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देवी और श्रृंखला की कड़ियां

गौरी तिवारी

 

 

मैं एक स्त्री हूं

हां, हां , मैं एक साधारण मनुष्य हूं

मत कहे ये समाज सम्मानित कर देवी

ना ही गिरा दे आसमान से कह कर दानवी

क्योंकि मैं भी एक हृदय हूं

हां, हां मैं भी एक जीवन हूं

यह सिर्फ काव्यात्मक पंक्तियां नहीं हैं, अपितु एक स्त्री के हृदय की वेदना है। वह वेदना जिसे ना जाने कितने वर्षों से अनसुना किया जा रहा है। हम हर वर्ष चैत्र और शरद नवरात्रि के नाम पर देवी की उपासना करते हैं, उपवास रखते हैं, अष्टमी नवमी के दिन 9 कन्याओं को सिद्धिदात्री का स्वरूप मानकर पूजते हैं। लेकिन जब प्रश्न उठता है कि क्या कन्याएं सिर्फ 9 दिन के लिए देवी का स्वरूप लेती हैं? कन्यापूजन की परंपरा क्या सिर्फ तथाकथित संभ्रांत परिवार के लिए होती है या क्या सिद्धिदात्री का स्वरूप उन्हें अपने वर्ग की ही कन्याओं में दिखाई देता है?? क्या झुग्गी या फुटपाथ पर रहने वाली बालिकाओं में किसी देवी का वास नहीं रहता? या उन्होंने भी वर्ग के नाम पर कन्याओं के साथ भेद भाव किया है?? क्या देवी मानकर उपासना करने की श्रेणी में सिर्फ नौ से ग्यारह साल की की बालिकाएं आती हैं या फिर स्त्री देवी स्वरूपा नहीं होती?? तब इन सवालों के जवाब में एक पंक्ति में तर्कों की बौछारें कर दी जाती हैं। यह भी देखा जा सकता है कि जब तक एक स्त्री अपने सारे सपने में त्यागकर निःस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करती है बिना अपने बारे में सोचे तब तक यह समाज उपयोग देवी की उपाधि देता है अन्यथा वही स्त्री गलती से भी एक बार अपने बारे में सोच ले तब यही समाज देवी से दानवी की उपाधि देने में देर नहीं लगाता। असल में यह समाज के एक वर्ग द्वारा किया गया छलावा है जिसका कारण महिलाओं को आदर्श बनने की स्थिति में बंधन में मजबूर किया जाता है। यह पुरुषवादी विचारधारकों की वह चाल है जिसमें वह अपनी सत्ता में स्त्री का दमन करना चाहते हैं।  सत्ता केवल सिंहासन पर बैठी हुई कोई कठोर आकृति नहीं होती, वह एक अदृश्य धागे की तरह समाज के हर कोने में बुनी होती है—विचारों में, परंपराओं में, भाषा में, और व्यवहार में। जब हम “स्त्री और सत्ता” की बात करते हैं, तो यह प्रश्न मात्र राजनीतिक भागीदारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उस व्यापक संरचना को समझने का प्रयास है जिसमें स्त्री का अस्तित्व और उसकी आवाज़ आकार लेती है। यह विषय एक नदी की तरह है—कभी शांत, कभी उग्र, और कभी अपने मार्ग को स्वयं बनाती हुई। प्राचीन काल में स्त्री की स्थिति को देखें तो एक द्वंद्व स्पष्ट दिखाई देता है। एक ओर वह “शक्ति” के रूप में पूजित थी—दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी—जिन्हें सृष्टि की आधारशिला माना गया; वहीं दूसरी ओर सामाजिक जीवन में उसे सीमाओं के भीतर बाँध दिया गया। यह विरोधाभास ही “स्त्री और सत्ता” का पहला अध्याय है—जहाँ सम्मान और नियंत्रण साथ-साथ चलते हैं। स्त्री को शक्ति का प्रतीक तो बनाया गया, पर वास्तविक सत्ता से दूर रखा गया। जैसे किसी को आकाश दिखाकर उसके पंख बाँध दिए जाएँ। मध्यकाल आते-आते यह स्थिति और जटिल हो जाती है। पितृसत्तात्मक संरचना ने स्त्री को घरेलू दायरे तक सीमित कर दिया। उसका जीवन “मर्यादा” और “सम्मान” के नाम पर नियंत्रित होने लगा। यहाँ सत्ता केवल राजनीतिक नहीं थी, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी थी। स्त्री के निर्णय लेने की क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाया गया, और उसे एक “आदर्श” के साँचे में ढालने की कोशिश की गई। यह आदर्श अक्सर त्याग, सहनशीलता और मौन का पर्याय बन गया। लेकिन इसी मौन के भीतर एक धीमी आग भी जलती रही—जो समय आने पर ज्वाला बनकर फूटने वाली थी।

