अनिल तिवारी
उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर स्थित बलिया जनपद का मशहूर ददरी मेला हिंदू पंचांग से प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा पर लगता है तथा इलाके की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र तो बनता ही है, वहां साहित्यिक जमावड़ा भी खूब होता है। आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रथम पुरुष भारतेंदु हरिश्चंद्र मंच की ओर से साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला पूरे महीने भर चलती रहती है। इस मंच को समृद्ध करने वालों की एक लंबी परंपरा और उनका इतिहास साहित्य के समक्ष साक्षी भाव से विद्यमान है। मौजूद फेहरिस्त का जब हम सांगोपांग समीक्षा करते हैं तो सबसे सुरीला स्वर हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का ही सुनाई देता है। अपने साहित्य सृजन, आलोचना, इतिहास दृष्टि, और खासकर ललित निबंधों से चमत्कृत कर देने वाले द्विवेदी जी ने समर्पण भाव से इसे सींचा, आगे बढ़ाया और एक नई दिशा दी। एक सौ अठारह साल पहले उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के ओझवलिया गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रात की और वह भी ज्योतिष शास्त्र में। उनकी वेशभूषा पंडितों जैसी थी। उनके लेखन का बड़ा हिस्सा परंपरा के विश्लेषण और मूल्यांकन से संबद्ध है। वे अपने लेखन में प्रायः संस्कृत और आवश्यकतानुसार प्राकृत और अपभ्रंश आदि भाषाओं से उद्धरण देते हैं। यही नहीं, वे अपने लेखन में धार्मिक, पौराणिक प्रसंगों, प्रतीकों, मिथकों और शब्दों का बार बार प्रयोग करते हैं। इन सब तथ्यों के कारण उन्हें परंपरावादी और पंडिताऊ किस्म का विद्वान समझा जाता रहा है। लेकिन उनका लेखन ही इस बात का प्रमाण है कि न तो वे रूढ़ अर्थों में परंपरावादी थे और न ही उनका लेखन पंडिताऊ किस्म का है। इसके विपरीत वे सच्चे अर्थों में संस्कृति और साहित्य के आधुनिक दृष्टि संपन अध्येता और संवेदनशील रचनाकार थे। उनका संपूर्ण लेखन जनोन्मुखी, लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से गहरे रूप से न केवल प्रभावित है बल्कि वे संपूर्ण परंपरा का अवलोकन व मूल्यांकन इन्हीं आधुनिक मूल्यों द्वारा करते हैं। यह अवश्य है कि उनके लेखन और जीवन दर्शन में कई तरह के अंतरविरोध भी निहित हैं लेकिन ये अंतरविरोध इन बुनियादी जीवन मूल्यों के प्रति उनकी सच्ची और गहरी आस्था को कहीं भी खंडित नहीं करते।
द्विवेदी जी ने अपने लेखन की शुरुआत बीसवीं सदी के जिस दौर में की थी उस समय देश में आजादी का संघर्ष अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर रहा था। इस दौर में यदि एक ओर वामपंथी आंदोलन का उदय हो रहा था तो दूसरी ओर हिंदू और मुसलिम सांप्रदायिक शक्तियां भी तेजी से बढ़ रही थीं। पाकिस्तान की मांग सामने आ चुकी थी। आजादी की तरफ बढ़ते कदम के साथ यह सवाल भी सामने आ रहा था कि आजाद भारत कैसा होगा? उसमें गरीबों, दलितों, स्त्रियों को भी क्या वैसी ही आजादो और वैसे ही अधिकार मिलेंगे जो अमीरों, ऊंची जाति वालों और पुरुषों को प्राप्त होंगे। बाबा साहब अंबेदकर दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग रख चुके थे। इसी दौरान देश को आजादी भी मिली और पूर्व और पश्चिम के कुछ हिस्से अलग होकर एक नया देश पाकिस्तान अस्तित्व में आया। बंगाल का विभाजन होकर पूर्वी पाकिस्तान बना। विभाजित भारत ने फिर भी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनाने का भी फैसला किया।
यह दौर विश्व स्तर पर भी
अशांति और संघर्षों का दौर था। यूरोप में साम्राज्यवादी देशों के पारस्परिक अंतरविरोधों ने तथा अंधराष्ट्रवाद और नस्लवाद के गठजोड़ से पैदा हुए फासीवाद ने उसे विश्वयुद्ध में धकेल दिया। इस युद्ध की चपेट से एशिया और अफ्रीका के वे देश भी नहीं बच सके जो साम्राज्यवादी देशों द्वारा उपनिवेश बनाए गए थे। जर्मनी के तत्कालीन शासक हिटलर ने साठ लाख यहूदियों को यातना शिविरों में तड़पा-तड़पा कर मार डाला। इस युद्ध में करोड़ों सैनिक और असैनिक मारे गए। अमेरिका द्वारा जापान के दो शहरों पर अणु बम का इस्तेमाल किया गया। इस पृष्ठभूमि को नजर में रखे बिना हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेखन को नहीं समझा जा सकता।
गुरुदेव और द्विवेदी जी
हिंदी शिक्षक के रूप में हजारी प्रसाद द्विवेदी जी 23 वर्ष की अवस्था में 1930 में शांति निकेतन चले गए और बीस वर्ष तक ये वहां अध्यापन कार्य करते रहे। लगभग बारह वर्ष तक उन्हें रवींद्र नाथ ठाकुर के निकट संपर्क में रहने का अवसर मिला। (हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली खंड आठ पृष्ठ 271) साथ ही इन बीस सालों में वे शांति निकेतन में कार्य करने वाले तत्कालीन विद्वानों, शिक्षकों और कलाकारों के भी निकट संपर्क में रहे। गुरुदेव और शांतिनिकेतन दोनों ही नवजागरण और स्वतंत्रता आंदोलन की उपज थे। रवींद्रनाथ ठाकुर और बंगाल के नवजागरण का गहरा असर उन पर था। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग तो नहीं लिया लेकिन उनका लेखन गहरे रूप में उस संघर्ष से जुड़ा था। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बंगाल की भूमि पर उस समय जहां एक ओर आजादी की लड़ाई में शामिल सभी तरह की धाराओं उग्र राष्ट्रवादी, सांप्रदायिक, उदार राष्ट्रवादी और वामपंथी ताकतों की शक्तिशाली उपस्थिति थी तो दूसरी ओर सांप्रदायिक आधार पर विभाजन की जो आग भभक रही थी उसका बहुत व्यापक और गहरा असर बंगाल पर था। द्विवेदी जी की विश्व दृष्टि का निर्माण आजादी के आंदोलन के दौर में और रवींद्र नाथ ठाकुर की छत्रछाया में रहते हुए हुआ था। वे अपने समय की दो महान विभूतियों से गहरे रूप में प्रभावित थे-गांधी और रवींद्र। रवींद्र नाथ के संसर्ग में रहने का तो उन्हें अवसर मिला ही था, लेकिन वे महात्मा गांधी से भी कम प्रभावित नहीं थे। संस्कृति पर टिप्पणी करते हुए गांधी ने लिखा था-मैं नहीं चाहता कि मेरे घर के चारों ओर दीवारें हों और उसकी खिड़कियां बंद हों। मैं चाहता हूँ कि मेरे घर में सभी देशों की संस्कृतियां मुक्तता से प्रवेश करें। लेकिन मैं यह नहीं चाहता कि उनसे मेरे अपने पैर अपनी जमीन से उखड़ जाएं। मैं किसी दूसरे के घर में जबरदस्ती घुसकर भिखारी या गुलाम की तरह नहीं रहना चाहता (यंग इंडिया-1-6-1921, पृष्ट 170)। गांधी जी इस विचार को नहीं मानते थे कि भारतीय संस्कृति दुनिया की दूसरी संस्कृतियों से निराली और भिन्न है। यंग इंडिया में ही लिखते हुए उन्होंने भारतीय संस्कृति को विभिन संस्कृतियों के संश्लेषण का परिणाम मानते हैं (यंग इंडिया-1-9-1920, पृष्ठ 277)। अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था कि भारतीय सभ्यता विभिन्न आस्थाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्कृतियों का परिणाम है और उस पर उन भौगोलिक और परिवेशगत विशेषताओं का भी प्रभाव है जिन पर संस्कृतियों का मिलन होता है। उन्हीं के शब्दों में अरब, तुर्की, मिस्त्र और भारत में इस्लामी संस्कृति एक सी नहीं है। इन पर उन देशों का प्रभाव है। इसी प्रकार भारतीय संस्कृति भारतीय है। यह न तो हिंदू संस्कृति है न इस्लामी और न ही और कुछ (यंग इंडिया-30-4-1931, पृष्ठ 88)।
यह अकेले गांधीजी के विचार नहीं थे। डिस्कवरी आफ इंडिया में जवाहर लाल नेहरू ने भी लिखा था कि न लोग न जातियां अपरिवर्तनशील होती हैं। वे निरंतर दूसरे के साथ मिलती रहती हैं और धीरे-धीरे अपने को बदलती रहती हैं। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि वे समाप्त हो रही हों लेकिन नए रूप में या पुराने के ही एक बदले हुए रूप में मनुष्य का उदय हो जाता है (पृष्ठ 47)। इसी पुस्तक में वे यह भी कहते हैं कि निसंदेह यह सोचना मूर्खतापूर्ण है कि भारत या किसी अन्य देश में मनुष्य की एक ही पहचान होती है, मैं ऐसा नहीं सोचता। मैं वर्ग, जाति, धर्म, नस्ल और सांस्कृतिक विकास के विभिन्न स्तरों की दृष्टि से भारतीय जीवन में निहित विविधताओं और विभाजनों के प्रति पूरी तरह सजग हूं। फिर भी मैं सोचता हूं कि एक ऐसा देश जिसका लंबा सांस्कृतिक इतिहास है और जीवन के प्रति जहां एक समान दृष्टिकोण है वह अपने लिए अपनी संतानों में एक ऐसी चेतना विकसित कर सकता है चाहे वे संतानें एक दूसरे से कितनी ही अलग-अलग क्यों न हों (पृष्ठ 52)।
ऐसे ही विचार हमें द्विवेदी जी के लेखन में भी मिलते हैं। जब वे लिखते हैं भारतीय संस्कृति पठार पर जमे हुए अनेक बालुकास्तरों की भांति नाना साधनाओं और संस्कृतियों के योग से बनी है (सभ्यता और संस्कृति निबंध से हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली खंड-नौ, पृष्ठ 197)। उनके लेखन का बड़ा हिस्सा इस एक वाक्य को तरह-तरह से व्याख्यायित और प्रमाणित करने का प्रयास है। लेकिन वे भारतीय संस्कृति को विभिन्न संस्कृतियों के योग से निर्मित मानने तक ही अपने विचारों को सीमित नहीं रखते। इस दृष्टि से वे वास्तव में संकीर्ण राष्ट्रवादी धारणाओं से ऊपर उठकर एक सच्चे अंतरराष्ट्रीयतावादी की तरह अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। वे लिखते हैं-मैं संस्कृति को किसी देश विशेष या जाति विशेष की अपनी मौलिकता नहीं मानता। मेरे विचार में सारे संसार के मनुष्यों की एक सामान्य मानव संस्कृति हो सकती है (वही, पृष्ठ 199)। इसी संदर्भ में वे भारतीय संस्कृति की बात करते हैं। वे मानते हैं कि इस मानव संस्कृति के निर्माण में भारतीयों का जो योगदान है वही दरअसल भारतीय संस्कृति की विशिष्टता है। उनके शब्दों में मैं जब भारतीय विशेषण जोड़कर संस्कृति शब्द का प्रयोग करता हूं तो मैं भारत वर्ष द्वारा अधिगत और साक्षात्कृत अविरोधी धर्म की ही बात करता हूं। अपनी विशिष्ट भौगोलिक परिस्थिति में और विशेष ऐतिहासिक परंपरा के भीतर से मनुष्य के सर्वोत्तम को प्रकाशित करने के लिए इस देश के लोगों ने भी कुछ प्रयत्न किए हैं। जितने अंश में वह संसार के अन्य मनुष्यों के प्रयत्नों का अविरोधी है उतने अंश में वह उनका पूरक भी है। भिन्न-भिन्न देशों में और भिन्न-भिन्न जातियों के अनुभूत और साक्षात्कृत अन्य अविरोधी धर्मों की भांति वह मनुष्य की जय यात्रा में सहायक है। वह मनुष्य के सर्वोत्तम को जितने अंश में प्रकाशित और
अग्रसर कर सका है, उतने ही अंश में वह सार्थक और महान है (वहीभारतीय संस्कृति है वही, पृष्ठ 201)।
मानव संस्कृति के अविरोधी अंग के रूप में भारतीय संस्कृति को देखने और समझने की यह दृष्टि द्विवेदी जी को रवींद्र नाथ ठाकुर से मिली थी। अमर्त्य सेन के शब्दों में रवींद्र नाथ अपने इस विश्वास के साथ किसी तरह का समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे कि मनुष्य विभिन्न संस्कृतियों को रचनात्मक रूप में अपने में जज्ब कर सकता है। स्वयं रवींद्र के शब्दों में जो कुछ भी मनुष्य द्वारा निर्मित है वह स्वतः ही हमारा हो जाता है चाहे उसका मूल उत्स कहीं का भी हो। मुझे अपनी मानवता पर गर्व है जब मैं दूसरे देशों के कवियों और कलाकारों को अपना मानता हूं। मनुष्य की समस्त उपलब्धियां मेरी हैं, इस बात को विशुद्ध व प्रसन्नचित भाव से ग्रहण करें (अमर्त्य सेन के आलेख, टैगोर ऐंड हिज इंडिया से उद्धृत, दि आग्र्ग्यूमेंटेटिव इंडियन, पृष्ठ 118-119)। रवींद्र मुक्ति को सबसे बड़ा मूल्य मानते थे। अमर्त्य सेन के शब्दों में टैगोर के लिए इस बात का सबसे अधिक महत्व था कि मनुष्य मुक्त होकर जी सके और सोच सके। राजनीति और संस्कृति, राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता, परंपरा और आधुनिकता इन सब को इसी विश्वास के आलोक में देखा जा सकता है। (वही, पृष्ठ 98)। अपने इस मत के पक्ष में वे गीतांजलि का एक अत्यंत लोकप्रिय गीत उद्धृत करते हैं जिसका भावार्थ है-
जहां मन भय से मुक्त हो और सिर ऊंचा हो, जहां ज्ञान मुक्त हो.
