‘एक और विभाजन’ की समीक्षा

साहित्य की परंपरा में कुछ कृतियां ऐसी होती हैं जो मात्र किसी कथा का विस्तार नहीं करती अभी तो समझ में छपी पीड़ा विडंबना और प्रश्नों को उजागर करती हैं। ऐसे ही विचार उत्तेजक कृति है बंगाल की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी द्वारा रचित ‘एक और विभाजन’, जहां सामाजिक संरचना के भीतर उपस्थित उन अदृश्य दरारों का चित्रण है जो मनुष्य के मन में एक दूसरे के प्रत्येक देश भाग उत्पन्न कर उन्हें एक दूसरे से अलग कर देती हैं। यह रचना यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब मनुष्य के बीच भेदभाव, असमानता और संकीर्णता जन्म लेते हैं तब एक नया विभाजन जन्म लेता है। भारतीय इतिहास में सन 1947 के विभाजन की घटना या फिर 1946 के देंगे ऐसी घटनाएं हैं जिनके कारण लाखों करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित हुआ। इस उपन्यास में लेखिका उसे ऐतिहासिक घटना की पुनरावृत्ति ना करके उससे आगे बढ़कर यह प्रश्न उठाती हैं कि क्या सिर्फ भौगोलिक सीमाएं बदल जाने से मनुष्य के भीतर की मानवता भी समाप्त हो जाती है समझ में कई प्रकार के विभाजन अभी मौजूद हैं जाति धर्म क लिंक और सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर मनुष्य को अलग-अलग वर्गों में बांट दिया गया है, जिसके कारण विभाजन किसी राष्ट्र के मध्य, किसी भौगोलिक क्षेत्र के मध्य नहीं होता अपितु वहां रह रहे लोगों के हृदय में द्वेष के रूप में पैदा होता है। आज भी हमारे समाज में ऐसे सामाजिक तत्व मौजूद है जो सांप्रदायिकता के नाम पर नफरत फ्लेट हैं देंगे करवाते हैं अशांति फ्लेट हैं लेकिन नफरत की लड़ाई में शिकार सदैव आर्थिक रूप से कमजोर (गरीब) और हाशिए के लोग ही होते हैं। लेखिका कहते हैं कि हमें सांप्रदायिक-प्रीति की रक्षा करनी होगी, चारों तरफ जब सांप्रदायिक उत्तेजना बिखेरी जा चुकी है उसे समय अति साधारण लोग ही हैं जो कट्टरवाद को पराजित कर सकते हैं क्योंकि वह बिल्कुल सटीक और उचित काम करते हैं किंतु इसके लिए उन्हें सक्रिय होना होगा। जिनके हाथ में कलम, विद्या, वाणी में भाषा और कंठ में गान है, उन लोगों को निरंतर सक्रिय रहना होगा। महाश्वेता देवी ने अतीत की स्मृतियों को उखड़ते हुए वर्तमान को जोड़ा तथा विभाजन सांप्रदायिकता तक ही सीमित न होकर उन्होंने आधुनिकता की प्रतिस्पर्धा का भी उल्लेख किया है कि किस प्रकार आज मध्यवर्गीय तथा उच्च मध्यवर्गीय परिवारों के सदस्यों के मध्य संवेदनाएं समाप्त होती जा रही हैं, सारा प्रेम सारी भावनाएं और लोगों का जीवन सिर्फ अर्थ के इर्द-गिर्द घूम रहा है। केतकी और रुचिरा जैसे सशक्त पत्रों के माध्यम से यह भली भांति देखा जा सकता है कि स्त्री के जी कोमलता को उसकी कमजोरी समझ जाता है वह असल में उसकी दिव्य शक्ति है उसमें जितनी करुणा है उतनी ही ज्वाला भी वह सिर्फ घर की चार दिवारी में कैद नहीं अपितु समाज को एक नया रूप देने तथा क्रांति लाने में भी सक्षम है।गीता तथा गुड़िया के पात्र के माध्यम से उन्होंने स्त्री चेतना को भी दर्शाया है कि यदि स्त्री चेतन है तो भले ही वह आर्थिक रूप से कमजोरी क्यों ना हो किंतु वह भी क्रांति कर सकती है। असगर को घर में बना देते समय केतकी के मन में चल रहा द्वंद इस्पात का सबूत है कि किस प्रकार धर्म नाम की संस्था ने लोगों को कट्टर बनाकर मानवता समाप्त कर रही है। लेकिन दूसरे ही पलकेत की द्वारा असगर के लिए खाना बनाकर उसे अपने ही बर्तन में खाना परोसने उसके हाथ कछुआ पानी पीना उसका मल मूत्र साफ करना यह दर्शाता है कि कहीं ना कहीं आज भी समझ में ऐसे लोग मौजूद हैं जो सांप्रदायिकता तथा जाति एवं धर्म के नाम पर भेदभाव का विरोध करते हैं आज के तेजी से बढ़ते इस युग की सबसे बड़ी समस्या है अफवाह “अधजल गगरी छलकत जाए” का भाव सबके भीतर है तभी तो शुभम द्वारा घंटा ताला में हो रहे दंगे की अफवाह सुनकर केतकी हैरान हो जाती है कि कैसे आज की तरह अफवाह फैलाई जा रही है जो वास्तविक घटना के बिल्कुल विपरीत है। उपन्यास में सांप्रदायिकता के इसी नकारात्मक प्रभाव का तो विश्लेषण है कि सांप्रदायिकता वह संकीर्ण मनोवृत्ति है जो धर्म और संप्रदाय के नाम पर पूरे समाज तथा राष्ट्र के व्यापक हितों के विरुद्ध व्यक्ति को केवल अपने व्यक्तिगत धर्म के हितों को प्रोत्साहित करने तथा उन्हें संरक्षण देने की भावना को महत्त्व देती है। एक समुदाय या धर्म के लोगों द्वारा दूसरे समुदाय या धर्म के विरुद्ध किये गए शत्रुभाव को सांप्रदायकिता के रूप में अभिव्यक्त किया जाता है।