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संवत्सरफल और समय की दिशा का संकेत

  

ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र

 

मानव जीवन केवल वर्तमान घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि समय, प्रकृति और चेतना के गहरे संबंधों का परिणाम है। भारतीय ज्योतिष परंपरा में संवत्सरफल इसी गूढ़ संबंध का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह केवल भविष्यवाणी नहीं करता, बल्कि समय की प्रवृत्ति, समाज की दिशा और मानव मन की स्थिति का भी संकेत देता है।

प्रस्तुत वर्ष के संदर्भ में ज्योतिषशास्त्र में वर्णित संवत्सरफल इस प्रकार है—

इस वर्ष के प्रारम्भ में ‘रौद्र’ नामक संवत्सर रहेगा। वैशाखकृष्ण नवमी शनिवार (11 अप्रैल 2026 ई.) को 40.44 इष्ट (रा. 10.03) पर ‘दुर्मति’ नामक संवत्सर का प्रवेश होगा, किन्तु संकल्पादि में वर्षपर्यन्त ‘रौद्र’ संवत्सर का ही विनियोग करना चाहिए। इस वर्ष राजा ‘गुरु’ तथा मन्त्री ‘मंगल’ हैं। राजा और मन्त्री में परस्पर मित्रता होने से शासक वर्ग, प्रजा तथा पशु-पक्षी आदि सुखी रहेंगे। व्यापारीवर्ग और सभी वर्गों के लिये यह वर्ष अच्छा रहेगा।

जगल्लंग्न के विचार से कर्कलग्न है तथा लग्नेश चन्द्रमा राहु के साथ अष्टमभाव में स्थित है जिससे अधिकतर लोगों की मानसिकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। जनता पर अपने कार्य का अधिक दबाव रहेगा। यह वर्ष अनेक समस्याओं को जन्म दे सकता है। इस्लामिक राष्ट्रों में आन्तरिक अशान्ति से बिखराव की स्थिति उत्पन्न होगी। भारत में स्त्री शासित प्रदेशों में विकास की स्थितियाँ बढ़ेंगी। मन्त्री पदस्थ मंगल कूटनीतियों की अनेक चाल चलने में दक्ष है। तदनुसार भारतीय प्रशासन आतंकवादी ताकतों के गुप्त निर्णयों को उदघाटित कर उजागर करेगा।

रुस, जापान, चीन, फिलीपिन्स द्वीप समूह, पूर्वी भारत एवं ऑस्ट्रेलिया आदि राष्ट्रों में पर्वत श्रृंखलाओं के विघटन से जनधन की हानि हो सकती है। विश्व व्यापार में परिवर्तन बनकर सुधार होने पर भी महँगाई की समस्यायें उभरी रहेंगी। वर्षलग्न के विचार से चतुर्ग्रही योग होने तथा द्वादशस्थ मंगल राहु के अंगारक योग से उग्रवाद व आतंकवादी गतिविधियों से विश्व में दुर्घटनायें तथा विस्फोटक सामग्री से जनधन की हानि होगी।

व्ययभाव में मंगल के होने से अनेक राष्ट्रों की सीमाओं पर सैन्य संघर्ष अथवा युद्ध से जन क्षति हो सकती है। नववर्ष प्रवेश की लग्न वृश्चिक है। लग्नेश राहु के साथ सुख भाव में है। अतः भारत के पड़ोसी देशों में आन्तरिक स्थिति विषम होगी। कहीं-कहीं तूफान, चक्रवात तथा किसी प्राकृतिक प्रकोप का सामना करना पड़ सकता है।

आर्द्रा प्रवेशांग के विचार से आद्रां प्रवेश लग्न मकर है। वर्षाकाल में सूर्य के आगे शुक्र गुरु एवं सूर्य के साथ बुध हैं। इसके प्रभाव से वर्षाकाल में अधिकांश भागों में वर्षा सामान्य होगी। कुछ भागों में शनि के प्रभाव से तेजवायु के साथ वर्षा होगी। कुण्डली में मंगल पंचम भाव में अग्नि तत्व है, अतः कुछ पश्चिमी भागों में वर्षा की कमी सम्भव है। उत्तर-दक्षिणी भागों में सामान्य से अधिक वर्षा होगी। वायव्यकोण में सूर्य बुध से अल्पवर्षण योग है। ईशानकोण में वर्षा अच्छी होगी। आग्नेय नैऋत्यकोण में वर्षा अच्छी होगी। उत्तर-दक्षिण में अधिक वर्षा के योग हैं।