जहां संसार घर की संकीर्ण दीवारों से खंड-खंड न हुआ हो,
जहां विवेक की स्वच्छ धारा मृत आदतों के उदास रेगिस्तान में खो
न गई हो,
मुक्ति के इस स्वर्ग में, मेरे पिता, मेरे देश को ले चल। (आग्र्ग्यूमेंटेटिव इंडियन से उद्धृत, पृष्ठ 98)।
रवींद्र, गांधी और नेहरू के कथनों का उल्लेख यहां इसलिए किया गया है कि इस बात को समझा जा सके कि हजारी प्रसाद के द्विवेदी के लेखन में निहित मानवतावादी दृष्टि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर की उपज है। द्विवेदी जी का अपना चिंतन उस दौर के सर्वोत्तम विचारकों में सबसे नजदीक है। यह विचार न तो संकीर्ण राष्ट्रवाद पर आधारित हैं और न ही संस्कृति की पुररुत्थानवादी, प्रतिक्रियावादी और सांप्रदायिक धारणाओं पर आधारित। स्वाधीनता, धर्मनिरपेक्षता और मिलीजुली संस्कृति को जो लोकतांत्रिक दृष्टि गांधी, रवींद्र और नेहरू के माध्यम से प्रकट हुई थी और जिसे स्वतंत्र भारत की पहचान बनाने का प्रयास आजादी के आरंभिक वर्षों में किया गया था, हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आत्मसात किया था। इस लोकतांत्रिक दृष्टि को वे जीवन के हर पक्ष पर लागू करते हैं। आजादी के दौर में हिंदी में इस दृष्टि को प्रेमचंद ने आत्मसात किया था, लेकिन इस दृष्टि को उन्होंने हिंदी समाज के राजनीतिक, सामाजिक जीवन के माध्यम से व्यक्त किया था। इस दृष्टि को द्विवेदी जी ने भी आत्मसात किया लेकिन इसे उन्होंने भारत के अतीत और सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन के माध्यम से व्यक्त किया। निश्चय ही प्रेमचंद की तरह द्विवेदी जी अपनी दृष्टि को समाजवाद की ओर उन्मुख नहीं कर सके लेकिन उनकी दृष्टि का समाजवाद से विरोध भी नहीं था। उनका संपूर्ण लेखन इस बात की गवाही भी देता है।
ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत
शांति निकेतन में अध्यापक बनकर जाने और रवींद्र के संसर्ग में आने को द्विवेदी जी अपना दूसरा जन्म मानते हैं। पहली ही मुलाकात में रवींद्र ने उनसे आशीर्वचन के रूप में कहा था, यहां का जो कुछ भी उत्तम है उसे लेना और तुम्हारे भीतर जो कुछ सर्वोत्तम है उसे देना। इसे उन्होंने महान गुरुमंत्र माना (हजारी प्रसाद ग्रंथावली, खंड नौ, पृष्ठ 477) और इस पर टिप्पणी करते हुए लिखा था, यह मंत्र सदा सर्वदा मार्गदर्शक सिद्ध हुआ। हर क्षेत्र में जो सबसे अच्छा है उसे ग्रहण करो, गंदगी और गलीज की उपेक्षा करो, जो तुम्हारा सर्वोत्तम है भले ही औरों की दृष्टि में वह नगण्य हो उसे ही दो। त्रुटियां और कमजोरियां तुम्हारी अपनी हैं, उन्हें मत बांटो। यह मंत्र ही मेरी वास्तविक दीक्षा का मंत्र है (वही, पृष्ठ 477)। लेकिन द्विवेदी जी ने रवींद्र से सिर्फ इतनी ही दीक्षा नहीं ली थी। वे अपने साहित्य में बार-बार जो यह बात कहते हैं कि मनुष्य जाति का कल्याण ही साहित्य का लक्ष्य है, उसकी शिक्षा भी उन्हें रवींद्र और गांधी से हो मिली थी। जब वे मनुष्य जाति के कल्याण की बात करते हैं तब उनके सामने संपूर्ण मानव जाति होती है। न भारतीय, न हिंदू, न ब्राह्मण और न ही सिर्फ हिंदी भाषी। डाक्टर धर्मवीर जैसे कुछ लेखक भले हो यह कहें कि वे द्विवेदी पहले थे और डाक्टर बाद में (कबीर के आलोचक, पृष्ठ 94)। लेकिन उनके साहित्य का कोई भी तटस्थ पाठक यह आसानी से पहचान सकता है कि द्विवेदी जी का संपूर्ण लेखन सचेत रूप से जाति, धर्म, राष्ट्र की संकीर्णताओं से मुक्त होकर लिखा गया है। लेकिन ऐसा लेखन यांत्रिक ढंग से नहीं हो सकता। लेखक को वैचारिक प्रतिबद्धता, बौद्धिक तैयारी और संस्कारबद्ध मानसिकता से निरंतर संघर्ष करते हुए लिखना होता है। इन सब के बावजूद लेखन में कुछ अंतरविरोध और कमजोरियां रह सकती हैं और उनको उजागर करना भी एक जरूरी काम है। लेकिन किसी भी लेखक का समग्र मूल्यांकन लेखन में व्यक्त लेखकीय दृष्टि और प्रतिबद्धता से ही किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में द्विवेदी जी द्वारा भारत में जातिवाद की विभीषिका के शिकार दलित वर्ग के बारे में व्यक्त किए गए विचारों को जानना सर्वाधिक उपयुक्त होगा।
दलितों के प्रति द्विवेदी जी की सहानुभूति सिर्फ कबीर पर पुस्तक लिखने से ही व्यक्त नहीं हुई है। उनके उपन्यास और निबन्ध लेखन भी इसके प्रमाण हैं। वे निबंधों में, जहां भी अवसर मिलता है इस समस्या पर टिप्पणी करने से नहीं चूकते हैं। वे यह बताना नहीं भूलते कि जातिवाद भारत के विकास का सबसे बड़ा अवरोध है। अपने एक निबंध में जाति भेद के दुष्परिणामों पर विचार करते हुए वे कवि रवींद्र की एक कविता का भावार्थ उद्धृत करते हैं, जिसे तुमने नीचे फेंक रखा है, वह तुम्हें नीचे से जकड़कर बांध लेगा, जिसे तुमने ढक रखा है, वह तुम्हारे समस्त मंगल को ढककर घोर व्यवधान की सृष्टि करेगा। (हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली, खंड दस, पृष्ठ 26)। द्विवेदी जी यह नहीं मानते कि कोई सुधारवादी तरीका इस गहन समस्या का समाधान कर सकता है। वे लिखते हैं कि इस देश में बहुत से साधुमना व्यक्ति हैं जो समझते हैं कि वेद पढ़ा देने या जनेऊ पहना देने से इन जातियों का उद्धार हो जाएगा। बहुत से लोग इनका बनाया हुआ अन्न ग्रहण कर लेने के कारण अपने को बड़ा सुधारक समझते हैं। यह मनोवृत्ति उचित नहीं है। जन जागृति जिस दिन सचमुच होगी, उस दिन ऊंची मर्यादा वाले इनका उद्धार नहीं करेंगे, ये स्वयं अपनी मर्यादा बनाएंगे। वह एक अपूर्व समय होगा जब शताब्दियों से पददलित, निर्वाक, निरन्न जनता समुद्र की लहरियों के फूत्कार के समान गर्जन से अपना अधिकार मांगेगी। उस दिन हमारी सभी कल्पनाएं न जाने क्या रूप धारण करेंगी जिन्हें हम भारतीय सभ्यता, हिंदू संस्कृति आदि अस्पष्ट भुलाने वाले शब्दों से प्रगट किया करते हैं। मैं हैरानी के साथ सोचता हूं कि क्या हममें उस महान ऐतिहासिक घटना को सहने का साहस है। निसंदेह यह जागृति धर्म और समाज सुधार का सहारा नहीं लेती। वह आर्थिक और राजनैतिक शक्तियों पर कब्जा करेगी। (प्रायश्चित की घड़ी निबंध, अशोक के फूल से, हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली, खंड नौ, पृष्ठ 445)। द्विवेदी जी जिस स्थिति की कल्पना कर रहे थे और आज वह ऐतिहासिक घटना अनावृत होने की ओर बढ़ रही है और समाज का सवर्ण वर्ग इसका किस तरह सामना कर रहा है, यह भी हमसे छिपा नहीं है। फिर भी यह कहना आवश्यक है कि किसी के जन्म का पता लगाकर उसे ब्राह्मणवादी या ब्राह्मण विरोधी बता देना आसान है और मनमर्जी से आधे-अधूरे उद्धरण चुनकर और उन्हें संदर्भ से काटकर किसी को कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है। हिंदी आलोचना में यह पराक्रम दिखाने की सुदृढ़ परंपरा रही है और यह परंपरा उस ब्राह्मणवाद का अवशेष है जिससे लड़ने का दावा डाक्टर धर्मवीर करते हैं।