बंगाल में फिर चलेगा ममता का जादू?

अल्पसंख्यकों के मोहल्ले से गुजरता है बंगाल की सत्ता का रास्ता 

अनिल तिवारी

 

इन दिनों फिल्म धुरंधर 2 के खलनायक का डायलॉग ‘दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर जाता है’ दर्शकों के सिर चढ़कर बोल रहा है। हालांकि बॉक्स ऑफिस के जरिए इस बोल से नैरेटिव गढ़ने, कमाई करने, अतिशयोक्ति परोसने का नीर-क्षीर विवेचन जानकार समालोचक कर रहे हैं लेकिन पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के टिकट बंटवारे से यह स्पष्ट हो गया है कि पश्चिम बंगाल की सत्ता की कुर्सी का रास्ता अल्पसंख्यकों के मोहल्ले से होकर गुजरता है। राज्य की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस बात को पहले से ही न सिर्फ समझा है बल्कि चुनाव दर चुनाव अपनी इस समझ को और मजबूत बनाया है। मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में भारतीय जनता पार्टी का उभार भी अल्पसंख्यक वर्ग को टीएमसी से जुड़ने तथा ममता को मजबूत बनाने में खाद पानी का ही काम किया है।
राज्य में 2026 के विधानसभा चुनाव के लिए टीएमसी मुखिया ममता बनर्जी ने अपनी गोलबंदी कर ली है। उन्हें पता है कि 294 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए एक 148 सीटें चाहिए। इनमें से करीब 75 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी इतनी अधिक है कि वहां मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा का जीतना नामुमकिन जैसा है। ऐसे में टीएमसी का सीधा गणित है 75 सीटें मुस्लिम वोटरों के दम पर पक्की करो और बाकी 75 सीट महिला वोटरों और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के जरिए हासिल कर लो। हालांकि ओवैसी और हुमायूं कबीर जैसे लोगों को आगे कर छिटपुट चुनौतियां खड़ी करने की रणनीति पहले भी बनती रही है लेकिन उनका असर पहले भी नहीं दिखा, अब भी कोई खास असर नजर नहीं आ रहा है।
अगर हम आंकड़ों को देखें तो मुस्लिम बहुल इलाकों में टीएमसी की जीत का स्ट्राइक रेट हैरान करने वाला है। 2011 और 2016 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोट कांग्रेस और टीएमसी के बीच बंटा था, फिर भी ममता को बढ़त मिली थी, लेकिन 2021 का चुनाव गेम चेंजर साबित हुआ। बीजेपी की आक्रामक लहर को देखते हुए बंगाल के मुसलमानो ने कांग्रेस और आईएसएफ को पूरी तरह से किनारे कर दिया। राज्य की करीब 85 सीटों पर जहां मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में हैं 75 सीटें टीएमसी ने जीत ली थी, जिसमें मुर्शिदाबाद की 22 में से 20, मालदा की 12 में से 8 उत्तर, दिनाजपुर में 9 में से 7, वीर भूमि की 11 में से 10 और दक्षिण 24 परगना की 31 में से 30 सीटें टीएमसी की झोली में चली गई थी। कांग्रेस पार्टी और वामपंथी दल सिरे से गायब हो गए थे। हालांकि बीजेपी कुछ सीट जीती थी लेकिन मुस्लिम इलाकों में भाजपा पूरी तरह से फेल हो गई थी।
अधिकांश जानकार मानते हैं की ममता बनर्जी के लिए बीजेपी का बंगाल में प्रमुख विपक्षी दल बना सियासी तौर पर बहुत फायदेमंद रहा है। जब जब बीजेपी ने जय श्री राम और एनआरसी का मुद्दा उठाया तो मुस्लिम वोटरों के पास ममता के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। वे और बड़ी तादाद में ममता की ओर खींचते चले गए। ममता बनर्जी ने भी बड़े जतन के साथ इस डर को बखूबी भुनाया। चुनाव आयोग द्वारा राज्य में चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान उनका एक बयान काफी वायरल हुआ था जिसमें वह कह रही हैं कि ‘हम हैं, इसलिए आप सब सुरक्षित हैं’। वह अपने विशेष मतदाताओं को साफ संदेश देती हैं कि अगर टीएमसी कमजोर हुई तो एनआरसी और सीएए जैसी तलवारे फिर से लटकने लगेंगी। राजनीतिक पंडित जानते हैं कि बीजेपी जितना अधिक ध्रुवीकरण की कोशिश करती है मुस्लिम मोटर उतनी ही मजबूती से ममता के पीछे एकजूट हो जाता है।
