गौरी तिवारी
कई बार ऐसा लगता है मानो, खुले नीले अंबर के नीचे रहने के बावजूद आपका दम घुट रहा है, उन्मुक्त होने के बावजूद ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो बेड़ियों ने आपको कसकर जकड़ कर रखा है। आपके गले से चीख सारी जकड़नों को तोड़कर बाहर निकलना चाहती हो किंतु किसी चीज से टकराकर वापस नीचे चली जाए और रह जाए बस एक खामोशी। ऐसी खामोशी जो खामोश होने के बावजूद चीत्कार कर रही हो अपनी उपस्थिति का आभास करवा रही हो। श्रेष्ठ को भी ऐसी ही अनुभूति हो रही थी, नील गगन में उड़ते एक आजाद पंछी की भांति होते हुए भी उसे घुटन महसूस हो रही थी, मानो वह श्वास ना ले पा रहा हो, जो वायु एक निर्जीव प्राणी में प्राण डाल देती है वह वायु अपने भीतर नहीं ले पा रहा था। कोई बात थी जो उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी, पल-पल उसे एक खोखलेपन की अनुभूति करवा रही थी। वह बैठे-बैठे स्मृतियों के भंवर में गुम हो जाता है।
” श्रेष्ठ, आ जाओ खाना खा लो बेटा” स्टील के एक बर्तन में जिसे शायद ना ही थाली कहा सकता है और ना ही कोई कटोरी, उसमें माढ़ और चावल, अचार के साथ परोसते हुए श्रेष्ठ की मां उसे पुकारती हैं। किंतु उत्तर न पाने पर जब वह उठकर देखती हैं तो उन्हें सिसकियों की आवाज आती है, श्रेष्ठ दीवार के एक कोने से चिपक कर रो रहा था। अपनी मां को देखते ही वह भाग कर आता है और उनसे कहता है “मां, मेरे सारे दोस्त बाहर होली खेल रहे हैं। मुझे भी होली खेलने जाना है लेकिन मेरे पास रंग और पिचकारी ही नहीं है मैं कैसे होली खेलूंगा”
” बेटा, पापा अभी काम पर गए हैं ना, जब घर लौटकर आएंगे तब अबीर, पिचकारी और गुब्बारे सब लाएंगे तुम्हारे लिए।”
“नहीं मुझे अभी ही चाहिए, थोड़ी देर में तो सब होली खेलकर वापस आ जाएंगे। फिर कौन होली खेलेगा मेरे साथ? जब तक मुझे पिचकारी और रंग नहीं मिलेंगे तब तक मैं कुछ भी नहीं खाऊंगा। हां, कुछ नहीं खाऊंगा मैं।”
“कह दिया ना एक बार की पापा आयेंगे तो लेकर आएंगे तुम्हारे लिए सामान। एक बार में समझ में नहीं आता?”
श्रेष्ठ अपनी आंखों में अश्रुओं की धारा लिए वापस उसी कोने में चला जाता है। यशोदा की आँखें भी नम हो गई, अब आखिर एक मां का दिल अपने बेटे को रोता हुआ कैसे देख सकता था। वह श्रेष्ठ के बालपन की जिद के कारण घर के किराए के लिए इकट्ठा किए 2000 रुपए में से 300 रुपए निकालकर श्रेष्ठ के लिए सामान ले आती है। अभी पगार मिलने के पहले कमरे का किराया देना है और राशन वाले का उधर भी चुकाना था। श्रेष्ठ को रंग, पिचकारी और गुब्बारे देते हुए यशोदा कहती है “देखो तुमने जो भी बोला था वो सब आ गया न, अब जल्दी से खाना खा लो।”
“पापा आप यहां अकेले क्यों बैठे हैं?” सहसा श्रेष्ठ स्मृतियों के स्वप्न से झकझोर कर बाहर निकल आया उसकी बेटी मान्या अब 7 साल की हो गई थी, उसने बचपन में जो गरीबी देखी वह नहीं चाहता था कि उसकी बेटी भी उन्हीं तंग हालातो में पले बढ़े। किंतु सफल तथा अमीर बनने की इस प्रतिस्पर्धा में श्रेष्ठ अपनी जड़ों को भूल चुका था, उसका अपने माता-पिता से लगाव ही हट चुका था। मानो उनका होना ना होना उसके लिए बराबर सा हो गया हो। मान्या अपने पिता को अबीर का टीका लगाकर इतनी जल्दी चली जाती है की श्रेष्ठ उसे रंग लगाना ही भूल जाता है। वह एक बार फिर अकेला हो गया और स्मृतियों के स्वप्न में गुम हो गया।
“होली खेले रघुवीरा अवध मा होली खेले रघुवीरा!!, आजकल ऐसे केमिकल वाले रंग मिल रहे हैं बाजार में की जल्दी छूटते ही नहीं, मानो पूरा चेहरा बंदर सा हो गया हो खैर यह बताओ सुनीता आज खाने में क्या बना है मुझे बहुत जोर से भूख लगी है”
तभी एक कमरे के भीतर से मंद स्वर में किसी की कांपती हुई आवाज आती है ” फागुन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं बेटा, खूब खुश रहो। आज हमसे से अबीर नहीं लगवाओगे?”