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि द्विवेदी जी एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे और यह भी दावा नहीं किया जा सकता कि वे परिवार और समाज से मिले संस्कारों से पूरी तरह मुक्त हो गए थे। लेकिन उनका आदर्श ब्राह्मणवाद नहीं था और न ही वे यह मानते थे कि वर्ण व्यवस्था और जातिवाद श्रेयस्कर हैं। इसके विपरीत वे मनुष्य को निरंतर इन पहचानों से मुक्त होकर सिर्फ मनुष्य के रूप में देखने का आग्रह करते हैं। वे कहते हैं इस देश में हिंदू हैं, मुसलमान हैं, ब्राह्मण हैं, चांडाल हैं, धनी हैं, गरीब हैं-विरुद्ध संस्कारों और विरोधी स्वार्थों की विराट वाहिनी हैं, इसमें पद पद पर गलत समझे जाने का अंदेशा है, प्रति क्षण विरोधी स्वार्थों के संघर्ष में पिस जाने का डर है। संस्कारों और भावावेशों का शिकार हो जाने का अंदेशा है। परंतु इन समस्त विरोधों और संघातों से बड़ा और सबको छाकर विराज रहा है मनुष्य। इस मनुष्य की भलाई के लिए आप अपने आपको निःशेष भाव से देकर ही सार्थक हो सकते हैं। (हजारी प्रसाद ग्रंथावली, खंड दस, पृष्ठ 38)। मनुष्य के हित कामना की बात करते हुए वे जाति और धर्म ही नहीं, देश का भी उल्लेख नहीं करते। यही वह मनुष्यत्व है जो हर तरह की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर ही पाया जा सकता है। द्विवेदी जी की पहचान यही मनुष्यत्व है।
साहित्य का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
आधुनिकता की पहली पहचान वे ऐतिहासिक दृष्टि को मानते हैं। द्विवेदी जी जब भी किसी विषय को उठाते हैं तो प्रायः उसे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करते हैं। साहित्य के इतिहास और आलोचना पर लिखते हुए तो उन्होंने ऐसा किया ही है, अपने ललित निबंधों में भी वे प्रायः इसी परंपरा को अपनाते हैं। उनका प्रख्यात ललित निबंध नाखून क्यों बढ़ते हैं? इस दृष्टि से उल्लेखनीय है। नाखून क्यों बढ़ते हैं, के सीधे-सीधे प्रश्न को वे मानव सभ्यता से विकास के साथ जोड़कर देखते हैं। नाखून शरीर का ऐसा हिस्सा है जिसकी सभ्यता के आरंभिक चरण में मनुष्य के लिए उपयोगिता रही होगी, लेकिन आज उसे उसकी वैसी आवश्यकता नहीं है। वे अपने आप से प्रश्न करते हैं कि मनुष्य जब बर्बर रहा होगा तब उसे नाखून की जरूरत रही होगी। धीरे-धीरे वह अपने अंग से बाहर की वस्तुओं का सहारा लेने लगा। वे शस्त्रों के विकास का संक्षेप में इतिहास प्रस्तुत करते हैं। आज नाखून की जरूरत नहीं रह गई है। इसलिए मनुष्य अपने बच्चों को नाखून काटने के लिए कहता है। लेकिन मनुष्य की बर्बरता घटी कहां है। वे कहते हैं मैं मनुष्य के नाखून की ओर देखता हूं तो कभी-कभी निराश हो जाता हूं। ये उसकी भयंकर पाशवीय वृत्ति के जीवंत प्रतीक हैं। मनुष्य की पशुता जितनी बार भी काट दो, वह मरना नहीं जानती। (वही, पृष्ठ 107)। नाखून के बढ़ने को मनुष्य के विकास से भी जोड़कर पेश करते हैं मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है? पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर ? (वही, पृष्ठ 107)। इस तरह उनका यह निबंध हथियारों की होड़ और मनुष्य जाति के सामने प्रस्तुत विनाश के संभावित खतरे को प्रभावशाली रूप में सामने रखता है।
अपने एक अन्य निबंध मेरी जन्मभूमि में वे अपने गांव के बारे में लिखते हुए वहां की विभिन्न जातियों का इतिहास प्रस्तुत करते हैं। यह इतिहास महज मनबहलाव के लिए नहीं बल्कि उसका मकसद यह बताना है कि जो आज जिस रूप में मौजूद है वह पहले वैसा नहीं था। गांव के भड़भूजे का पेशा करने वाली जाति कांदू के बारे में लिखते हैं कि गुप्त सम्राटों ने इन्हें वैश्य की मर्यादा दी। कलवार भी कभी राजपूत सैनिक थे। इसी संदर्भ में वे एक विदेशी विद्वान के इस कथन को दोहराते हैं कि मध्य प्रांत की सभी बनिया जातियों का मूल उत्स राजपूत कुल से है। इसी तरह वे दुसाध, डोम आदि अंत्यज समझी जाने वाली जातियों के उत्स पर विचार करते हुए बताते हैं कि इन्हें आरंभ से ही ऐसा नहीं माना जाता था। वे लिखते हैं अंग्रेज लोग जब देश में राज्य स्थापना में समर्थ हुए तो उन्हें कुछ अत्यंत दुर्दात जातियों का सामना करना पड़ा। उत्तर भारत में अहीर और दुसाध तथा बंगाल में डोम बड़े लड़ाके थे और कानून मानने से सदा इनकार करते थे। (वही, पृष्ठ 98-99)। वे बताते हैं कि बंगाल के डोम सहजिया बौद्ध थे और किसी जमाने में प्रबल पराक्रांत राज्यों के अधीश्वर थे। (वही, पृष्ठ 99)। आगे वे गांव के मंदिरों, पूजास्थलों, विभिन्न देवी-देवताओं का विवरण प्रस्तुत करते हैं और बताते हैं कि किन देवी-देवताओं का संबंध किस आर्य और अनार्य परंपरा से रहा है। इसी संदर्भ में वे नई अवतरित हुई पिलेक मैया का उल्लेख करना भी नहीं भूलते जो दरअसल प्लेग माता है। वे कल्पना करते हैं कि सौ वर्ष बाद यदि कोई कहे कि प्लेग अंग्रेजी शब्द है और यह देवी अंग्रेजी साहचर्य की देन तो निष्ठावान हिंदू शायद कहने वाले का सिर तोड़ देगा। (वहीं, पृष्ठ 100)। इन सब का उल्लेख करते हुए वे इस बात पर अफसोस जाहिर करते हैं कि साहित्य के इतिहास में इन संस्कृति चिन्हों की कोई चर्चा क्यों नहीं है। वे लिखते हैं हमारी भाषा में इनकी स्मृति है। हमारे जीवन में इनका पदचिन्ह है। हमारी चिंता धारा में इनका कोई स्थान होगा ही नहीं, यह कैसे मान लें? परंतु साहित्य का जो इतिहास हमें पढ़ाया जाता है वह क्या मनुष्य की अप्रतिहत विजय यात्रा का कोई आभास देता है? हम क्यों नहीं अपने को पढ़ने का प्रयास करते? (यही, पृष्ठ 100)। द्विवेदी जी के कहे अनुसार यदि हमने अपने को पढ़ने, अपने को जानने का प्रयास किया होता तो हम धर्म, जाति, संस्कृति, राष्ट्र, भाषा और साहित्य संबंधी कई संकीर्णताओं से मुक्त हो गए होते और अपने से जो भिन्न नजर आ रहा है और इसी भित्रता के कारण जिसे हम अपना विरोधी और शत्रु मान लिया है, उसमें अपना प्रतिबिंब देखते और अपने में उसका। इसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के कारण द्विवेदी जी ने हिंदी साहित्य की परंपरा को हिंदी भाषा और हिंदी भाषियों की परंपरा के रूप में ही नहीं देखा था। उसे कहीं ज्यादा व्यापक रूप में देखा थ। ।
भयमुक्त स्वाधीनता का आदर्श
द्विवेदी जी के अनुसार आधुनिकता की दूसरी विशेषता है इसी दुनिया में मनुष्य को सब प्रकार की भीतियों और पराधीनता से मुक्त करके सुखी बनाने का आग्रह। इस संदर्भ में बाणभट्ट की आत्मकथा में बाण को दिया गया महामाया भैरवी के गुरु अधीर भैरव के उपदेश का स्मरण करना उपयुक्त होगा। अघोर भैरव ने कहा था-किसी से न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं। (हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली, खंड एक, पृष्ठ 115)। यह उपदेश कई अर्थों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अघोर भैरव ने उन सच बंधनों का उल्लेख कर दिया है जिससे बंधकर मनुष्य अपने जीवन को अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी नरक बना देता है। मनुष्य ने अपने को जिन रूढ़ियों से जकड़ लिया है वह जकड़न इन्हीं से पैदा होती है। लोग क्या कहेंगे, बिरादरी और समाज वाले क्या सोचेंगे? (लोक का भय), बड़े क्या सोचेंगे (गुरु का भय), ऐसा या वैसा करना धर्म परंपरा शास्त्र के अनुकूल है या नहीं, इससे स्वर्ग मिलेगा या नरक, कौन सा काम किस मुहूर्त में करना उपयुक्त होगा ? (वेद और मंत्र का भय), ऐसे सारे प्रश्नों से जकड़ा मनुष्य न स्वाधीन हो सकता है न उदारमना। रवींद्र की जिस कविता का उल्लेख पहले किया गया है उसमें ऐसी पराधीनता से मुक्त होने की बात कही गई है। डाक्टर नामवर सिंह ने हजारी प्रसाद द्विवेदी के संदर्भ में जिस दूसरी परंपरा की बात कही है वह भी स्वाधीनचेता मनुष्य के लिए ही संभव है। गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर ने जब द्विवेदी जी के सामने यह प्रश्न रखा कि क्या पूर्व पक्ष में के वे ऋषि कुछ कम पूज्य हैं जिनका खंडन उत्तर पक्ष में किया गया है? (दूसरी परंपरा की खोज, पृष्ठ 11), तो एक तरह से उन्होंने द्विवेदी जी का उन चली आ रही रूढ़ियों की जकड़न से मुक्त होने का ही आह्वान किया था। स्वाधीन मनुष्य ही परंपरा और इतिहास को नई दृष्टि से देख सकता है। वही साहित्य के इतिहास को नई दृष्टि दे सकता है।
द्विवेदी जी की मानवतावादी दृष्टि अपने समस्त सोच और चिंताओं के केंद्र में मनुष्य को रखती है। लेकिन यह मनुष्य कोई अमूर्त और रहस्यमय सत्ता नहीं है। इसे वे बार-बार अपने लेखन में स्पष्ट करते हैं। अपने निबंध मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है में वे लिखते हैं जो साहित्य मनुष्य समाज को रोग शोक, दारिद्र्य, अज्ञान तथा परमुखापेक्षिता से बचाकर उसमें आत्मबल का संचार करता है, वह निश्चय ही अक्षय निधि है (हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली, खंड दस, पृष्ठ 25)। अपने लेखन के लिए मनुष्य समाज को परिभाषित करते हुए लिखते हैं-भारत के हजारों गांवों और शहरों में फैली हुई सैकड़ों जातियों और उपजातियों में विभक्त सभ्यता की नाना सीढ़ियों पर खड़ी हुई जनत्ता ही हमारे समस्त कर्तव्यों की लक्षीभूत श्रोता है, उसका कल्याण ही साध्य है। बाकी सब कुछ साधन है। (वही पृष्ठ 29)। वे अपने एक अन्य निबंध मनुष्य की सर्वोत्तम कृति साहित्य में लिखते हैं कि जो जाति जितनी अधिक सौंदर्यप्रेमी हो उसमें मनुष्यता भी उतना ही अधिक होती है। जाति का यह सौंदर्यप्रेम उनके अनुसार उसके साहित्य और कला में व्याप्त रहता है। (वही, पृष्ठ 20) लेकिन वे यह भी कहते हैं कि साहित्य के उपासक अपने पैर के नीचे की मिट्टी की उपेक्षा नहीं कर सकते। हम सारे वाह्य जगत को असुंदर छोड़कर सौंदर्य की वृष्टि नहीं कर सकते। सुंदरता सामंजस्य का नाम है जिस दुनिया में छुटाई और बड़ाई में, धनी और निर्धन में ज्ञानी-अज्ञानी में आकाश पाताल का अंतर हो वह दुनिया वाह्य सामंजस्यमय नहीं कही जा सकती और इसलिए वह सुंदर भी नहीं है। इस वाह्य सुंदरता के ठूह पर खड़े होकर आंतरिक सौंदर्य की उपासना नहीं हो सकती। हमें उस वाह्य असुंदर को देखना ही पड़ेगा। निशस्त्र, निर्वसन जनता के बीच खड़े होकर आप परियों के सौंदर्यलोक की आप कल्पना नहीं कर सकते। साहित्य सुंदर का उपासक है, इसलिए साहित्यिक को असामंजस्य को दूर करने का प्रयत्न करना होगा, अशिक्षा और कुशिक्षा से लड़ना होगा, भय और ग्लानि से लड़ना होगा। सौंदर्य और असौंदर्य का कोई समझौता नहीं हो सकता। सत्य अपना पूरा मूल्य चाहता है। उसे पाने का सीधा और एक मात्र रास्ता उसकी कीमत चुका देना ही है। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता नहीं है। हमारे देश का बाह्य रूप न तो आंखों की प्रीति देने लायक है, न कानों को, न मन को, न बुद्धि को। यह सच्चाई है। (वही, पृष्ठ 36)। ऐसी ओजपूर्ण भाषा में सच कहने का यह साहस द्विवेदी जी के लेखन की ऐसी विशेषता है जिसे डाक्टर नामवर सिंह ने उनके अपने जनपद की विभूति (दूसरी परंपरा की खोज, पृष्ठ 15) कहा है।
व्यक्ति मानव बनाम समष्टि मानव
साहित्य के बारे में द्विवेदी जी के विचारों से स्पष्ट है कि वे साहित्य का लक्ष्य मनुष्य मात्र की कल्याण कामना मानते हैं। यही आधुनिकता की तीसरी विशेषता है। व्यक्ति मानव के स्थान पर समष्टि मानव या संपूर्ण मानव समाज की कल्याण कामना। आधुनिकता के बारे में विचार करते हुए ही वे साहित्य की ऐसी चार प्रवृत्तियों का उल्लेख करते हैं जिन्हें आधुनिकता के दायरे से वे बाहर मानते हैं। ये हैं पुनरुत्थानवाद, रहस्यवाद, काम और यौन को ही महत्व देने वाला साहित्य और मनोविश्लेषणवादी साहित्य। इन चारों पर टिप्पणी करते हुए द्विवेदी जी लिखते हैं- ये चारों प्रकार के विचार आधुनिकतावादी विचारक की दृष्टि में समाज को आगे बढ़ाने के बजाय पीछे ढ़केलते हैं और उस व्यवस्था को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में जीवित रखने में सहायक होते हैं जो समाज के पिछड़े और उपेक्षित अंगों के शीषण पर ही आधारित है (हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली, खंड नौ, पृष्ठ 361)। द्विवेदी जी के इस मत से शायद ही किसी प्रगतिशील और जनोन्मुखी साहित्य के पक्षधर को विरोध हो सकता है। हां, यह जरूर है कि हिंदी में आधुनिकतावादी रचनाकारों के रूप में अपनी पहचान रखने वाले अधिकांश लेखक उपर्युक्त चार में से ही सही किसी न श्रेणी में परिगणित होंगे। मुक्तिबोध ने भी अपने लेखन में आधुनिकता बोध की दो श्रेणियां की थीं और उसके आधार पर एक प्रगतिशील और जनोन्मुखी विचारधारा में यकीन रखने वाले और दूसरे व्यक्तिवाद, मनोविश्लेषणवाद और यौन वर्जनाओं को सब कुछ समझने वाले नई कविता के कवियों के पहचान की थी। (मुक्तिबोध रचनावली भाग पाँच पृष्ठ 176-178)। द्विवेदी जी इस दूसरे तरह के आधुनिकतावादियों को आधुनिकतावाद के दायरे से बाहर कर देते हैं। वैसे भी आधुनिकता कोई नकारात्मक धारणा नहीं है और द्विवेदी जी ने इसे नकारात्मक रूप में लिया भी नहीं है।
