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सुलझे हुए व्यक्तित्व से संपन्न श्रीयुक्त सुमित्रा

डॉ. जयशंकर

 

अद्भुत व्यक्तित्व की धनी सुमित्रा अयोध्या के चक्रवर्ती महाराजा दशरथ की तीसरी महिषी थी। सबसे बडी कौशल्या, उसके बाद कैकेयी और तीसरी पत्नी भगवत प्रेमी, नि:स्वार्थी, सभी परिस्थितियों में प्रसन्न रहने वाली सुमित्रा थी। महाराज दशरथ कौशल्या को पट्टमहिषी होने के कारण सम्मान देते थे वहीं पर कैकेयी अतिसुन्दर होने के कारण महाराज की अतिप्रिय थी। उनके प्रति उनका अप्रतिम लगाव–झुकाव था। लेकिन सुमित्रा के प्रति सदैव तटस्थ रहते थे। बाल्मीकि रामायण में तो उल्लेख मिलता है कि महाराज दशरथ हमेशा सुमित्रा की उपेक्षा करते थे और सदैव उनको तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे। लेकिन सुमित्रा इन सब बातों को बहुत ज्यादा तव्वजुह नही देती थी। इतिहास में सुमित्रा के विषय में बहुत तथ्यगत जानकारी तो नही मिलती कि उनके माता-पिता कौन थे, कहाँ जन्म हुआ था। लेकिन जहां कालिदास उनको मगध नरेश की पुत्री बताते है वहीं पर अन्य विद्वान काशी नरेश की पुत्री बताते हैं। कुछ कहते हैं कि इनका जन्म राजगीर में हुआ था।

