क्रांतिकारी विचारों का सन्यासी

स्वामी विवेकानंद जयंती पर विशेष

  • अनिल तिवारी

स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती के मौके पर हम उनके जीवन उनके कामकाज और उनके सिखाए तकनीकी तरीकों के आधार पर अपने लक्ष्य को साध सकते हैं। स्वामी जी के विशाल जीवनानुभवों और अल्पायु में किए गए बेशुमार कृतु के आलोक में एक अचरजाकारी सवाल जरूर उठना है कि आखिर उन्होंने इतना सब कुछ इतनी छोटी आयु मात्र 39 साल के जीवन खंड में वह कैसे कर सके थे? क्या यह सब स्वामी जी के समय प्रबंधन का कौशल था?इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर यह सब उनके समय प्रबंधन का ही कमाल था तो निश्चित ही उनके कुछ सूत्र आज प्रबंधन के बोलबाला वाले दौर में और भी उपयोगी हो सकते हैं। आइए, उनकी जयंती के अवसर पर विचार करते हैं कि उनके व्यवस्था सूत्र क्या है ?

सक्रियता

स्वामी विवेकानंद आरंभ से ही कर्म की अहमियत देते थे। जीवनकाल में दिए गए उनके हरेक भाषणों और वार्तालापों में वह बारम्बार स्व-कर्म करने के लिए लोगों से अपील करते थे, उन्हें निर्देश तक देते थे। दरअसल, वह जीवन के स्वाभाविकं कर्म करने का तकाजा करते थे। स्वामी जी ने तत्कालीन भारत के समक्ष मुंह बाए चुनौतियों-गरीबी, भूख, अशिक्षा, अंधविश्वास और धर्म, जाति और क्षेत्रीय अलगाव-को चिह्नित कर रखा था। वह इस बात पर क्षोभ व्यक्त करते थे कि किस तरह भारतवर्ष अपने ऐतिहासिक गौरव के शिखर से विदेशी कुशासन के गर्त में गिर कर आर्थिक और सामाजिक; दोनों क्षेत्रों में पराभव को प्राप्त हो गया था।
आत्मनिरीक्षण
विवेकानंद ने हमेशा व्यक्ति के आत्मावलोकन पर बल दिया। वह खासकर अपने समानधर्मी हिन्दुओं से बहुत नाराज थे और उन्हें अधिक आत्मनिरीक्षण करने पर जोर देते थे। घुसपैठिये विदेशी शासकों और साम्राज्यवादियों से देश के आक्रांत होने के लिए हिन्दुओं को ही कसूरवार मानते थे। उन्होंने बताया कि हिन्दुओं में आंतरिक अलगाव, परस्पर दुश्मनी, एक दूसरे के विरुद्ध छल-छद्म और घोर निठल्लेपन फायदा उठा कर ही विदेशी हम पर हुकूमत करने लगे थे। स्वामी जी ने हिन्दुओं और मुसलमानों से अपने वैर-भाव भुलाकर राष्ट्र के नवनिर्माण में जुट जाने का आह्वान किया। वह हमेशा हिन्दू मस्तिष्क और इस्लामी काया के सहमेल की बात करते थे। बहुतेरों ने हिन्दू और मुसलमानों के बीच सद्भाव और सहयोग कायम करने में इस मुहावरे के उपयोग को चमत्कारिक माना है। वहीं कुछ लोगों ने इस मुहावरे पर आपत्ति जताई। उनका सवाल था कि स्वामी जी के कहने का मतलब हुआ कि हिन्दुओं में शारीरिक बल नहीं होता और मुसलमान बौद्धिक नहीं होते। हालांकि प्रबंधक शरीर और मन के अपने विशिष्ट बल होने के विचार को समझेंगे और दोनों को एक साथ रखेंगे, जहां एक और एक का जोड़ दो से बहुत ज्यादा 11 हो सकता है।

