अनिल तिवारी
राजनीति संपूर्ण और दीर्घकालिक प्रयास की एक सतत प्रक्रिया है। यहां चट मंगनी और पट शादी का फार्मूला अक्सर लागू नहीं होता है
। अपवाद स्वरूप भले ही किसी को बाबुल के पेड़ के नीचे आम मिल गया हो लेकिन राजनीति में बिल्ली के भाग्य जैसे दही का मटका नहीं मिलता। यहां पाने के लिए धैर्य के साथ एड़ियां रगड़नी पड़ती है। जो तुरंत फल पाने का लालच रख राजनीति में उतरते हैं वह कई बार गच्चा खा जाते हैं। इसकी ताजी मिसाल बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्ता पलट की पटकथा लिखने वाले दल (एनसीपी) का है। यह अनुभव ठीक उसी तरह का है जैसे कुछ दिन पहले बिहार में प्रशांत किशोर के दल जन सुराज के साथ हुआ था। उन्होंने भी बिहार को बदलने के बड़े-बड़े दावे किए थे लेकिन चुनावी अंकगणित में पूरी तरह खेत रहे थे।
हालांकि की राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं होता, ना दोस्त- ना दुश्मन। यह बात बांग्लादेश के चुनाव में भारी बहुमत से जीते तारिक रहमान ने अपनी याद भूमिका से साबित की है। अपनी दूरदर्शिता से उन्होंने अभी-अभी उपजे छात्र नेताओं को सबक दिया कि सड़क की ताकत को वॉलेट में बदलना इतना आसान नहीं होगा। अगर आपको याद हो तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी बिहार चुनाव के दौरान कमोबेश यही संदेश देते हुए कहा था कि जनसुरज को समझना होगा कि जोश को संगठन में और नारों को वोट में बदलने का हुनर सीखना और साधना अभी बाकी है।
बांग्लादेश में भारी बहुमत से विजयी हुए तारिक रहमान ने समय लगाकर राजनीति की बारिकियों को समझा और धीरे-धीरे अपनी पैठ मजबूत की। निर्वासन, मुकदमे और सियासी ठंडेपन के लंबे दौर के बाद धीरज के साथ उन्होंने अपना खेल बुना। नतीजा सबके सामने है। बांग्लादेश चुनाव में बीएनपी ने रिकॉर्ड तोड़ जीत दर्ज की है वही शेख हसीना को बाहर का रास्ता दिखाने वाले छात्रों की एनसीपी फिसड्डी साबित हुई है। 300 सीटों वाली चुनावी लड़ाई में एनसीपी दहाई का अंक भी हासिल नहीं कर सकी है।
इस पूरे चुनाव में बीएनपी के सामने चर्चित दल के रूप में एनसीपी ही थी। बीते साल बने इस राजनीतिक दल ने शेख हसीना के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन किया था जिसकी वजह से आखिरकार उनकी सरकार गिर गई थी। यहां तक कि उन्हें भारत में शरण लेना पड़ा था। मोहम्मद यूनुस को बांग्लादेश की कमान मिलने के पीछे भी छात्रों के इसी दल एनसीपी का अहम रोल रहा था। बिहार के प्रशांत किशोर की तरह माना जा रहा था कि बांग्लादेश चुनाव में भी एनसीपी चमत्कारी कमाल दिखाएगी। लेकिन बैलट बॉक्स की भाषा अलग निकली। एनसीपी को केवल और केवल 6 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। पार्टी के बड़े चेहरे नाहिद इस्लाम और हसनत अब्दुल्ला तो किसी तरह जीत गए लेकिन पार्टी को वह कामयाबी हासिल नहीं हुई जिसकी उम्मीद उसने लगा रखी थी।
अब जब छात्रों के दल की बुरी तरह हर हो गई है तब इसके पीछे की वजह तलाशी जा रही है। बांग्लादेश की राजनीति पर पैनी नजर रखने वालों का कहना है कि एनसीपी को जमाते इस्लामी का साथ रास नहीं आया। ज्ञात होगीजिस जमाते इस्लामी सॉन्ग हाथ मिलाने का छात्रों की पार्टी को नुकसान हुआ वह इतिहास में तारीख रहमान की पार्टी बीएनपी की साथी रह चुकी है लेकिन इस बार तारिक ने जमात से पर्याप्त दूरी बनाए रखी, जिससे बड़े पैमाने पर उसे फायदा हुआ। दरअसल जमात ए इस्लामी बांग्लादेश के बनने से भी पुरानी पार्टी है। वर्ष 1971 के मुक्ति संग्राम में इसने पाकिस्तान का साथ दिया था। इसके मलेशिया साथी ने पाकिस्तान सेना के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर जुल्म किए थे। इसके कुकृत्यों में बड़े पैमाने पर बुद्धिजीवियों की टारगेटेड हत्याएं, सामूहिक रेप और हिंदू अल्पसंख्यकों का नरसंहार शामिल था। बाद में जमात को नरसंहार बलात्कार और मानवता के खिलाफ अपराध का जघन्य दोषी तक ठहराया गया। इसीलिए बांग्लादेश बनने के बाद शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर रहमान ने इस पर बैन भी लगा दिया था।