महाराज दशरथ अपने समय के सबसे बडे राजा थे। धन-जन-क्षेत्र की दृष्टि से इनका उस समय कोई सानी नहीं था। दशों दिशाओं में साम्राज्य के विस्तार के कारण ही इनको चक्रवर्ती सम्राट कहा जाता था। कुछ दन्त कथाओं के अनुसार आसमुद्र और पाताल लोक तक इनका राज्य विस्तृत था। गृहस्थ आश्रम के आखिरीसे पहले पडाव वानप्रस्थ के दस्तक देने के समय तक तीनों रानियों से कोई संतान न होने के कारण वे बहुत चिन्तित रहते थे। एक दिन चर्चा के दौरान संतान के प्रकरण पर महर्षि वशिष्ठ भी राजन के असह्य वेदना को देखकर अपने को रोक नहीं पाए। राजा दशरथ के साथ कुलपुरोहित होने के नाते इनकी आंखे भी अश्रु से छलछला उठीं। लेकिन अपने को संभालते हुए बोले-राजन इसका भी उपाय है। इसके लिए हमें अद्भुत ज्ञानी, कर्मकांड में प्रवीण, महान तपस्वी श्रृंगी ऋषि की शरण में जाना पडेगा। कई एक राजाओं की उनके आशीर्वाद से वंश परंपरा चल रही हैं। उनके द्वारा संपन्न पुत्रेष्ठि यज्ञ से शतप्रतिशत मनोकामना पूर्ण होती है। महाराज दशरथ के निवेदन और महर्षि वशिष्ठ जी के आग्रह पर तय तिथि समय के अनुसार संपूर्ण तैयारी के पश्चात अतिथि भवन में विराजे श्रृषि श्रेष्ठ को ध्यान-स्नान के उपरांत यज्ञानुकूल वस्त्र धारणकर स्वयं राजन् लेने गए। यज्ञ संपन्न होने के पश्चात प्रसाद के रूप में रानियों को ग्रहण कराने के लिए जो चरू भाग ऋषिवर ने राजा को  सौंपा था और उसकी ग्रहण विधि बताई थी, महाराज ऋषि आज्ञा के अनुसार तीनों रानियों को सम मात्रा में ग्रहण कराने के लिए प्रसन्नतापूर्वक महल में जाकर उत्सुकता और खुशी के साथ कुलदेवता और कुलदेवी के भजन-पूजन में लीन,प्रतीक्षारत कौशल्या जी, रानी कैकेयी और सुमित्रा जी में से केवल पट्टमहिषी सहज-सरल, सीधी-साधी कौशल्या जी और वाकपटु, युद्धकला में पारंगत, अति साहसी, महाराज के मनोकामनाओं को जानने में कुशल कैकेयी को ही बुलाया। लेकिन इन दोनों रानियों के साथ सहजता के साथ सुमित्रा भी आ गयी। राजा दशरथ ने चरू के आधा भाग को कौशल्या को आधे में से आधा भाग कैकेयी को दिया। कुछ सोच-विचार कर पुन: शेष चतुर्थांश में दो भाग कर दोनों रानियों कौशल्या और कैकेयी को सौंप दिया। सुमित्रा के भी मन में मां बनने की लालसा अवश्य रहीं होगी जैसा कि एक स्त्री के लिए  लोक में पुत्रवती होना सबसे बडा सौभाग्य माना जाता है। वह अधिकृत भी थी क्योंकि वह भी उन्हीं की पत्नी (छोटी रानी) थी। लेकिन पता नही उनको महाराज ने ऋषिवर के निर्देश के बाद भी प्रसाद नही दिए। लेकिन संतोषी, धैर्यशील और सबसे बडी बात ईश्वर में विश्वास रखने वाली होने के कारण स्त्री होने के बावजूद भी सुमित्रा को महाराज दशरथ के द्वारा चरू भाग न दिए जाने का रंचमात्र भी मलाल या दुख नही हुआ। चुपचाप राजा के प्रति आदर- सम्मान, विनत-श्रद्धा भाव से झुकी हुई नजरों से देखते हुए निज की चिंता से परे दोनों बडी रानियों को चरू के द्वारा पुत्र प्राप्त करने की बात को सोच-सोच कर मन ही मन गदगद हो रही थी। महाराज के वहां से जाने के उपरान्त दोनों रानियों ने राजा के द्वारा पहले दिए गए प्रसाद भाग को परमेश्वर का स्मरण करते ग्रहण किया और बाद में प्राप्त प्रसाद भाग को दोनों ने सुमित्रा को उनके संकोच करने और शर्माने के बावजूद भी हंसी से लोट-पोट होते हुए बलात बारी- बारी से खिला दिए। पहले कौशल्या की गोद पुत्ररत्न से संपन्न हुई तत्पश्चात कैकेयी की। प्रसाद के दो भाग ग्रहण करने के कारण सुमित्रा को जुडवे पुत्ररत्नों की प्राप्ति हुई। राजपरिवार में एक ही साथ चार पुत्र रत्नों के आगमन से संपूर्ण अयोध्या बहुत काल तक मंगलगीत, सोहर, बधाईगीत, दान-पुण्य, पूजा-पाठ, नाच-गान, प्रहसन के महोत्सवों मे आकण्ठ निमग्न रही। प्रत्येक जन के चेहरे पर अठखेलियां भरती हुई प्रसन्नता को देखकर ऐसा लग रहा था मानों अयोध्या के प्रत्येक दंपत्ति को पुत्र रत्न का वरदान सुफल हुआ हो। तीनों रानियाँ अपने पु्त्रों को प्राण से भी ज्यादा प्यार करतीं थी।जहां पर  वंश आगे न बढने की चिन्ता से राजा के माथे पर सदैव चिन्ता की लकीरें स्पष्ट दिखाई देती थी, राजपाट से उनका मन उचटता जा रहा था, सब कुछ भार महसूस हो रहा था, चेहरे पर झुर्रियों का जाल फैलता जा रहा था, वहीं पुत्ररत्नों के आगमन से महल का कोना-कोना खुशियाँ से गुलजार होने के साथ-साथ राजा का संपूर्ण व्यक्तित्व भी विशेष दीप्ति से जगमगा रहा था।उनके मन में प्रतिपल लड्डू फुटते रहते थे। सभी पुत्र उनको प्राण से भी प्रिय थे। जहां उनके साथ अपना ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत करने में उन्हें अपार आनंद का अनुभव होता था वहीं पिता होने के नाते उनके सुगढ, सुन्दर-सफल भविष्य के लिए विशेष योजनाओं को बनाने और उनके सफल कार्यान्वयन की कल्पनाओं में सदैव लीन रहते थे। कभी-कभी पालने में झूलते हुए चारों भाईयों को देखते ही रह जाते थे।सेविका के साथ वहां पर केवल सुमित्रा थी तभी महाराज वहां उपस्थित हुए और राम को गोद में लेकर पुचकारने लगे। उनकी आहट को पाकर कौशल्या और कैकेयी भी आ गई। कौशल्या लक्ष्मण को उठाकर दुलारने लगी, सुमित्रा भरत को लेकर प्यार करने लगी और कैकेयी अकेले रोते हुए शत्रुघ्न को उठा ली। तुलसीदास ने कवितावली में इस दृश्य का बहुत मनोरम वर्णन किया है-रामसिसु गोद महामोद भरे दशरथ,कौसिलाहु ललकि लखनलाल लये हैं/भरत सुमित्रा लये, कैकेरयी सत्रुसमन, तन प्रेम पुलक, मगन भये हैं।। सुमित्रा के मन में अपना-पराया की भावना रंचमात्र भी नही थी। सभी के प्रति वह सदैव प्रेम उडेलती रहती थी। यही कारण था कि राजपरिवार के चारों बालक मां सुमित्रा के कक्ष में उन्हीं के साथ खेलते हुए रमण करते रहते थे। कई प्रसंगों में ऐसा भी वर्णन आया है वे अपने दोनों पुत्रों से ज्यादा लाड-प्यार राम और भरत पर न्यौछावर करती रहती थी। सबके खान-पान वस्त्र आभूषण का विशेष ध्यान सुमित्रा ही रखती थी। चारों में से कोई भी खासकर यदि राम कभी रोने लगते थे तो पूरा घर ही सिर मांथे पर उठा लेती थी। किसी भी बालक को दुखी या रोते देखकर उनकी आंखे अश्रुओं से डबडबा उठती थी। सभी उनके लिए प्राण से भी अधिक प्रिय थे। लेकिन राम के प्रति उनके मन में और राम के मन में उनके प्रति विशेष अनुराग था। सुमित्रा अद्भुत भगवत प्रेमी थी। राम के विशेष अवतार के बारे में संभवतः उनको सब कुछ पता रहा हो। महाकवि तुलसीदास ने भी सुमित्रा को राम भक्त के रूप में चित्रित किया है। वह बहुत गर्व के साथ कहती हैं कि वही माता धन्य है जो श्रीराम चरणानुरागी पुत्र को जन्म देती है जैसे वह हैं –“पुत्रवती जुवती जग सोई, रघुपति भगतु जासु सुत होई।” पूरे दिन सभी नवजात उन्हीं के पास रहते थे। उन्हीं के साथ खेलना-कूदना,मचलना, बालहठ करना, उन्हीं के हाथ से दुग्धपान करना, खाना पीना, यहां तक की केश गुंथवाना सभी उन्हीं से पसंद करते थे। अंधेरा होते-होते राम को कौशल्या और भरत को कैकेयी अपने-अपने कक्ष में लेकर चलीं जाती थी। भरत तो माँ की लोरियां सुनते हुए अक्सर सो जाते थे। लेकिन राम को मां कौशल्या के अंक में भरपूर नींद नही आती थी, कुछ प्रहर व्यतीत होने के पश्चात ही राम तीव्र स्वर में रोना-धोना प्रारंभ कर देते थे तथा इतना छरिया जाते थे कि परेशान होकर कौशल्या भागी-भागी सुमित्रा के कक्ष के कपाट को थपथपाते हुए अक्सर कहने लगती थी ‘लो अपने राम को, मेरी तो सुन ही नहीं रहें है। देखो तो सुमित्रा रोते-रोते इन्होंने अपने मुंह को  कितना सुजा लिया है, अपनी आंखों को कैसा रक्तिम कर लिया है।’ सुमित्रा संकोच-प्रसन्नता में डुबी हुई घबराहट में दीदी-दीदी कहते हुए आती थी तो वे यह कहते हुए ‘पता नहीं कौन सी घुट्टी पिला दी हो, जादू कर दी हो कि एक क्षण भी मेरे अंक में इनको चैन ही नहीं मिलता, लो सुलाओ,’ थोड़ी सी झिडकी और हंसी के साथ उनकी गोद में डालकर अपने कक्ष में विश्राम हेतु चली जाती थी। कुमारों के रहन-सहन, खान-पान, शिक्षा-दीक्षा पर महाराज बहुत ही बारीकी से नजर रखते थे। गुरू आश्रम से सभी मूल संस्कारों और शिक्षा-दीक्षा में पारंगत होकर जब चारों कुमार महल लौटे तो महल की पहले से भी ज्यादा रौनक बढ गई। महाराज राजकुमारों की दैनिक चर्या की रानियों के साथ-साथ दरबार में भी महामंत्रियों, मंत्रियों-सभासदों से चर्चा परिचर्चा कर हमेशा प्रसन्न रहते थे। सभी भाईयों में बहुत सुन्दर तालमेल था। खेल में दो समूह बनते थे। प्रथम राम लक्ष्मण का दूसरा भरत शत्रुघ्न का। राम जहाँ धीर-गंभीर, सहज-मोदक स्वभाव के थे, वहीं पर भरत शांत-सरल, निश्छल और राम अनुगामी थे। लक्ष्मण ओज- वीर-गंभीर स्वभाव के थे। उनसे अन्याय कभी सहन नहीं होता था। शत्रुघ्न की तो बात ही निराली थी वे तीनों भाईयों के परमाज्ञा पालक, वीरत्व से ओतप्रोत सरल स्वभाव के थे। राजा के साथ तीनों रानियाँ कुमारों के क्रमशः बालानंद के पश्चात किशोरानंद के आनंद का पान ही कर रहीं थी कि स्वागत कक्ष में महर्षि विश्वामित्र का आगमन हुआ। वे यज्ञ-हवन, ध्यान-साधना, पूजा-पाठ में बाधक बने सनातन कर्म-धर्म के विरोधी राक्षसी वृतियों वाले असभ्यों के समूल नाश के लिए और इस महत कार्य के लिए राम लक्ष्मण को कुछ दिनों के लिए साथ ले जाना चाहते थे। ऋषि अपने आग्रह पर, राजा के न भेजने के लिए लाख अनुनय विनय, तर्कों के बावजूद भी अडे रहे। कुलगुरू वशिष्ठ के समझाने पर(तब वसिष्ट बहुविधि समुझावा, नृप संदेह नास कंह पावा।) बहुत ही भारी मन से महाराज ने स्वीकरोक्ति दी। विश्वामित्र जी जब सुरक्षा के अनकों आश्वासनों से महाराज को अवगत कराकर साथ में कुलगुरू की हांमी और उन्हीं के द्वारा दोनों कुमारों के ले जाने के पीछे गुप्त उद्देश्यों के संकेत के पश्चात महाराज की प्रसन्न भाव की अनुमति से जब दोनों राजकुमार विदा हुए तो सभी रानियों में उनके कुशल क्षेम के लिए सबसे ज्यादा चिंतित सुमित्रा ही रहती थी।जब भी अवसर मिलता तो पूजा कक्ष में जाकर भगवान के समक्ष विनत भाव से राम और राम के अनुगामी लक्ष्मण को अपने गंतव्य के उद्देश्यों को पूर्णकर शीघ्र उनकी सकुशल नगर वापसी हेतु प्रार्थना-अर्चना करने लगती थी। सुमित्रा अपने पुत्र लक्ष्मण और शत्रुघ्न का लालन-पालन एक आदर्श माता के रूप में करती हुई दिखाई देती हैं। वह पुत्रों को उपदेश देती हुई कहती हैं कि अच्छे व्यक्ति को राग-इर्ष्या, मद-मोह, रोष आदि विकारों से दूर रहकर सदैव विनम्रता, ईमानदारी, दया और सेवा भाव का अनुगमन करना चाहिए- “रागु रोष इरिषा मद मोहू, जनि सपनेहुं इन्ह के बस होहू। सकल प्रकार विकार बिहाई, मन क्रम वचन करेहु सेवकाई।।” सुमित्रा सदभावों के साथ-साथ, जनकल्याणकारी कार्यों के लिए भी दोनों पुत्रों को सदैव अभिप्रेरित करती रहती हैं। उन्होंने दोनों का इस तरह से पालन-पोषण किया था कि   अन्य गुणों के साथ-साथ उनका व्यक्तित्व राजधर्म के विशिषट गुण अतुल वीरत्व से सदैव संपन्न रहे। इसके साक्षात साक्षी उनके दोनों पुत्र शेषनाग के अवतार लक्ष्मण और शत्रुओं के संहारक शत्रुघ्न थे। मुनि विश्वामित्र जब राम लक्ष्मण को साथ ले गए तो कौशल्या जी कई  दिनों तक महाराज के समझाने के बाद भी उदास रही। लेकिन सुमित्रा यह सोच कर गर्वोन्नत हो रही थी कि मेरा पुत्र राम के साथ असुरों के संहार(वीरता पूर्ण कार्य) के लिए कौशिक मुनि के साथ गया है। जब राम सीता के साथ वन जाने लगतें है तो वह स्वयं लक्ष्मण को वन जाने के लिए प्रेरित करते हुए कहती हैं कि- “तुम्हारहि भाग रामु वन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाही।। सकल सुकृत कर बड फल एहू। राम सिय पद सहज सनेहू।।” सुमित्रा यहां पर उपदेशिका, निःस्वार्थी जनकल्याणकारी भावना से ओतप्रोत संपन्न माँ के रूप में दिखाई देती हैं।