“हां मां, रूकिए आते हैं थोड़ी देर में”
पूरा दिन बीत जाता है लेकिन श्रेष्ठ अपनी मां से अमीर नहीं लगवाता उसी रात अचानक यशोदा की तबीयत बहुत खराब हो जाती है श्रेष्ठ डॉक्टर को बुलाता है और हर संभव प्रयास करता है कि उसकी मां ठीक हो जाए लेकिन अपनी मां के लिए 2 मिनट का समय नहीं निकल पाता और ना ही उनके पास बैठकर उनसे बात करता है। सुबह तक यशोदा की हालत बहुत नाजुक हो जाती है श्रेष्ठ जब उनसे मिलने आता है तब वह कांपते हुए हाथ से उसके सर पर हाथ रखती हैं और कुछ कहने की कोशिश ही करती हैं कि उनकी आंखें अपना 65वां वसंत देखने से पूर्व ही बंद हो जाती हैं। उन्हें दिल का दौरा पड़ जाता है।
“पापा खाना ठंडा हो रहा है, दादु आपको कब से बुला रहे हैं। चलिए खाना खाते हैं” श्रेष्ठ की स्मृतियों का स्वप्न एक बार फिर टूटता है, वह हड़बड़ाते हुए कहता है “तुम चलो, हम आते हैं” श्रेष्ठ अपने पिता के पास जाता है और उनकी गोद में सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगता है मानो दिल का बोझ हल्का करना चाहता हो। उसके पिता उसके अंतर मन की भावनाओं को समझ जाते हैं इसलिए उसके सिर पर हल्के से हाथ फेरते हुए उससे कहते हैं “कोई बात नहीं बेटा, कब तक मन में यह बोझ लिए खुद को दुख पहुंचाते रहोगे? अब शांत हो जाओ। अपने अतीत को वर्तमान पर हावी मत होने दो क्योंकि भूल से कुछ सीखना चाहिए ना कि पछतावे का नाम देकर बार बार वही गलती करनी चाहिए। मान्या तुम्हें ही अपना आदर्श मानती है, वह तुमसे ही सीखेगी, यदि उसने अभी अपनी जड़ों को नहीं पहचाना, परिवार के महत्व को नहीं जाना तो वह भी इस मशीन योग की प्रतिस्पर्धा में शामिल हो जाएगी और जाने अनजाने में खुद भी एक मशीन बन जाएगी। इसलिए पुरानी बातों को भूलकर अपने आज पर ध्यान दो, आज होली का त्यौहार है, हम सब का जीवन भी इंद्रधनुष के समान विभिन्न रंगों का रंगारंग गुलदस्ता होता है और होली के यही रंग हमें जिंदगी के इन्हीं विभिन्न पहलुओं से परिचित करवाने के लिए होते हैं। इसलिए अपने मन के बोझ को खत्म करो और एक नई शुरुआत करो।”

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अत्यंत मार्मिक रचना