शांति वार्ता की नौटंकी के बीच युद्ध की दुंदुभी से पश्चिम एशिया हलकान

युद्ध के लंबा खींचने के आसार
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अनिल तिवारी
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ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के लिए ओमान की मध्यस्थता में शांति वार्ता चल रही थी। इसराइल के साथ साझेदारी को मजबूत करने के के इरादे से पहुंचे भारत के प्रधानमंत्री वहां की संसद को संबोधित करते हुए डायलॉग और डिप्लोमेसी से विवादों का हल तलाशने की बात कही थी। दुनिया के कई हिस्सों में चल रहे युद्ध के हालातों को देखते हुए ईरान ने युद्ध से बचने की इच्छा जरूर जताई थी, लेकिन उसने यूरेनियम समृद्ध करने का अधिकार रखने की बात दोहराई। अब इजराइल और अमेरिका के साझा हमले के बाद यह वार्ता फिलहाल बेमानी हो चुकी है। दो दिन पहले तक ईरान पर हमले से अमेरिकी नुकसान की आशंका व्यक्त कर रहे अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान को दुश्मन देश बताते हुए इसराइल को साथ लेकर मौत का सामना करो का हुंकार भरते हुए इसराइल को साथ लेकर मध्य एशिया को युद्ध में झोंक दिया है। सवाल है कि जिस दौर में विकास के नारे के साथ सभी देश बेहतर भविष्य का सफर तय करना चाहते हैं, उसमें संवाद के रास्ते बंद करके युद्ध का रास्ता अख्तियार करने का नतीजा आखिर क्या निकलेगा?