उनका एक स्वरूप स्वाभिमानी-साहसी-दूरदर्शी नारी के रूप में तब दिखाई देता है जब वन जाने के लिए अनुमति मांगने हेतु उनके पास लक्ष्मण आते हैं। वह तुरंत तटस्थ भाव से भविष्य के कार्यों को देखते हुए लक्ष्मण से कहती हैं -तुम्ह कहुँ वन भाँति सुपासू। संग पितु मातु रामसिय जासु। जेहि न राम बन लहहि कलेसू। सुत सोई करेहु इहइ उपदेसु।। वह आज्ञा के साथ यहां तक कह देती हैं कि “रामसीय सेवा सुचि ह्वै हौ, तब जानिहौ सही सुत मेरे।” अर्थात तुम्हारे मेरे पुत्र होने की भी सार्थकता भी यही है। यही नही लक्ष्मण की सारी शंकाओं को निर्मूल करते हुए कहती हैं कि राम वन में तुम्हारे ही कल्याण के लिए जा रहे हैं अन्य कोई कारण नही है। ज्ञातव्य है कि लक्ष्मण शेषनाग के अवतार हैं, धरती उनके शीश पर है और धरती पर पाप बढ जाने के कारण भार बढ गया। उसे ही संतुलित करने के लिए राम वन जा रहे हैं– “तुम्हरेहिं भाग राम वन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।” वह थोड़ा सा भी घबराती नहीं हैं। लक्ष्मण को सीधे कहती हैं कि तुम वन जाओ, यहां तुम्हारा कोई काम नही है- “तात तुम्हारी मातु वैदेही, पिता राम सब भाँति सनेही।, जौ पै सीय राम बन जाहीं, अवध तुम्हार काजु कछु नाही।।” वह स्वाभिमानी माँ भी हैं। जब राम लक्ष्मण के माध्यम से सुमित्रा माता से अनुमति मांगते हैं तो वह कहती हैं कि जब राम मुझसे मिलने नहीं आए तो उनको संकोच हो रहा है और उनके पास जाने में मुझे भी संकोच हो रहा है। वे भी जब रावण का वध करके लौटेंगे तभी मै भी मिलूंगी। कृतिवास रामायण के अनुसार वे विवेकशील, धैर्यवान नारी हैं। वह सदैव पर्दे के पीछे रहती हैं। लेकिन श्रीयुक्त हैं अर्थात ज्ञान और धर्म की अद्भुत प्रतीक हैं। सुमित्रा त्याग की आदर्श मूर्ति और अच्छी देवरानी भी हैं। वह बालकों की सेवा सुश्रूषा के साथ-साथ कौशल्या की सेवा में भी अपना अधिकतम समय व्यतीत करती हैं। लेकिन कभी, किसी भी परिस्थिति में अपना धैर्य नही खोती हैं। राम-सीता के साथ लक्ष्मण वन चले जाते हैं तो जरा भी विचलित नही होती, जब कि कौशल्या दुःख और चिन्ता के सागर में आकुल-व्याकुल हो उठती हैं। वह खाना- पीना सब त्याग देती हैं। यहां तक कि जल  लेना भी छोड़ देती हैं। लेकिन सुमित्रा महत कार्य के लिए लक्ष्मण के वन गमन को सोचकर बहुत धैर्य के साथ रहती हैं। बाल्मीकि रामायण के अनुसार तीन दिनों तक बिना अन्न जल के कारण जब पट्टमहिषी कौशल्या की हालत बिगड़ने लगती है तब वह दूध का कटोरा लेकर उनको पिलाने के लिए जाती है और तरह- तरह से समझाती हैं- “आश्वासयन्ती विविधैश्च वाक्यैः, वाक्योपचारे कुशलानवद्य। रामस्य तां मातरेवमुक्त्वा, देवी सुमित्रा विरराम रामा।”