लेकिन बाद में उनकी हत्या के बाद जब जियाउर रहमान की सत्ता आई तो उन्होंने बांग्लादेश के संविधान से धर्मनिरपेक्ष शब्द हटा दिया।धर्मनिरपेक्षता शब्द हटते ही धर्म आधारित राजनीतिक दलों को कम करने की इजाजत मिल गई और इसका सबसे ज्यादा फायदा जमात को प्राप्त हुआ।जमाई ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी बीएनपी से हाथ मिला लिया था उसे दौरान बीएनपी की सरकारों में जमात ने मंत्री पद भी हासिल कर लिए थे। हालांकि दोबारा शेख हसीना के सत्ता में लौटते ही जमात पर फिर से बैन लगा दिया गया। इस बीच बीते साल जब शेख हसीना का तख्ता पलट हुआ तो जमात की हथकड़ियां फिर से खुल गई। जमात खुलकर राजनीति खेलने के लिए मैदान में उतर आई। जमाई ने पहले भी समय-समय पर यह तर्क दिया है कि 1971 के आरोप राजनीतिक हैं। जमात के नेताओं द्वारा आरोपों के विरुद्ध अदालत में चुनौती भी दी गई है।
इस बीच जब बांग्लादेश में चुनावी प्रक्रिया शुरू हुई तो सभी राजनीतिक दलों ने जीत हार का जोड़ घटाव लगना शुरू कर दिया। सीटों के बंटवारे पर असहमति और जमात की बदनाम छवि को ध्यान में रखते हुए बीएनपी नेता तारिक रहमान ने इस बार जमात को दूर से ही नमस्ते कर दिया। दूसरी तरफ पहली पहली बार चुनावी दंगल में उतरे छात्रों के दल एनसीपी को शक था कि अकेले दम पर लंबी लड़ाई नहीं चल सकती। छात्रों के पक्ष में जमीन पर जोश तो था लेकिन संगठन की जड़ें कमजोर ही नहीं बहुत कच्ची थी। लेकिन इन नाजुक स्थितियों में जिस कंधे का सहारा चुना गया, वह था पहले से ही कुख्यात जमात। जमात के साथ समझौता होते ही कहानी में मोड़ आ गया। जमात को लेकर पार्टी के भीतर भी दरारें दिखने लगी। एनसीपी के तमाम नेताओं ने इस समझौते से सार्वजनिक असहमति जताई और कईयों ने तो पार्टी भी छोड़ दी।इस उठा पटक और जोड़ तोड़ में सबसे ज्यादा सहज वह मतदाता हुए जो खुद को मध्य मार्गी या प्रगतिशील मानते थे। उनको धर्म की गंदी राजनीति करने वाली जमात का साथ कतई पसंद नहीं आया। हालांकि एनसीपी के नेता मतदाताओं से बार-बार अपील कर गठबंधन का बचाव करते रहे लेकिन मतदाताओं ने भरोसा नहीं किया। पार्टी के संयोजक ने विशेष रूप से सभाएं आयोजित कर कहा था की विचारधारा नहीं चुनावी रणनीति के तहत सोच समझकर गठबंधन का फैसला लिया गया है लेकिन उनका तर्क मतदाताओं के गले के नीचे नहीं उतरा।
छात्रों के दल एनसीपी के हार के पीछे यूनुस सरकार की नकारात्मकता को भी एक प्रमुख कारण के रूप में देखा जा रहा है। शेख हसीना को गाद्दी से उतारे जाने के बाद छात्रों ने यूनुस को देश की कमान सौंपने का रास्ता तैयार किया था। उम्मीद की जा रही थी कि सरकार देश के लोगों के हित में कदम उठाएगी और उसका फायदा प्रकारांतर से छात्रों के दल एनसीपी को होगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सरकार ने जन कल्याण का कोई बड़ा कार्य नहीं किया। समस्याएं जस की तस बनी रही। देश के भीतर कलह बढ़ता ही रहा। अल्पसंख्यक हिंदुओं पर आए दिन हमले होते रहे। सीमा पर भी तनाव कायम रहा। छात्रों को उम्मीद थी की सरकार कुछ अच्छे कदम उठाएगी जिसका फायदा उन्हें चुनाव में अवश्य मिलेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
बांग्लादेश को अब तारिक रहमान की अगुवाई में नई सरकार मिल गई है। हार जीत के कारणों की विवेचना राजनीतिक पंडित अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं। लेकिन सौ की एक बात सभी कह रहे हैं कि यह तो होना ही था। क्योंकि जमात के प्रति लोगों के विचार अच्छे नहीं थे और लोग नौसीखिए (एनसीपी)पर दांव लगाने के लिए कतई तैयार नहीं थे। और अंततः मतदाताओं ने नया नौ दिन पुराना सब दिन की कहावत को चरितार्थ करते हुए बांग्लादेश की बागडोर बीएनपी को सौंप दी।
