अनिल तिवारी
ऋषि मार्कंडेय ने दुर्गा सप्तशती के पांचवें अध्याय में कहा है, ‘या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता’। और अगली पंक्ति में नमस्तस्यै,नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमो नमः कहकर मां को बार-बार प्रणाम किया है।
मां सभी दृश्य और अदृश्य की जननी है। माँ प्रत्येक जीव की आदि-अनादि अनुभूति है। माँ की देह का विस्तार ही हम सबकी काया है। हम सबका अस्तित्व माँ के कारण ही है। माँ न होती तो हम न होते। माँ स्वाभाविक ही दिव्य हैं, देवी हैं, पूज्य हैं, वरेण्य हैं, हरदम याद रखने और आराधन के योग्य हैं। सभी लोक, वनस्पति जगत्, कीट, पतंग और समस्त प्राणी माँ का विस्तार हैं।
नवरात्र के नौ दिनों में मां के नौ रूपों की प्रतिष्ठा है। पहले दिन शैलपुत्री। शैल का अर्थ है हिमालय और हिमालय के यहां जन्म लेने के कारण ही इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। इनका वाहन बैल है इसलिए इन्हें वृषभारुढ़ा के नाम से भी पुकारा जाता है। कथा है कि सती के पिता प्रजापति दक्ष यज्ञ मे अपनी पुत्री सती और दामाद शिव को आमंत्रित नहीं किया, लेकिन सती अपने पति शंकर की इच्छा के विपरीत उस यज्ञ में शामिल हुई। वहां पति के तिरस्कार से क्रोधित होकर योगाग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया। अगले जन्म में हिमालय की पुत्री के रूप में वे शैलपुत्री कहलाईं। शिव को प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्य रहकर शैलपुत्री ने कठिन तप किया, इसलिए दूसरे दिन इनके ब्रह्मचारिणी रूप की आराधना की जाती है। नवरात्र के तीसरे दिन चंद्रघंटा देवी के बंदन, पूजन और स्तवन का विधान है। देवी ने ब्रह्मांड की रचना की इसलिए चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है। मां के पुत्र कार्तिकेय का एक नाम स्कंद शिव भी है इसलिए पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा स्वाभाविक रूप से होती है। छठवें दिन धर्म अर्थ काम और मोक्ष चार पुरुषार्थ की प्राप्ति के लिए मां कात्यायनी के रूप का स्मरण किया जाता है।
सातवें दिन साधक कालरात्रि की अर्चना योग के साथ करते हैं। शिव को प्राप्त करने के लिए देवी ने लगातार कठिन तप किया जिसके कारण उनका रंग काला पड़ गया था। कथा है कि भगवान शिव ने इन्हें गौर वर्ण का बना दिया था इसलिए आठवें दिन मां महागौरी के रूप में इनकी पूजा होती है। नवरात्र के नौवे दिन दुर्गा जी के नवे स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा और अर्चना का विधान है। कहते हैं कि भगवान शिव ने भी देवी की कठिन तपस्या कर इनसे सभी सिद्धियां प्राप्त की थी। देवी की कृपा से ही महादेव की आधी देह देवी की हो गई थी, और वह अर्धनारीश्वर कहलाए।
कहने का तात्पर्य है कि मां ही सब कुछ है इसलिए विभिन्न रूपों में केवल और केवल मां की महत्ता है। माँ का रस, रक्त और पोषण ही प्रत्येक जीव का मूलाधार है। पृथ्वी भी वैसी है। उसके अंगभूतों से सभी जीव निर्मित हैं, वही मूल है, वही आधार है। इस पर रहना, कर्म करना, कर्मफल पाना और अंततः इसी की गोद में जाना सतत प्रवाही जीवनक्रम है। ऋग्वेद के ऋषियों के लिए पृथ्वी माता है। यह माता पृथ्वी धारक है। पर्वतों को धारण करती है, मेघों को प्रेरित करती है। वर्षा के जल से अपने अंतस् ओज से वनस्पतियां धारण करती है। ऋग्वेद में रात्रि भी एक देवी है वे अविनाशी – अमर्त्या हैं, वे आकाश पुत्री हैं, पहले अंतरिक्ष को और बाद में निचले-ऊंचे क्षेत्रों को आच्छादित करती हैं। उनके आगमन पर हम सब गौ, अश्वादि और पशु-पक्षी भी विश्राम करते हैं।