हिंदी साहित्य में ललित निबंध का काम द्विवेदी जी ने किया था। उनके बाद के रचनाकारों में निबंध की एक प्रमुख शैली ललित निबंध को हिंदी में प्रतिष्ठा दिलाने यथा विद्यानिवास मिश्र, कुबेर नाथ राय, विवेकी राय आदि के निबंधों को पढ़कर कई बार द्विवेदी जी को भी उन जैसा ही रूढ़िवादी-परंपरावादी मान लिया जाता है लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। प्रकृति के जिन रूपों पर उन्होंने निबंध लिखे हैं और जो काफी लोकप्रिय भी हैं, यदि उनका ध्यान से अध्ययन किया जाए तो यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि वहां भी उनकी दृष्टि मनुष्य के कल्याण पर ही टिकी रहती है। हर कहीं वे मनुष्य की जय यात्रा का उद्घोष करते दिखाई देते हैं। वे मनुष्य को उसकी वैचारिक संकीर्णता और स्वार्थ कामना से मुक्त करने की कोशिश करते नजर आते हैं। अपने प्रसिद्ध निबंध अशोक के फूल में वे मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा की व्याख्या करते हुए लिखते हैं-मुझे मानव जाति की दुर्दम निर्मम धारा के हजारों वर्ष का रूप साफ दिखाई दे रहा है। मनुष्य को जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है। वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। न जाने कितने धर्माचारों, विश्वासों, उत्सवों और व्रतों को धोती-बहाती यह जीवन धार आगे बढ़ी है। संघर्षों से मनुष्य ने नई शक्ति पाई है। हमारे सामने समाज का अब जो रूप है वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है। देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बाद की बात है। सब कुछ में मिलावट है, सब कुछ अविशुद्ध है शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा (जीने की इच्छा)। वह गंगा की अबाधित, अनाहत धारा के समान सब कुछ हजम करने के बाद भी पवित्र है। (हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली, खंड नौ, पृष्ठ 23)। इस निबंध में द्विवेदी जी का पंडित रूप भी निखर कर सामने आता है। वे अशोक के फूल के बहाने भारत में आई विभिन्न जातियों का उल्लेख करते हैं। वे बताते हैं कि न जाने कितनी जातियां यहां आई और आज के भारत वर्ष को बनाने में अपना हाथ लगा गई। (वही, पृष्ठ 20)। अशोक का फूल भी उनके अनुसार गंधरवों व यक्षों की देन है। (वही, पृष्ठ 22)। कुटज निबंध में वे कुटज शब्द की उत्पत्ति पर विचार करते हुए अनुमान लगाते हैं कि यह आर्य जाति का तो नहीं जान पड़ता। (वहीं, पृष्ठ 31)। इसी संदर्भ में वे याद दिलाते हैं कि संस्कृत भाषा में अनेक ऐसे शब्द हैं जो दूसरे भाषा परिवारों से आए हैं। कुटज भी संभवतः आस्ट्रोएशियाटिक परिवार या पुराने साहित्य में जिसे कोल परिवार कहा गया है, का शब्द हो सकता है। कुटज की प्राकृतिक विशेषताओं को विपरीत परिस्थितियों में भी उसकी बनी रहने वाली दुरंत जीवन शक्ति की तुलना मनुष्य की स्वार्थ प्रवृत्ति से करते हुए वे लिखते हैं कि कुटज क्या केवल जी रहा है? वह दूसरे के द्वार पर भीख मांगने नहीं जाता, कोई निकट आ गया तो भय के मारे अधमरा नहीं हो जाता, नीति और धर्म का उपदेश नहीं देता फिरता, अपनी उन्नति के लिए दूसरों का जूता नहीं चाटता फिरता, दूसरों को अपमानित करने के लिए ग्रहों की खुशामद नहीं करता, आत्मोन्नति के लिए नीलम नहीं धारण करता, अंगूठियों की लड़ी नहीं पहनता, दांत नहीं निपोरता, बंगले नहीं झांकता। जीता है और शान से जीता है-(वही पृष्ठ 33)। यह जो स्वार्थ के दायरे से ऊपर उठकर जीने की बात द्विवेदी जी कहते हैं वह मनुष्य की कल्याण कामना के उनके लक्ष्य के अनुरूप है जिसे वे मनुष्य और साहित्य दोनों का लक्ष्य मानते हैं। द्विवेदी जी ने प्रकृति के विभिन्न रूपों पर बहुत से निबंध लिखे हैं और प्रत्येक निबंध में प्रकृति के उस विशिष्ट रूप के इतिहास का विस्तृत लेखा-जोखा भी प्रस्तुत किया है लेकिन यह विवरण अपने ज्ञान का आतंक कायम करने के लिए नहीं जैसा की प्रायः बाद के कई ललित निबंधकारों के यहां नजर आता है। इसके विपरीत उनका मकसद यही रहा है कि वे यह बताएं कि जिसे हम भारत की संस्कृति और परंपरा कह रहे हैं और जिसे हम हिंदू संस्कृति और परंपरा के रूप में पहचाने जाने का आग्रह करते हैं वह कोई शुद्ध आर्य चीज नहीं है। यही नहीं, ऐसी बहुत सी परंपराएं, जिन्हें आज शुद्ध आर्य और हिंदू समझा जा रहा है वे अपने मूल में दरअसल अनार्य हैं। उन अनार्यों को आर्यों ने राजनीतिक संघर्ष में भले ही पराजित कर दिया हो, लेकिन आर्यों के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन पर वे लगातार गहरी छाप छोड़ते रहे हैं। वे इस विवाद में नहीं पड़ते कि जिसे हम आज भारतवर्ष कहते हैं उस भूमि पर कई जातियां आई और यहां आकर बस गईं। वे अपने साथ अपनी सभ्यता और अपनी संस्कृति भी लेकर आई थीं। आज का भारत इन सभी सभ्यताओं और संस्कृतियों के पारस्परिक संघर्ष और सम्मिलन का परिणाम है। वे इस सत्य को कभी भी अपनी नजरों से ओझल नहीं होने देते इसलिए वे अपने लेखन में यह प्रमाणित करते नजर नहीं आते कि भारत ने किसकों क्या-क्या दिया। उनका बल हिसाब-किताब और हानि लाभ पर नहीं रहता जबकि अपने मार्क्सवादी होने का दावा करने वाले कुछ हिंदी के विद्वान ऐसे विषयों पर लिखते हुए यही प्रमाणित करते नजर आते हैं।( दृष्टव्य भगवान सिंह की पुस्तक हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य और डाक्टर राम विलास शर्मा की पुस्तक भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)।
साहित्य में वैज्ञानिक दृष्टि का प्रतिपादन
भारत की सभ्यता और संस्कृति में विभिन्न जातियों और संस्कृतियों के योगदान की बात वे किसी राजनीतिक मकसद से नहीं करते, बल्कि जिस बात की ओर कम ध्यान दिया गया है, वह यह कि इसके पीछे एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी काम करता रहा है। द्विवेदी जी मानव सभ्यता के विकास की बात करते हुए इस बात को नहीं भूलते कि इस पृथ्वी पर मानव जीवन कैसे अस्तित्व में आया और किस तरह मानव विकास करता हुआ आज की मंजिल तक पहुंचा। ब्रह्मांड का विस्तार शीर्षक लेख में वे सृष्टि के विस्तार का वही विवरण प्रस्तुत करते हैं जिसे वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं। यही नहीं, ज्योतिष पर लिखे अपने निबंधों में भी वे सृष्टि के विकास की उसी धारणा को प्रस्तुत करते हैं और यह बताते हैं कि ज्योतिष की पूर्व धारणाओं में किस तरह अंतर आता रहा है। अपने इसी वैज्ञानिक दृष्टि के कारण, वे मनुष्य और मनुष्येतर प्राणियों के बीच के अंतर को भी विवेकपूर्ण ढंग से रखने में समर्थ हुए हैं। उनके अनुसार, मनुष्य और मनुष्येतर जीव-जगत में विकास प्रयत्नपूर्वक किया गया। मनुष्येतर जगत में इच्छा तो है पर उसको रूप देने की क्षमता उसमें नहीं है। मनुष्य में इच्छा भी है और उसे रूप देने का सामर्थ्य भी (हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली, खंड दस, पृष्ठ 19)। अपने साहित्य में वे कदम कदम पर निरंतर वैज्ञानिक दृष्टि से तथ्यों और विचारों का विश्लेषण करते हैं और उसी के आधार पर उन्हें स्वीकार और अस्वीकार करते हैं। आधुनिक साहित्य की नई मान्यताओं पर विचार करते हुए वे डार्विन के विकासवाद का उल्लेख करते हैं और अपना यह मत प्रस्तुत करते हैं कि डार्विन ने