शारदीयधान्य के विचार से शारदीय कुण्डली में कर्कलग्न लग्नेश कर्कभाव में पंचमेश मंगल के साथ हैं। सूर्य के आगे शुक्र एवं पीछे चन्द्रमा सूर्य बुध माथ हैं। अतः शारदीय फसल पर्याप्त होगी। अष्टम राहु की स्थिति से प्राकृतिक प्रकोप तथा रोग से फसल की कुछ भागों में कमी हो सकती है। ग्रीष्मकालीन धान्य के विचार से ग्रीष्म धान्योत्पत्ति में वृश्चिक लग्न है तथा सूर्य से द्वादश बुध है। इसके प्रभाववश ग्रीष्मकालीन फसल पर्याप्त होगी। लग्नेश मंगल तथा मन्त्री भी मंगल हैं। इसलिए लाल वस्तु की उत्पत्ति अच्छी होगी। मसूर, चना, गेहूं की फसल की अच्छी पैदावार होगी।

उपरोक्त संवत्सरफल का जब हम गहराई से विश्लेषण करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि यह वर्ष ‘संतुलन और असंतुलन के मध्य एक संक्रमणकाल का प्रतीक है।’ एक ओर शासन, व्यापार और कृषि के क्षेत्र में अनुकूलता के संकेत हैं, वहीं दूसरी ओर मानसिक दबाव, प्राकृतिक अस्थिरता और वैश्विक तनाव जैसी परिस्थितियाँ भी साथ-साथ चलने वाली हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह वर्ष विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। चन्द्रमा का राहु के साथ अष्टम भाव में होना यह दर्शाता है कि व्यक्ति के भीतर असुरक्षा, चिंता और भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। जब व्यक्ति का मन स्थिर नहीं होता, तब वह अपने निर्णयों में भी अस्थिर हो जाता है, और यही स्थिति समाज में व्यापक रूप से दिखाई देने लगती है।

सामाजिक स्तर पर यह संवत्सर हमें यह संकेत देता है कि केवल बाहरी व्यवस्था पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। यदि व्यक्ति अपने भीतर संतुलन स्थापित नहीं करता, तो बाहरी परिस्थितियाँ उसे और अधिक विचलित कर सकती हैं। इसलिये इस समय आत्मसंयम, धैर्य और विवेक की अत्यंत आवश्यकता है। प्राकृतिक दृष्टि से वर्षा का असमान वितरण, तूफान और अन्य प्रकोप यह स्पष्ट करते हैं कि प्रकृति भी संतुलन की मांग कर रही है। यह केवल ज्योतिषीय संकेत नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सत्य भी है कि जब मानव प्रकृति के नियमों की उपेक्षा करता है, तो प्रकृति अपने तरीके से संतुलन स्थापित करती है। आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ भी हमें यही सिखाती हैं कि स्थिरता केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि संतुलित नीतियों और नैतिक दृष्टिकोण से आती है। यदि समाज में सहयोग और सामूहिकता की भावना बनी रहती है, तो बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना भी सहज रूप से किया जा सकता है। अतः यह संवत्सर हमें यह संदेश देता है कि हमें अपने जीवन में संतुलन स्थापित करना होगा—
1.विचारों में संतुलन,2.व्यवहार में संतुलन और 3.समाज के प्रति उत्तरदायित्व में संतुलन। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस संवत्सरफल को केवल घटनाओं का पूर्वानुमान न मानें, बल्कि इसे एक जीवन-दर्शन के रूप में स्वीकार करें। यह हमें चेतावनी देता है, मार्गदर्शन देता है और साथ ही यह अवसर भी प्रदान करता है कि हम अपने जीवन को अधिक सार्थक और संतुलित बना सकें।

आवश्यक सूचना –
विद्वतजनों तथा सुधी पाठकजन आप सभी इस वर्ष के प्रारम्भ से ‘रौद्र’ संवत्सर का संकल्पादि में विनियोग करें, क्योंकि नियमानुसार ‘सिद्धार्थ’ संवत्सर का लोप हो रहा है। अतः आपसे निवेदन है कि संवत् 2083 के वर्षारम्भ से ही संकल्पादि में ‘रौद्र’ संवत्सर का ही वर्षपर्यन्त विनियोग करें।

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