महादेवी वर्मा के अनुसार, प्रायः जो वस्तु लौकिक साधारण वस्तुओं से अधिक सौंदर्य सुकुमार होती है उसे या तो मनुष्य अलौकिक और दिव्य की पंक्ति में बैठकर पूजाई समझने लगता है या फिर तुच्छ समझी जाकर उपेक्षा और अवहेलना की भाजन बनती है। बड़ी ही विडम्बना से भारतीय नारी को दोनों ही अवस्थाओं का पूर्ण अनुभव हो चुका है। वह पवित्र देव मंदिर की अधिष्ठात्री देवी भी बन चुकी है और अपने ग्रह के मलिन कोने की बंदिनी भी। कभी जिन गुणों के कारण उसे समाज में सम्मान और अतुल श्रद्धा मिली, जब प्रकारांतर से वे ही त्रुटियों में गिने जाने लगे तब उसे उतनी ही मात्रा में अश्रद्धा और अनादर भी, जिसे स्त्री को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानकर स्वीकार करना पड़ा।
वैसे तो कहा जाता है कि हमें अपनी कमजोरी पर नहीं अपितु अपनी शक्ति पर ध्यान देना चाहिए अपनी चेतना जागृत करनी चाहिए किंतु मेरा मानना है कि समस्याओं का समाधान समस्या के ज्ञान में है इसलिए महादेवी वर्मा के निबंध संग्रह से श्रृंखला की बेड़ियों को समझने का प्रयास किया।

‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ शीर्षक ही अपने भीतर एक गहरा प्रतीकात्मक अर्थ समेटे हुए है। ‘श्रृंखला’ अर्थात बंधन, और ‘कड़ियाँ’ अर्थात वे छोटे-छोटे तत्व जो मिलकर एक बड़ी बेड़ी बनाते हैं। महादेवी वर्मा ने इस शीर्षक के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि स्त्री की पराधीनता किसी एक कारण का परिणाम नहीं, बल्कि अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और मानसिक बंधनों का सम्मिलित प्रभाव है। यह कृति इन कड़ियों को एक-एक करके पहचानने और उनके स्वरूप को उजागर करने का प्रयास करती है। महादेवी वर्मा के स्त्री-विमर्श की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह आक्रोश या विद्रोह की तीखी भाषा में नहीं, बल्कि संवेदना और तर्क के संतुलित स्वर में प्रस्तुत होता है। उनके लेखन में एक शांत, किंतु गहन प्रतिरोध दिखाई देता है—जैसे कोई नदी चट्टानों से टकराकर भी अपना मार्ग बना लेती है। वे स्त्री की स्थिति को केवल बाहरी दृष्टि से नहीं देखतीं, बल्कि उसके भीतर उतरकर उसकी अनुभूतियों को शब्द देती हैं। उनके लिए स्त्री केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और स्वतंत्र व्यक्तित्व है। इस कृति में महादेवी वर्मा ने स्त्री की पराधीनता के विभिन्न आयामों को उजागर किया है। वे बताती हैं कि किस प्रकार बचपन से ही स्त्री को सीमाओं में बाँध दिया जाता है। उसके लिए आचरण के नियम तय कर दिए जाते हैं, उसकी इच्छाओं को नियंत्रित किया जाता है, और उसे यह सिखाया जाता है कि उसका अस्तित्व दूसरों के लिए है। यह प्रक्रिया इतनी सूक्ष्म और गहरी होती है कि स्त्री स्वयं भी इसे अपनी नियति मानने लगती है। यही वह ‘श्रृंखला’ है, जिसकी कड़ियाँ अदृश्य होते हुए भी अत्यंत मजबूत होती हैं।

