Breaking News :

nothing found

मृगतृष्णा (लघुकथा)

गौरी तिवारी 

 

“माँ, ये देखिए, मैंने एक कविता लिखी है आपके लिए।”
“दिखाई नहीं दे रहा? हम किसी से फोन पर बात कर रहे हैं!”

अपनी माँ के इस रूखे व्यवहार से संजना की आँखें नम हो जाती हैं, किंतु बिना कुछ कहे वह कमरे के एक कोने में जाकर बैठ जाती है। कुछ देर बाद कोई धीरे से दरवाजा खटखटाता है, सरला उस आवाज़ को अनसुना कर देती है, इसलिए संजना ही जाकर दरवाज़ा खोलती है। तभी संजय पसीने से लथपथ कमरे में प्रवेश करता है।
“पापा, आज फिर आप इतनी दूर से पैदल आए?”
“अरे बेटा, आज मौसम बड़ा अच्छा था, सोचा पैदल ही चले आयें।”

यह सुनते ही सरला व्यंग्य से भर उठती है, “सारी ज़िंदगी इसी गरीबी में कट जाएगी! इस एक कमरे के घर से कब छुटकारा मिलेगा, जो शुरू होते ही खत्म हो जाता है?”
तभी अचानक से बिजली चली जाती है, और सरला के तानों का वार फिर शुरू हो जाता है, इनवर्टर, बड़े घर से लेकर ए.सी. और बड़ी टी.वी. तक सबकी आकांक्षाएं व्यक्त करने लगती है और कहती है कि कहां एक ओर पड़ोसियों के घर में सारी सुविधाएं हैं और कहां इनके घर में एक इनवर्टर तक नहीं। संजय शांत रहा। वह जानता था कि सरला के मन में अभाव से अधिक आकांक्षाओं का बोझ था। उसे लगता था कि धन ही जीवन का सबसे बड़ा सुख है। पड़ोसियों के बड़े मकान, रिश्तेदारों की गाड़ियाँ और वैभवपूर्ण जीवन देखकर वह अक्सर अपने भाग्य को कोसती रहती थी।

सबके भोजन करने के पश्चात सरला रात में देर तक इन्हीं विचारों में डूबी रही और कब सो गई, उसे पता ही नहीं चला।

स्वप्न में उसने स्वयं को एक भव्य महलनुमा भवन में पाया। संगमरमर की चमकती फर्श, ऊँची छतों से लटकते झूमर, दूर-दूर तक फैले आलीशान कक्ष और उसकी सेवा में तत्पर अनेक नौकर। उसके पास धन की कोई कमी नहीं थी। उसके एक संकेत पर लोग दौड़े चले आते थे।

पहले सरला को लगा कि उसकी सारी इच्छाएँ पूरी हो गई हैं। वह प्रसन्न होकर एक कक्ष से दूसरे कक्ष तक घूमती रही। किंतु कुछ ही देर बाद उसे एक अजीब-सी रिक्तता महसूस होने लगी।

उसने पुकारा, “संजना!”
कोई उत्तर नहीं मिला।
उसने फिर आवाज़ लगाई, “संजय!”
सन्नाटा।
चारों ओर केवल उसकी अपनी आवाज़ की प्रतिध्वनि गूँज रही थी।
वह एक कमरे से दूसरे कमरे तक भागी। विशाल भोजन-कक्ष में सोने-चाँदी के बर्तन सजे थे, पर उसके साथ भोजन करने वाला कोई नहीं था। बैठक में महँगे सोफे थे, किंतु उन पर बैठकर हँसने-बोलने वाला कोई अपना नहीं था। विशाल शयनकक्ष में अत्यंत मुलायम बिस्तर था, किंतु सिरहाने बैठकर उसका हाल पूछने वाला कोई नहीं था।
अचानक उसे लगा कि वह उस महल में नहीं, बल्कि एक सुनहरे पिंजरे में कैद है।
उसने घबराकर फिर पुकारा, “संजना…! संजय…!”
लेकिन उत्तर में केवल निस्तब्धता थी।
अब उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने नौकरों से पूछा, “मेरे अपने लोग कहाँ हैं?”
एक वृद्ध नौकर बोला, “मालकिन, धन कमाने और सुख खोजने की दौड़ में वे बहुत पीछे छूट गए। अब इस घर में केवल वैभव है, सदस्य नहीं।”
यह सुनते ही सरला का हृदय काँप उठा। उसी क्षण उसे लगा जैसे महल की दीवारें उसके ऊपर झुक रही हों। वह भयभीत होकर चीखी और रोने लगी तभी अचानक उसकी नींद खुल गई।
वह घबराहट के कारण पसीने से भीग गई थी । कमरे में हल्का अँधेरा था। उसकी दृष्टि सामने गई। संजय फर्श पर गहरी नींद में सो रहा था और संजना अपनी कॉपी सीने से लगाए माँ के पास ही सिमटी हुई थी।

सरला कुछ क्षण उन्हें निहारती रही। फिर उसने धीरे से बेटी के सिर पर हाथ फेर दिया। उसकी आँखों से अश्रुधारा छलक उठी।

सुबह जब संजना स्कूल जाने लगी तो सरला ने उसे प्यार से अपने पास बुलाया और कहा “बेटा, कल तुम मुझे कोई कविता दिखा रही थीं न? कहां है?”
संजना ने आश्चर्य से माँ की ओर देखा। बहुत समय बाद उसे माँ की आवाज़ में अपनापन सुनाई दिया ।
वहीं दूसरी ओर जब संजय काम पर जाने लगा तो सरला ने उसके हाथ में टिफिन देते हुए कहा, “अपना ध्यान रखिएगा।”
संजय मुस्करा उठा।

Read Previous

मोदी सरकार के 12 साल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular