चर्चा में है चीन और भारत की करीबी

डॉ दिनेश प्रसाद मिश्र

 

चिकित्सा विज्ञान की दुनिया में एक प्रसिद्ध कहावत है कि ‘जीवधारी एक दूसरे पर निर्भर हैं’। अन्य विषयों के संदर्भ में इसका मोटा आशय यही है कि अगर समाज में कोई घटना होती है तो उसका असर सामाजिक व्यवहार शास्त्र, राजनीति शास्त्र अर्थशास्त्र पर भी पड़ता है।अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ से लगाए गए टैरिफ के बावजूद साल 2025 में भारत और चीन के बीच होने वाले कारोबार को गति मिली है तथा भारत का निर्यात पहले की तुलना में बढ़ गया है। ताजा रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि चीन को होने वाले भारतीय निर्यात में पिछले साल के मुकाबले 5.5 बिलियन डालर की वृद्धि हुई है। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा उच्चतम स्तर पर है लेकिन भारत की ओर से ठहरे हुए चीन को निर्यात में बढ़ोतरी से सकारात्मक संकेत मिलते हैं।
वर्तमान वैश्विक भू राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए अधिकांश देश आपस के छोटे-मोटे रगड़े से ऊपर उठकर वृहत्तर लाभ के लिए संजीदगी के साथ काम कर रहे हैं। भारत और चीन भी इस दिशा में लंबे समय से प्रयत्नशील हैं। इस वर्ष 2026 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत आने की संभावना है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए उन्हें निमंत्रण दिया गया है और उन्होने आने का भरोसा भी दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही घोषणा की है कि वैश्विक दक्षिण के हितों को ध्यान में रखते हुए अगला सम्मेलन सहयोग और स्थिरता के लिए क्षमता निर्माण और नवाचार पर केंद्रित होगा।
मालूम हो कि पूर्व में चीन के तियानजिन में हुए शंघाई सहयोग संगठन के सम्मेलन के दौरानभारत के प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत और चीन के बीच संबंधों को बेहतर बनाने के लिए सीमा क्षेत्र में शांति और स्थिरता लाने हेतु गंभीर बातचीत के साथ आगे बढ़ाना आवश्यक है। समझा जाता है कि दोनों देशों के सत्ताधारी दल आपसी समझदारी के साथ विवादित मुद्दों को सुलझाने और आर्थिक रूप से मजबूती की ओर बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
भारत और चीन के मध्य जारी कूटनीतिक कोशिशों के बीच दोनों देशों के सत्ताधारी दलों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने के लिए भेंट मुलाकात हुई। चीन के राजदूत की उपस्थिति में हुई भेंट के दौरान आपसी सद्भाव और आपसी सम्मान के साथ आगे बढ़ने पर जोर दिया गया। यह अलग बात है कि भारत के विपक्षी दलों कोई अपडेट हजम नहीं हुई। विपक्षी दलों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया देने की बजाय राजनीति को ही प्रमुखता दी।

