राज्यों की आर्थिकी और केंद्र की भूमिका

अनिल तिवारी

संसद के मौजूदा बजट सत्र के दौरान दो प्रमुख रिपोर्ट प्रस्तुत हुई। पहली, वैश्विक भू- राजनीतिक उथल-पुथल और दुनिया के देशों के साथ लगातार हो रहे मुक्त व्यापार समझौतों के दरमियान केंद्रीय बजट 2026-27 और दूसरी बहुप्रतीक्षित 16वीं केंद्रीय वित्त आयोग की रिपोर्ट पर केंद्र सरकार की अनुशंसा जो वर्ष 2026-27 से अगले 5 वर्ष तक के लिए प्रभावी रहेगी। दोनों रिपोर्ट का देश के आर्थिक विकास की तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों जरूरतों पर व्यापक असर होगा और आने वाले समय में देश और राज्यों के आर्थिक विकास की रूपरेखा इनमें प्रस्तुत आंकड़ों से बहुत हद तक प्रभावित होगी।
लगातार रिकॉर्ड नवीं बार देश का आम बजट प्रस्तुत करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जानकारी दी कि केंद्र ने 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें मंजूर कर ली है।नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता वाले वित्त आयोग ने सिफारिश की है कि केंद्रीय करों में से 41 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को दिया जाए। केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी की यह सिफारिश एक अप्रैल से अगले पांच वर्षों के लिए अनुमन्य है। वित्त मंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वित्त आयोग अनुदान के रूप में राज्यों को देने के लिए 1.4 लाख करोड रुपए का प्रावधान किया है। मालूम हो की 15 वें वित्त आयोग की सिफारिश भी हु-ब-हू ऐसी ही थी, लेकिन केंद्र की ओर से राज्यों को इसके तहत केवल 34 प्रतिशत के बराबर की रकम ही दी गई, जिसे वित्त वर्ष 2027 में बढ़ाकर 34.6 प्रतिशत दिए जाने का वादा किया गया है।
आज पूरी दुनिया जिस तरह के वैश्विक भू राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है और इस कारण देश के सामने जो कठिनाइयां खड़ी हो रही हैं, वित्त मंत्री ने अपने आम बजट के जरिए उससे बाहर निकलने का एक रोडमैप पेश किया है। वित्त मंत्री ने उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाते हुए आर्थिक विकास तेज करने, लोगों को सक्षम साझीदार बनाकर उनकी आकांक्षाएं पूरी करने और सबका साथ-सबका विकास की सोच के साथ सभी को अवसर मुहैया कराने के तीन मुख्य कर्तव्यों की प्रतिबद्धता जताते हुए सात रणनीतिक सेक्टरों में अपेक्षित प्रगति के साथ भारत को अगले स्तर पर ले जाने का वादा किया है। रोजगार की चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने आम बजट में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर फोकस किया है तथा सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान बढ़ाकर 25 प्रतिशत तक करने का लक्ष्य तय किया है, जोकि अभी तक 20% का लक्ष्य भी हासिल नहीं किया जा सका है।
पहले करोना संकट के दरमियान केंद्र और राज्य सरकारों की राजकोषीय सीमा रेखांकित और संकुचित हुई थी,जिसके कारण केंद्र के साथ राज्य की सरकारें भी विकास संबंधी खर्चों को लेकर अमूमन दबाव में थी। और अब दुनिया भर में छिड़े टैरिफ वार की मार, प्रतिक्षण बदलती भू राजनीतिक स्थिति, लगातार बढ़ती आबादी की जरूरतों और बड़े श्रम बल को समुचित रोजगार की आवश्यकता, कृषि क्षेत्र को लेकर असंतोष और पलायन से आने वाली समस्याएं जैसी चिंताएं बनी हुई है। इसका एक प्रमुख कारण राजस्व की कमी और दीर्घकालिक रणनीति का अभाव भी रहा है।
हालांकि बजट में वित्त मंत्री ने अपने राजस्व की चिताओं के बीच विभिन्न क्षेत्रों की अपेक्षाओं में सामंजस्य से बैठाने की कोशिश की है। भविष्य के भारत को और अधिक समृद्ध बनाने के लिए उत्पादकता और घरेलू खपत को बढ़ाने की ठोस रणनीति तैयार की है। भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियाद खपत है। देश की जीडीपी में इसका योगदान 60% के करीब है।पिछले साल के बजट में खपत को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने न्यू टैक्स रिजीम के तहत 12 लाख रुपए तक की आमदनी पर आयकर माफ कर दिया था। सरकार ने पिछले दिनों जीएसटी दरों को भी तर्कसंगत बनाया है। रिजर्व बैंक ने भी ब्याज दरों में कटौती करते हुए 0.75 बेसिस प्वाइंट की कमी की है।
आर्थिक सर्वेक्षण के आकलन के हिसाब से देखा जाए तो अर्थव्यवस्था तुलनात्मक रूप से सही दिशा में आगे बढ़ रही है। भारत आत्मनिर्भरता की राह पकड़कर विकासशील देश से विकसित देश की कोटि में शामिल होने के लिए खुद को तैयार करने में जुटा है। प्रधानमंत्री ने बजट के बारे में कहा है कि “यह बजट अपार अवसरों का राजमार्ग है जो 2047 के विकसित भारत की हमारी ऊंची उड़ान का मजबूत आधार है”।
सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो बजट सरकार के साल भर में किए जाने वाले आय और व्यय की रूपरेखा है परंतु वर्तमान में उठाए गए कदमों का असर आने वाले समय में होने के कारण इसकी घोषणाएं दीर्घकालिक रणनीति को भी रेखांकित करती है। वहीं केंद्रीय वित्त आयोग की अनुशंसा का केंद्र के साथ-साथ राज्यों की राजकोषीय स्थिति पर व्यापक प्रभाव होता है और इसके निर्णय 5 वर्षों तक के लिए लागू रहते हैं।
भारत के संघीय ढांचे में केंद्र राज्य के साथ-साथ राज्यों के बीच भी राजकोषीय क्षमता, स्थिति और आर्थिक सामाजिक विकास के स्तर पर काफी असमानता एवं असंतुलन है। कम विकसित राज्यों की स्थिति और भी नाजुक है।राज्य सरकारों के पास राजस्व संग्रह के विकल्प कम है और कर लगाने की उनकी स्वायत्तता अप्रत्यक्ष कर में हुए व्यापक सुधार के तहत जीएसटी के लागू होने के साथ ही बहुत ही कम हो गई है। वहीं कर्ज लेने और उन्हें चुकाने की राज्यों की क्षमता भी केंद्र से कम है जिसके कारण राज्यों की वित्तीय निर्भरता केंद्रीय राजस्व पर ही अधिक रही है। कम विकसित राज्यों की यह निर्भरता और भी अधिक है क्योंकि विकास की जरूरतों को पूरा करने के संसाधन वहां बहुत ही कम है। साथ ही एक अन्य चिंता राज्य सरकारों के खर्चों की गुणवत्ता को लेकर भी बनी रहती है। हालांकि बजट में केंद्र का राज्यों को पूंजीगत व्यय बढ़ाने को लेकर प्रेरित करना अच्छा कदम है परंतु राज्यों की राजकोषीय स्थिति निराश करती है।
विभिन्न स्तर की सरकारों के बीच आर्थिक विषमता को देखते हुए संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत राष्ट्रपति द्वारा केंद्रीय वित्त आयोग की स्थापना हर पांच साल पर की जाती है। इसका मुख्य कार्य यह तय करना है कि केंद्र सरकार करों से एकत्र राजस्व को राज्यों के साथ कैसे साझा करेंगी? साथ ही यह भी तय किया जाता है कि उस साझेदारी में किस राज्य की हिस्सेदारी कितनी होगी? इसके पीछे की अवधारणा यह है कि देश के हर कोने में रहने वाले नागरिकों को देश के सकल आर्थिक संसाधनों का लाभ समान रूप से मिले और इसमें आर्थिक संसाधनों की क्षेत्रीय विषमता के कारण आने वाली बड़ी बाधाओ को दूर किया जा सके। पिछले कुछ आयोगों की अनुशंसा में राज्यों के जनसंख्या घनत्व को लेकर राज्यों के बीच काफी मतभेद रहा है।वर्तमान आयोग ने जनसंख्या और जनसंख्या नियंत्रण के राज्यों के प्रयास दोनों का अपने फार्मूले में उपयोग किया है।
16 वें वित्त आयोग की सिफारिशों का महत्व इस कारण भी बढ़ गया है कि वर्तमान में विभिन्न राज्यों के बीच आर्थिक विकास की असमानता पहले से काफी अधिक है और यह देश में जीएसटी लागू होने के बाद केंद्र राज्य के बीच राजस्व बंटवारे का भी मामला है। आयोग ने केंद्र के करों के विभाज्य हिस्से में राज्यों की हिस्सेदारी 41 प्रतिशत रखी है। हालांकि कई कारणों से केंद्रीय राजस्व के विभाजित होने वाले हिस्से का आकार ही कम होने से राज्यों की राजकोषीय स्थिति और खराब होगी। इसका प्रमुख कारण पहले से लागू कई तरह के सेस के ऊपर व्यय के नाम पर लगाए जाने वाले अन्य अतिरिक्त सेस हैं।उदाहरण के लिए वर्ष 2018-19 में शेष से लगभग 2.75 लाख करोड रुपए एकत्र हुए जो केंद्र के राज्यों को विभाज्य राजस्व के हिस्से में नहीं गए। अतः केंद्र द्वारा अधिक मात्रा में सेस लगाने से सरकारों के बीच राजकोषीय संतुलन को कम करना और भी मुश्किल हो जाता है। एक और कदम जो कि राज्यों के खर्चे की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव डालता है वह है राज्यों को दी जाने वाली रेवेन्यू घाटे की क्षतिपूर्ति। यह एक तरह से खराब राजकोषीय प्रबंधन को पुरस्कृत करने जैसा है। ऐसे राज्य जो अपने कुल राजस्व प्राप्ति के अधिकतम हिस्से के लिए केंद्र पर निर्भर हैं उनकी हिस्सेदारी इन कारणों से नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।
आर्थिक विकास एक सतत प्रक्रिया है फिर भी हर वर्ष केंद्रीय बजट से नई उम्मीद बनी रहती है। इसका प्रमुख कारण तात्कालिक समस्याओं को लेकर सरकार से की जाने वाली अपेक्षाएं हैं। मौजूदा बजट से शेयर बाजार बहुत मायूस है। हमेशा ललचायी नजर से बजट की प्रतीक्षा करने वाला देश के मध्य वर्ग ने बजट को ‘बोरिंग’ बताया। राजनीतिक दल अपने-अपने चश्मे से देख रहे हैं। लेकिन तटस्थ होकर बजट के प्रावधानों को देखने भर से महसूस होता है कि यह एक समावेशी बजट है। इसमें समाज के प्रत्येक व्यक्ति के भविष्य की चिंता है, उसके भले के लिए प्रयास करने का संकल्प है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए बजटीय प्रावधान भी कमोबेश मुफीद नजर आते हैं। बावजूद, इसके लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए रणनीतिक परिपक्वता की जरूरत है। केंद्र को राज्यों के प्रति आर्थिक संसाधन प्रदान करने के रवैया को और सकारात्मक करने की भी जरूरत है, क्योंकि देश के समग्र विकास में राज्यों की बड़ी भूमिका है। वर्तमान में केंद्र- राज्य सामंजस्य बिठाना भी और आसान होना चाहिए तब जबकि अधिकतर राज्यों में समान विचारधारा की सरकारें हो। इन सब के बीच दीर्घकालिक रणनीति के तहत लंबे समय में देश की बढ़ती जनसंख्या के मद्देनजर लोगों को रोजगार के समुचित अवसर उपलब्ध कराने के साथ ही उनके जीवन की मूलभूत सुविधाओं को पूरा करने के लिए बड़े एवं सार्थक कदम उठाने जरूरी है।

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