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डॉ. अम्बेडकर के आरक्षण और धर्मांतरण संबंधी विचार

(भारत नीति प्रतिष्ठान)

 

अनुसूचित जाति मूल के उन व्यक्तियों को, जिन्होंने ईसाई अथवा मुस्लिम धर्म स्वीकार कर लिया है, आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए या नहीं, इस विषय पर होने वाली किसी भी चर्चा को डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर के विचारों के गंभीर अध्ययन और विश्लेषण के बिना पूर्ण नहीं माना जा सकता। किंतु इस प्रश्न पर स्वयं डॉ. अम्बेडकर के अनुयायियों के मध्य भी मतैक्य नहीं है। एक पक्ष का मत है कि धर्म परिवर्तन के पश्चात भी सामाजिक कलंक और भेदभाव समाप्त नहीं होते, अतः आरक्षण की सुविधाएँ जारी रहनी चाहिए; जबकि दूसरा पक्ष इस विचार का स्पष्ट विरोध करता है। ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि डॉ. अम्बेडकर के विचारों का उनके ऐतिहासिक संदर्भों में निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए।

डॉ. अम्बेडकर उस समय के ऐसे नेता थे जिन्हें वास्तविक और प्रतीकात्मक, दोनों प्रकार की उच्चतम वैधानिक एवं नैतिक मान्यता प्राप्त थी। संविधान सभा में विधि मंत्री तथा प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उनकी उपस्थिति को कुछ सदस्यों ने इस तर्क के समर्थन में प्रस्तुत किया कि भारत सामाजिक प्रगति कर चुका है और अब आरक्षण की आवश्यकता नहीं रह गई है। किंतु संविधान सभा के वरिष्ठ नेतृत्व का मत था कि सामाजिक रूप से वंचित तथा तथाकथित ‘अवसादग्रस्त वर्गों’ को अतीत में अवसरों से व्यवस्थित रूप से वंचित रखा गया है, इसलिए समतामूलक समाज की स्थापना के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान आवश्यक हैं। इसी कारण शिक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति के क्षेत्रों में इन वर्गों के लिए विशेष अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता को स्वीकार किया गया। परिणामस्वरूप अस्पृश्यता के उन्मूलन और अवसर की समानता को संविधान में महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया।

आरक्षण के प्रश्न पर डॉ. अम्बेडकर का दृष्टिकोण उनके व्यक्तिगत अनुभवों और नीति-निर्माता के रूप में उनकी भूमिका, दोनों से निर्मित हुआ था। उनका स्पष्ट मत था कि आरक्षण का मूल उद्देश्य जाति व्यवस्था के कारण अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों पर हुए ऐतिहासिक अन्यायों की भरपाई करना है। संविधान सभा में उन्होंने बार-बार यह प्रतिपादित किया कि आरक्षण को ऐतिहासिक सामाजिक और आर्थिक विषमताओं के परिमार्जन के साधन के रूप में देखा जाना चाहिए। उनका मानना था कि सदियों से उत्पीड़ित समुदायों को संसाधनों और अवसरों तक समान पहुँच नहीं मिल सकी, इसलिए सकारात्मक भेदभाव (Affirmative Action) आवश्यक है। वे इस तथ्य को लेकर भी स्पष्ट थे कि केवल अस्पृश्यता का विधिक उन्मूलन कर देने मात्र से सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ समाप्त नहीं होंगी।

हालाँकि, आरक्षण की आवश्यकता स्वीकार करते हुए भी वे इसके स्वरूप और सीमा के प्रति सजग थे। उनका मत था कि आरक्षण स्थायी व्यवस्था नहीं होना चाहिए, बल्कि एक सीमित अवधि के लिए लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि आरक्षण का दायरा इतना व्यापक नहीं होना चाहिए कि अवसर की समानता का मूल सिद्धांत ही प्रभावित हो जाए। यही कारण था कि जब कुछ सदस्यों ने आरक्षण की समय-सीमा समाप्त करने का प्रस्ताव रखा, तब डॉ. अम्बेडकर ने उसका विरोध किया और कहा कि संविधान सभा पहले ही इस विषय पर सर्वसम्मति से निर्णय ले चुकी है तथा इसमें किसी भी परिवर्तन के लिए संवैधानिक संशोधन आवश्यक होगा।