वास्तव में, भारत-चीन संबंधों को सामान्य बनाने का काम पिछले साल अक्तूबर में ही शुरू हो गया था, जब कजान में दोनों शीर्ष नेताओं ने मुलाकात की थी। इसके बाद विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत हुई। इन बैठकों में मुख्य रूप से सीमा पर तनाव, भारत-चीन व्यापार असंतुलन, हवाई सेवा ववीजा सेवा की पुनर्बहाली, द्विपक्षीय संबंधों के भविष्य जैसे मुद्दों पर चर्चा होती रही। तियानजिन शीर्ष स्तर पर इन्हीं मुद्दों पर विचार साझा करने का मंच बना, जिसके सकारात्मक परिणाम निकल सकते हैं।
मौजूदा वैश्विक हालात के लिहाज से भी यह मुलाकात खासा अहम थी। दरअसल, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति के कारण वैश्विक आर्थिक समीकरण तेजी से बदले हैं। इसका असर भारत और अमेरिका के संबंध पर भी पड़ा है। ऐसे में, पूरी दुनिया की नजर इस पर थी कि भारत और चीन जैसी दो बड़ी आर्थिक ताकतें अपने विवादों को किनारे करके किस गर्मजोशी के साथ बातचीत की मेज पर बैठती हैं। मोदी और जिनपिंग ने निराश नहीं किया। बैठक के बाद भारत और चीन की तरफ से जो अलग-अलग बयान आए , उनसे यही लगा कि संबंधों का नया दौर अब शुरू होने वाला है।
यह सही है कि उस मुलाकात के बाद कोई साझा वक्तव्य जारी नहीं किया गया, लेकिन जो बातें कही गईं, उनमें काफी कुछ समानता थी। मसलन, दोनों देशों ने इसका स्वागत किया कि आपसी संबंध अब सुधरने लगे हैं। उन्होंने इस पर भी रजामंदी जताई थी कि गलवान झड़प के बाद सीमा पर पैदा हुए तनाव को खत्म करने में सफलता मिली है और वहां शांति व स्थिरता आई है। यह स्पष्ट संकेत है कि ट्रंप की नीति और सीमा पर सुधरते हालात ही दोनों पड़ोसी देशों के बीच संबंध-सुधार के आधार बने हैं।
हालांकि, अब भी कई ऐसे मसले हैं, जो किसी चुनौती से कम नहीं। पहला, आपसी विश्वास बहाली के उपाय जरूर किए जा रहे हैं, लेकिन अब तक पूरा विश्वास नहीं जम सका है। दूसरा, सीमा पर शांति व स्थिरता तो बहाल हो गई, मगर असली मुद्दा सीमा-विवाद का समाधान है। सीमा समझौते अब हो जाने चाहिए और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार व विशेष प्रतिनिधि के स्तर पर जो बातचीत चल रही है, उसे अंजाम तक पहुंच जाना चाहिए।
भारत ने कई बार यह स्पष्ट कर दिया है कि सीमा पर शांति और स्थिरता एक ‘बीमा पॉलिसी’ है, जो द्विपक्षीय संबंध में सुधार के लिए जरूरी है, जबकि चीन सीमा विवाद को अपेक्षाकृत कम तवज्जो देते हुए अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की वकालत कर रहा है। विचारों का यह अंतर बताता है कि चीन जहां आपसी रिश्ते को तत्काल गति देना चाहता है, वहीं नईदिल्ली फूंक-फूंककर कदम आगे बढ़ाने की इच्छुक है। मतभेद को ‘
विवाद का रूप न देने की बात भी कही गई, साथ ही चीन ने भारत की इस सोच पर हामी भरी कि संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए आपसी विश्वास, आपसी सम्मान और आपसी संवेदनशीलता की जरूरत है।
उस मुलाकात से यह संदेश भी निकला था कि दोनों देश एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि सहयोगी के रूप में देखना चाहते हैं। दोनों एक-दूसरे के यहां निवेश बढ़ाने को भी तैयार हुए हैं। मगर इसका यह अर्थ नहीं है कि दोनों देशों में विश्वास बहाल हो गया है। यह काफी कुछ सीमा के हालात और विशेष प्रतिनिधियों की आपसी बातचीत पर निर्भर करेगा। चूंकि अभी ब्रिक्स की अध्यक्षता हमारे पास है, जिसका अगला सम्मेलन भारत में होगा, लिहाजा मोदी ने जिनपिंग को भारत आने का न्योता दिया है, जिसका मतलब है कि अगले साल फिर से दोनों शासनाध्यक्षों की बैठक होगी, जहां से इस बदलते रिश्ते को नई दिशा मिल सकती है।
दोनों देशों के संबंध में एक पहलू पाकिस्तान भी है। आतंकवाद पर ठीक-ठाक बातचीत होनी चाहिए। चूंकि, दोनों देश यह चाहते हैं कि किसी तीसरे देश के नजरिये से आपसी संबंध प्रभावित नहीं होने चाहिए, इसलिए भारत की जहां यह सोच होगी कि अमेरिका के साथ उसके रिश्ते को चीन दरगुजर करे, तो उसी तरह बीजिंग की भी मंशा यही होगी कि पाकिस्तान-चीन रिश्ते का असर भारत-चीन संबंध पर न पड़े। हालांकि, चीन के साथ रिश्तों में सुधार का दीर्घकालिक लाभ हमें जरूर होगा, पर इतिहास को देखते हुए लगता यही है कि सुधार की यह प्रक्रिया लंबी और जटिल होने वाली है, जिसमें कई उतार-चढ़ाव आ सकते हैं।
बाहर हाल भारत सरकार की ओर से जारी की गई रिपोर्ट में चीन के साथ भारत के निर्यात बढ़ने की पुष्टि हुई है।वहीं चीन के कस्टम विभाग की ओर से जारी आंकड़ों में भी 2025 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षी व्यापार अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 155.62 बिलियन डॉलर पर पहुंच गया है।लेकिन हमें यहां यह याद रखना होगा कि भारत और चीन के व्यापार में सबसे बड़ी समस्या व्यापार घाटे की रही है यानी कि भारत चीन को बेचता कम है, खरीदता ज्यादा है जो कि हमारे आत्मनिर्भर स्वावलंबी भारत के सिद्धांतों के सर्वथा प्रतिकूल है।

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