ममता बनर्जी ने यह सब कुछ पलक झपकते हासिल नहीं किया है। इसके लिए उन्होंने योजनाबद्ध लड़ाई लड़ी है। 2011 के पहले बंगाल का मुस्लिम वोटर मुख्य रूप से वामपंथियों और कांग्रेस के बीच बंटा हुआ था। ममता बनर्जी ने इसे दो हिस्सों में छीना। वर्ष 2011 के चुनाव से पहले ममता ने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को हथियार बनाया। उन्होंने बार-बार कहा कि 34 साल के वामपंथी राज में मुसलमान की हालत दलितों से भी बदतर हो गई है। वे धीरे-धीरे मुसलमान की आवाज बनी। फिर आया सिंगूर नंदीग्राम का घटनाक्रम। इन आंदोलनों में मारे गए या विस्थापित हुए लोगों में बड़ी संख्या में मुस्लिम किसान शामिल थे। उनके साथ वह खड़ी हुई और खुद को उनका रक्षक साबित किया। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस और लेफ्ट का कैडर धीरे-धीरे टीएमसी में शिफ्ट होता गया। उसके बाद मुस्लिम बहुल सीटें टीएमसी ने हथिया ली। इसमें ममता की नीतियों, बयानों और उनके रणनीतिक कौशल का भी योगदान रहा है।
ममता ने सिर्फ भाषण नहीं दिए उन्होंने जमीनी स्तर पर ऐसी योजनाएं लागू की जिससे मुसलमान का सीधा जुड़ाव पैदा हुआ। 2012 में इमामों के लिए मासिक भत्ते की शुरुआत करना एक बड़ा टर्निंग पॉइंट था। हालांकि इस पर काफी विवाद हुआ लेकिन इसने मुसलमान के मजहबी नेतृत्व के बीच ममता की साख बहुत पक्की कर दी। इतना ही नहीं उन्होंने मदरसा आधुनिकीकरण का कार्यक्रम भी शुरू किया और छात्रवृत्ति एकलव्य श्री जैसी स्कॉलरशिप और कन्याश्री का लाभ मुस्लिम लड़कियों तक जमकर पहुंचाया। इस बार भी चुनाव में जाने से पहले ममता बनर्जी ने अपने अंतरिम बजट में माइनॉरिटी अफेयर्स के नाम पर 5713 करोड रुपए आवंटित किए हैं। इससे मुस्लिम समाज के भीतर एक नया मध्य वर्ग तैयार हुआ है जो टीएमसी का कट्टर समर्थक माना जाता है।
बताते चलें की ममता का सिर पर पल्लू रखकर इफ्तार पार्टियों में जाना या मंच से दुआएं पढ़ना महज इवेंट नहीं था। यह उस समुदाय को सम्मान देने का तरीका था जिसे बीजेपी तुष्टीकरण रहती है। मुस्लिम वोटर को लगा की पहली बार कोई मुख्यमंत्री उनके रिवाज को खुलकर अपना रही है। कई मौके ऐसे आए जब हिंदू मुस्लिम त्योहार पर सांप्रदायिक तनाव पैदा हुए। ऐसे समय में ममता पर भले आरोप लगे हो कि उन्होंने मुस्लिम पक्ष की तरफ झुकाव रखा लेकिन इससे ना उन्होंने कोई परहेज किया न ही उन पर कोई फर्क पड़ा।
कांग्रेस, वामपंथी दल ममता बनर्जी पर तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए आलोचना कर रहे हैं। भाजपा लगातार छाती पीट रही है। लेकिन टीएमसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। बंगाल चुनाव में मुस्लिम फैक्टर लंबे समय से टीएमसी के लिए ट्रंप कार्ड बना हुआ है और इस बार भी उसकी कोई बड़ी काट अभी दिखाई नहीं देती। इस बार यहां इसलिए भी दिलचस्प हो गया है क्योंकि बीजेपी के खिलाफ मुस्लिम वोट बैंक पॉलिटिक्स देश भर में असर को बैठी है सिवाय पश्चिम बंगाल के। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि वर्ष 2011 से ही इस सूबे की सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी ने ऐसा जादू चलाया है कि उन्हें बहुमत के लिए राज्य की महज 25 प्रतिशत सीटों पर ही मेहनत करनी पड़ती है, बाकी 25 प्रतिशत सीटें अपने आप उनके झोली में आ गिरती है। मालूम हो कि बंगाल में मुसलमानों की आबादी 27 प्रतिशत से अधिक है।
ममता बनर्जी ने पिछले 15 सालों में मुस्लिम राजनीति को वोट की राजनीति से बदलकर अस्तित्व की लड़ाई बना दी है। आज बंगाल में बीजेपी के खिलाफ मुस्लिम वोट बैंक एक ऐसी दीवार की तरह खड़ा है जिसे ढहाना फिलहाल किसी भी विपक्षी दल के लिए मुमकिन नहीं दिखता है। 2026 के लिए ममता की राह इसी मुस्लिम किलेबंदी के भरोसे औरों की तुलना में अधिक आसान नजर आती है। टिकटों के बंटवारे से भी यह स्पष्ट होता है कि ममता अपने बनाए हुए मार्ग पर ही आगे बढ़ रही हैं।
हालांकि चुनाव अंतिम तौर पर मतदाताओं का निर्णय होता है। मतदाता किसे फर्श से अर्श पर या अर्श से फर्श पर बिठा दें पहले से नहीं कहा जा सकता, लेकिन दुनिया के नक्शे के कई हिस्सों में जारी जंग के कारण मची उथल-पुथल, आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की आपूर्ति बाधित होने,महंगाई की आशंका आदि के असर की भी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

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