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विवेकानंद एक सशक्त स्त्रीवादी

वैदेही

 

हम स्त्री सशक्तीकरण के बारे में ढेर सारी बातें करते हैं। आज से डेढ़ सदी पहले एक युवा और घुमक्कड़ संन्यासी स्वामी विवेकानंद ने पाया था कि भारतीय नारियों की दशा दीन-हीन है। उन्हें इसकी मूल वजह स्वी-अशिक्षा लगी थी। तभी वह इसे मिटाने की धुन में लग गए थे। स्वामी ने तय किया कि एक दिन वह स्त्रियों की इस दुर्दशा को दूर करके रहेंगे और उन्हें एक पढ़ा-लिखा परिवेश देंगे। शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद के मंच से मौजूदा श्रोतावर्ग को गरिमामय और अपार स्नेह से ‘अमेरिका की बहनों एवं भाइयों’ कह कर पश्चिमी जगत के प्रबुद्ध मानस को जीत चुके थे। पश्चिमी समाज में स्वी को मान-सम्मान प्राप्त था और उन्हें उनके बेहतर भविष्य के लिए एक आश्वासन था। धर्म संसद को संबोधित करने के पहले स्वामी जी मैसाच्यूट्स के ब्रीजी मेडोज में संवाद कर चुके थे, जहां उन्हें सुनने महिला जेल की एक कैदी भी आई थी। इस बैठक में विवेकानंद ज्यादा समय तक भारतीय नारियों और उनकी वीरता का बखान करते रहे किंतु उनका ध्यान उनकी मौजूदा अधोगति से उबारने के प्रयासों पर भी था।
पढ़ाई-लिखाई : बेड़ियां तोड़ने का सूत्र
गरीब-लाचार, निरक्षरता की सजा भुगत रही और वर्चस्ववादी पुरुषप्रधान समाज में तिरस्कृत रहने वाली भारतीय नारियों के लिए तब क्या कोई उम्मीद थी? शिक्षित अमेरिकी स्त्रियों के प्रखर आत्मविश्वास को देखकर ही स्वामी को यह सूत्र मिला कि भारतीय नारियों की दुर्दशा को दूर करने की वह कुंजी शिक्षा ही हो सकती है। उन्होंने भारत में अपनी बहनों को रूढ़िवाद की बलिवेदी पर आत्महत्याएं करते देखा था। लेकिन स्वामी जी अमेरिकी स्त्रियों के व्यवहारों पर गौर करते हुए इस धारणा पर भी पहुंचे थे कि भारतीय नारियों को पश्चिम के बिना सोचे-समझे अनुकरण से परहेज ही करना चाहिए। न्यूयार्क में एक सभा में स्वामी ने बेबाक कहा, ‘मैं चाहता हूं कि हमारी महिलाएं आपकी स्त्रियों जैसी बौद्धिक हों लेकिन अवश्य ही यह शुद्धता की कीमत पर न हो।’ कैलिफोर्निया में स्वामी जी ने 1990 में अपने एक व्याख्यान में कहा, ‘भारत में आदर्श नारी मां है-वह पहले और आखिर में सिर्फ मां है। ‘स्त्री’ शब्द के उच्चारण मात्र से ही एक आम हिन्दू के मन में जो पहली छवि बनती है, वह मां की है और ईश्वर को मां कहा गया है।’ इसी तरह, अगर मां शिक्षित और आत्म-विश्वासी नहीं होगी तो फिर वह आदर्श मां कैसे बन सकेगी? यही वह बड़ी वजह थी, जिसने स्वामी विवेकानंद को स्त्री सशक्तीकरण जैसे बड़े मकसद के लिए प्रेरित किया। उन्होंने पाया कि वह आजाद जन्म लेकर भी, स्त्री हर तरफ बेड़ियों से जकड़ी हुई है। यहां तक कि सम्पन्न घराने की महिलाएं भी कई रूपों में समाज के दबाव के आगे नतमस्तक थीं। जाहिर था कि लड़ाई दुधारी थी। एक तरफ तो आत्भज्ञान सम्पन्न लोगों का यह कर्त्तव्य बनता था कि वे बाल विवाह और विधवाओं के प्रति अपने रूढ़ विचारों को छोड़ें। स्वामी जी का कहना था, ‘स्मृतियों की रचना कर और उनमें स्त्रियों के लिए कड़े-कड़े नियमों के प्रावधान कर पुरुषों ने स्त्रियों को केवल संतान पैदा करने वाली मशीन बना कर रख दिया है।’