इस संदर्भ में उनके वे विचार विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं जिनमें उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जातियों को विशेष संरक्षण क्यों दिया गया, जबकि अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को नहीं। उनका तर्क था कि मुसलमानों और ईसाइयों जैसे समुदायों को ब्रिटिश शासनकाल में अपेक्षाकृत लंबे समय तक राजनीतिक विशेषाधिकार प्राप्त रहे थे, जबकि अनुसूचित जातियों को ऐसे लाभ बहुत देर से और सीमित अवधि के लिए मिले। अतः अनुसूचित जातियों के लिए विशेष प्रावधानों का औचित्य ऐतिहासिक वंचना और प्रतिनिधित्व की कमी पर आधारित था।

धर्मांतरण के जोखिम : डॉ. अम्बेडकर का दृष्टिकोण

संविधान की व्याख्या करते समय ‘मौलिक आशयवाद’ (Originalism) के सिद्धांत का उल्लेख किया जाता है, जिसके अनुसार संविधान निर्माताओं की मूल मंशा को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसलिए धर्मांतरण के प्रश्न पर डॉ. अम्बेडकर के विचारों का अध्ययन भी आवश्यक हो जाता है।

डॉ. अम्बेडकर ने धर्मांतरण को मुख्यतः सामाजिक समानता प्राप्त करने का माध्यम माना। उनका मत था कि दलित समुदाय धर्म परिवर्तन आर्थिक या राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक अपमान और भेदभाव से मुक्ति के लिए करता है। 13 अक्टूबर 1935 को नासिक के येवला सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि धर्म परिवर्तन का उद्देश्य आर्थिक समृद्धि प्राप्त करना नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि धर्मांतरण से आर्थिक लाभ सुनिश्चित नहीं होता, किंतु हिंदू समाज में बने रहने पर भी दलित समुदाय निर्धनता और सामाजिक हीनता से मुक्त नहीं हो सकता। उनके अनुसार राजनीतिक अधिकारों के स्तर पर भी कोई वास्तविक हानि नहीं होगी, क्योंकि जिस समुदाय में वे सम्मिलित होंगे, वहाँ उपलब्ध राजनीतिक अधिकारों का लाभ उन्हें प्राप्त हो सकेगा। उनका विश्वास था कि धर्म परिवर्तन से सबसे बड़ा लाभ सामाजिक सम्मान और समानता के रूप में प्राप्त होगा।

उनके विचारों का समालोचनात्मक अध्ययन यह दर्शाता है कि धर्मांतरण उनके लिए केवल धार्मिक या आध्यात्मिक प्रश्न नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा से जुड़ा एक नैतिक एवं राजनीतिक कार्य था। वे इसे जातिगत अपमान और असमानता के विरुद्ध एक सशक्त प्रतिरोध के रूप में देखते थे। किंतु इसके साथ ही वे धर्मांतरण के व्यापक सांस्कृतिक और राष्ट्रीय प्रभावों के प्रति भी सजग थे। उनके अनुसार धर्म परिवर्तन सामाजिक परिस्थितियों और पहचान को बदल देता है, और यही विचार वर्तमान आरक्षण विमर्श में भी प्रासंगिक हो उठता है।

डॉ. अम्बेडकर की वैचारिक दुविधा

जब डॉ. अम्बेडकर ने दलितों से हिंदू धर्म छोड़ने का आह्वान किया, तब स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठा कि उन्हें कौन-सा धर्म अपनाना चाहिए। उन्होंने इस संदर्भ में इस्लाम, ईसाई धर्म, सिख धर्म और बौद्ध धर्म का गंभीर अध्ययन किया। प्रारंभिक चरण में उन्हें इस्लाम और ईसाई धर्म आकर्षक प्रतीत हुए, क्योंकि इन धर्मों के अनुयायियों के पास व्यापक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संसाधन उपलब्ध थे। इसके विपरीत सिख धर्म अपेक्षाकृत सीमित संसाधनों और क्षेत्रीय प्रभाव वाला था।

