Sunday , 18 October 2026
साहित्य

कविता

गौरी तिवारी

 

हां, मैं नहीं हूं बेघर
पर मैंने देखा है
सर्द रात में ठिठुरती जिंदा लाशों को
देखा है मैंने मृत्यु से भयहीन आंखों को
हां, मैं कह सकती हूं
मैंने समझा है
तपती गर्मी में भूख से व्याकुल क्रंदन को
देखा है आशाहीन आंखों में कुछ बची हुई चमक को

हां, मैं नहीं हूं सत्ता
पर मैंने देखा है
झूठे आदर्शों के ढोंग का मुखौटा पहनी सत्ता को
देखा है मैंने जनता को फुसलाती, मदारी सत्ता को
हां, मैं कह सकती हूं
मैंने समझा है
धर्म, जाति के नाम पर दुश्मन बनी जनता को
देखा है मैंने उनके बीच फंसी मासूम जनता की पीड़ा को

हां, मैं नहीं हूं जोगी
पर मैंने देखा है
जोगी के वेष में पाखंडी धूर्तों को
देखा है मैंने उनके ढोंग की पराकाष्ठा को
हां, मैं कह सकती हूं
मैंने देखा है अंधभक्ति की सीमा लांघते भक्तों को
देखा है मैंने जालसाजों के जाल में फंसते बेवकूफों को।।।।।।

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