गौरी तिवारी
कुर्सी के लोभ में राजनीति अक्सर व्यापार बन जाती है
स्वार्थ की विषैली धारा लोकतंत्र के निर्झर में घुल जाती है
सेवा की पावन चौखट पर सत्ता का व्यापार सजा,
जनविश्वासों के आँगन में छल का फिर दरबार सजा
वाणी में अमृत बरसता, अंतस में विष पलता है
मुख पर चंदन-सी शीतलता, भीतर दावानल जलता है
वादों की हरियाली बोकर सूखे मौसम दे जाते
आशाओं के दीप जलाकर, वायु से अदृश्य हो जाते
राष्ट्र-कोष का धन हड़प कर दानवीर कहलाते हैं
अपने ही प्रतिबिम्बों पर जय-जयकार के पुष्प चढ़ाते हैं
किंतु सत्ता का हर स्वर्णिम सिंहासन सिर्फ क्षणभंगुर सुख रहा
कालचक्र के सम्मुख झुकना वैभव का सदैव विधान रहा
जनचेतना का दीप जब जन-जन के मन में जागृत हो जाएगा
छल का साम्राज्य तब स्वयं अपनी ही राख में ढह जाएगा
सत्य-सूर्य जब उदित होगा, तम का नाम न रह पाएगा
तब भारत वास्तव में विश्वगुरु कहलाएगा।