जीव विज्ञान के क्षेत्र में विकासवाद का प्रतिपादन किया जिसे सच्चे अर्थों में आधुनिकता की नींव कहा जा सकता है। इसने हर क्षेत्र में मनुष्य को नई दृष्टि दी। आज शायद ही कोई ऐसा ज्ञान-विज्ञान हो जिसे इस विकासवाद के सहारे समझने का यत्न न किया जाता हो। सब प्रकार के आध्यात्मिक दर्शन, सब प्रकार की अलौकिक समझी जाने वाली सौंदर्य भावना और रस संवेदना, सब प्रकार की कर्म प्रणालियां इसकी लपेट में आ गई। साहित्य के विविध तत्व छंद, अलंकार, शैली, भाषा प्रतिपादन-इस सिद्धांत के सहारे अधीन और व्याख्यायित हुए। यहीं से मनुष्यों ने विचारों के इतिहास की बात सोची। भावनाओं के क्रम विकास का अध्ययन शुरू किया और मानस ग्रंथियों की ऐतिहासिक विकास परंपरा को समझने का प्रयत्न किया। यहां से साहित्य को नए रूप में देखा जाने लगा। उसके प्रगमन और प्रतिगमन के कारणों पर विचार किया जाने लगा और उसके संबंध में नई दृष्टि प्रतिष्ठित हुई। (वही, पृष्ठ 77)। इसी विकासवाद के साथ वह उस नव मानवतावाद को जोड़कर देखते हैं जिससे द्विवेदी जी के संपूर्ण चिंतन को परिभाषित किया जा सकता है। विकासवाद इस नव मानवतावाद से किस तरह संबद्ध है, इसे परिभाषित करते हुए वे लिखते हैं- मनुष्य के रूप में ही सृष्टि का सर्वोत्तम प्राणी विकसित हुआ है। मनुष्य देह में ही मन और बुद्धि का भावावेग और तर्कयुक्ति के आश्रय इंद्रिय विशेष का विकास हुआ है। यह संसार क्या है और कैसा है? इसके जानने का एकमात्र साधन मनुष्य की बुद्धि है। इस जगत में जो कुछ सत्य है, वह मनुष्य दृष्टि में देखा हुआ सत्य है। अतएव मानव सत्य है। (वही, पृष्ठ 78)। यही मानव सत्य मानवतावाद का आधार है।
मानवतावाद की प्रतिष्ठा
द्विवेदी जी के लिए मानवतावाद सिर्फ साहित्यिक सिद्धांत नहीं था बल्कि इसी ने उन्हें वह दृष्टि दी कि वे भारतवर्ष को पूर्णता में देख सकें और उसे अपने साहित्य में जगह दे सकें। वे वर्तमान भारत की उन कमजोरियों के प्रति भी सजग थे जो अंदर ही अंदर उसे खोखला कर रही थीं। बार-बार मनुष्य जाति की आंतरिक एकता पर बल देने का कारण भी यही था। अपने एक निबंध ‘ठाकुर जी की बटोर’ में वे जातिवाद पर गहरा प्रहार करते हैं। अपने गांव के पास के एक ठाकुरबाड़ी की दुर्दशा से विचलित होकर बुलाई गई सभा में जब एक पंडित जी यह बताते हैं कि ठाकुर जी की पूजा पिछले तीन साल से शास्त्र निषिद्ध विधि से होती रही है क्योंकि वर्तमान में जो साधु पूजा कर रहे हैं वह भी ब्राह्मण नहीं हैं और इससे पूर्व भी जो साधु पूजा करते थे वह भी ब्राह्मण नहीं थे। उन पंडित जी के अनुसार शास्त्र के मत से ठाकुर जी उसी जाति के हाथ का पूजा ग्रहण करते हैं जिस जाति में पुजारी का जन्म हुआ रहता है। इसीलिए यह, अत्यन्त स्पष्ट बात है कि ब्राह्मण ऐसे ठाकुर जी को पूज्य नहीं समझ सकता। उन पंडित जी का यह भी विचार था कि अनाधिकारी की पूजा से गांव का अमंगल हो रहा है। इसलिए पहले अन्ब्राह्मण साधु को स्थानच्युत किया जाए। फिर राग-भोग की व्यवस्था बाद में होती रहेगी। (वही, पृष्ठ 167)। द्विवेदी जी के सामने ऐसे कई प्रसंग उभर आते हैं जब शूद्र से भी निम्न कुल में जन्म लेने वाले भक्तों की महान परंपरा में पूजे गए और गिने गए, उन्हें मंदिरों का प्रधान अधिकारी बनाया था। विठ्ठल नाथ जी ने अपने शूद्र शिष्य कृष्ण दास अधिकारी को जो अष्टछाप के एक कवि भी थे, श्रीनाथ जी के मंदिर का प्रधान अधिकारी बनाया था। महाकवि चैतन्य ने मुसलमान भक्त हरिदास का चरणोदक हठ के साथ छक कर पिया था। द्विवेदी जी अत्यन्त विचलित होकर उस सभा में कहते हैं जो ठाकुर जाति विशेष की पूजा ग्रहण करके ही पवित्र रह सकते हैं, जो दूसरी जाति की पूजा ग्रहण करके अग्राह्य चरणोदक हो जाते हैं, वे मेरी पूजा नहीं ग्रहण कर सकते। मेरे भगवान दीन-हीन और पतितों के भगवान हैं। जाति और वर्ण से परे के भगवान हैं। धर्म और संप्रदाय के ऊपर के भगवान हैं। वे सबकी पूजा ग्रहण कर सकते हैं और पूजा ग्रहण करके अब्राह्मण, चांडाल सबको पूज्य बना सकते हैं। (वही, पृष्ठ 168)। धर्म, जाति, भाषा आदि के नाम पर भारतीय समाज में व्याप्त विषमताओं को लेकर द्विवेदी जी चिंतित रहते थे। उन्होंने अपने लेखन द्वारा निरंतर यह प्रयत्न किया कि ये भेदभाव जो भारत की प्रगति के मार्ग के सबसे बड़े अवरोधक हैं, समाप्त हो जाएं। भारतीय सभ्यता और संस्कृति के निर्माण में अनार्य कही जाने वाली जातियों के योगदान की विस्तृत चर्चा का कारण यही है कि वे बार-बार यह बताना चाहते हैं कि जाति प्रथा कोई ऐसी चीज नहीं है जो शास्वत हो और जिससे मुक्त नहीं हुआ जा सकता।
इसी तरह वे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जारी भेदभाव और संघर्ष को भी उतना ही गंभीर मानते हैं। वे इस बात पर चिंता व्यक्त करते हैं कि आज हम प्रत्येक बात को हिंदू और मुसलमान दृष्टिकोण से देखने के आदी हो गए हैं मानो ऐसा कोई दृष्टिकोण ही नहीं है जिससे हिंदू और मुसलमान एक साथ ही देख सकें। (वही, पृष्ठ 170)। यही कारण है कि वे अपने लेखन में में जहां भी अवसर मिलता है, वहां यह बताना नहीं भूलते कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विकास में मुसलमानों ने विधिवत अध्ययन किया था, उसके विकास में भी ये अन्य जतियों और का भी अप्रतिम योगदान रहा है। ज्योतिष शास्त्र, जिसका उन्होंने धर्मों के योगदान को स्वीकार करते हैं। इसवी सन, हिजरी सन और शक संवत को विदेशी मानने वाले और विक्रमी संवत को ही हिंदू और इसलिए राष्ट्रीय संवत मानने वाले सांप्रदायिक सोच वाले लोगों को द्विवेदी जी के ज्योतिर्विज्ञान पर लिखे लेखों का अध्ययन करना चाहिए। अपने एक निबंध नया वर्ष आ गया में इस कथित राष्ट्रीय संवत पर विस्तृत चर्चा करते हुए वे निष्कर्ष रूप में लिखते हैं कि इसके साथ असुरों, यवनों, शकों और आर्यों की दीर्घ साधना से उपलब्ध ज्ञानों की स्मृति जुड़ी हुई है, वह ईसाइयों और यहूदियों के सांस्कृतिक संघर्ष की याद दिला जाता है और हिंदुओं और मुसलमानों की सम्मिलित प्रतिभा की स्मृति भी जगा देता है और ऐसा कहते हुए उनके मस्तिष्क में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जारी सांप्रदायिक संघर्ष भी रहा होगा, इसलिए वे आगे जोड़ते हैं, जो लोग दुविधा में पड़े हुए हैं, उन्हें आश्वासन दे जाता है कि ये विकट भृकुटियां ज्यादा दिन तक परेशान नहीं करेंगी, ये स्वार्थ संघात क्षणिक हैं। कठोर संघर्ष के भीतर भी मनुष्य की मिलन भूमि तैयार होती रहती है। (वही, पृष्ठ 96)
