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हानि-लाभ से आगे बढ़ मेल- मिलाप का त्यौहार है ‘होली’

अनिल तिवारी
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प्रसिद्ध चिंतक आइजनहावर ने अपने दिल की इच्छा व्यक्त की थी ‘हमारी यह दुनिया भय और घृणा का भयानक समुदाय बनने से बचे और यहां विश्वास, सम्मान और सह अस्तित्व कायम हो’ लोग एक दूसरे से मन से मिले, सबको साथ लेकर आगे बढ़े’। सहिष्णुता का यह संदेश है जो जाति, धर्म और वर्ग की दीवारों को गिरा देता है। होली रंग डालने, गुलाल लगाने और विभिन्न पकवान खाने-खिलाने तक सीमित नहीं। हिंदू धर्म के अनुसार होलिका दहन भगवान विष्णु के प्रति अटूट विश्वास की जीत और अहंकार (हिरण्यकश्यप) और बुराई (होलिका) के अंत का प्रतीक है। ब्रज की होली सीधे तौर पर राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम से जुड़ी है। श्रीकृष्ण का राधा और गोपियों पर रंग डालना इस त्योहार को सामाजिक बंधनों से मुक्त कर निश्छल प्रेम और आनंद का उत्सव बनाता है।
सिख धर्म में होली को एक नया और वीरतापूर्ण आयाम दिया गया है। गुरु गोविंद सिंह जी ने होली के अगले दिन वीरतापूर्ण आयाम ‘होला महल्ला’ की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य सिखों को सैन्य प्रशिक्षण, कुश्ती और शस्त्र विद्या में निपुण बनाना और ‘रंगों’ के साथ-साथ शौर्य व वीरता का प्रदर्शन करना था। दक्षिण भारत में होली को कामदेव के बलिदान और उनके पुनर्जन्म की खुशी में मनाया जाता है। इसे वहां ‘कामदहन’ के रूप में जाना जाता है। जैन ग्रंथों के अनुसार इसका मुख्य संदेश मैत्री भाव है। आपसी मनमुटाव भुलाकर एक-दूसरे के प्रति क्षमा और प्रेम व्यक्त करते हैं।
होली विज्ञान, मनोविज्ञान और प्राचीन परंपराओं का अनूठा संगम है। जब भी हम किसी पर होली के रंग बरसाते हैं, तो यह उनके प्रति हमेशा प्यार और स्नेह बरसाने का वादा होता है। वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि से यह वसंत के आगमन और सर्दियों की विदाई का उत्सव है, जो नई फसल और जीवन की ताजगी को दर्शाता है। प्राचीन समय में प्राकृतिक रंगों जैसे हल्दी, नीम, पलाश का उपयोग होता था। ये रंग त्वचा के छिद्रों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते थे। रंगों का हमारे मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
विडंबनापूर्ण है कि आधुनिककरण की दौड़ में होली के पावन पर्व में भी हमने अनेक विकृतियां शामिल कर दी हैं। मानवता की पुकार है कि होली के अवसर पर सारे गिले-शिकवे मिटाते हुए सबको गले लगाए और इस पर्व को ‘इको-फ्रेंडली’ बनाएं।

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