रूस-यूक्रेन के बीच जारी युद्ध वैश्विक शांति के लिए पहले ही एक जटिल चुनौती है। हाल ही में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भड़की खुली जंग ने भी एक नया मोर्चा खोल दिया। अब इजराइल और अमेरिका के साझा हमले और खासतौर पर खामेनेई की मौत पर ईरान की जवाबी कार्रवाई के बाद की प्रतिक्रिया क्या होगी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसे समीकरण खड़े होंगे, किन देशों के बीच नई मोचेर्बंदी होगी और युद्ध कितने बड़े दायरे में फैलेगा, ये प्रश्न वैश्विक चिंता का केंद्र बनने वाले हैं।
शांति वार्ता का नाटक रचते हुए ईरान पर हमला एक सुनियोजित षड्यंत्र ही है क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रमों का बहाना लेकर ईरान के सर्वोच्च नेता को निशाने पर रखा था। हाल के दिनों में उन्होंने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा कि वे खामनेई की मौत चाहते हैं। अमेरिका और इजरायल के बयानों से ऐसा लग रहा है कि इस बार युद्ध केवल प्रतीकात्मक नहीं है।
मालूम हो कि अमेरिका और ईरान के बीच तनातनी दशको पुरानी है। सन 1979 के बाद तो दोनों मुल्कों के संबंधों में अदावत जग जाहिर है। वर्तमान समय में सारा विवाद ईरान यूरेनियम संवर्धन को लेकर है। अमेरिका चाहता है कि ईरान पर पूरी तरह ब्रेक लगा दे और बैलिस्टिक मिसाइल की मारक क्षमता इतनी कम कर दे कि इजरायल के लिए कोई खतरा न पनप सके। लेकिन ईरान हमेशा दोहराता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण मकसद के लिए है।
लंबे समय तक ईरान में सर्वोच्च पद पर रहे खामनेई का अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ संबंध कभी भी बेहतर नहीं रहा। अमेरिका की अगुवाई में पश्चिमी ताकते उन्हें सत्ता से बेदखल करने की कई बार कोशिश की लेकिन खामनेई हर बार अपनी हुकूमत बचाने में सफल रहे। जब से यह खबर आई कि ईरान ने परमाणु बम बना लिया है उसके बाद से ही अमेरिका ने ईरान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मान लिया और कमजोर करने के लिए हर हद तक जाने की कोशिश की।
ध्यान रहे, जब से ट्रंप अमेरिका में दूसरी बार राष्ट्रपति बने हैं तब से उनकी नीतियों के कारण पूरा वैश्विक ऑर्डर उथल-पुथल हो गया है। एक दिन वह विश्व शांति की बात करते हैं और अपने को नोबेल पुरस्कार के हकदार के रूप में खुद को प्रस्तुत करते हैं और अगले ही दिन युद्ध के एजेंडे के साथ मैदान में कूद आते हैं। ईरान में सत्ता परिवर्तन के लिए ट्रंप वहां के आंदोलन को सीधा समर्थन कर रहे थे, लेकिन जब आंदोलन लंबा नहीं चल सका तो वह ईरान के साथ डील के बहाने दबाव बनाना शुरू किए। उनकी मंसा थी कि मनमाफिक डील के के बाद अमेरिका सहित पूरे विश्व में उनका रुतबा बढ़ जाएगा। लेकिन अनुभवी खामनेई को वह झुका नहीं सके।
फिर क्या था ट्रंप ने इसराइल को साथ लिया। यह पूरा विवाद कहीं ना कहीं मिडिल ईस्ट में प्रभुत्व जमाने का है। इसराइल के लिए इस इलाके में ईरान सबसे बड़ी बाधा है। गाजा विवाद में भी ईरान खुलकर फिलिस्तीन का समर्थक रहा है। इजराइल का यह भी मानना है कि उसके खिलाफ संसाधन उपलब्ध कराने में ईरान का अहम योगदान रहा है। पिछले 40 साल से अधिक समय से ईरान और इजरायल के बीच कोई कूटनीतिक संबंध नहीं रहे हैं। चुकि अमेरिका का इजरायल के साथ हमेशा से संबंध अच्छा रहा है। इसलिए मौका देखकर ट्रंप ने ईरान के खिलाफ आक्रामक गठबंधन बना लिया।
अमेरिकी-इजरायली गठबंधन द्वारा ईरान पर हमले के विरोध में भारत के लखनऊ, कश्मीर आदि जगहों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए हैं। दुनिया में अमन चैन की वकालत करने वाले लोग अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ मुखर हो रहे हैं। यहां तक कि अमेरिका में भी ईरान युद्ध के विरोध में लोग सड़कों पर उतरे हैं। भारत सरकार ने भी हालत पर चिंता जताते हुए सभी देशों की संप्रभुता और अखंडता का सम्मान करने की बात कही है। विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर दोनों पक्षों को संयम बरतने और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की गुजारिश की है।
पश्चिम एशिया क्षेत्र में लगभग 9-10 मिलियन भारतीय रहते हैं। पिछली बार हुए गल्फ वार के दौरान 75000 लोगों को सुरक्षित वापस लाना पड़ा था। पिछले साल इजराइल- ईरान संघर्ष की वजह से जब हालात बिगड़े तो ऑपरेशन सिंधु के तहत लगभग साढ़े चार हजार लोगों को बाहर निकाला था। भारत ईरान का पारंपरिक मित्र देश रहा है। हालांकि हाल के बरसों में इसराइल के साथ संपर्क गाढ़े हुए हैं लेकिन कूटनीति के तौर पर दोनों को साधे रखना हमारी विदेश नीति का हिस्सा है। इसके मद्देनजर भारत के लिए एक जरूरी कदम यह होना चाहिए कि युद्धग्रस्त इलाकों से अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने के प्रयास हों।
जून 2025 में ईरान और इजरायल के बीच 12 दिन तक लड़ाई चली थी। अमेरिका ईरान में अमूल चूल सत्ता परिवर्तन चाहता है। लेकिन ईरान ने जिस तरह से अली रेजा रफी को लगभग अपना सर्वोच्च नेता चुन लिया है उससे जंग के लंबा खींचने के आसार बढ़ गए हैं। इस्लामी रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) यूएई कुवैत मैं हमला कर इसका संकेत भी दे दिया है। अगर युद्ध लंबा खींचता है तो भारत को तेल जरूरतों के आयात पर सीधा असर पड़ेगा। जहाजों की आवाजाही बाधित होने से अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक असर होगा।
कुल मिलाकर आज दुनिया में युद्ध के कई मुहाने खुल गए हैं, अगर उसे रोका नहीं गया, तो फिर व्यापक जंग के त्रासद नतीजे सामने होंगे।

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