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मनुष्य जाति को धर्म, संप्रदाय, जाति, नस्ल, लिंग, क्षेत्र और भाषा के आधार पर खंड-खंड कर देखा जा सकता है और इसी खंड-खंड मनुष्य को ही सच्चाई मानकर उसको अपने साहित्य में जगह देने वाला साहित्य भी लिखा जाता रहा है। यह खंड-खंड मनुष्य सच है, लेकिन यह साहित्य का लक्ष्य नहीं हो सकता। साहित्य का लक्ष्य तो संपूर्ण मनुष्य ही हो सकता है। साहित्य के द्वारा साहित्यकार इसी संपूर्ण मनुष्य की तलाश करता है और अपना यही संदेश वह अपने पाठकों तक पहुंचाना चाहता है।
भाषा साध्य है साधन नहीं
अपनी बात को अपने पाठकों तक पहुंचाने का माध्यम उसकी भाषा है। यहां भी हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदीपरस्त अंधराष्ट्रवादियों की तरह नहीं सोचते। वे इस बात को महत्व ही नहीं देते कि किस भाषा का वर्चस्व कायम है और किस भाषा को ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए। न ही वे भाषा को राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति का आधार मानते हैं। उनके विचार में, भाषा महज एक माध्यम है, एक साधन है। स्वयं उनके शब्दों में, मनुष्य ही बड़ी चीज है, भाषा उसी की सेवा के लिए है। (हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली, खंड दस, पृष्ठ 25)। वे इस सत्य को नहीं भूलते कि वर्तमान हिंदू समाज में एक दो नहीं, बल्कि दर्जनों ऐसी जातियां हैं जो अपनी मूल भाषाएं भूल चुकी हैं और आर्य भाषा बोलती हैं। (वही, पृष्ठ 27)। वे इस ऐतिहासिक तथ्य को भी स्वीकार करते हैं कि ब्राह्मण प्रधान धर्म ने जातियों का कुछ इस प्रकार स्तर विभाग स्वीकार किया है कि निम्न श्रेणी की जातियां ऊपर उठने के लिए संस्कृत भाषा की प्रधानता स्वीकार करती रही हैं। (वहीं, पृष्ठ 27)। इसके बावजूद वे साहित्य लेखन के लिए भाषा का निर्णय इस बात से तय नहीं करते कि भाषा की सामाजिक और राजनीतिक हैसियत क्या है। वे इसका निर्णय उन करोड़ों लोगों को दृष्टि में रखकर करते हैं जो दीर्घकाल से आलोक से वंचित हैं। शताब्दियों से गौरव से हीन इन मनुष्यों में हमें आत्म-गरिमा का संचार करना है। अकारण अपमानित इन मूक नर कंकालों को हमें वाणी देनी है। रोग, शोक, अज्ञान, भूख, प्यास, परमुखापेक्षिता और मूकता से इनका उद्धार करना है। साहित्य का यही काम है। (वही, पृष्ठ 28)। और इसीलिए वे लेखकों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि, आप क्या लिखेंगे, कैसे लिखेंगे और किस भाषा में लिखेंगे, इन प्रश्नों का निर्णय इन्हीं की ओर देखकर कीजिए (वही, पृष्ठ 28)। इसी आदर्श से जब वे हिंदी लेखन को देखते हैं तो वे इस बात पर अफसोस जाहिर करते हैं कि हिंदी का साहित्य संसार बहुत ही दरिद्र है। वे हिंदी समाज से और अपने आप से ही यह प्रश्न पूछते हैं, हिंदी में कितने जन समूहों के परिचायक ग्रंथ लिखे हैं? इस विशाल मानव समाज की रीति-नीति, आचार-विचार, आशा आकांक्षा, उत्थान-पतन समझने के लिए हमारी भाषा में कितनी पुस्तकें हैं? इनके जीवन को सुखमय बनाने के साधनों, इनकी भूमि, इनके पशु, इनके विनोद सहचर, इनके पेशे, इनके विश्वास, इनकी नई-नई मनोवृत्तियों का हमने क्या अध्ययन प्रस्तुत किया है? कहां है सहानुभूति और दर्द का प्रमाण, जिसे आप गणदेवता के सामने रख सकेंगे। वे बिल्कुल सही कहते हैं कि हिंदी की उन्नति का अर्थ उसके बोलने और समझने वालों की उन्नति है। (वही, पृष्ठ 28)।
कुछ अंतरविरोध
मनुष्य को ही साहित्य का लक्ष्य मानने वाले द्विवेदी जी ने आधुनिकता के मूल्यों को गहरे रूप में आत्मसात किया है, यह देखकर आश्चर्य होता है कि वे फलित ज्योतिष जैसी एक अत्यंत अवैज्ञानिक धारणा से कैसे चिपके रहे ? फलित ज्योतिष पर लिखे अपने लेख में, वे फलित ज्योतिष को यद्यपि भारत की देन नहीं, उसे बाहरी प्रभाव मानते हैं और बाणभट्ट की आत्मकथा और कई निबंधों में वे फलित ज्योतिष की आलोचना भी करते हैं। यहीं नहीं, अपने एक निबंध ‘लड़ाई खत्म हो गई’ में शिव प्रसाद सिंह के हवाले से वे लिखते हैं, मैं ज्योतिष जानता हूं, वे मानते हैं।
द्विवेदी जी की ज्योतिषशास्त्र पर संकलित एक पुस्तक के ग्यारहवें खंड में फलित ज्योतिष का भी विवरण दिया गया है। इसी तरह खड-आठ में रवींद्र नाथ की जन्मपत्री दी गई है और उसकी शुभाशुभ विवेचना की गई है। द्विवेदी जी अपने लेखन में ज्योतिर्विज्ञान की व्याख्या वैज्ञानिक शोधों से प्राप्त नए निष्कर्षों से करते हैं, लेकिन फिर भी फलित ज्योतिष से वे पूरी तरह क्यों मुक्त नहीं हो सके, यह कहना मुश्किल है।
ऐसा ही अंतरविरोध स्त्री-संबंधी उनके विचारों में दिखाई देता है। अपने उपन्यासों में उन्होंने भट्टिनी, निपुणिका, महामाया, मैना, चंद्रलेखा, चंदा, मृणाल जैसी तेजस्वी और कर्मशील स्त्रियों का चित्रण किया है जो घर की चहारदीवारी में कैद नहीं रहतीं बल्कि दृढ़तापूर्वक हर तरह के अत्याचार और उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष करती हैं। चारु चंद्रलेख की मैना तो युद्ध में भी भाग लेती है और उसका नेतृत्व भी करती है। लेकिन फिर भी अपने निबंधों में वे स्त्रियों की स्वाधीनता को सतीत्व की प्रतिगामी धारणा से बांध देते हैं। यह और बात है कि पुनर्नवा की चंदा उस पति को पति मानने से इनकार कर देती है, जो नपुंसक है और जिस आर्यक से प्रेम करती है, उसे ही अपना पति मानती है, जबकि उसके साथ उसका विवाह नहीं हुआ था।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की तरह समाजवाद से विरोध भाव न रखते हुए द्विवेदी जी ने उसे अपनी वैचारिक दृष्टि का अंग नहीं बनाया। उनके सोच में यह चिंता तो शामिल है कि क्या कोई ऐसा उपाय नहीं हो सकता कि समाज से पैसे का राज खत्म हो जाए। हमारे समस्त बड़े प्रयत्न इस एक चट्टान से टकराकर चूर हो जाते हैं। क्या कोई ऐसी व्यवस्था हो सकती है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपने मतलब भर का पैसा पा जाए और उससे अधिक पाने का कोई उपाय ही न हो। (हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली, खंड नौ, पृष्ठ 105)। फिर भी, वे समाज में व्याप्त विषमताओं को वर्गीय दृष्टि से नहीं देखते। मानवजाति के विकास के किसी भी पहलू पर विचार करते हुए उनका प्रयत्न रहता है कि उन सभी वर्गों, समुदायों और जातियों की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विशेषताओं को ध्यान में रखें और उनके पारस्परिक संबंधों और संघर्षों को भी आंखों से ओझल न होने दें। इस तरह, उनके सामने एक जटिल, गतिशील और संघर्षपूर्ण संरचना मौजूद रहती है, जो निरंतर मानवीय हस्तक्षेप द्वारा अपना स्वरूप बदल रही है। इस संरचना में वे अपने को किसी विशेष धर्म, जाति, भाषा और संस्कृति के साथ नहीं जोड़ते। उनकी दृष्टि संपूर्ण मानव समाज पर रहती है और उसकी कल्याण कामना पर। उनकी वैचारिक दृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वे मनुष्य की प्रगति पर विश्वास करते हैं और बार-बार दोहराते हैं कि सारी बाधाओं के बावजूद मनुष्य की जययात्रा न रुकी है और न रुकेगी।