स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि किसी और की परिधि में परिभाषित किया गया है—कभी वह किसी की बेटी है, कभी पत्नी, कभी माँ; पर ‘स्वयं’ के रूप में उसका परिचय धुंधला कर दिया गया है। यह स्थिति किसी छाया की तरह है—जो हमेशा किसी वस्तु के साथ रहती है, पर स्वयं कभी प्रकाश का केंद्र नहीं बन पाती। स्त्री की यह छायात्मक उपस्थिति ही उसकी सबसे बड़ी समस्या है।

दूसरी महत्वपूर्ण समस्या है—शिक्षा और चेतना का अभाव, स्त्री को जानबूझकर ज्ञान से दूर रखा गया, ताकि वह प्रश्न न कर सके। उसे परंपराओं को मानने की शिक्षा दी गई, पर उन्हें समझने या चुनौती देने का अवसर नहीं दिया गया। यह स्थिति किसी बंद खिड़की वाले घर की तरह है—जहाँ प्रकाश का प्रवेश वर्जित हो, और भीतर का अंधकार धीरे-धीरे सामान्य लगने लगे। शिक्षा के अभाव ने स्त्री को न केवल निर्भर बनाया, बल्कि उसके आत्मविश्वास को भी सीमित कर दिया।

महादेवी वर्मा विवाह को एक सामाजिक आवश्यकता के रूप में स्वीकार करती हैं, पर उसके भीतर छिपे असंतुलन को उजागर करने से नहीं हिचकतीं। वे दिखाती हैं कि कैसे विवाह स्त्री के लिए एक ऐसा अनुबंध बन जाता है, जिसमें उसके अधिकार कम और कर्तव्य अधिक होते हैं। वह अपने सपनों, आकांक्षाओं और स्वतंत्रता को त्यागकर एक निर्धारित भूमिका निभाने को बाध्य होती है। यह स्थिति किसी पिंजरे में बंद उस पक्षी की तरह है, जिसे उड़ने की क्षमता तो है, पर आकाश तक पहुँचने का मार्ग नहीं।

जब तक स्त्री आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं होती, तब तक उसकी स्वतंत्रता अधूरी रहती है। महादेवी वर्मा इस तथ्य को बड़ी स्पष्टता से प्रस्तुत करती हैं कि आर्थिक निर्भरता स्त्री को निर्णय लेने की शक्ति से वंचित कर देती है। वह अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाती है, और यही निर्भरता उसकी आवाज़ को दबा देती है। इन समस्याओं के साथ-साथ महादेवी वर्मा एक और सूक्ष्म परंतु गहरी समस्या की ओर संकेत करती हैं—*मानसिक दासता*। यह वह स्थिति है, जहाँ स्त्री स्वयं अपने बंधनों को स्वीकार कर लेती है और उन्हें अपनी नियति मान लेती है। यह दासता बाहरी बंधनों से अधिक खतरनाक है, क्योंकि यह भीतर से उत्पन्न होती है। जब मन ही बंधन को स्वाभाविक मान ले, तो मुक्ति का विचार भी दुर्लभ हो जाता है।

किन्तु महादेवी वर्मा केवल समस्याओं का चित्रण नहीं करतीं; वे समाधान की एक सशक्त और संतुलित दिशा भी प्रस्तुत करती हैं। सबसे महत्वपूर्ण समाधान है—आत्मबोध। वे मानती हैं कि जब तक स्त्री स्वयं अपने अस्तित्व को नहीं पहचानेगी, तब तक कोई बाहरी परिवर्तन स्थायी नहीं हो सकता। आत्मबोध वह दीपक है, जो भीतर जलता है और अंधकार को दूर करता है। यह वह क्षण है, जब स्त्री स्वयं से प्रश्न करती है—“मैं कौन हूँ?”—और इस प्रश्न का उत्तर ही उसकी मुक्ति का मार्ग बन जाता है।

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One Comment

  • जय सेवा जोहार 🙏
    गौरी जी,
    बहुत बढ़िया लेखन👍

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