जवाबदेही

स्वामी विवेकानंद ने देश की गरीबी और गरीबों की दुर्दशा के लिए तब के सम्पन्न भारतीयों को जिम्मेदार ठहराया था। कहा था, इन भूखे, नंगे और आश्रयहीन लोगों के रहते अघाए लोगों की प्रार्थना, पूजा-पाठ और तीर्थाटन एक पाखंड है। गरीबों के आगे धर्म-चर्चा उनका उपहास करना है। उनके इस कहे का यह मतलब नहीं कि वह मनुष्य की भौतिकेतर आवश्यकताओं से अनभिज्ञ थे। उनका मानना था कि मनुष्य जीवन के आध्यात्मिक रास्ते पर कदम बढ़ाने के पहले बुनियादी और सहज भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति आवश्यक है। स्वामी जी ने साफ कहा कि गरीबों का यह हक ही नहीं बल्कि कर्तव्य भी है कि वह कुलकों के विरुद्ध विद्रोह कर दें। यहां विवेकान्द हमें समाजवादी और मानवतावादी लगते हैं।
वैश्वीकरण
19 वीं सदी में देश के दूर-दराज के इलाकों में भ्रमण और समुद्री मार्ग से विदेश यात्रा करना काफी दुष्कर था। लेकिन स्वामी जी अमेरिका के शिकागो में 1893 में आयोजित विश्व धर्म संसद में वेदांत को संदेश पहुंचाने के लिए उतावले थे। इसके लिए उन्होंने पहले दक्षिण भारत की यात्रा की और वहां से अमेरिका जाने के लिए धन और सहायता जुटाई। शिकागो में न केवल उन्होंने धर्म संसद पर अपने अपनत्व भरे संबोधन, गुरुत्तर ज्ञान और ओजस्वी भाषण से अपनी अमिट छाप छोड़ी बल्कि इन गुणों के कारण समूचे अमेरिका में वह छा गए।
प्रभावी संवाद शैली
स्वामी विवेकानंद महान वक्ता थे। सीधे मर्म को छू लेने वाली प्रखर अभिव्यक्ति कला से पहले उन्होंने पूरे भारत में अपनी बात पहुंचाई। उन्होंने बिना थके मीलों दूर तक यात्राएं की और बिना विराम लिए लोगों को संबोधित करते रहे। वह देश-दुनिया के लाखों लोगों तक अपने संदेश पहुंचाने के महत्त कार्य के लिए अपने शरीर तक की परवाह नहीं की। कोलंबो से लेकर अल्मोड़ा तक दिये गए उनके भाषणों का संग्रह, उनके तप मिशन का जीवंत अभिलेख है। वह संजीदगी से बोलते थे। वे वेधड़क, दो टक बोलने वाले और परिस्थिति-मुताबिक रूखे होकर वाद-विवाद तक कर लेते थे। लोगों से उनका अनथका संवाद भारत से अमेरिका और फिर वहां से पूरे विश्व में फैल गया।
संस्थाओं का निर्माण
स्वामी विवेकानंद घूम-घूम कर बोलते ही नहीं रहे; उन्होंने अपने गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस के नाम पर पश्चिम बंगाल के बेलूर में रामकृष्ण मिशन की गौरवशाली कालजयी संस्था की नींव रखी। मिशन ने 1992 में अपनी 100वीं सालगिरह मनाई। इसमें देश भर से 10 हजार युवाओं की टोली पहुंची थी। बेलूर रामकृष्ण मिशन का मूल निवास है। पार्श्व में बहती हुगली नदी के किनारे टीन की छत से ढंका छोटे-से घर को आज भी आबाद रखा गया है, जहां स्वामी जी ने पांच संन्यासिनों के साथ मिलकर रामकृष्ण मठ की आधारशिला रखी थी। अब तो इस संस्था का वैश्विक अवतार हो गया है, जहां सान्फ्रांसिकों से लेकर सिडनी तक 250 आश्रम हैं।
रामकृष्ण मठ सभी लिहाज से महान संस्था है। इसने स्वामी जी के अखिल विश्व को एकल मानवीय परिवार मानने के वेदांत के उनके दृष्टिकोण को सच्चे अर्थों में साकार किया है। इसने मनुष्य के आध्यात्मिक उन्नयन के काम को ही व्यापक स्तर पर लागू नहीं किया है बल्कि गरीबों की शिक्षा और उन्हें स्वास्थ्य देने का दायित्व भी निभा रहा है। रामकृष्ण मिशन अपने मूल मूल्यों और संस्कृति को आत्मसात किए हुए है। इस विकसमान संगठन को संचालित करने के लिए मिशन प्रतिबद्ध युवकों से जुड़ने का आह्वान करता है, उन्हें प्रशिक्षित करता है और उनमें नेतृत्त्व के गुणों का विकास करता है।
नेतृत्त्व के गुण
स्वामी विवेकानंद विचार, शब्द और कर्म से एक सम्पूर्ण नेता थे। वह संवाद करते थे। वह हमेशा अगले मोर्चे पर मिलते थे। श्रीरामकृष्ण परमहंस के महान, समग्र और आंतरिक विश्वासों से भरपूर आध्यात्मिक संदेशों को जन-जन तक पहुंचाना स्वामी जी के प्रयासों से ही संभव हुआ। सुंदर उपमाओं से लिखी धर्म सिद्धांत की उनकी पुस्तक व्यापक तौर पर पढ़ी जाती है और उन पर चर्चा की जाती है। इसने फेंच के ख्यातिलब्ध विद्वान रोम्या रोलां का ध्यान खिंचा, जिन्होंने ‘लाइफ ऑफ विवेकानन्द’ नामक किताब लिखी और इस तरह स्वामी जी को दुनिया के पाठकों के बीच ले गए।
एक लक्ष्य
स्वामी जी ने कानून की पढ़ाई की थी। वकालत उस समय की सबसे सम्मानित पेशा मानी जाती थी। तेज-तर्रार वकीलों की अच्छी खासी फीस भी होती थी। हालांकि तब स्वाधीनता संग्राम के सेनानी होने के लिए अनेक वकीलों ने अपने पेशे का त्याग कर दिया था। स्वामी जी उन सबके अग्रदूत थे। विवेकानंद चाहते तो वह भी लालची वकील हो कर वेशुमार धन-दौलत कमा सकते थे। इसके बावजूद उन्होंने समाज, देश के लिए त्यागमय जीवन को चुना। वह आजीवन श्रीमद्भगवद्‌गीता के मूल निष्काम भाव से स्वकर्म, का पालन करते रहे। इसके चलते ही वह मर कर भी अमर हो गए।

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