स्त्री शिक्षा के पाठ्यक्रम
दूसरी तरफ, उनका यह भी मानता था कि स्त्रियों को खुद भी अपनी दासता से उबरने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए स्त्री को पढ़ाने-लिखाने की जरूरत थी, जिससे कि वह मानवाधिकारों को जान सके। साथ ही घरबार संभालने में एक रचनात्मक जोड़ीदार बने। ऐसी स्त्री-शिक्षा के योग्य पाठ्यक्रम को लेकर पूछे एक सवाल के जवाब में स्वामी जी ने -कहा था, ‘स्त्री शिक्षा में धर्म, कला, विज्ञान, घर के कामकाज, रसोई, बुनना, स्वास्थ्य की बेहतर देखभाल’ के ज्ञान देने वाले पाठ रहेंगे और निश्चित रूप से महाकाव्यों की वीरांगनाओं के अध्याय भी दिए जाएंगे। वह चाहते थे कि स्त्रियों को ऐसी सर्वांगीण शिक्षा देने वाले प्रशिक्षण केंद्र चलें। । समाज के लादे प्रतिबंधों की अनदेखी करते हुए स्वामी जी ने भगिनी निवेदिता को भारत आने का आमंत्रण दिया और उनसे स्त्री शिक्षा के लिए काम करने को कहा। तत्कालीन भारत में स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में भगिनी निवेदिता और भगिनी क्रिस्टिन का अमूल्य योगदान इतिहास में दर्ज है। उन सभी मामलो में स्वामी विवेकानंद का नजरिया बेबाक था। जब उनसे पूछा गया कि इन पढ़ी-लिखी स्त्रियों का मौजूदा सामाजिक बंधन वाले हालात में शादी-ब्याह हो पाएगा, विवेकानंद ने कहा था कि जब कोई काम नैतिक बल के साथ किया जाता है तो निश्चित सफलता मिलती है: आपने समाज के चलन को समझा नहीं है। इन विद्वान और सुसंस्कृत लड़कियों के लिए लड़कों का अकाल नहीं होगा। आज का समाज बाल विवाह को पसंद नहीं करता और आगे भी नहीं करेगा।’

सशक्त इतिहास बोध
तत्कालीन समाज में ब्रह्माचारिणी बन कर उपलब्धि पाने का भी एक मार्ग था और इस तरह समाज के लिए अपने उपयोगी बनाना था। विवेकानंद का इतिहास बोध बड़ा सशक्त था। वह जानते थे कि भारत की महानता यहां समाज को दिए गए स्वियों के अप्रतिम अवदान पर आश्रित है। लाख बाधाओं के बावजूद भारतीय नारियां स्वाभाविक रूप से अध्यात्म की ओर उन्मुख थीं और अपनी ऐतिहासिक-पौराणिक महान वीरांगनाओं के झेले गए दुखों से परेशान-कातर नहीं थीं। उन पर रोने-धोने के बजाय वह जीवन संग्राम से जूझते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी अपने को सशक्त बनाती आई थीं। इसके बारे में स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा था, ‘तमाम दुखों को झेलते हुए भारतीय नारियां पूरी तरह शुद्ध, समर्पिता हैं और उनकी एकमात्र सर्वोच्च महत्त्वाकांक्षा सीता होने की हैं।’ इस तरह, उन्होंने पाया कि स्त्रियां दुश्वारियां झेलने के लिए अपने को जैसे हमेशा तैयार रखती थीं। किट्टर की रानी चेन्नामा, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, सुभद्रा कुमारी चौहान समेत वे तमाम नारियां, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया; और चिपको आंदोलन में भागीदारी निभाने वाली महिला सहित आज के सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाली स्त्रियों को अपने बड़े ध्येय के लिए बहुत कुछ सहना पड़ा है। इसलिए स्वामी जी नई भारतीय स्त्रियों के लिए बलात एक मॉडल गढ़ना नहीं चाहते थे। उनका मानना था कि शिक्षा ही उनकी अंतर्निहित आध्यात्मिक बल को फिर से पाने में मदद करेगी। अतः उन्हें जीवन में आदेश-निर्देश देने की आवश्यकता नहीं थी। उन्हें आजादी की आवश्यकता है और निश्चित है कि अगर उन्हें आजादी दी जाए तो वह उचित काम ही करेंगी। स्वामी जी ने गुरु गंभीर स्वर में यह उ‌द्घोषित किया था, ‘पहले आप स्त्रियों को शिक्षित करें और फिर उन्हें उन पर छोड़ दें, तब वे स्वयं आपसे कहेंगी कि उनके लिए क्या-क्या सुधार आवश्यक है। उनके मामले में दखल देने वाले आप होते कौन हैं?’ नारी स्वातंत्र्य के भारतीय नारियों को इस महान आध्यात्मिक संन्यासी के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, जिसकी परम्परा आज भी प्रवहमान है।

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