गौरी तिवारी
एक बहुत बड़े महानगर में एक बहुत छोटी कॉलोनी थी, जहां एक सीमित क्षेत्र में लगभग 20-25 परिवार रहते थे। सभी परिवार विभिन्न धर्म जातियों में बटे हुए थे लेकिन उन्हें जोड़ती थी उनकी गरीबी। उन सभी ने अपनी झुग्गी को ही महल और पीने के बदबूदार पानी को ही अमृत समझ लिया था। अब आखिर उनकी भी गलती कहाँ? वे सभी गांव छोड़कर महानगर आए थे कि कुछ पैसे आ जाएंगे तो जिंदगी बेहतर हो जाएगी और फिर बस गए यहीं, सदा के लिए। पीढ़ियां गुजर गई उसी झुग्गी में रहते हुए, वही गंदा पानी पीते हुए, अब तो उन्हें इस चीज़ की आदत सी हो गई थी।
हर घर में भले शौचालय न हो लेकिन सबके पास एक मोबाइल फोन ज़रूर होता, अब ठहरे नए इंडिया के मॉडर्न लोग, जब तक मोबाइल फोन पर न्यूज़ न देख लें दिन कैसे पूरा होगा । हां, एक बात अच्छी थी कि वहां रहने वाले लोगों ने कभी बदलाव नहीं चाहा। एक ही दिनचर्या का पालन करते और जो मिल जाता उसी में संतुष्ट हो जाते, और अगर कुछ नहीं भी मिलता तो चावल और पानी खाकर सो जाते लेकिन गलती से भी नहीं सोचते कि काश कुछ अच्छा मिल जाता। उनकी दिनचर्या में एक बड़ी अजीब परंपरा थी, [परंपरा शब्द इसलिए क्योंकि सालों से यही रीति चली आ रही थी परिवार में] पुरुष सुबह खाना खाकर मजदूरी करने चले जाते, महिलाएं घर का सारा काम निपटती फिर बचा-खुचा खाना खाकर, पानी पीकर पेट भरती फिर फैक्ट्री में काम करने चली जाती। और बच्चे कभी घर पर सोए रहते, कभी मोहल्ले में आपस में खेल लेते और यदा-कदा गलती से स्कूल जाने का मन कर गया तो स्कूल भी चले जाते, ऐसे ही शाम हो जाती, स्त्रियां काम से लौटकर एक बार फिर घर का काम करती, खाना बनाती और इस बीच ऐसी कोई न कोई भूल जरूर कर देती जिससे उनके स्वामी रूष्ट हो जाते। अब बेचारे थके-हारे, काम से लौटे पुरुषों को यदि मालिक से डांट पड़ी होती तो भला अपना क्रोध कहां निकालते इसलिए अपना सारा गुस्सा उन आलसी पत्नियों पर निकाल देते। ऐसे ही समय बीतता गया, एक दिन अचानक कॉलोनी के पास बहुत लोगों की भीड़ दिखाई दी, सफेद चमचमाते कुर्ते पजामे में खुद को जनता का सेवक कहता हुआ एक पुरुष माइक में अंतरात्मा की पवित्रता पर भाषण देने लगा और घूमते फिरते फिर, वो बचपन में किए संघर्षों का गान करते हुए अश्रुओं की निर्मल धारा छलकाने लगा। तभी उसी कॉलोनी के एक महाशय कहते हैं ” बहुत हो गया अब धोखा! अब हमें ऐसे ही ईमानदार सेवक की जरूरत है।”
वैसे भी लोकतंत्र में ध्वनि अर्थात शोर-शराबे बड़ी अहमियत होती है, जो नेता जितनी तेज ध्वनि में सुहावने सपने दिखाता है वो उतने ही अधिक लोगों का चहीता होता है। यदि ध्वनि करारी हो, उसमें जरूरत के मुताबिक रुदन/ रूदाली का भी अंश हो और आह्वाहन करने की ललकारने की खनक भी हो। जब भी चुनाव के दौर आता है तो इस कॉलोनी में भी सियासी हवाओं की बहार होती है, कुछ राजनीति से दूर रहने वालों और निठल्लों को भी हवा में धुर राजनीति दिखाई देने लगती है। जिसका असर ये हुआ कि कॉलोनी के मेन गेट के पास एक मीटिंग बैठाई गई जिसमें परमात्मा के दूतों परमात्मा को चुनने का आग्रह करते हुए कहा ” बहुत हो गई चालबाज़ी! अब हमें बदलाव चाहिए!”
नेता जी ने भी यह कहते हुए कि प्राण जाए पर वचन न जाए ये वादा किया कि चुनाव जीतने के बाद सबसे पहले जल बोर्ड की गाड़ी भेजी जाएगी और पीने के साफ पानी की व्यवस्था की जाएगी और साथ ही सबको एक पक्का मकान भी मिलेगा, अब आखिर रोटी, कपड़ा, मकान प्राथमिक ज़रूरत है सबकी इसलिए कोई इससे वंचित नहीं रहेगा। इतना कहना क्या कम था लोगों का विश्वास जीतने के लिए?
3 हफ्ते बाद चुनाव के परिणाम घोषित हुए, नेताजी धर्म का पालन करते हुए सदाचरण का ताबीज पहने हुए जीत गए चुनाव। और अखबारों में मोटे – मोटे बड़े अक्षरों में खबर छपी ” “जल्द ही लागू होगी आवास योजना”
सभी परिवारों को झुगी से निकालकर तथा कुछ कागजों पर दस्तखत करवाने के बाद उनसे कहा गया कि वे कुछ समय के लिए किसी अन्य स्थान पर चले जाएं ताकि यहां उनकी जमीनों पर मकान बन सके। वाकई अच्छे दिन आ गए!!
लेकिन अपनी ज़मीन और घर छोड़कर गए लोग यहां लौटकर वापस न आ सके अब आखिर उनके मकान से ज्यादा जरूरी देश की अच्छी अर्थव्यवस्था के लिए मॉल बनाना जो था।।।।
