लोकतंत्र तो मजबूत हुआ, पर गणतंत्र का “गण” अब भी कमजोर

अनिल तिवारी

 

भारतीय गणतंत्र के 76 साल पूरे हो गए। इन 76 सालों में बतौर राष्ट्र भारत ने लंबा सफर तय किया है। इस सफर में उतार-चढ़ाव है, कामयाबियां है, लगातार परेशान करने वाली समस्याएं हैं तो भविष्य की चुनौतियां भी हैं, लेकिन इन सबके बीच भारत के कदम मजबूती के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
बीते 76 सालों में सबसे बड़ी कामयाबी भारत में लोकतांत्रिक ढांचे का बना रहना, और समय के साथ अधिक सुदृढ़ होना है। यह इसलिए भी अहम है क्योंकि पड़ोसी देशों में लगातार फौजी हुकुमतो का बोलबाला रहा है। चाहे वह पाकिस्तान हो या फिर बांग्लादेश। शांति और स्थायित्व का भरोसा यहां है। लोकतंत्र के इस सफर में भारतीय राजनीति में एक और अहम बदलाव हुआ है। नब्बे के दशक के पहले तक देश में एक ही राजनीतिक दल का बोलबाला हुआ करता था। लेकिन अब देश ही नहीं राज्य स्तरों पर भी गठबंधन की राजनीति का चलन है। 42 राजनीतिक दलों को एक साथ लेकर अटल बिहारी बाजपेई ने जब केंद्र की सरकार बनाई तो कई राजनीतिक विश्लेषकों को भरोसा नहीं हो रहा था कि सरकार टिकाऊ होगी लेकिन न्यूनतम साझा कार्यक्रम के झंडे के तहत गठजोड़ की सरकार ने कार्यकाल पूरा किया। उसके बाद कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग की सरकार भी 10 साल तक चली।वर्ष 2014 से ही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग गठबंधन की केंद्र में सरकार है। बहुत लोग हैं जो गठबंधन की राजनीति को लोकतंत्र के लिए उपयोगी नहीं मानते लेकिन सही मायने में मजबूत लोकतंत्र की आधारभूत बात यही है कि सरकार या फिर कोई राजनीतिक दल बहुत ज्यादा मजबूत ना हो, नहीं तो ऐसी सरकारें और राजनीतिक दल मनमानी पर उतर आते हैं। इस लिहाज से लोकतंत्र में पार्टियां जितनी कमजोर होगी लोकतंत्र उतना ही मजबूत होता है।
दूसरी कामयाबी भारत की आर्थिक तरक्की का है। दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में शुमार भारत की आर्थिक बुनियाद का ढांचा इसका अंदरूनी ग्रोथ है। इसमें स्थिरता का भाव ज्यादा है। यही वजह है कि जब दुनिया की तमाम आर्थिक ताकते चरमरा गई थी, तमाम आशंकाओं के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पटरी पर रही। चीन की तरह भारत की आर्थिकी एक्सपोर्ट आधारित नहीं है। यही कारण है कि दुनिया भर के कारोबारी भारतीय बाजार को ललचायी नजर से देख रहे हैं। उदारीकरण के बाद यह ट्रेंड और अधिक विकसित हुआ है। पहले हम दिन को पहरों और घंटों में नापते थे, लेकिन अब एक आम भारतीय भी एयर टाइम का पेमेंट करता है। मोबाइल फोन पर हर सेकंड के लिए हम आप या यूं कहें कि कुल करीब 90 करोड़ से अधिक भारतीय एक एक सेकंड का पैसा अदा करने में सक्षम हो गए हैं। शायद यह तकनीकी क्रांति के रास्ते आई आर्थिक क्रांति के चलते संभव हो पाया है।