विकासवादी सिध्दांत के अनुसार माँ की उपासना (स्त्रीलिंग आराधना) अतिप्राचीन है। वे इसका कारण समाज की मातृसत्तात्मक व्यवस्था बताते हैं। सृष्टि का विकास जल से हुआ। यूनानी दार्शनिक थेल्स भी ऐसा ही मानते थे। ऋग्वेद में भी इसी धारणा के साक्ष्य हैं। प्रकृति एक सुसंगत संविधान में चलती है। ऋग्वेद में इसका नाम ‘ऋत’ है। अधिकांश विश्वदर्शन में जल सृष्टि का आदि तत्व है। स्वाभाविक ही जल की पूजा और उपासना भी प्राचीन होनी चाहिए। ऋग्वेद में ‘जल माताएं’ आपः मातरम् हैं और देवियां हैं। ऋग्वेद के अपो देवीः और आपों मातरः मातृसत्तात्मक समाज की देन हैं। उन्हें बहुवचन रूप में याद किया गया है। सामाजिक विकास क्रम में मातृ सत्तात्मक से आई देवी पूजा व्यवस्था प्राचीन है, पितृसत्तात्मक व्यवस्था से आये देवता उसके बाद के हैं। संसार के प्रत्येक जड़ चेतन को जन्म देने वाली यही माताएं हैं, ‘विश्वस्य स्थातुर्जगतो जनित्रीः’। ऋग्वेद के बड़े प्रभावशाली देवता हैं अग्नि। इन्हें भी माताओं ने जन्म दिया है,’तमापो अग्निं जनयन्त मातरः।’ सविता ऋग्वेद के एक अन्य प्रभावशाली देवता है। इनकी भी स्तुति अपां नपातम् कहकर की गई है।
ऋग्वेद अथर्ववेद में अदिति भी देवी है। आदित्य-सूर्य उनके पुत्र हैं। यहां अदिति माता-पिता हैं और अदिति ही पुत्र भी हैं। अदिति जैसा देव प्रतीक (या देवी) विश्व की किसी भी संस्कृति में नहीं है जो कुछ हो चुका – भूत और जो आगे होगा भविष्य वह सब अदिति हैं। अदिति प्रख्यात दार्शनिक अनाक्सिमैंडर की अनंत सत्ता हैं। ऋग्वेद में वाणी की देवी वाग्देवी हैं। वे रुद्र और वसुओं के साथ चलती हैं।
ऋग्वेद में ऊषा भी देवी हैं। सविता तेज हैं। सूर्य इस तेज की अभिव्यक्ति हैं और ऊषा सूर्योदय के पूर्व का सौंदर्य।
ऋषि फिर कहते हैं, ऊषा स्वर्ग की कन्या जैसी प्रकाश के वस्त्र धारण करके प्रतिदिन पूरब से वैसे ही आती हैं जैसे विदुषी नारी ऋत-नियम मार्ग से ही चलती है। ऊषा आनंदित करती हैं। वे देवी हैं, इसीलिए उनकी स्तुतियाँ हैं, वे सबको प्रकाश आनंद देती हैं। अपने पराए का भेद नहीं करतीं, छोटे से दूर नहीं होती, बड़े का त्याग नहीं करती। यहां समत्व दृष्टि की सीधी चर्चा है। ऊषा समद्रष्टा हैं।
भारत का लोकजीवन देवी उपासक है। वह सब तरफ माता ही देखता है। देवी उपासना काल से भी प्राचीन है। यहां पृथ्वी माता हैं ही। इडा, सरस्वती और मही भी माता हैं, ये ऋग्वेद में तीन देवियां कही गयी हैं – इडा, सरस्वती, मही तिस्रो देवीर्मयो भुव। ‘भारती को भारतीभिः’ कहकर बुलाया गया है – आ भारती भारतीभिः। यहां भारतीभिः भरतजनों की इष्ट हैं। फिर कहते हैं सजोषा इडा देवे मनुष्ये – इडा देवी मनुष्यों देवों के साथ यज्ञ अग्नि के समीप आयें और सरस्वती वाक्शक्ति के साथ पधारें। सरस्वती पहले नदी हैं, माता हैं। बाद में वे ज्ञान की देवी हैं, माता तब भी हैं। यज्ञ संस्कृति होने के कारण भारत कहने से अग्नि का बोध होने लगा – त्वं नो असि भारता अग्ने। मन की शासक देवी का नाम ‘मनीषा’ है। ऋग्वेद में श्रद्धा भी एक देवी हैं, श्रद्धा प्रातर्हवामहे, श्रद्धा मध्यंदिन परि, श्रद्धां सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह नः। यहां श्रद्धा जीवन और कर्म की शक्ति हैं, श्रद्धा से ही श्रद्धा की याचना में गहन भावबोध है। इस श्रद्धा का मतलब अंधविश्वास नहीं है। श्रद्धा विशेष प्रकार की दिव्य चित्त दशा है और प्रकृति की विभूतियों में शिखर है।
देवी उपासना प्रकृति की विराट शक्ति की ही उपासना है। मूर्ति, बिम्ब और प्रतीक नाम ढेर सारे हैं – दुर्गा, महाकाली, महासरस्वती, महालक्ष्मी या सिद्धिदात्री आदि कोई नाम भी दीजिए। देवी दिव्यता हैं। माँ हैं। सो पालक हैं। मेरे खुद की मां ने जिस तरह मुझे पाला पोसा है, जो मुझे दिया है, उससे मैं कभी भी उऋण नहीं हो सकता। देह के साथ मेरी मां अब नहीं है। मैं टूअर (बिन मां बाप के बच्चे) हो गया हूं।भारत स्वाभाविक ही नवरात्रि उत्सवों के दौरान मां उपासना में तल्लीन है। मैं भी उनकी स्मृतियों की शक्ति के सहारे मां के विभिन्न स्वरूपों की आराधना कर रहा हूं।
