Sunday , 18 October 2026
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साहित्य

न बैठ यूं तू हार कर

न बैठ यूं तू हार कर

चल फिर से एक वार कर

न रख तलवार को यूं म्यान में

रख लक्ष्य को अपने ध्यान में

बस तू चल दे तेरे निशान

ज़मीं पे कुछ यूं बन जायेंगे

तू चलेगा तो बाकियों के लिए

रास्ते तेरे ये निशान बन जाएंगे

न बैठ यूं तू हार कर

चल फिर से एक वार कर

तू न हो विकल

फिर से मन एकाग्र कर

मुश्किलों के सागर

बस समय समय की बात है

जो हार कर उठा है बार बार

वहीं भंवर के पार है

फिर से उठ एक बार

न बैठ यूं तू हार कर

चल फिर से एक वार कर

सोच क्या होता

यदि सूर्य न आता

समय पर भोर में

क्या होता यदि

रुक जाती वायु

विश्राम करने की सोच कर

न मिटा पाया है, न ही भटका पाया है

इन्हें कोई इनके मार्ग से

तू भी इनकी तरह विचार कर

न बैठ यूं तू हार कर

चल फिर से एक वार कर।

तू चांद सा सरल है

तो सूर्य सा प्रचंड भी

तू स्वयं का हौसला बढ़ा

और रच अपने भाग्य को

न बैठ यूं तू हार कर

चल फिर से एक वार कर

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