भारत की अर्थव्यवस्था नेहरूवादी समाजवाद का खोल उतारकर निजी, देशी-विदेशी पूंजी के नेतृत्व में उदारीकरण, भूमंडलीकरण की राह पर सरपट दौड़ रही है। विकास वृद्धि दर के लिहाज से भारत आज दुनिया की दूसरी सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ पिछले 25 वर्षों में देश में खूब समृद्धि की आई है। समृद्धि भले ही देश के सभी वर्गों तक नहीं पहुंची हो, लेकिन अमीरों के अलावा उच्च मध्यम वर्ग के बड़े हिस्से को इसका जबरदस्त लाभ हुआ है। आश्चर्य नहीं कि कभी गरीबी के कारण विशेष पहचान वाले देश में अरबपतियों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है।
तमाम अनुमानों और सर्वेक्षणों के मुताबिक डॉलर अरबपतियों की सूची में भारत अमेरिका और चीन के बाद दुनिया भर में तीसरे स्थान पर है। यही नहीं भारतीय डालर अरबपतियों की कुल संपदा चीनी अरबपतियों की संख्या से काफी अधिक है। इस मायने में भारत अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है। साफ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की हालिया गतिशीलता के साथ देश में संपदा बरस रही है। करोना महामारी के दौरान भी सरकार के चहेते पूजीपतियों की संपत्ति में बहुत वृद्धि हुई । आज भारतीय अर्थव्यवस्था 3.46 खरब डालर की हो चुकी है। निश्चय ही अर्थव्यवस्था के चमत्कारी प्रदर्शन ने दुनिया भर का ध्यान खींचा है। हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुके हैं। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार पर दांव लगाने के लिए दुनिया भर की बड़ी-बड़ी कंपनियां कतार लगाए खड़ी है। कहा जा रहा है कि आने वाले दशकों में भारत चीन की अर्थव्यवस्था को भी पीछे छोड़ वैश्विक अर्थव्यवस्था के इंजन के रूप में काम करेगा।
लेकिन चिंता की बात यह है कि आज से 76 साल पहले 26 जनवरी 1950 को जिस “गण” की सेवा के लिए भारत गणतंत्र बना, उस गण को तेजी से दौड़ रही अर्थव्यवस्था के बहुत कम लाभ मिले है। खुद सारे सरकारी आंकड़े इस तथ्य की गवाही दे रहे हैं। देश में गरीबी की रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वालों का सही अनुमान लगाने के लिए गठित नीति आयोग की समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि देश में गरीबों की संख्या कुल आबादी का अब भी 23% के आसपास है। यह नीति आयोग के मौजूदा अनुमान 22% से ज्यादा है, लेकिन उससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि जब देश में अर्थव्यवस्था एक सम्मानजनक रफ्तार से कुलांचे भर रही थी और समृद्धि और उसके साथ डालर अरबपतियों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही थी, उस समय देश में गरीबों की तादाद में सालाना मात्र 0.83% की कमी ही दर्ज की गई।
सवाल है कि अर्थव्यवस्था से निकल रही जबरदस्त समृद्धि आखिर कहां जा रही है? निश्चय ही इस सवाल का एक सिरा देश में डालर अरबपतियों की संख्या में तेजी से हो रही वृद्धि से जुड़ता है। जाहिर है कि यह सिर्फ संयोग नहीं है कि डालर अरबपति देश की कुल जनसंख्या के मात्र 0.00001 प्रतिशत हैं जबकि देश की सकल घरेलू उत्पाद के एक चौथाई हिस्से पर उनका कब्जा है। दूसरी ओर वर्ष 2008 में सरकार द्वारा गठित अर्जुन सेनगुप्ता समिति ने निष्कर्ष निकाला था कि देश की कुल आबादी का 78% हिस्सा प्रतिदिन ₹20 से कम की आय पर गुजर कर रहा है। करोना काल के पहले हुए एक अध्ययन में यह रकम ₹20 प्रति दिन से बढ़कर ₹32 प्रति दिन हो गई थी। तथ्य