समय के साथ उनके विचारों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। दीर्घ अध्ययन और चिंतन के उपरांत उन्होंने 1956 में बौद्ध धर्म को अपनाया। उनका मानना था कि यदि दलित समुदाय बड़ी संख्या में इस्लाम या ईसाई धर्म ग्रहण करता है, तो वह भारतीय सांस्कृतिक एकता से दूर हो सकता है। उन्होंने इसे ‘राष्ट्रविहीनता’ (Denationalisation) के संभावित खतरे के रूप में देखा।

डॉ. अम्बेडकर ने अपनी प्रसिद्ध कृति *पाकिस्तान आर दि पार्टीशन ऑफ़ इंडिया(Pakistan or the Partition of India) में इस्लाम और भारतीय समाज के संबंधों पर विस्तार से विचार किया। उनका मत था कि इस्लाम जहाँ मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करता है, वहीं मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच एक स्पष्ट विभाजन भी निर्मित करता है। उन्होंने यह भी लिखा कि इस्लामी भ्रातृत्व सार्वभौमिक मानव-भ्रातृत्व नहीं, बल्कि मुख्यतः मुसलमानों तक सीमित है।

ईसाई धर्म के संबंध में उनका दृष्टिकोण अपेक्षाकृत संतुलित था। उन्होंने ईसा मसीह की शिक्षाओं की प्रशंसा की, किंतु साथ ही यह भी कहा कि ईसाई मिशनरियों को धर्मांतरण तक सीमित न रहकर ईसाई समुदायों के राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों की रक्षा के लिए भी सक्रिय होना चाहिए।

भारतीयता और धर्मांतरण

डॉ. अम्बेडकर के चिंतन में सामाजिक मुक्ति और सांस्कृतिक निरंतरता, दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण थे। वे चाहते थे कि दलित समुदाय जातिगत उत्पीड़न से मुक्त हो, किंतु साथ ही भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत से उसका संबंध भी बना रहे। उनके अनुसार यदि दलित समुदाय इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार करता है, तो वह केवल हिंदू धर्म ही नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से भी दूर हो सकता है।

इसी कारण 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर स्थित दीक्षाभूमि में उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया। उनके लिए बौद्ध धर्म सामाजिक समानता, तर्कशीलता, नैतिकता और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता था। यह जाति व्यवस्था का प्रतिरोध करता था, किंतु भारतीय सभ्यतागत परंपरा से विच्छेद भी उत्पन्न नहीं करता था।

आरक्षण संबंधी बहस पर इसके निहितार्थ

डॉ. अम्बेडकर की वैचारिक यात्रा यह दर्शाती है कि वे एक ओर जातिगत उत्पीड़न से मुक्ति के पक्षधर थे, तो दूसरी ओर भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता के संरक्षण को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे। उनके अनुसार आरक्षण सामाजिक न्याय का उपकरण है, न कि धार्मिक पहचान के आधार पर प्रदान किया जाने वाला विशेषाधिकार।

उनका न्यायबोध वितरणात्मक और अनुपातिक था। वे मानते थे कि आरक्षण का उद्देश्य उन ऐतिहासिक अन्यायों का परिमार्जन करना है जो जाति व्यवस्था के कारण उत्पन्न हुए। इसलिए इसकी मूल भावना सामाजिक पुनर्संतुलन और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, न कि इसे स्थायी अथवा सार्वभौमिक अधिकार के रूप में देखा जाए।

इस प्रकार डॉ. अम्बेडकर की वैचारिक विरासत यह संकेत देती है कि आरक्षण की अवधारणा को उसके मूल ऐतिहासिक और संवैधानिक उद्देश्यों के आलोक में समझा जाना चाहिए। उनके विचार स्पष्टता, सीमितता और उद्देश्यपरकता पर बल देते हैं, न कि विस्तार की निरंतरता पर।

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