जब हनुमान के माध्यम से लक्ष्मण को शक्तिबाण लगने की सूचना पाती हैं तो उन्हें लक्ष्मण की चिन्ता नही होती है अपितु यह सोचकर व्याकुल हो जाती हैं कि अब तो राम अकेले पड गए होंगे और हनुमान से कह उठती है– कपि सौ कहति सुभाय अंबके अंबक अंबु भरे है, रघुनन्दन बिनु बन्धु कुअवसर जदपि धनु दूसरे हैं….। वह तुरंत राम की सहायता के लिए शत्रुघ्न जी को हनुमान के साथ जाने को कहती हैं- “तात जाहु कपि संग.. ”। वह तो वशिष्ठ जी वहां उपस्थित थे जिन्होंने सुमित्रा को समझाकर शत्रुघ्न जी को रोक लिया, नही तो शत्रुघ्न जी को वह वन भेज ही देती। लक्ष्मण के आहत होने से वह चिन्तित न होकर उल्टे कहती हैं कि लक्ष्मण मेरा पुत्र! श्रीराम के लिए युद्ध में लडता हुआ गिरा। मै धन्य हो गई। लक्ष्मण ने मुझे पुत्रवती होने का सच्चा गौरव प्रदान किया है। वह वीरता और देश प्रेम की साक्षात् साकार स्वरूप हैं। अपने दोनों पुत्रों को निश्छल भाव से देश की सुरक्षा में लगा देती हैं। लक्ष्मण को जहां राम को सौंपकर देश की बाह्य सुरक्षा से संलग्न करती हैं वहीं पर शत्रुघ्न को भरत का अनुगामी बनाकर देश की आंतरिक सुरक्षा हेतु सौंप देती हैं। सुमित्रा अनन्य विश्वासी भी हैं। राम के साथ लक्ष्मण को वन भेजकर निश्चिंत हो जाती हैं। उन्हें राम पर अनन्य विश्वास था। इसलिए वन से लौटने पर जब लक्ष्मण को गले लगाकर उनके शरीर पर चोट का निशान देखकर राम से पूछती है कि ये कैसा चिह्न है तो राम रोते हुए शक्ति लगने की कथा सुनाने लगते हैं तभी परिस्थिति को संभालते हुए हंसकर अनन्य विश्वास के साथ बोली-राघव आप  तो हाथ ही फेर देते तो सब ठीक हो जाता, इसमें कैसा संकोच। इस प्रकार हम देखते हैं कि सुमित्रा जी तेज की खान हैं, उनमें तेज का आधिक्य होने के कारण ही उनके दोनों पुत्र रामकथा में सर्वत्र तेजपुंज के रूप में दिखाई देते हैं। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए संस्कृत भाषा के सर्वश्रेष्ठ व्याकरणाचार्य आचार्य महर्षि पाणिनी कहते हैं कि सुमित्रा का व्यक्तित्व इतना ऊंचा है कि उन्हें स्त्री कहने का साहस मुझमे नही है। यही कारण है कि उन्होंने सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण के लिए स्त्रीवाचक प्रत्यय का प्रयोग न करके सौमित्र ही उदबोधित किया हैं। निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि सुमित्रा इतिहास की पुनरावृति न होकर नवीन चेतना संपन्न नारी हैं। कौशल्या की अपेक्षा उनका चरित्र प्रखर, प्रभावी तथा संघर्षमय, त्याग से परिपूर्ण आदर्श संपन्न है।

 

लेखकडा. जयशंकर शेरपुरवासी

वर्तमान मे निवास लखनऊ

संपर्क सूत्र– 6394192621

 सहायक ग्रन्थ  

 

  1. वाल्मीकि रामायण ।
  2. कम्ब रामायण ।
  3. आध्यात्म रामायण ।
  4. रामचरित मानस ।
  5. रामानन्द सागर निर्मित रामायण सीरियल ।
  6. बज्जिका रामायण ।
  7. कृतिवास रामायण ।
  8. रघुवंशम – कालिदास ।

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One Comment

  • सुमित्रा के
    व्यक्तित्व का बहुत सुंदर वर्णन ।इन पर बहुत कम लिखा गया है

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