है कि देश में गैर बराबरी बढ़ी है। सच पूछिए तो आज गरीबी से कहीं अधिक आर्थिक विषमता और गैर बराबरी भारतीय गणतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। यह गैर बराबरी कई रूप में उभरकर हमारे सामने आ रही है। इसका एक रूप तो महंगाई में भी देखा जा सकता है। क्या यह चिंता की बात नहीं है कि गणतंत्र बनने के बाद देश ने अन्न उत्पादन में बहुत तरक्की की, लेकिन प्रति व्यक्ति प्रतिदिन खाद्यान्न की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है। उदाहरण के लिए 1951 में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन अनाज और दालों की उपलब्धता क्रमशः 334 और 61 ग्राम,यानी कुल 394 ग्राम थी, वह आर्थिक तरक्की के साथ बढ़ते हुए 1971 में लगभग 417 और 52 ग्राम,यानी कुल 469 ग्राम और 1991 में 468 और 42 ग्राम कुल 510 ग्राम हो गई, लेकिन वर्ष 2007 से ही यह उतार पर है। 2007 में घटकर 407 और 35 ग्राम यानी कुल 442 ग्राम रह गई थी जो आगे और कम हो करके 398 और 36 ग्राम यानी कुल 434 ग्राम ही रह गई थी। वर्ष 21-22 में यह और कम होकर अनाज 282 ग्राम दाल 45 ग्राम यानी कुल 327 ग्राम तक नीचे आ चुका है।साफ है कि आज देश में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन अनाज और दालों की उपलब्धता 1971 से भी कम हो गई है। हालांकि कई लोगों का यह भी कहना है कि आर्थिक समृद्धि के साथ खानपान के व्यवहार में बदलाव आया है और लोगों ने अनाजों के बजाय अंडे, मांस, दूध, सब्जियां, फल फूल अधिक खाना शुरू कर दिया है।
यह दावा हवा में नहीं है, इस बारे में सच्चाई है, लेकिन बहुत कम रुपए पर गुजर-बसर करने वाले 90 करोड़ लोगों के लिए सच यही है कि उन्हें हर दिन दोनों जून दाल रोटी के लिए ही संघर्ष करना पड़ रहा है। यही कारण है कि पिछले 76 वर्षों में आर्थिक तरक्की की तेज रफ्तार के बावजूद हमारे गणतंत्र का गण कहीं पीछे छूटता जा रहा है। वह अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा है। यही नहीं, कहीं ना कहीं उसे यह भी लगने लगा है कि अर्थव्यवस्था के कर्ताधर्ताओं को उसकी परवाह नहीं रह गई है। जबरदस्त आर्थिक तरक्की के बावजूद 76 साल के हुए गणतंत्र के लिए यह चिंता और उससे अधिक गंभीर चिंतन का विषय होना चाहिए। आखिर “गण को नजरअंदाज करके देश को आगे ले जाने का दावा करने वाला तंत्र किस तरह का गणतंत्र बनाना चाहता है इसकी भी समीक्षा होनी चाहिए। क्षेत्रीय दलों की बैसाखी पर टिकी केंद्र की सरकार आंकड़ों में गरीबों का दायरा घटना का दावा कर रही है लेकिन लगे हाथ देश के अत्यंत जरूरतमंद 85 करोड लोगों को जीवन यापन के लिए चार-पांच किलो राशन मुफ्त में बांट रही है।क्या यह फ्री की रेवड़ी हमारी अर्थव्यवस्था की मजबूती के खोखले दावों की कलई नहीं खोलती? सत्ता तंत्र द्वारा मुफ्त का लालच दे देकर गण को लुभाने, बहकाने और अपने पाले में बनाए रखने के लिए घोषित तौर पर किए जा रहे जायज नाजायज फैसलों की भी समीक्षा होनी चाहिए। अगर तंत्र गण के भलाई के लिए है तो फिर तंत्र द्वारा गण को केंद्र में रखकर गणतंत्र को मजबूत आधार प्रदान करना चाहिए।

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