Sunday , 18 October 2026

काव्य कोना

काव्य कोना

चेतना

गौरी तिवारी   यदि दूसरों के कष्ट को अपना समझना तानाशाही और लोकतंत्र के मध्य अंतर समझना बिना बोले लाठी और पैलेटगन की...

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हे कृष्ण एक बार फिर लौटो

गौरी तिवारी   दीन, दुःखी, निर्बलों, विकलों की आस, गोकुल के ग्वाले, तुम कहाँ हो? अधरों पर रखकर मौन मुरली, मुरलीधर क्यों आज...

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मोबाइल : मित्र अथवा शत्रु ?

गौरी तिवारी   ज्ञान का दीप लिए जब विज्ञान का युग आया, मानव ने अपनी प्रतिभा से नव इतिहास रचाया अनंत क्षितिज की...

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परिवर्तन

गौरी तिवारी    वह ऐसा न था, उसका मन निर्मल निर्झर था, वह निष्कपट और निर्भय था पर छल की धूल निरन्तर पड़ती...

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मानव और पशु

गौरी तिवारी   पशुओं पर दोष मढ़कर मानव बचता आया है, अपने मन का हर अँधियारा उनके सिर पर थोपता आया है। गधा...

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जंजीरें

’गौरी तिवारी    लोगों को पसंद आती है आसमान में उड़ती पतंग अपने मुताबिक खींच लें जिसकी उड़ान की बागडोर पर खराब लगते...

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साक्ष्य (कविता)

गौरी तिवारी    आँखें होती हैं साक्ष्य कभी इतिहास और भूगोल की कभी राजनीति और भ्रष्टाचार की कभी युद्ध और मानवता के पतन...

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कुर्सी की राजनीति

गौरी तिवारी   कुर्सी के लोभ में राजनीति अक्सर व्यापार बन जाती है स्वार्थ की विषैली धारा लोकतंत्र के निर्झर में घुल जाती...

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निराश आँखें (कविता)

गौरी तिवारी    भूख ज्वालामुखी का लावा बन, दरिद्र के जीवन को तपाती है सूनी थाली की मौन व्यथा हर संध्या आँसू गाती...

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प्रकृति

गौरी तिवारी    भोर क्षितिज की दहलीज़ पर चुपके से दीप जलाती है, नींद भरे वन के आँगन में धीरे-धीरे गीत सुनाती है।...