सिर मुड़ाते ही ओले पड़े…

अनिल तिवारी

 

दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के कगार पर खड़े भारत के विश्व गुरु बनने के प्रयासों को झटका लगा है। नोएडा के एक निजी विश्वविद्यालय की कुत्सित कारस्तानी के चलते सरकार की काफी किरकिरी हुई है। हालांकि सरकार के संतुलनकारों की ओर से डैमेज कंट्रोल के तहत मामले पर मिट्टी डालने की कोशिश की जा रही है लेकिन सब जानते हैं कि धनुष से निकला तीर वापस नहीं आता है।
नई दिल्ली के भारत मंडपम में इस समय ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ की थीम पर एआई इंपैक्ट सम्मिट चल रहा है। बाजार बढ़ाने के साथ सभी के फायदे के लिए एक समावेशी तकनीक पर केंद्रित इस आयोजन ने देश में एआई को लेकर एक हलचल जरूर पैदा की लेकिन इसकी खामियां उस पर भारी पड़ी हैं। इसे लेकर सरकार को सफाई भी देनी पड़ी है जिसके चलते वैश्विक महत्व के इस आयोजन की साख भी दांव पर है।
मालूम हो कि आयोजन में शामिल गलगोटिया विश्वविद्यालय ने चीनी रोबोटिक डॉग को विश्वविद्यालय द्वारा विकसित रोबोट बताया। विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नेहा सिंह ने इस बारे में सरकारी टीवी चैनल दूरदर्शन को इंटरव्यू देते हुए विस्तार से बताया की उनकी फैकल्टी द्वारा लगभग 350 करोड रुपए खर्च करके इस रोबोटिक डॉग को तैयार किया गया है। इसे बनाने में विश्वविद्यालय में पूरे एक वर्ष खर्च किए हैं। सरकार के डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को जमीन पर उतरने के लिए उन्होंने विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया। दूरदर्शन पर रोबोटिक कुत्ते की खबर प्रसारित होते ही देश दुनिया के स्तर पर क्रिया प्रतिक्रिया होने लगी। केंद्रीय मंत्री अश्विन वैष्णव ने विश्वविद्यालय के प्रयास की प्रशंसा की तथा प्रधानमंत्री के नेतृत्व में इसे भारत की महान उपलब्धि बता दिया। सरकार के प्रवक्ता भी भारत के डिजिटल सुपर पावर होने का दावा करने लगे।
लेकिन जैसे ही वास्तविकता सामने आई कि यह रोबोटिक डॉग चीन का है जिसकी कीमत बाजार में केवल 2 लाख से 8 लाख तक है तो चारों तरफ आलोचना होने लगी। देश के विरोधी दलों के साथ-साथ वैश्विक नेता गण भी चुटकी लेने में पीछे नहीं रहे। सरकार के भी कान खड़े हो गए। इस वैश्विक समिट के जरिए दुनिया भर में अपना चेहरा चमकाने, एआई के लिए बड़ा बाजार बनाने में जुटे बड़े लोग डैमेज कंट्रोल में लग गए। केंद्रीय मंत्री ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया वही दूरदर्शन से इंटरव्यू वाली बाइट हटा दी गई। आयोजन स्थल से यूनिवर्सिटी के पवेलियन को खाली कराने के लिए बिजली काटनी पड़ी। इसे कहते हैं “चले थे हरि भजन को अब ओटन लगे कपास”।
यहां कई एक सवाल खड़े होते हैं लेकिन सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर किसी निजी विश्वविद्यालय को इतना बड़ा झूठ बोलने की जरूरत ही क्यों पड़ी? इससे विश्वविद्यालय को क्या मिला और वह क्या हासिल करना चाहता था? जवाब में जितने मुंह उतनी बातें हैं। कोई कह रहा है फंड का मामला है। कोई कह रहा है प्रचार का मसला है। विश्वविद्यालय प्रशासन माफी मांगते हुए कह रहा है कि रोबोटिक डॉग के बारे में बताते हुए उसकी जुबान फिसल गई आदि -आदि।
लेकिन मेरी समझ में इसका कम शब्दों में और सीधा उत्तर यही हो सकता है कि एआई के मामले में भारत केवल और केवल एक उपभोक्ता देश है, आविष्कारक नहीं। दुनिया भर के आविष्कारक देशों की नजर इसी उपभोक्ता प्रधान भारत पर है। ध्यान रहे कि भारत शोध और अनुसंधान पर अभी भी अपनी जीडीपी का महज 0.7% ही खर्च करता है। हमारे देश के अन्वेषणकर्ताओं ने समय-समय पर चेताया है कि शोध पर सरकार का आवंटन अमेरिका और चीन द्वारा उनके जीडीपी के लगभग तीन प्रतिशत खर्च करने की तुलना में ऊंट के मुंह में जीरा ही है।
झूठ बोलने की यह घटना निहितार्थ के मोर्चे पर भले ही छोटी सी है लेकिन इसके फलितार्थ आशंकित करने वाले हैं। प्रेमचंद ने लिखा है कि ‘सच जब तक जूता पहना है झूठ तब तक दुनिया घूम के आ जाता है।’ विश्वसनीयता बड़ी चीज होती है, उसे हर हाल में कायम रखना ही होगा और इसके लिए जरूरी है की सरकार फंड का अधिक से अधिक आवंटन करें, हमारे वैज्ञानिकों को आवश्यक साजो सामान देकर उत्साहित करें ताकि हमारे अनुसंधानकर्ता चीन का रोबोटिक कुत्ता दिखाने की बजाय हमारा रोबोटिक हाथी हाजिर कर सकें।

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