पुस्तकालय
गौरी तिवारी छायी थी अंधियारी थी मिथ्या की, जब आडंबर ने था अपना पैर पसारा, तब पुस्तकालय ने किया ज्ञानदीप से सारा जग रौशन। नहीं मात्र यह पुस्तकों का संचय, नहीं सिर्फ यह अक्षर
गौरी तिवारी छायी थी अंधियारी थी मिथ्या की, जब आडंबर ने था अपना पैर पसारा, तब पुस्तकालय ने किया ज्ञानदीप से सारा जग रौशन। नहीं मात्र यह पुस्तकों का संचय, नहीं सिर्फ यह अक्षर
हक मुझे सिर्फ मेरा हक चाहिए, इश्क-विश्क तुम रख सकते हो। राहें इतनी भी कांटे भरी नहीं मेरी, तुम चाहो तो साथ भी चल सकते हो। तू मिल जाती जिंदगी में तो कोई गम नहीं