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कलम के जादूगर (प्रेमचंद की पुण्यतिथि पर विशेष)

बूढ़ी काकी और पंच परमेश्वर जैसी लगभग 300 कहानियां लिखने वाले कलम के जादूगर प्रेमचंद हिन्दी के ऐसे यथार्थवादी मूर्धन्य कथाकार हैं जिनके नाम पर हिन्दी कहानी के युगों का नामकरण किया गया है। वे अपने साहित्य में काल्पनिक चीज़ों की जगह सामाजिक सरोकारों जैसे सामाजिक रूढ़ियां, समाज में स्त्री की स्थिति, किसान, श्रमिक जीवन इत्यादि को सर्वोपरि रखते थे जिससे कि पाठक के मन में बौद्धिक हलचल पैदा हो। 1936 में भारत में प्रेमचंद की अध्यक्षता में जिस ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की नींव रखी गई, उसकी सभा में उन्होंने साहित्य के उद्देश्य पर बात करते हुए साहित्य का वास्तविक अर्थ भी बताया। वे साहित्यकार को समाज का सजग और संवेदनशील प्रवेक्षक मानते थे। उनके अनुसार लेखक का कार्य सिर्फ घटनाओं का वर्णन करना नहीं है अपितु उसके पीछे मानवीय पीड़ा और सामाजिक विडंबना को सामने लाना है और इसी प्रकार उन्होंने साहित्य का उद्देश्य सिर्फ आनंद को न मानकर उसका उद्देश्य समाज की समस्याओं को सामने लाना, उसका करना और निष्कर्ष निकालना माना। प्रेमचंद का मानना था कि साहित्य मानव जीवन से निकलता है और मानव जीवन को ही प्रभावित भी करता है।

उस भारत को जो इतिहास के पृष्ठों पर भले ही बहुत कम दिखाई देता हो, किंतु खेतों, कच्ची झोपड़ियों, गाँव की पगडंडियों, शहर की तंग गलियों और अभावग्रस्त मनुष्यों के जीवन में रोज़ दिखाई देता था अपनी रचनाओं का विषय बनाने वाले प्रेमचंद, 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही गाँव में जन्मे थे। उनका वास्तविक नाम धनपत राय था जिन्हें बाद में साहित्य-जगत ने मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना। वे हिंदी और उर्दू कथा-साहित्य के ऐसे अप्रतिम रचनाकार थे, जिन्होंने भारतीय समाज को उसकी समूची जटिलता, पीड़ा, संघर्ष और मानवीय आकांक्षाओं के साथ साहित्य में प्रतिष्ठित किया। 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हुआ, किंतु उनके जाने के बाद भी उनकी रचनाएं जीवित हैं अमर है क्योंकि उनकी कहानियों की प्रासंगिकता एक आशावादी नजरिया लिए है तथा उनकी रचना अपने समय से आगे निकलकर आने वाली पीढ़ियों के प्रश्नों को स्वर देती रही है। प्रेमचंद ऐसे समय में साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हुए, जब भारत राजनीतिक दासता, सामाजिक विषमता और आर्थिक शोषण से जूझ रहा था। औपनिवेशिक शासन की कठोरता, जमींदारी व्यवस्था, ग्रामीण निर्धनता, जातिगत विभाजन, स्त्री की पराधीनता और रूढ़ सामाजिक संरचनाएँ भारतीय जनजीवन को भीतर तक प्रभावित कर रही थीं। प्रेमचंद ने इन प्रश्नों को किसी बाहरी दृष्टा की तरह नहीं देखा। उन्होंने इन्हें अपने साहित्य के जीवित अनुभव में रूपांतरित किया। वे अपनी रचनाओं के पात्रों के माध्यम से किसी व्यक्तिविशेष की जगह समूचे वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज़ कहलाता है।

प्रेमचंद की भाषा भी उनके साहित्य की शक्ति है। उन्होंने साहित्यिक भाषा को जीवन से जोड़ा। उनकी भाषा न तो कृत्रिम अलंकारों के बोझ से दबती है और न ही सामान्य जीवन से इतनी दूर जाती है कि पाठक उससे अपना संबंध स्थापित न कर सके। सहजता, प्रवाह, मुहावरेदारी और प्रसंगानुकूलता उनकी भाषा की प्रमुख विशेषताएँ हैं। गाँव, शहर, किसान, व्यापारी, अधिकारी और सामान्य जन, सभी अपने सामाजिक परिवेश के अनुरूप बोलते हैं। इसीलिए उनकी भाषा पढ़ते हुए लगता है कि साहित्य किसी दूरस्थ संसार का वर्णन नहीं कर रहा, बल्कि हमारे आसपास का जीवन स्वयं शब्दों में उतर आया है। जहां एक ओर उनकी कहानी बूढ़ी काकी उन मार्मिक रचनाओं में से एक है, जहाँ वृद्धावस्था, उपेक्षा और पारिवारिक संवेदना के प्रश्न के माध्यम से मनुष्य की वास्तविक पहचान को परखा गया है। कहानी का पात्र बूढ़ी काकी सिर्फ एक वृद्ध स्त्री नहीं, अपितु उस असहाय मनुष्य का प्रतीक हैं, जिसे परिवार उसकी उपयोगिता समाप्त होते ही लगभग विस्मृत कर देता है। उनकी भूख केवल अन्न की भूख नहीं, बल्कि स्नेह, सम्मान, अपनत्व और मानवीय गरिमा की भूख है। वहीं दूसरी ओर उनकी कहानी पंच परमेश्वर के माध्यम से प्रेमचंद ने न्याय के महत्व को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया है। वे अलगू चौधरी और जुम्मन शेख दोनों के माध्यम से यह सिद्ध करते हैं कि सच्चा न्याय व्यक्ति की निजी भावनाओं का अनुकरण नहीं करता, बल्कि सत्य और निष्पक्षता का अनुसरण करता है। जुम्मन के विरुद्ध निर्णय सुनाते समय अलगू अपनी मित्रता को न्याय के मार्ग में बाधक नहीं बनने देता और बाद में जब स्वयं अलगू के विवाद में जुम्मन को पंच बनने का अवसर मिलता है, तब जुम्मन भी व्यक्तिगत शत्रुता से ऊपर उठकर न्यायपूर्ण निर्णय देता है, जिसके माध्यम से यह भली भांति देखा जा सकता है कि न्याय मनुष्य के अंतर्मन में जागने वाली नैतिक चेतना है। जिसकी कलम ने किसान, श्रमिक और सामान्य जन के जीवन-संघर्षों को स्वर दिया तथा गांव व समाज की वास्तविक तस्वीर को अत्यंत सजीवता से अभिव्यक्त किया, उन कलम के जादूगर मुंशी प्रेमचंद की मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत उत्कृष्ट रचनाओं को याद करते हुए आज उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।

गौरी तिवारी

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