यह एक ऐसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें सांप्रदायिकता को आधार बनाकर राजनीतिक हितों की पूर्ति की जाती है और जिसमें सांप्रदायिक विचारधारा के विशेष परिणाम के रूप में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएँ होती हैं। सांप्रदायिक हिंसा वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देती है और सामाजिक सामंजस्य प्रभावित होता है। यह दीर्घावधि में सांप्रदायिक सद्भाव को गंभीर नुकसान पहुँचाती है। सांप्रदायिक हिंसा धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व जैसे संवैधानिक मूल्यों को प्रभावित करती है, पीड़ित परिवारों को इसका सबसे अधिक खामियाज़ा भुगतना पड़ता है, उन्हें अपना घर, प्रियजनों यहाँ तक कि जीविका के साधनों से भी हाथ धोना पड़ता है। उपन्यास के माध्यम से महाश्वेता देवी ने भली भांति दर्शाया है कि किस प्रकार झूठी अफवाहें फैलाकर दंगे करवाए जा रहे हैं जिनका खामी आज सिर्फ मासूम जनता को भोगना पड़ रहा है। जब शमी और पलाश में बहस होती है तो देखा जा सकता है कि जो धार्मिक कट्टर लोग होते हैं वह तर्क नहीं अपितु कुतर्क करते हैं, उनकी बातों में तार्किकता नहीं सिर्फ अज्ञानता होती है। यह भी दर्शाया गया है कि किस प्रकार नेता या राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए जनता में द्वेष की भावना पैदा करते हैं जैसे घंटातला के लोगों की जमीन हड़पने के इरादे से दंगे करवाए जा रहे थे, दंगाई कोई आम जनता नहीं अभी तो गुंडे होते हैं जो आम जनता के घर जला देते हैं वह भी बिना धर्म देखें जब भी कहीं दंगा होता है तो सिर्फ किसी एक धर्म के नहीं, अपितु सभी के घर जलाए जाते हैं। उपन्यास में यह भी चित्रित किया गया है कि जिस घटना से आम जनता का कोई लेना-देना नहीं होता उसे घटना को लेकर लोगों के मन में नफरत की भावना फैलाई जाती है जैसे यह एक और विभाजन उपन्यास बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने के बाद की घटना का चित्रण है इसमें दिखाया गया है कि जिन लोगों को यह भी नहीं पता कि बाबरी मस्जिद कहां है कब टूटा कैसे टूटा उन लोगों को भी इन दंगों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि एक व्यक्ति को उसके पूरे समुदाय की नजरों से देखा जा रहा है और एक अपराधी की भांति उससे व्यवहार किया जा रहा है। शमी का सर फटने के बाद जब खेत की रंजय से फोन मांगती है उसको डॉक्टर को बुलाने के लिए कहती है लेकिन उसका खिड़की बंद कर लेना यह दिखाता है कि कुछ लोग ऐसे भी हैं समाज में जो सिर्फ अपने स्वार्थ के बारे में सोचते हैं उन्हें दूसरों की पीड़ा से कोई मतलब नहीं। लेखिका ने यह प्रश्न उठाया है कि जो लोग दूसरों की मुसीबत में अपने घर के दरवाजे बंद कर लेते हैं जब उन पर मुसीबत आएगी तो उन्हें भी दूसरों के पांव पकड़ने होंगे। क्या उन्हें इस बात का ख्याल नहीं आता?
एक और विभाजन उपन्यास मैं सिर्फ समस्याओं का उल्लेख नहीं है अपितु अंत में उनका समाधान भी दिया गया है। जहां एक और दंगाई है जो लोगों में नफरत फैला रहे हैं वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अति साधारण लोग हैं जैसा कि मैं शुरू में जिक्र भी किया था वह अति साधारण लोग जो यदि एकजुट हो जाए तो समाज में क्रांति ला सकते हैं ऐसी क्रांति जो दंगाइयों को डरा कर भगा सकती है। जहां उपन्यास के अंत में केतकी, रुचिरा, शिवेन, सीमा, असगर तथा अन्य लोग जुलूस में शामिल होकर नारे लगाते हैं तथा आपसी सौहार्द की बात करते हुए शांति की हुंकार करते हैं “दंगा नहीं चाहिए, चाहिए शांति, हिंदू मुस्लिम भाई भाई।
जातिवाद को पांव नहीं रखने देंगे, रखने नहीं देंगे।”

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