पित हो जाए

वह आहुति हूं मैं

जो विरह में बीते क्षणों को स्मरण करे

बह बीता अतीत हूं मैं

जो विरह में हवाओं से रहे

और सागर को मनाए

वह प्रेम हूं मैं

जो विरह में जीना सीख जाए

वह विरहिणी हूं मैं।।।

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